स्वास्थ्य-रक्षक आरोग्य-सूत्र

(स्वस्थ जीवन की प्राप्ति हेतु विशिष्ट उपाय)

स्वास्थ्य-रक्षक आरोग्य-सूत्र

गर मनुष्य अपनी दिनचर्या को नियमित रखे और छोटे-छोटे तथ्यों का ध्यान रखे और उनका पालन करें, तो सुखमय मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य की प्राप्ति कर दीर्घायु को प्राप्त कर सकता है।
  • जीवन की स्थिरता के लिए प्राकृतिक, सात्त्विक व सहज प्राप्त अन्न (भोजन) सर्वश्रेष्ठ है।
  • शरीर में समता व प्रसन्नता लाने के लिए समुचित रूप में जल का सेवन करना उत्तम है।
  • शरीर में दृढ़ता व स्फूर्ति लाने के लिए शारीरिक व्यायाम सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
  • सब रोगों की एक मात्र निर्विवाद, प्रमाणिक, वैज्ञानिक व प्रभावशाली अनुभूत र्वश्रेष्ठ औषधि प्राण (प्राणायाम) है।
  • समय पर सात्त्विक व संतुलित भोजन करना आरोग्य का सबसे बड़ा मंत्र है।
  • वर्जनीय (दूर से त्याज्य) जनों में, नास्तिक अर्थात् आत्मा-परमात्मा, कर्मफल एवं पुनर्जन्म में विश्वास न करने वाला व्यक्ति प्रथम स्थान पर आता है।
  • व्याधिविनाश के लिए लंघन (उपवास) सर्वश्रेष्ठ है- 'लंघनं परमौषधम्।
  • पाचन शक्ति के अनुसार भोजन करने से जठराग्नि की वृद्धि होती है।
  • आवश्यकता से अधिक भोजन करने से अजीर्ण उत्पन्न होता है तथा स्वास्थ्य की हानि होती है।
  • समय पर भोजन करने से स्वास्थ्य की रक्षा तथा बल की वृद्धि होती है।
  • अनियमित भोजन करने से पाचन-शक्ति में अनियमितता उत्पन्न होती है तथा स्वास्थ्य की हानि होती है।
  • उपवास (सप्ताह में एक बार) करने से शरीर के आमदोष आदि विषैले तत्त्वों का शमन होता है।
  • लम्बे समय तक उपवास रखने से स्वास्थ्य की क्षति होती है।
  • भोजन से तुरन्त पहले एवं तुरत बाद में जल पीने से जठराग्नि मंद होती है।
  • अधिक मात्रा में ठण्डे पेय पदार्थ पीने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है तथा कफ अधिक मात्रा में बनता है।
  • तांबे के पात्र में रखे जल का सेवन यकृत् व प्लीहा के लिए लाभप्रद होता है।
  • ताजी हवा व स्वस्थ वातावरण थकान को दूर कर शरीर में ताजगी व स्फूर्ति उत्पन्न करता है।
  • दिन में भोजन के बाद सोने से कफ  की वृद्धि होती है तथा मोटापा बढ़ता है।
  • बिस्तर पर लेट कर पढऩा आँखों के लिए हानिकारक होता है।
  • मूत्र व पुरीष के वेग को रोकने से आध्मान तथा उदावर्त आदि विकारों की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार छींक आदि अन्य वेग भी न रोकें।
  • ज्यादा बोलने से शारीरिक शक्ति का ह्रास तथा वात की वृद्धि होती है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करने से आयु तथा शारीरिक शक्ति की वृद्धि होती है।
  • स्वच्छंद यौन सम्बन्ध आयु को क्षीण करता है।
  • हस्तमैथुन, मुखमैथुन, समलैंगिक आदि अप्राकृतिक मैथुन व अत्यधिक सम्भोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है तथा तीनों दोषों को अव्यवस्थित व विकृत करता है।
