सनातन संस्कृति तथा मूल्यों की प्रासंगिकता
On
प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
वर्तमान में क्या प्रासंगिक है, यह प्रश्न स्वयं में सामाजिक या वैश्विक सन्दर्भ वाला है। आध्यात्मिक सन्दर्भ में तो जो सनातन है, वह सनातन है, अतीत, वर्तमान, भविष्य सभी के लिए प्रासंगिक। अत: वैश्विक सन्दर्भ में ही विचार करणीय है। विश्व अनादिकाल से गतिशील, परिवर्तनशील, यथासमय वृद्धि, क्षय, पुनर्भव की परम्परा में प्रवाहमान भव-सागर है। भव-सागर यानी निरंतर रचा जा रहा और बदल रहा संसार। यह भूत-सागर नहीं है कि एक बार किसी ने सृष्टि बना दी, फिर वह यथावत है। नहीं, हम अपने-अपने स्तर पर इसके एक अंश को, चाहे वह क्षुद्रतम हो, नित्य रचते और संवारते या बिगाड़ते-मिटाते हैं। यह सब एक विराट मर्यादा-चक्र के भीतर। क्योंकि अधिक की शक्ति एक मनुष्य में तो क्या पृथ्वी के समस्त मनुष्यों में मिलकर समवेत रूप में भी नहीं है। |
अब प्रश्न है मूल्यों की प्रासंगिकता का। 'मूल्य’ शब्द इस अर्थ में न तो हमारे शास्त्रों में है, न विश्व में कहीं और था। सत्तर-अस्सी वर्ष पूर्व यह उच्चारित हुआ और 40 वर्षों से विश्व में व्यापक है। यह 'वेल्यू’ का अनुवाद है। इसके समतुल्य भारतीय शब्द 'यम’ और 'नियम’ हैं। जिनमें से अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य या इन्द्रिय-मन बुद्धि का संयम एवं श्रेयस के लिए प्रयोग तथा अपरिग्रह यानी वस्तु-रति का अभाव। ये पांच सार्वभौम यम या मूल्य हैं। पवित्रता, संतोष, तप, आत्म-ज्ञान की साधना एवं भगवद् भक्ति ये पांच सार्वभौम नियम हैं। अत: इनकी प्रासंगिकता सदा है।
वर्तमान से तात्पर्य वर्तमान वैश्विक एवं राष्ट्रीय परिवेश एवं सन्दर्भ से है। विगत एक हजार से कुछ अधिक वर्षों से विश्व में दो एकपंथवादी समूहों ने विश्व-विजय की अभिलाषा से जो कुछ किया, उसके क्रम में दो महायुद्ध यूरोपीय गुटों एवं उनके गैर-यूरोपीय साथियों ने लड़े, जिनमें जो पक्ष जीता, उसका भी महाविनाश हुआ। संसार में अपना फैलाव विजेता पक्ष को भी सिकोडऩा पड़ा। वैसे, विजयी पक्ष की विजय का मुख्य कारण भारतीय सेनाएं थी इस दृष्टि से देखें तो सनातन भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक प्रासंगिक मूल्य है- 'धर्ममय वीरता’, जिससे विजयी पक्ष का जीवन बचा, सर्वनाश बचा।
संसार में मय, इंका, एजटेक, घना जैसी अत्यंत श्रेष्ठ एवं धर्ममय सभ्यताएं 400 वर्ष पूर्व तक थी। पारसीक, मिश्र एवं बौद्ध सभ्यताएं थी। दोनों एकपंथवादियों ने इन्हें क्रूरतापूर्वक नष्ट किया। दोनों ने भारत पर भी निरंतर चोटें की। भारत बचा रहा तो धर्ममय वीरता के कारण। उदारता, शांति, प्रेम, मैत्री, समता, करुणा, न्याय और समृद्धि तो मय, इंका आदि में भी शिखर पर थी। यह स्वयं एकपंथवादियों ने वर्णन किया है। अत: भारत की विशेषता शांति, प्रेम, मैत्री, करुणा के साथ ही धर्ममय वीरता है। यदि सब गुण होते और वीरता न होती तो हम भी मय, पारसीक, इंका जनों की तरह समाप्त हो जाते। अत: सर्वोपरि प्रासंगिक मूल्य है धर्ममय वीरता की साधना। जिन गुणों के बावजूद मय, इंका आदि समाज हार गये, वे ही गुण हिन्दु यानी भारतीय संस्कृति में भी यूरोपीय ईसाई लोग बहुतायत से दिखाने या प्रचारित करने लगे। जिस अद्वितीय वीरता के कारण भारत बचा, उस गुण का कोई अस्तित्व भी भारत में था, इसे दबाया-छिपाया गया। गांधी जी इसमें अंग्रेजों के परम सहायक सिद्ध हुए।
