राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा वैचारिक या बौद्धिक आतंकवाद

राकेश कुमार,  मुख्य केन्द्रीय प्रभारी, पतंजलि योग समिति

पुरातन काल से ही भारत एक सहिष्णु व उदार राष्ट्र रहा है। एक तरफ यहाँ पर ईश्वर को मानने वाले अनेकों दर्शन हैं, वहीं दूसरी ओर नास्तिक दर्शन चार्वाक को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यही क्षमा, दया, सहनशीलता, परस्पर सद्भाव, एक दूसरे के विचारों का सम्मान व सर्वसमावेशी होने का भारत का स्वाभाविक स्वभाव रहा है। भारत की वैदिक सनातन संस्कृति की विशेषता रही है कि यहाँ पर अपनी विचारधारा थोपी नहीं जाती बल्कि आत्म चिंतन, मनन-मंथन से अनेकों प्रश्नों के बाद जो उत्तर निकले वह यहाँ का स्वभाव है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हमारी इसी उदार प्रकृति का ही सहारा लेकर विकृति उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है। हमारी सहनशीलता की परीक्षा लेकर बार-बार हमारी अखण्डता को खण्डित करने का, भारत की सभ्यता, संस्कृति, मर्यादा व परम्पराओं को तोड़कर देश के ही अलग-अलग वर्ग-मत-पंथ और जातियों में संघर्ष करके तोडऩे का जब षड्यन्त्र चलता है तो राष्ट्रवादी सात्त्विक शक्तियों को आत्म-चिन्तन की आवश्यकता है। श्री राजीव मलहोत्रा जी ने दशकों के शोध से यह निष्कर्ष निकाला कि विघटनकारी शक्तियाँ षड्यन्त्रपूर्वक अन्तर्राष्ट्रीय ताकतों से सम्पर्क करके तथा देश में ही विभाजनकारी शक्तियों से गठजोड़ करके देश तोडऩे के काम में लगी हैं। विगत 200 वर्षों में कैसे भारत में मुख्यधारा से अलग द्रविड़ और दलित  की अलग पहचान देने और अलग-अलग जातियों के नाम पर देश को तोडऩे के लिए कैसे विदेशी तन्त्र कार्य कर रहा है।
राजीव मलहोत्रा जी आगे कहते हैं- '1990 के दशक में प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी के एक विद्वान् ने बताया की वे 'एफ्रो-दलित प्रोजेक्ट’ के सिलसिले में भारत से लौटे हैं। और जानकारी लेने से पता चला, अमेरिका के पैसे से चलने वाला यह प्रोजेक्ट भारत के दलितों को 'भारत के Black और गैर दलितों को 'भारत के White की तरह दिखाने का प्रयास है। अमेरिका के काले-गोरे के नस्लवाद और दास प्रथा के इतिहास को उठाकर भारत पर थोपने और इस बहाने से यहाँ सामाजिक वैमनस्य पैदा करने का प्रयास है।’
                मैंने खोज की कि भारत में द्रविड़ और आर्य जातियों की अवधारणा कहाँ से आई? आर्य और द्रविड़ जातियों की पहचान भारत में अंग्रेजी उपनिवेशवाद की उपज है,19वीं शताब्दी के पहले इसका कोई अस्तित्व नहीं था।
                इसके लिए विदेशों से धर्म परिवर्तन के नाम पर मिशनरियों को धन उपलब्ध करवाया जाता है तथा स्थानीय स्तर पर गैर सरकारी संगठनों को फंडिंग करके सभाओं, वर्कशॉप व बैठकों के माध्यम से अपनी षड्यन्त्रकारी विचाराधारा के लिए कैडर तैयार करवाकर देश को कमजोर करने की साजिश चल रही है।
                देशविरोधी मानसिकता वाले लोगों को विदेशी पुरस्कारों से सम्मानित करना कृत्रिम बुद्धिजीवी तैयार करके देश को अलग-अलग जातियों में विचाराधाओं में तोडऩे के लिए लेख लिखना, पुस्तकें प्रकाशित करना, सोशल मीडिया के माध्यम से किसी एक विशेष वर्ग व समाज को शोषित, वंचित, दलित या मानवाधिकार, विकास व शोषण के नाम पर भ्रमित करना, पुराने समय में जहाँ तलवार व बन्दूक से होता था, अब युद्ध व आक्रमण के तरीके बदल गये हैं। अब युद्ध में कलम ने बन्दूक की जगह ले ली है, मोबाईल की टच-स्क्रीन, कम्प्यूटर का की-बोर्ड आधुनिक हथियार बन गये हैं।