  • दौर्गन्ध्य युक्त साँस, विबन्ध, खराब पाचन क्रिया, मुख की अस्वस्थता तथा मलाशय के अन्दर उपस्थित विषैले पदार्थों का सूचक है।
  • शारीरिक दौर्गन्ध्य शरीर के अन्दर उपस्थित विषैले पदार्थों का सांकेतिक सूचक है।
  • मानसिक शान्ति व प्रसन्नता व्याधि रहित जीवन के लिए सुरक्षित है।
  • मानसिक अप्रसन्नता जीवन के उत्साह एवं स्फूर्ति को नष्ट करती है।
  • तनाव व चिन्ता बीमारियों को उत्पन्न करती है तथा हृदय को कमजोर बनाती है।
  • भय व डर वात को प्रकुपित करता है तथा शारीरिक ऊर्जा को क्षति पहुँचाता है।
  • क्रोध व ईष्र्या पित्त को प्रकुपित करता है तथा शरीर में विषाक्त पदार्थों को उत्पन्न करता है।
  • लालच, अत्यधिक चिन्ता एवं अत्यधिक लगाव कफ की वृद्धि करता है।
  • रात को जल्दी सोएं और प्रात:काल जल्दी उठें, इस प्रकार प्रतिदिन सूर्योदय से डेढ़ घन्टा पूर्व उठें।
  • प्रात: उठकर 2-3 गिलास गुनगुना पानी पीएँ। गुनगुने पानी में आधे नींबू का रस एवं एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से विशेष लाभ होता है। सुबह खाली पेट चाय व कॉफी का सेवन कभी भी न करें।
  • शौच करते समय दाँतों को भींचकर रखने से वृद्धावस्था में भी दाँत नहीं हिलते।
  • प्रात: मुँह में पानी भरकर ठण्डे जल से आँखों में छींटे मारें। अँगूठे से तालू की सफाई करने से आँख, नाक, कान एवं गले के रोग नहीं होते।
  • स्नान करने से पूर्व दोनों पैरों के अंगूठों में सरसों का शुद्ध तेल मलने से वृद्धावस्था तक नेत्रों की ज्योति कमजोर नहीं होती। प्रात: नंगे पाँव हरी घास पर टहलें, इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है। सप्ताह में एक दिन पूरे शरीर की सरसों के तेल से मालिश करें तथा पैरों के अंगूठों व पैर के पंजों की भी मालिश करें।
  • प्रात: दाँतों को साफ करने के लिए नीम या बबूल की दातुन का प्रयोग करें तथा रात्रि को सोने से पहले प्रत्येक बार भोजन लेने के बाद दाँतों के बीच में फँसे अन्न कणों को ब्रश से साफ करें।
  • नहाने के पानी में नींबू का रस मिलाकर नहाने से शरीर की दुर्गंध दूर होती है।
  • प्रतिदिन शौच-स्नान के पश्चात् किसी नजदीकी योग कक्षा में यौगिक जोगिंग, योगासन, प्राणायाम आदि नियमित रूप से करें। प्राणायाम करने से सभी प्रकार के रोग दूर होते हैं तथा शरीर स्वस्थ व मन शान्त रहता है और आत्मबल बढ़ता है।
  • नाश्ते में हल्का तथा रेशायुक्त खाद्य, अंकुरित अन्न, फलों व दलिए का इस्तेमाल करें।
  • भोजन के उपरान्त कम से कम 10 मिनट तक वज्रासन में बैठें। यदि सम्भव हो तो रात्रि के भोजन के बाद थोड़ा भ्रमण करें।
  • दिन में कम से कम 8 से 12 गिलास (ढाई से तीन लीटर) पानी जरूर पीएँ।
  • सदैव रीढ़ (कमर) को सीधी रखकर बैठें। जमीन पर बैठकर बगैर सहारे के उठें। नाखुनों को दाँतों से कभी न काटें।
  • खाने के दौरान पानी न पीएँ। खाने के आधा घण्टे पहले तथा आधा घण्टे बाद पानी का सेवन करें। सदैव पानी घूँट- घूँट करके पीएँ।