इसके साथ ही, महायुद्धों से जर्जर ख्रीस्त-संस्कृति एवं यूरोपीय जनों ने जहां तक हो, युद्धों से बचने और युद्ध के लक्ष्यों को शांतिपूर्ण उपायों से प्राप्त करने की नीति अपनाई। संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय सहित अनेक वैश्विक संगठन उसी का परिणाम हैं। पर इनके वैचारिक आधारों को भी श्रेष्ठता प्रदान करने की शक्ति भारतीय संस्कृति में ही है। कैसे? यह समझना आवश्यक है।
भारतीय संस्कृति सहिष्णुता एवं उदारता तक सीमित नहीं हो जाती। वह दूसरों पर तरस दिखाने के लिए 'पिटी’ और 'चैरिटी’ की बात नहीं करती। वह अधिक व्यापक और गहरी दृष्टि देती है। 'सहिष्णुता’ नहीं, समता। समता का अर्थ है सम-दृष्टि, सार्वभौम कसौटियां। 'तरस’ नहीं, 'पिटी’ नहीं, करुणा, पूत्र्त कर्मों की प्रेरणा जो अभावों को यज्ञीय-चक्र वाली प्रक्रिया से पूर्ण करते रहे। मानवाधिकार मात्र पर्याप्त नहीं, सर्वव्यापी चैतन्य सत्ता की अखंडता और अनन्यता की गहरी आध्यात्मिक संवेदना एवं अनुभूति आवश्यक है। ये हैं वे प्रासंगिक मूल्य जो भारतीय संस्कृति प्रस्तुत करती है। इसे समझने के लिए भारतीय संस्कृति की विश्व-दृष्टि एवं विश्व-विद्या को समझना होगा।
भारतीय विश्व-दृष्टि या विश्व-विद्या
भारतीय विश्व-दृष्टि यह है कि एक परम सत्ता सृष्टि में सर्वत्र ओतप्रोत है। वही सृष्टि का मूल या प्रथम हेतु है। तैत्तिरीय उपनिषद् का प्रसिद्ध निरूपण है- 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद् विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्म इति।'
अर्थात् जिससे समस्त व्यक्तरूप उत्पन्न हुए हैं, जिससे और जिसमें वे सब उत्पन्न सृष्टि-रूप जीते हैं, जिसमें वे पुन: लौटकर समा जाते हैं, उसकी ही जिज्ञासा करणीय है। वह ब्रह्म है। उसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद् का सुप्रसिद्ध निरूपण है- 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।' अर्थात् निश्चय ही यह सब ब्रह्म ही है। उसी से सब कुछ उत्पन्न, उसी में सबका पुन: लय, उसी में स्थिति और सबकी चेष्टा है (तत्+ज+लं+अन्+ इति= तज्जलानिति)। शान्त चित्त होकर उसी की उपासना करणीय है।
इस प्रकार ब्रह्म ही आदि जनक या प्रजापति या स्रष्टा है, वही पालक, विष्णु, कृष्ण (गति का हेतु एवं प्रेरक) तथा राम (सर्वत्र रमा हुआ) है, वही सबका लय-कत्र्ता महाकालेश्वर रूद्र शिव है। उस ब्रह्म की साधना ही सत्य, ऋत एवं धर्म की साधना है, क्योंकि वही सत्य है, वही सर्वव्यापी व्यवस्थापक एवं धारणकत्र्ता नियम है, तत्त्व है। स्पष्ट है कि सर्वत्र व्याप्त, प्रकाशित, सर्वेश्वर ब्रह्म का किसी भी रूप में निषेध असत्य है, अनृत है, अधर्म है। अत: किसी देश-विदेश मात्र में विराज कर शासन कर रहे तथा किसी व्यक्ति-विशेष मात्र के माध्यम से उपदेश या प्रकाश या सन्देश दे रहे किसी आराध्य देव की धारणा, कल्पना, प्रचार एवं उस पर रचित अनुशासन की स्थापना सनातन धर्म की दृष्टि में असत्य है, अनृत है, अधर्म है। इसीलिए किसी आइडियालॉजी, थियॉलॉजी और मज़हब को सब पर लादने की इच्छा, चेष्टा एवं कर्म पाप है, झूठ है, तमस है, हिंसा है।
