जीवन के तथ्य एवं सत्य

जीवन के तथ्य एवं सत्य

आचार्य बालकृष्ण

    जीवन में दो बातें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। एक परिस्थिति एवं दूसरी मन:स्थिति। परिस्थितियाँ जीवन में एक जैसी नहीं हो सकती, क्योंकि इस संसार में हमारे अलावा बहुत बड़ी रचना है, मनुष्य एवं मनुष्येतर करोड़ों जीव एवं जड़ चेतन जगत् का अस्तित्व है तथा संसार मेें जो कुछ घटित हो रहा है उसके प्रभाव व परिणाम से हम अछूते नहीं रह सकते।
अत: परिस्थितियाँ कभी भी पूर्णरूप से हमारे अनुकूल हो ही नहीं सकती, इसलिए विवेकशील मनुष्य को बाहर की परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अपनी मन:स्थिति को सदा ऊँचा, समतापूर्ण एवं दिव्य रखकर सदा कत्र्तव्यनिष्ठ, सहज, प्रसन्नचित्त व आनन्दित रहना चाहिए।
पराधीनता व स्वाधीनता
गुलामी तथा आजादी कभी भी पूर्ण रूप से हमारे जीवन में कभी भी नहीं होती है। हम कुछ अर्थों में सदा स्वतंत्र (आजाद) रहते हैं तथा जीवन के कुछ ऐसे पहलु हैं, जहाँ हम पराधीन ही रहते हैं। कभी-कभी पराधीनता में भी हमारे जीवन का निर्माण व विकास होता है और हम पूर्ण रूप से सुखी, स्वस्थ, प्रसन्नचित्त व आनन्दित होते हैं तथा हमारे जीवन का पूर्ण विकास भी होता है। जैसे विवेकी माँ केगर्भ में तथा गुरु कुल में विवेकी गुरु के गर्भ या आश्रय में पूर्ण पराधीन रहकर भी हम पूर्ण स्वाधीन ही होते हैं।
मूलत: एक बहुत बड़ा सिद्धान्त है स्वाधीनता या आजादी का कि हमारी किसी भी प्रकार की वैयक्तिक, पारिवारिक, व्यवसायिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक या राजनैतिक आजादी से किसी अन्य की आजादी बाधित नहीं होनी चाहिए। यदि हमारे आहार, विचार, वाणी, व्यवहार या अभिव्यक्ति आदि की आजादी किसी भी मनुष्य या मनुष्येत्तर जड़, चेतन, जीव जगत् की आजादी खतरे में पड़ती है या उसको हानि पहुँचती है, तो यह आजादी नहीं अपराध होता है।
अन्तद्र्वन्द्व
हमारे व्यक्तिगत जीवन से लेकर पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व राजनैतिक जीवन में बहुत बड़े अन्तद्र्वन्द्व हैं। इसी अन्तद्र्वन्द्व से समाज में कलह, लड़ाई, झगड़ा, हिंसा, क्रूरता, अन्याय, शोषण, युद्ध, 'गृह युद्धएवं विश्वयुद्ध जैसी परिस्थितियों का भी निर्माण होता है। अत: संसार के सभी जिम्मेदार बड़े लोगों का कत्र्तव्य है कि समाज, राष्ट्र व विश्व में संघर्ष, वैर-विरोध या युद्ध के सूत्र न खोजें, क्योंकि जातियों, पंथों, देशों एवं दुनिया में अतीत में जो कुछ घटित हुआ, उससे हम अच्छी या बुरी दोनों ही बातों को ले सकते हैं। अत: समझदारी व जिम्मेदारी इसमें है कि हम अतीत की बातों को भुलाकर वर्तमान में एकता, समानता, न्याय, बन्धुत्व, प्रेम, सद्भावना, सामंजस्य व सह-अस्तिव के साथ आगे बढ़ें। समाज की सभी विषमताओं, अन्याय, अनीति, हिंसा, वैर व प्रतिशोध को खत्म करके सभी व्यष्टि व समष्टिगत अन्तर्विरोधों व अवरोधों से बाहर निकलकर एक स्वस्थ, समृद्ध, सुखी, सफल, विकासशील व प्रगतिशील भविष्य का निर्माण करें।
तुलना संबंधों में नहीं