  • शाकाहारी सुपाच्य, सात्त्विक भोजन भूख लगने पर ही चबा-चबाकर खाएँ। फास्ट-फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, धूम्रपान, माँस मदिरा का प्रयोग कभी भी न करें।
  • कम खाएँ, जीवन जीने के लिए खाएँ, न कि खाने के लिए जीएँ। अपने अमाशाय का आधा भाग भोजन, चौथाई भाग पानी तथा शेष चौथाई वायु के लिए रखें। देह को देवालय बनाएँ, कब्रिस्तान नहीं।
  • पानी हमेशा बैठकर ही पीएँ खड़े होकर पीने से घुटनों में दर्द होने लगता है।
  • भोजन हमेशा धरती पर बैठकर ही करें, खूब चबा-चबाकर खाएँ। भोजन करने समय मौन रहें, शोर न करें, पूरा ध्यान खाने पर ही रखें। भोजन करते समय टेलीविजन न देखें।
  • भेाजन से पूर्व ईश्वर का स्मरण करें तथा भोजन को ईश्वर का प्रसाद मानकर ग्रहण करें।
  • भोजन में हरी सब्जी व सलाद का अधिक से अधिक प्रयोग करें। अधिक गर्म और ण्डी वस्तुएँ पाचन क्रिया के लिए हानिकारक हैं, भोजन में मिर्च-मसालों का प्रयोग कम करें। प्रतिदिन मौसम के फलों का प्रयोग स्वास्थ्य के  लिए अति उत्तम है। फलों को भोजन के साथ न लेकर अलग से भोजन से पहले खाएँ। भोजन के तुरन्त बाद आईसक्रीम न खाएँ।
  • खाने के पश्चात लघुशंका अवश्य करें।
  • रात का खाना सोने के 2 घंटे पहले खाएँ, खाने के बाद थोड़ी चहल कदमी करें, खाने के तुरन्त बाद न लेटें। बिना तकिए के सोने से हृदय और मस्तिष्क मजबूत होता है।
  • सांस हमेशा नाक से ही लें व छोड़ें। ईश्वर ने मुख खाने के लिए दिया है, मुख से सांस नहीं लेना चाहिए।
  • फल तथा सब्जियों को अच्छी तरह धोकर प्रयोग करें। छिलके वाली दालों का ही सेवन करें।
  • सोने के लिए अधिक नर्म बिस्तर का प्रयोग न करें, डनलप के गद्दे का प्रयोग हानिकारक है।
  • जीवन में वाणी, व्यवहार व विचार के दोषों को दूर करने के लिए तथा जीवन पथ पर आगे बढऩे के लिए प्रतिदिन सायंकाल या रात्रि शयन पूर्व थोड़ी देर धैर्यपूर्वक आँखें बंद करके आत्मनिरीक्षण करें, और जीवन में अष्टांग योग को अपनाने के लिए पुरुषार्थ करें। मुँह ढककर न सोयें। रात को कमरे में सोते समय वायुसंचार को पूर्णतया अवरुद्ध न करें। बायीं करवट सोने से दायाँ स्वर चलता है, जो भोजन पचाने में सहायक है।
  • उत्तर तथा पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने वालों की आयु क्षीण होती है। पूर्व तथा दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने वालों की आयु दीर्घ होती है।
  • पीने का पानी एवं अन्य खाद्य पदार्थ भी स्वच्छ होने चाहिए क्योंकि अस्वच्छता से अनेक रोगों की उत्पत्ति होती है।
  • नशीले पदार्थों के सेवन से तन, मन, धन, धर्म व आत्मा की हानि एवं अपनी तथा परिवार की बदनामी होती है।
  • हर परिस्थिति में सदैव प्रसन्न एवं उत्साहित रहें। उत्साह का परिणाम- सफलता तथा निराशा का परिणाम असफलता होती है। प्रसन्नता स्वास्थ्य की सबसे बड़ी कुंजी है। हर रोज खुलकर खिलखिलाकर हँसें। हँसना ही जीवन है।
  • आलस्य विलासिता तथा नींद को जितना बुलाएँगे, ये उतने ही ज्यादा नजदीक आएँगे। अत: इनसे दूरी बनाए रखें।
 

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