जैसी कि ऋग्वेद की वाणी है, 'जो कुछ अस्तित्व में आ चुका है और जो कुछ आने वाला है, वह नामरूपातीत पुरुष है- सहस्त्रशीर्ष, सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपाद। समस्त चिन्मय देवसत्ताएँ उसी का अंश हैं। उस पुरुष से विराट उत्पन्न हुआ, विराट से हिरण्यगर्भ। हिरण्यगर्भ के समक्ष देवसत्ताओं ने आदियज्ञ किया। यज्ञ से ही देवताओं ने यज्ञ का यजन किया। उसी से प्रथम धर्म प्रकट हुए। यह विराट पुरुष सत् और असत् जैसे भेदों से भी परे है (अत: एक या अनेक जैसे भेद की वहाँ कल्पना ही मूढ़ता है), सर्वत्र उसका ही महद् यश है। उसी एक मूल तत्त्व को विद्वान (मूढ़ नहीं) अभीष्ट संकेत के लिए विविध प्रकार से कहते हैं (उस परम तत्त्व को न जानकर किसी एक देव की चर्चा तमस है)। वे विराट पुरुष सर्वत्र ओत-प्रोत हैं।'
प्रत्येक पुर (पिण्ड) में वही विराजमान हैं, इसीलिए उन्हें पुरुष (पुरुष यानी नर या नारी आदि नहीं) कहा है। वही एकमेवाद्वितीय है। वह है (अस्ति इति)। किसी द्वितीय का वह विरोधी या विद्वेषी, ईष्र्यालु या प्रतिशोध लेने वाला (ख्रीस्तादि मत) नहीं है। क्योंकि द्वितीय कुछ है ही नहीं। वह स्कम्भ है (सबका आश्रय एवं आधार) - 'स्कम्भं तं ब्रूहि’ (अथर्ववेद)।
वही सविता (सविता वा देवानां प्रसविता, जो समस्त चिन्मय देवताओं का मूल है, वह चेतना-सूर्य), सोम (सर्वश्रेष्ठ आनन्द तत्त्व) एवं प्रजापति है। प्रजापति के तप से सृष्टि व्यक्त होती है। वह उत्पन्न नहीं की जाती। केवल अव्यक्त से व्यक्त होती है। सृष्टि अनादि है, अजा है। प्रजापति के तप से ही वेद व्यक्त हुए। वेद अनादि सृष्टि के साथ-साथ आरम्भ से ही हैं, अत: वेद अनादि हैं। तप से ही यज्ञ का सृजन हुआ। यज्ञ से समस्त काम्य पदार्थ प्राप्त होते हैं।
समृद्धि, सम्पत्ति और आनन्द
इस प्रकार सत्य, ऋत, धर्म एवं यज्ञ- ये चार भारतीय पुरूषार्थ चिन्तन के मूल आधार हैं। इसी प्रकार भारतीय पुरुषार्थ-चिन्तन के मूल लक्ष्य हैं- समृद्धि, सम्पत्ति और आनन्द। समृद्धि का शास्त्रीय अर्थ है- पूर्णता। जो वस्तुएँ और संसाधन व्यक्ति, परिवार, समूह, समाज या राष्ट्र की अपूर्णता को दूर करें, उन वस्तुओं को प्राप्त करना और उन्हें अर्जित कर उन पर स्वामित्व प्राप्त करना ही समृद्ध होना है। जिन वस्तुओं को प्राप्त कर या अर्जित कर इस प्रकार समृद्ध हुआ जाता है, वे सभी वस्तुएँ सम्पत्ति हैं। वस्तुत: किसी कर्म को सम्पादित करने के लिए अपेक्षित साधन ही सम्पत्ति हैं। इस प्रकार सम्पत्ति सम्बन्धी अवधारणा इस पर निर्भर है कि कोई व्यक्ति, परिवार, समूह, समाज या राष्ट्र किन कर्मों के सम्पादन को श्रेयस्कर, उचित और वांछित मानता है, धर्ममय और श्रेष्ठ मानता है तथा सुखकारक और आनन्दप्रद मानता है। वैसे कर्मों को करने के लिए अपेक्षित साधन ही सम्पत्ति हैं। इस प्रकार पूर्णता और सुख तथा समृद्धि और आनन्द की धारणा ही सम्पत्ति सम्बन्धी धारणाओं का आधार है।
एकपंथवादी पंथों में सम्पत्ति की धारणा अलग है। वहाँ माना जाता है कि उनमें से हर एक के विशेष प्रवर्तक को परमेश्वर ने यह उपहार दिया है कि तुम्हारे अनुयायी को दुनिया की सभी चीजें भेंट दी जा रही हैं, वे उनकी असीमित विलासिता के लिए हैं, वे उन्हें मनमाना भोगें, बस, इबादत या 'प्रेयर’ का वह तरीका अपनाएं, जो तुम उन्हें बता रहे हो।