                विषैला विचार देश की सीमाओं पर नहीं, बल्कि सामान्य नागरिकों के मस्तिष्क पर हथियार काम करता है। गोली का असर एक बार होता है। लेकिन विषैले विचार का असर बार-बार होता है तथा विषैले विचार से केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज व राष्ट्र को घायल किया जा सकता है। सोशल मीडिया के माध्यम से देश के युवाओं को भ्रमित करने का कार्य भी यह वैश्विक ताकतें भारत को तोडऩे के लिए कर रही हैं। देश हित में बौद्धिक चिन्तन करके सकारात्मक विचार देने वालों से अलग देश के अंदर ही बौद्धिक आतंकवाद या वैचारिक आतंकवाद फैलाने वाले वर्ग का उदय हो रहा है जो जंगल में पाये जाने वाले हथियार बंद लोगों या आतंकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक है।
जैसे जंगलों में नक्सलवादी, माओवादी, अलगाववादी विचारधारायें हथियारबंद होकर राज्य पर आक्रमण करती हैं, तो इन्हें नक्सलवादी आतंकवादी कहा जाता है और छद्म लेखक, पत्रकार, वकील, समाजिक कार्यकत्र्ता एक्टिविस्ट के नाम पर, कलम की-बोर्ड कैमरे से वैचारिक स्तर पर जब पढ़े-लिखे लोग शहर में किसी बन्द स्टूडियो या किसी विश्वविद्यालय के ए.सी. कमरों में बैठकर इन हथियारबंद नक्सलवादियों को, अलगाववादी, आतंकवादियों को अपना बौद्धिक व कानूनी समर्थन उपलब्ध करवाते तो इन्हें अर्बन नक्सलवादी या वैचारिक आतंकवादी ही कहा जाता है।
                युद्ध रणनीतिज्ञ विलियम एस लिंड ने अपनी पुस्तक 'फोर्थ जनरेशन वारफेयरमें कहा है कि 'युद्ध की यह रणनीति समाज में सांस्कृतिक संघर्ष के रूप में दरार उत्पन्न करने पर टिकी होती है। इस प्रकार से देश को नष्ट करने के लिए बाहर से आक्रमण करने की कोई आवश्यकता नहीं होती, वह भीतर ही भीतर स्वयं ही टूट जाता है।
शहरी नक्सलवाद भी सांस्कृतिक उदारतावाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अपने मंसूबों को अंजाम देने में लगा है। इसका खतरा और साजिश इतनी खतरनाक है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट देकर यहाँ तक कहा कि 'अर्बन नक्सल और उनके समर्थक जंगलों में घुसपैठ किए बैठी उनकी सेना से भी अधिक खतरनाक हैं।ये तथाकथित बुद्धिजीवी मानवाधिकार और असहमति के अधिकार की आड़ लेकर सुरक्षा बलों की कार्रवाही को कमजोर करने के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेते हैं और झूठे प्रचार के जरिए सेना आदि को बदनाम करते हैं।
                इस प्रकार यह बौद्धिक आतंकवादी, नक्सलवादी, उग्रवादी आतंकवादियों को भी कई बार मानवाधिकार व मीडिया प्रशासन पर दबाव बनाकर लोगों को बचा ले जाते हैं और खुद इतने शातिर होते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी स्वतन्त्रता आदि के आड़ में कानून का सरेआम मखोल बनाते हैं।
                लेकिन अब देश ऐसे अर्बन नक्सलवादियों या बौद्धिक आतंकवादियों के असली चेहरे को पहचान रहे हैं राष्ट्रीय स्तर अब राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी व समाज का नेतृत्व करने वाले लोगों द्वारा इनके खिलाफ  आवाज उठ रही है और लोग अलग-अलग जातियों के नाम पर, वर्गों के नाम पर, मीडिया का दुरुपयोग करके इनके द्वारा किये जा रहे षड्यन्त्र को जनसाधारण के बीच में जागरूक कर बेनकाब कर रहे हैं।
