जीवन का समाधान

जीवन का समाधान

भारत की सनातन ऋषि परम्परा के वर्तमान युग के जीवन्त प्रतिनिधि श्रद्धेय दादा गुरुदेव पूज्य स्वामी सोमानन्द जी महाराज के तप:पूत जीवन के प्रतिबिम्ब स्वरूप कुछ अनमोल रत्न:-
  • धन्य हैं वे, श्रद्धा भक्ति और प्रेमरूपी पावन त्रिवेणी संगम में नहाए स्नातक! वे विश्व को पवित्र करेंगे। मद्भक्तियुतो भुवनं पुनाति।
  • धन्य हैं वे साधु, जो हिल मिल रहें बेलाग! धन्य हैं वे सेवक, जो आठों प्रहर रहे जाग!
  • धन्य हैं वे प्रेमी, जो हेतु रहित अनुराग! धन्य हैं वे दाता- जो जीवन धन महाभाग!
  • धन्य हैं वे वीर-परहित खेलें फाग! धन्य हैं वे जती सती- चित्तभूम बेदाग!
  • धन्य हैं वे विरले परमहंस-जीवन पट बेदाग।
  • धन्य हैं वे वर्धमान धैर्य वाले उत्तरापथ के यात्री, जो असत् से सत्, तम से ज्योति और मृत्यु से अमरता की ओर प्रयाणशील हैं।
  • धन्य हैं आत्मजित्, सर्वजित् वे अकिञ्चन! जिनके जीवन का अन्तिम जयघोष है- त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
  • धन्य हैं वे पतित जिन्होंने मान लिया है कि हम किसी पतित से भी जो पतित हैं उनसे भी ऊँचे नहीं हैं, वे पतित पावन बनेंगे।
  • धन्य हैं वे सर्वभूत हृदय अपरिग्रही दिगम्बर परमहंस, उन पर जीवन का लक्ष्य और अभिप्राय प्रकट होगा।
  • धन्य है वह हितार्थ एकमात्र आर्तनाद! जिसने अन्तर्यामी को कारुण्य-वृष्टि के लिए बाध्य कर दिया।
  • धन्य हैं श्रद्धालु तापसों के वे धूलि-धूसर अंग! जीवन जिनका बना पसीना, नित्य बहे जिमि गंग!
  • धन्य हैं श्रमिक जन जीवित पीर फकीर। जीवन जिनका बना पसीना, जैसे सुर सरिता का नीर।
  • धन्य है बाँस की बाँसुरी जिसने अपने तन को छिदवाकर भी आत्मा के तरंगित नि:श्वास को सुरीले-रसीले रस से अभिषिक्त कर अवनी-अम्बर को रस से भर दिया।
  • धन्य हैं तथाकथित वे दु:खी, जिन्होंने जीवन भर अर्जित की हुई सुख सामग्री को दु:खियों पर वार दिया है।
  • धन्य हैं वे तापस जो कर्म करते हैं यज्ञ-दान-तप के लिए। जिनका यज्ञ-शेष मात्र ही है खाने के लिए, खाते हैं जीने मात्र के लिए और जीते हैं सर्वभूतहित में रत रहने के लिए।
  • धन्य हैं श्रद्धा-सम्बल से भरे वे अमीर, जो जीवनभर प्राणिमात्र का आतिथ्य करते-करते गरीब हो गए हैं।
  • धन्य हैं वे धरती पुत्र! जो बाल सुलभ भोलेपन से तम, सहज सरल गति से रज और सहज समझ से सत्त्व की रक्षा करते हैं।
  • धन्य हैं वे, जो इस आलोक सागर के विकसित अनन्त आकारों के सुरभित तट से उस अदृश्य मधु के रस और सुरभित सौम्य स्पर्श से पुलकित हुए हैं।
  • धन्य हैं वे जो अपने हृदय के पावन घाट से आनन्द और ज्ञानमयी अमर सुर सरिता का नित्य नूतन रसपान करते हैं।
  • धन्य हैं वे जो सम्पूर्ण अस्तित्व वस्तु-व्यक्ति-जड़-चेतन-जीव-जगत् रूपी समष्टि को भगवान् की देन मानते हुए उसके अनुग्रह को मूत्र्त रूप में अनुभव करते हुए उसके प्रति सहअस्तित्त्व के दिव्य भाव से प्रेम, कृतज्ञता, समझदारी व जिम्मेदारीपूर्वक जीते हैं।
  • धन्य है सर्वहारे अकिञ्चन की बलवती पुकार! जिसको परिस्थितियों ने जीवन-धन की सम्पदाओं से सर्वथा वंचित कर दिया है, उसको भगवत्-कृपारूपी कल्पवृक्ष का सन्तोषरूपी अमर फल मिलेगा।
  • धन्य हैं वे जीवन यात्रा के सहज पन्थी, जिनका सारथ्य (जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति-तुर्यावस्था में) स्वयं भगवान् कर रहे हैं। वे जीवन के लक्ष्य और अभिप्राय तक पहुँचेंगे।