मानव-जीवन के चार पुरुषार्थ
मानव-जीवन के चार पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष। इनमें से तीन लोक-जीवन में साध्य पुरुषार्थ हैं यानी वे सामाजिक पुरुषार्थ हैं, लौकिक पुरुषार्थ हैं। चौथा पुरुषार्थ निजी है, अलौकिक है। वह परम पुरुषार्थ है। परम का अर्थ यहाँ 'मूल’ या 'मुख्य’ नहीं है, अपितु 'सर्वोच्च’ एवं 'सबसे परे’ है। मोक्ष सामाजिक जीवन का लक्ष्य नहीं है। जीवन के लक्ष्यों को जिसके ज्ञान से अधिप्रमाणित किया जाता है, जो समस्त जीवन-लक्ष्यों के यथार्थ को और परमार्थ को प्रकाशित करता है, वह है परम पुरुषार्थ। अत: जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति किसी भी एक कार्य या व्यवसाय में सर्वोच्च नहीं हो सकता, यद्यपि सिद्धान्तत: प्रत्येक व्यक्ति को सर्वोच्च होने का प्रयास करने का अधिकार भी है और कत्र्तव्य भी हो सकता है, उसी प्रकार सर्वोच्च या परम पुरुषार्थ मोक्ष प्रत्येक व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, यद्यपि वह प्रत्येक द्वारा प्राप्य है। मोक्ष, मनुष्य का सामान्य धर्म नहीं है। वह परम धर्म है, विशिष्ट धर्म है।
मनुस्मृति ने स्पष्ट कहा है कि सभी मनुष्यों के लिए तीन पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, एवं काम। वस्तुत: मोक्ष मनुष्यों का सामान्य धर्म या सर्वसामान्य लक्ष्य कभी भी नहीं माना गया है। मनुस्मृति स्पष्ट कहती है-
धर्मार्थावुच्यते श्रेय:, कामार्थौ धर्म एव च।
अर्थ एवेह वा श्रेय:, त्रिवर्ग इति तु स्थिति:।।
अर्थात् कुछ का मत हैै कि धर्म एवं अर्थ की साधना श्रेयस्कर है, कुछ के अनुसार काम और अर्थ की तथा कुछ के मत से केवल धर्म की। इस विषय में सम्यक् स्थिति यह है कि धर्म, अर्थ एवं काम- ये तीनों ही (त्रिवर्ग) श्रेयस्कर हैं।
मनु ने स्पष्ट कहा है कि तीनों ऋणों (देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण) से मुक्त होकर ही मन को मोक्ष में निविष्ट करे (ऋणानि त्रीणि अपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्)।
ऋण चुकाये बिना जो मोक्षार्थी होता है, वह अधोलोकों में जाता है (अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यध:)। जो भी द्विज वेदों का अध्ययन किये बिना, पुत्रोत्पत्ति किये बिना एवं यज्ञ-सम्पादन किये बिना मोक्ष की इच्छा करता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि जिनके मन किसी भी सामान्य गृहस्थी की आकांक्षा से मुक्त हैं, केवल वे ही जन्म-जन्मान्तर के अपने उन्नत संस्कारों के फलस्वरूप सीधे मोक्ष-साधना में प्रवृत्त हो सकने के अधिकारी हैं। मनु ने ही स्पष्ट किया है- 'सर्वस्व दक्षिणा देकर, सन्यस्त होकर, समस्त प्राणियों को अभय देकर जो घर से निकल कर प्रव्रज्या करता है, उस ब्रह्मवादी को तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं।‘
बृहदारण्यक उपनिषद् ने स्पष्ट किया है कि 'वेदाध्ययन, यज्ञ, दान, तप एवं उपासना के उपरान्त ही व्यक्ति परम सत्य के ज्ञान के लिए पात्र बन सकता है। ऐसा व्यक्ति पापविजयी हो जाता है, रजोगुण से रहित हो जाता है, संशयशून्य हो जाता है। शान्त एवं दान्त (इन्द्रिय जयी) हो जाता है। परम ब्रह्म से स्वयं की एवं संसार की अभिन्नता की उसे अनुभूति होने लगती है। यह है मोक्ष-साधना की पात्रता। स्पष्टत: यह सामान्य धर्म वही है, यानी सर्वसाधारण द्वारा पालनीय धर्म नहीं है। अर्थ, काम एवं धर्म सामान्य धर्म हैं यानी मानव-मात्र का स्वभाव है कि वह स्वत: ही काम, अर्थ तथा धर्म-कत्र्तव्य के किसी न किसी रूप मेें रत रहता है, प्रवृत्त रहता है। सम्यक् रूप में अथवा असम्यक् रूप में।‘