अभी कुछ दिन पहले विश्वविख्यात योगगुरु पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने भी राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया के सामने इस अदृश्य खतरे के बारे में खुलकर चर्चा की। पूज्य स्वामी जी कहते हैं कि 'मैं चार बात एक साथ कहता हूँ, इस देश में जो वक्त चल रहा है और अब जो आने वाला वक्त है, इसमें Social media का Impact बहुत बढ़ रहा है। फेसबुक, यू-ट्यूब, गूगल आदि का दुरुपयोग कर कुछ विध्वंसक (Destructive) लोग देश के अंदर नफरत व घृणा की राजनीति कर रहे हैं।
दूसरी तरफ साथ ही मैं बहुत देखता हूँ ऐसी चीजें, फेसबुक पर, ट्विटर पर बहुत अधिक मात्रा में वैचारिक नकारात्मकता है, Positive चीजें तो है ही नहीं, हम तो 99% Positive में जीते हैं 1% जो Negative लोग होते हैं। ऐसे लोग जो ऐसी विचारधारा के समर्थक हैं, जो कहते हैं ईश्वर को मानने वाले मूर्ख होते हैं, उसकी पूजा करने वाले महाधूर्त होते हैं, ईश्वर तो सबसे बड़ा शैतान है और पता नहीं क्या-क्या बकवास करते हैं? ऐसी विचाराधारा समाज को तोडऩे वाली विचाराधारा है।
                मुझे कम्युनिस्ट भाइयों से कोई Problem नहीं है, वो अलग view रखें और वो उनका अधिकार है, लेकिन इस देश के लिये लेनिन, माक्र्स, माओ कभी आदर्श नहीं हो सकते, और हमें आयातित अपसंस्कृतियों की आवश्यकता नहीं है। हमारी सांस्कृतिक विचारधारा बहुत सशक्त व समृद्ध है, हमें किसी विदेशी विचारधारा की आवश्यकता नहीं है।
                जहाँ तक Confucius हैं, वो तो एक महात्मा व्यक्ति था, लेकिन उसके  शिष्यों ने भी उनकी विचारधारा को तोड़मरोड़ कर गलत स्वरूप दे दिया।
हम अम्बेडकर साहब का एक देश, एक कानून और जाति मुक्त भारत, समानता, न्याय जो उनके संकल्प थे उनके पूर्ण समर्थक हैं। हम उनकी इस विचारधारा पोषक हैं। मैं तो दलितों से खूब मुहब्बत करता हूँ, मेरे यहाँ पर रसोई से लेकर के, मेरे हर काम में दलित होते हैं, हर जगह, हम कोई भेद-भाव नहीं रखते। योग्यतानुसार हमनें उनको आचार्य बनाया, संन्यासी बनाया, दलितों को, वाल्मीकियों को, वनवासियों को और OBC को अपने institutions का Head बनाया। लेकिन कुछ लोग अलग-अलग तरीके से समाज को तोडऩे व बांटने की कोशिश करते हैं। यह ठीक नहीं है। किसी भी राष्ट्र में ऐसी नकारात्मक विचाराधारा को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए इस गम्भीरता से लेकर देश की सरकार को यह कानून बनाना चाहिये, ऐसी आभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को बर्बाद करने वाले, ऐसे देश तोडऩे वाले नकारात्मक कन्टेन्ट को हटा देना चाहिए जो देश में Destruction की बात करते हैं।
                मैंने कहा मुझे ओवैसी से कोई घृणा नहीं है, उसमें भी एक ही आत्मा है, एक ही परमात्मा है, एक ही भगवान् है, लेकिन जो ओवैसी के जो नाकारात्मक विचार हैं, वो बड़े जहरीले हैं, उन विचारों से, मुझे घृणा है, वो कहते हैं OBC एक हो जाओ, सबको गाली देते हैं, ऋषि, मुनि, सब पूर्वजों को, भगवान् योगेश्वर कृष्ण व सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी दलित पिछड़े सवर्ण के नाम पर जो बांटने का काम करते हैं हम सब उसके खिलाफ हैं। हम सब एक ईश्वर, परमपिता परमात्मा की संतान हैं। हम सभी समान व सभी महान्हैं।
पूज्य स्वामी जी कहते हैं 'साजिश पूर्वक अपने मूल विचार से, अपनी मूल संस्कृति से, प्रकृति से, मूल सभ्यता से, अपने ही पूर्वजों की सात्विक विरासत से, वैज्ञानिक विरासत से हमें हटा कर के भ्रमित करने की कोशिशें हो रही हैं। देश में, यह वैचारिक आतंकवाद बड़ा खतरनाक है।
 
 

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