शीतकाल में स्वास्थ्यकर आहार-विहार

शीतकाल में स्वास्थ्यकर आहार-विहार

आचार्य विजयपाल प्रचेता  पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार

आयुर्वेद में वर्ष के मुख्यतः तीन विभाग बताये हैं- वर्षाकाल, शीतकाल एवं उष्णकाल (गर्मी)। इनमें प्रत्येक काल चार-चार मास का होता है, अत एव वर्षाकाल के चार मासों को चौमासा भी कहते हैं। वर्षाकाल के अनन्तर शीतकाल आता है। इसमें मार्गशीर्ष, पौष, माघ एवं  फाल्गुन, ये चार मास आते हैं।
अब मार्गशीर्ष मास चल रहा है। इसका आरम्भ नवम्बर के दूसरे सप्ताह से हुआ है। यह शीतकाल मार्च के पूर्वार्ध तक रहेगा। इस काल-विभाग का निर्देश प्राचीन संहिताओं में इस प्रकार मिलता है-
त एते वर्षाशीतोष्णा रविवत्र्मवशात् त्रय:। (सिद्धसारसंहिता- 1.9)
अर्थात् बारह मास एवं छह ऋतुओं वाले वर्ष में वर्षा, शीत तथा उष्णता के आधार पर चार-चार मास के तीन भाग बनते हैं। इनमें शीतकाल स्वास्थ्य एवं बलवृद्धि के लिए सर्वोत्तम होता है।
शीतकाल में जठराग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल होती है, इसका कारण इस प्रकार बताया गया है-
शीते शीतानिलस्पर्शसंरुद्धो बलिनां बली।
पक्ता भवति हेमन्ते मात्राद्रव्यगुरुक्षम:।।
(चरक, सूत्र- 6.9)
अर्थात् शीतकाल में शरीर पर शीतल वायु का स्पर्श होने से शरीर की उष्णता बाहर न निकलकर अन्दर ही अवरुद्ध हो जाती है, इससे कायाग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल हो जाती है। यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति ग्रीष्मकाल में शीतल जल से स्नान करता है तो उसके स्पर्श से शरीर की उष्णता बाहर न निकलकर अन्दर ही सञ्चित हो जाती है। इससे जठराग्नि तीव्र हो जाती है। इसीलिए हमें स्नान के बाद भूख की अनुभूति विशेष रूप से होती है। अतएव नित्यकर्म-विधान में भजन एवं भोजन से पूर्व स्नान आवश्यक माना गया है ।
इस प्रकार पूर्वोक्त प्रतिपादन से सिद्ध होता है कि बाहरी वातावरण में विद्यमान शीतलता के प्रभाव से हमारी पाचनशक्ति तीव्र हो जाती है। इससे स्निग्ध एवं पौष्टिक भोजन का पाचन सरलता से हो जाता है और बलवृद्धि होती है। इस प्रकार शीतकाल विशेषकर बल एवं आरोग्य देने वाला माना गया है। इसी दृष्टि से गीता में मार्गशीर्ष मास को सर्वश्रेष्ठ मास कहा गया है-
मासानां मार्गशीर्षोऽहम् (गीता-10.35)
मार्गशीर्ष का दूसरा नाम अग्रहायण भी है। इसका अर्थ है कि यह मास पूरे हायन (वर्ष) में अग्र (उत्तम) है, क्योंकि इसमें बल एवं आरोग्य की वृद्धि होती है।
व्यायामशील व्यक्ति को इस ऋतु में स्निग्ध, अम्ल एवं लवण रस युक्त भोजन करना चाहिए। गोरस (दूध, दही, छाछ, मक्खन, घृत), पुराना गुड़, तिल, तिलतैल, ओदन आदि का सेवन उचित है। इस काल में उष्ण जल का सेवन करना चाहिए-
तस्मात्तुषारसमये स्निग्धाम्ललवणान् रसान्।
गोरसानिक्षुविकृतीर्वसां तैलं नवौदनम्।
हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुष्णं चायुर्न हीयते।।
(चरक, सूत्र-6.11,13)