  • आत्यन्तिक सत्ता का प्रत्यक्ष ही साक्षात्कार है- अन्त:करण का दिव्य अनुभव।
  • संसार के सब मनुष्यों के सभी प्रकार के दु:खों का कारण अज्ञान ही है।
  • जिस ज्ञान से अपने अज्ञान का ज्ञान हो वह ज्ञान भगवत्कृपा है।
  • मुक्ति चित्त की एक विशेष अवस्था है, स्थान नहीं।
  • आयु का सम्बन्ध शरीर से है और जीवन का आत्मा से। जीवन एक अविनाशी प्रवहमाण सत्ता है।
  • जीवन की महती चालिका शक्ति 'श्रद्धा’ है, न कि 'विचार’।
  • क्रियाओं की मूल्यता का मापदण्ड है भावना।
  • महापुरुषों ने हमें सुख में संयम और दु:ख में धीरज से रहना सिखाया है।
  • आओ! अपने निकटतम दु:खी जीव-सृष्टि की सेवा-साधना द्वारा अपने हृदय को पवित्र करें। यह पवित्र हृदय प्रभु मिलन का खुला महाद्वार है।
  • बच्चों के लिए माँ अथाह है, शिष्यों के लिए गुरु अथाह है, भक्तों के लिए भगवान् अथाह है, प्रत्येक चीज को भगवान् की देन समझो।
  • अपने से आगे चलने वाले पुण्यात्माओं के पीछे-पीछे चलते रहो।
  • कौन जन्म मैंने भूल न कीन्ही? कौन जन्म तूने क्षमा न कीजी?
  • स्थूल भौतिक दृष्टि से सब कुछ स्थूल भूत संसार दिखाई देगा।
  • सूक्ष्म मनोमय दृष्टि से सब सूक्ष्म मनोमय लोक दिखाई देगा।
  • सम्पूर्ण सृष्टि स्वयं में अनुशासित है। महापुरुष ज्ञान, कर्म व उपासना के द्वारा मनुष्य को इस सृष्टि के विधाता भगवान् के दिव्य अनुशासन में ढालने के लिए दिव्य पुरुषार्थ कर रहे हैं।
  • जैसे एक वैज्ञानिक पूर्ण शान्त चित्त होकर सृष्टि की सूक्ष्मताओं में प्रवेश करके नया अनुसंधान करता है और संसार में भौतिक सुख-सुविधाओं को बढ़ाता है वैसे ही एक योगी पूर्ण शान्तचित्त होकर चित्त व समष्टि की अदृश्य सत्ता का अनुभव करके अतीन्द्रिय आध्यामिक शाश्वत सुख-शान्ति का अनुभव करता है व अन्य जीवों को इस दिव्य सुख की ओर ले जाता है।
  • गहनगंग = शालीनता! सहजगंग = कुलीनता!
  • परमगंग = तल्लीनता! अणुगंग = महद्!
  • निर्वाण= वाण या गति जिसमें न हो, जन्म मरण का चक्कर न हो, वासना की गन्ध न हो।
  • निर्वाण= उष्ण वासनाओं का बुझना, शान्त होना।
  • बुद्धे: फलमनाग्रह:। बुद्धि का फल है, जिद्दी न हो।
  • ज्ञान= जानना मात्र! विज्ञान= अनुभव!
  • जब मन इन्द्रियोन्मुख होता है तब मन कहलाता है और जब आत्मोन्मुख होता है तब बुद्धि।
  • श्रद्धा= सत्त्व की भाव धारा का अजस्र तरङ्गित प्रवाह!
  • अपने मत का प्रचार करने का सर्वोत्तम साधन है- 'आचारÓ, उच्चारण नहीं! जैसे सूर्य और नदी का प्रवाह! घर का दीपक! आचरण के द्वारा सूर्य की प्रचारक शक्ति कितनी प्रबल है यह स्पष्ट है!
  • प्रचार= जीवन का बाटना
  • आध्यात्मिकता! 'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति
  • भौतिक पक्ष से सब के लिए सब प्यारे नहीं हैं; बल्कि आत्मपक्ष की ओर से, आत्म-तादात्म्य की दृष्टि से, अपने की दृष्टि से सब प्यारे हैं।
  • आध्यात्मिकता! किसी देवी से वात्र्तालाप करते समय ऐसा अनुभव न हो कि मैं पुरुष हूँ। देवी भी किसी पुरुष से वात्र्तालाप करते समय यह अनुभव न करे कि वह स्त्री है।
  • अहंकार सब व्याधियों की जड़ है। अहंकार के स्रोत को खोजने से अहंकार नष्ट हो जाता है और जो फिर शेष रहता है, वही है आत्मा।
  • दूसरों के प्रति गुण दृष्टि; अपने प्रति दोष दृष्टि-आत्म निरीक्षण द्वारा आत्मोद्धार।
  • दूसरों के लिए उदारता, अपने लिए कंजूसी-अपरिग्रह। 

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