राजनैतिक जीवन में, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यवसाय या अन्य व्यवहारिक क्षेत्रों में जहाँ हम विभिन्न पहलुओं की तुलनात्मक समीक्षा करके अपने लिए श्रेष्ठ विकल्प या चयन कर सकते हैं, करने चाहिए। लेकिन व्यक्तिगत सम्बन्धों एवं पारिवारिक सम्बन्धों यहाँ तक कि महापुरुषों में तुलना करने पर संघर्ष, विवाद एवं कई बार तो युद्ध या गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन जाती है। मैं महान् हूँ, तुम निकृष्ट या नीच हो, माँ अच्छी है, पिता जी बुरे हैं। पति अच्छे है, पत्नि बुरी है। माँ अच्छी है, स्त्री बुरी है। ये सोच विचार व व्यवहार ठीक नहीं है। ये महापुरुष अच्छे हैं, महान् हैं। ये महापुरुष उनसे छोटे हैं। महापुरुषों के योगदान में न्यूनाधिकता हो सकती है, लेकिन उन सबका जीवन महान् होता है। लेकिन कुछ लोगों को महापुरुषों के नाम पर थोप दिया गया है। लेकिन वे यदि हमारे सभी पूर्वज महापुरुषों का अनादर करें, उन पर ओछे, घटिया आधार रहित झूठे मनघड़न्त निकृष्ट आरोप लगायें, वे तो महापुरुष की श्रेणी में ही नहीं आते। भले ही उन्होंने कुछ अच्छे काम भी किये हों, लेकिन कुछ अच्छे कामों की वजह से हम उन्हें महापुरुष या भारत के महान् आदर्शों की श्रेणी में नहीं रख सकते। निष्कर्ष यह है कि सात्त्विक महापुरुषों या यथार्थ में जिनका जीवन महान् रहा है, उन महापुरुषों की भी कभी तुलना या अपमान नहीं करना। संबंधों एवं परस्परता में तुलना न करके एक दूसरे की पूरकता में काम, सेवा, सहयोग, सम्मान, सद्भाव एवं एकात्मभाव से अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सब प्रकार से परस्पर सुख, समृद्धि, शान्ति, सद्भावना व आत्मीयता को बढ़ाना।
'रामराज्य
दीर्घकाल के धैर्य, संघर्ष, साधना एवं सरकार की राजनैतिक इच्छा शक्ति व पराक्रम से राम मंदिर तो अब निश्चित रूप से बनेगा। यह राष्ट्र का परम सौभाग्य होगा। राम को जो महापुरुष, अवतारी पुरुष या भगवान् या अपना महान् पूर्वज किसी भी रूप में मानते हैं, सभी के लिए परम गौरव का अवसर है। राम मंदिर के साथ-साथ राम एवं सीता जैसा व व्यापक रूप से कहें तो अपने महान् पूर्वजों जैसा हमारा चरित्र हो, इसके लिए हम सब साधना, पुरुषार्थ या चरित्र निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण के लिए परम पुरुषार्थ करें। यह सबका दृढ़ संकल्प होना चाहिए। भगवान् श्रीराम को हम मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं एवं माता सीता को प्रत्येक अग्नि परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली परम सत्य की उपासक व पूर्ण पवित्रता का स्वरूप मानते हैं। हम सबके जीवन में आहार, विचार, वाणी, व्यवहार, स्वभाव व आचरण की दृष्टि से पूर्ण मर्यादित हों। हम मानव की मर्यादा, माता-पिता की मर्यादा, गुरु-शिष्य की मर्यादा, देश के नागरिक की मर्यादा का पूरा पालन करके जीवन को आदर्श रूप से जीने के लिए संकल्पित होंगे तभी राष्ट्र में रामराज्य आयेगा।

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