यहाँ एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है कि इस काल में उष्ण जल पीने वाला विशेष रूप से स्वस्थ रहता है। इसके पीछे यह रहस्य है कि इस ऋतु में प्राय: स्निग्ध भोजन लिया जाता है। घृत, दुग्ध आदि की स्निग्धता के ऊपर उष्ण जल पीने से उसका पाचन अच्छी तरह हो जाता है। अत: आयुर्वेद में जगह-जगह स्निग्ध पदार्थों का अनुपान उष्ण जल बताया गया है। इसके विपरीत जो स्निग्धभोजी व्यक्ति इस ऋतु में शीतल जल का पान करते हैं, उनके भोजन का अच्छी तरह से पाचन नहीं होता है। उन्हें मन्दाग्नि, प्रतिश्याय (जुकाम), कण्ठविकार एवं अन्य कफजन्य रोग हो जाते हैं। अत: इस ऋतु में उष्ण जल का सेवन अवश्य करना चाहिए। ध्यान रहे कि जल अति उष्ण भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि अत्यन्त उष्ण एवं अत्यन्त शीतल भोज्य एवं पेय पदार्थ हमारी पाचन शक्ति को बाधित करते हैं। अत: उबालकर रखा हुआ मध्यम उष्णता वाला जल इस ऋतु में विशेष रूप से हितकर होता है। जल पीने के विषय में हमें आयुर्वेद के इस नियम का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए-
अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं निरम्बुपानाच्च स एव दोष:।
तस्मान्नरो वह्निविवर्धनार्थं मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि।।
(सुषेणनिघण्टु, पानीयवर्ग-71)
अर्थात् बहुत अधिक पानी पीने से भोजन नहीं पचता है और सर्वथा पानी न पीने से भी वही (भोजन का न पचना) दोष होता है। अत: भोजन के पाचन एवं जठराग्नि की वृद्धि के लिए मनुष्य को बार-बार थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहना चाहिए।
व्यायाम
शीतकाल में पौष्टिक भोजन के साथ व्यायाम अत्यन्त आवश्यक है। आयुर्वेद में शीतकाल में व्यायाम को अत्यन्त हितकर बताया है-
व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम्।
स शीते च बसन्ते च तेषां पथ्यतमो मत:।।
अर्थात् स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान् व्यक्तियों के लिए व्यायाम सदा ही पथ्य (हितकर) होता है, किन्तु शीतकाल तथा वसन्तकाल में वह बहुत ही हितकर होता है।
सुश्रुतसंहिता में भी स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हितकर साधनों में व्यायाम को गिना है-
ब्रह्मचर्य-निवातशयन-उष्णोदकस्नान-निशास्वप्न-व्यायामाश्च एकान्तत: पथ्यतमा:। (सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान- 20.6)
अर्थात् ब्रह्मचर्य, निवातशयन (ऐसे स्थान पर सोना जहाँ सीधी वायु न लगे), उष्ण जल से स्नान, रात्रि में शयन एवं व्यायाम करना, ये पाँच कार्य स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यन्त हितकर होते हैं।
रात्रि में निद्रा लेना और व्यायाम करना, ये भोजन पाचन के लिए भी अत्यन्त आवश्यक हैं। इस रहस्य को वैद्य सुषेण इस प्रकार प्रस्तुत करते है-
स्थाल्यां यथाऽनावरणाननायां न घट्टितायां न च साधुपाक:।
अनाप्तनिद्रस्य तथा नरेन्द्र व्यायामहीनस्य न चान्नपाक:।।
(सुषेणनिघण्टु-व्यायामवर्ग-7)
अर्थात् जैसे ढ़क्कन रहित पाकपात्र में डाला गया अन्न कर्छी से बिना चलाए ठीक प्रकार से नहीं पकता है, इसी प्रकार नींद न लेने वाले और व्यायाम न करने वाले व्यक्ति का खाया हुआ अन्न भी अच्छी तरह से नहीं पचता है। व्यायाम के महत्त्व का उल्लेख करते हुए वैद्य सुषेण कहते है-
सामथ्र्यं सकलक्रियासु लघुतामंगेषु दीप्तिं परा-
मग्ने: पाटवमिन्द्रियेषु लघुतां छेदं परं मेदस:।
उत्साहं मनस: शरीरदृढतां शान्तिं बलाद् व्यापदां
व्यायाम: शिशिरे वसन्तसमये कुर्याद्धिमे सेवित:।।
अर्थात् हेमन्त, शिशिर एवं वसन्त में व्यायाम विशेष रूप से हितकर होता है। व्यायाम सभी शारीरिक व मानसिक क्रियाओं में सामथ्र्य बढ़ाता है। इससे शरीर में स्फूर्ति और मन में उल्लास एवं उत्साह बढ़ता है। अत: व्यायाम करने वाला अवसाद (डिप्रेशन) से सदा मुक्त रहता है। व्यायाम अंगों में कान्ति पैदा करता है और जठराग्नि को तीव्र करता है, यह मोटापे को विशेष रूप से दूर करता है। इससे इन्द्रियों में लघुता एवं शरीर में दृढ़ता आती है। यह रोगों को हठात् शान्त कर देता है। अत: हेमन्त, शिशिर, एवं वसन्त में अवश्य ही व्यायाम करना चाहिए। अन्य ऋतुओं में भी हल्का व्यायाम आवश्यक है।
तैलाभ्यंग (तेल मालिश)
शीतकाल में व्यायाम से पहले सरसों या तिल के तैल से मालिश करनी चाहिए। आयुर्वेद में इसे विशेष रूप से हितकर बताया गया है। इससे बलवृद्धि एवं शरीर में दृढ़ता आती है। तैलाभ्यंग से सभी वात-विकारों का शमन हो जाता है। पैरों पर विशेष रूप से तेलमालिश का निर्देश मिलता है-
व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्यामुद्वर्तितस्य च।
व्याधयो नोपसर्पन्ति सिंहं क्षुद्रमृगा इव।।
(सुश्रुत, चिकित्सा-24.43)
व्यायाम से शरीर को थका देने वाले तथा पैरों पर अभ्यंग करने वाले व्यक्ति के पास रोग वैसे ही नहीं फटकते जैसे सिंह के पास मृग।
सूर्यनमस्कार एवं दण्ड बैठक
शीतकाल में मालिश के उपरान्त सूर्यनमस्कार एवं दण्डबैठक बहुत उपयोगी व्यायाम हैं। इन्हें अपनी सुविधानुसार घर में या बाहर भी किया जा सकता है। सूर्यनमस्कार से शरीर में लोच एवं स्फूर्ति बनी रहती है और दण्डबैठक से बलवृद्धि विशेष रूप से होती है। इन दोनों व्यायामों को प्राणायाम पूर्वक करने से आशातीत एवं चमत्कारी लाभ होते हैं। जो किशोर, युवक या अधेड़ अवस्था वाले दुबले-पतले व्यक्ति हृष्ट-पुष्ट होना चाहते हैं, उन्हें शीतकाल में पहले दस मिनट तेल मालिश करनी चाहिए, तदनन्तर अपने सामथ्र्य के अनुसार धीरे-धीरे बढ़ाते हुए दण्डबैठक का व्यायाम करना चाहिए। ध्यान रहे दण्डबैठक राममूर्ति की विधि से प्राणायाम के साथ करें।
इसके उपरान्त सुखपूर्वक शरीर का मर्दन करें। कुछ सुस्ताकर उष्ण जल से स्नान करें, ध्यान रहे सिर पर उष्ण जल न डाले। सिर पर ताजा जल का प्रयोग करें। वाग्भट ने कहा है-
उष्णाम्बुनाध: कायस्य परिषेको बलावह:।
तेनैव तूत्तमाङ्गस्य बलहृत् केशचक्षुषाम्।।
(अष्टांगहृदय, सूत्र- २.१७)
अर्थात् सिर को छोड़कर शरीर पर उष्ण जल डालकर स्नान करने से बलवृद्धि होती है, परन्तु सिर पर गर्म जल डालने से नेत्र एवं केश कमजोर हो जाते हैं। शीतकाल में उचित मात्रा में खजूर या मुनक्का डालकर गर्म किया हुआ दूध विशेष रूप से पुष्टि कर होता है। यथासमय मित मात्रा में पौष्टिक, स्निग्ध एवं सात्त्विक भोजन लें। दूध-दही की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए। रात को दूध में एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण मिलाकर सेवन करें। दिनचर्या नियमित रखें। संयम पूर्ण जीवनचर्या अपनाएं। इस प्रकार निरंतर करने से तीन महीने में शरीर हृष्ट-पुष्ट हो जाता है। आयुर्वेद में मालिश का चमत्कारी प्रभाव बताया गया है। इससे दुर्बल व्यक्ति के शरीर के संकुचित स्रोत खुल जाते हैं और वह शीघ्र ही पुष्ट होने लगता है। जो स्थूल व्यक्ति मालिश करते हैं उनका मोटापा भी कम हो जाता है, क्योंकि तेल स्रोतों में प्रविष्ट होकर अनावश्यक वसा को पिघलाकर कम कर देता है। इसलिए आयुर्वेद में तेलमालिश का यह विचित्र प्रभाव विशेष बल देकर बताया गया है कि इससे पतले व्यक्ति हृष्ट-पुष्ट हो जाते हैं और मोटे व्यक्ति मोटापे से मुक्त होकर संतुलित शरीर वाले हो जाते हैं। दूध के साथ अश्वगंधाचूर्ण का सेवन आयुर्वेद का प्रसिद्ध योग है, जो दुर्बल व्यक्तियों को पुष्ट करता है।
दिवाशयन निषेध
शीतकाल में दिन में सोना बहुत ही हानिकारक है। अत: आयुर्वेद में इसका स्पष्ट रूप से निषेध किया गया है-
'ग्रीष्मवज्र्येषु कालेषु दिवास्वापो निषिध्यते'
अर्थात् ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतुओं में दिन में सोना निषिद्ध है। क्योंकि यह सब दोषों को बढ़ाने से अति हानिकारक है। अन्यत्र भी कहा गया है-
भुक्तमात्रस्य शयनाद् हन्त्यग्निं कुपित: कफ :।
अर्थात् भोजन करते ही दिन में सोने से अति कुपित हुआ कफ जठराग्नि को नष्ट कर देता है। सुश्रुत संहिता में दिन में सोने के दुष्परिणाम इस प्रकार बताए गए हैं-
सर्वर्तुषु दिवास्वाप: प्रतिषिद्धोऽन्यत्र ग्रीष्मात्। विकृतिर्हि दिवास्वप्नो नाम, तत्र स्वपतामधर्म: सर्वदोषप्रकोपश्च, तत्प्रकोपाच्च कास-श्वास-प्रतिश्याय-शिरोगौरवांगमर्दारोचक-ज्वराग्निदौर्बल्यानि भवन्ति।
(सुश्रुत, शारीर- 4.38)
अर्थात् ग्रीष्म को छोड़कर अन्य सब ऋतुओं में दिन में सोना निषिद्ध है। दिन में सोना एक विकृति है। इससे मनुष्यों को अधर्म (पाप) लगता है, अर्थात् दिवाशयन से तन-मन के विकार बढ़ते हैं। दिन में सोने से वात, पित्त एवं कफ  ये तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इनके प्रकोप से कास (खाँसी) श्वास (दमा) प्रतिश्याय (जुकाम) सिर मे भारीपन, अंगों में टूटन, ज्वर, अरुचि व मन्दाग्नि इत्यादि रोग होते हैं। अत: शीतकाल में भी दिन में सोने से बचें।
आजकल शहरी लोगों में विशेषत: महिलाओं में मोटापे की समस्या बढ़ रही है, उसके पीछे श्रमरहित जीवनचर्या, आवश्यकता से अधिक भोजन एवं दिन में सोना मुख्य कारण हैं। दिन में सोने के दुष्परिणाम को नीतिकार सोमदेव सूरि ने बड़े मार्मिक शब्दों में कहा है-
दिवास्वापो नाम व्याधिव्यालानामुत्थापनदण्ड:। (नीतिवाक्यामृतम्)
अर्थात् दिन में सोना ऐसा है जैसे शरीर में सोए हुए रोग रूपी सर्पों को डण्डा मारकर जगाना। इस उपमा से दिन में सोने के हानिकारक परिणामों की कल्पना सहज ही की जा सकती है।
ग्रीष्म ऋतु में रात छोटी तथा दिन बड़ा होता है। प्रचंड आतप (धूप) के वातावरण में रूक्षता आ जाती है। अत: दिन में कुछ समय तक सोना उचित माना है, क्योंकि इससे शरीर में स्निग्धता एवं तरावट आती है तथा दोषों का संतुलन बना रहता है, परन्तु अन्य ऋतुओं में दिवाशयन हानिकारक ही होता है। आयुर्वेद के अनुसार बाल, वृद्ध, रोगी व रात में आजीविका-कार्य करने वालों के लिए दिन में सोना मान्य है। इस प्रकार आयुर्वेद में निर्दिष्ट आहार-विहार को अपनाते हुए उत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त किया जा सकता है।

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