धर्म, अर्थ एवं काम
इस प्रकार त्रिवर्ग ही सामान्यत: धर्म है। मोक्ष-धर्म अति विशिष्ट धर्म है। वह समस्त पुरुषार्थों की निवृत्ति है, समाप्ति है। यहाँ 'धर्म’ के अर्थों का सदा स्मरण आवश्यक है। जो जिसका सहज स्वभाव एवं सहज कत्र्तव्य है, वही उसका धर्म है। जो समस्त मानवों द्वारा करणीय कत्र्तव्य हैं, वे हैं सामासिक धर्म या सामान्य धर्म। फिर, अपनी विशेष स्थिति के अनुरूप करणीय कत्र्तव्य हैं अपना विशेष धर्म या स्वधर्म। इस प्रकार धर्म का एक व्यापक अर्थ है और एक विशिष्ट। व्यापक अर्थ में जो कुछ भी कत्र्तव्य है, वह सब धर्म ही है। अत: काम एवं अर्थ भी जहाँ तक करणीय है, वहाँ तक वे धर्म ही हैं। इसीलिए धर्ममय काम एवं धर्ममय अर्थ ही साध्य हैं। गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है- 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ।‘ प्राणियों में धर्म का अविरोधी काम मैं स्वयं हूँ।
यज्ञ का स्वरूप एवं अर्थ
भारतीय दृष्टि को समझने के लिए धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के साथ सृष्टि-चक्र (यज्ञ) को समझना भी आवश्यक है।
ऋग्वेद में यज्ञ को 'भुवनस्य नाभि:’ कहा है। पुरुषसूक्त में कहा है- 'सर्वहुत यज्ञ से ही वेदों तथा समस्त पदार्थों की उत्पत्ति हुई। ब्राह्मण ग्रन्थों में से अधिकांश में यज्ञों का सही स्वरूप विस्तार से वर्णित है। ऐतरेय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण जैसे प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थों में यह वर्णन विस्तार और गहराई तथा स्पष्टता से देखा जा सकता है। उनमें यज्ञ की व्याख्या बहुत ही साफ-साफ की गई है।
यज्ञ का अर्थ 'सेक्रीफाइस’ नहीं, विराट आनन्दोत्सव है
इस सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण भ्रम यह है कि अंग्रेजी में यज्ञ का अनुवाद 'सैक्रीफाइस’ किया जाता है और लोग इसे सही माने हुए हैं। यज्ञ का अर्थ 'सैक्रीफाइस’ या 'उत्सर्ग’ कतई नहीं है। वैदिक संहिताओं मेें यज्ञ का उत्सर्गमूलक अर्थ सम्भव ही नहीं है। वहाँ यज्ञ का अर्थ विराट आनन्दोत्सव है, जो कि जीवन-यात्रा है, जीवन-लीला है, जीवन है। इसमें संघर्ष, सन्धि, विराम, पीड़ा, विजय, पराजय, समृद्धि, द्वन्द्व, द्वन्द्व-मुक्ति, उत्कर्ष, अपकर्ष, घात-प्रतिघात सभी समाहित हैं। द्वन्द्व का अर्थ सरल द्वन्द्वात्मकता नहीं। दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों में सीधा संघर्ष है, यह दृष्टि वैदिक और सनातन धर्म में अमान्य है। शैतान और भगवान् जैसा कोई विभाजन यहाँ नहीं है। भारतीय चिन्तन में शैतानियत के किसी सुस्थिर रूप की कोई मान्यता नहीं है। इसलिए यहाँ सदा आग्रह रहा है सतत सजगता, अप्रमाद, निरन्तर प्रदीप्त विवेक के प्रति। मनुष्य को स्वतंत्रता प्राप्त है, क्योंकि यह ऋत और सत्य के अनुशासन में रहे। वह कर्म करने में जितना स्वतंत्र है, कर्मफल भोगने में उतना ही परतंत्र। कर्मफल व्यक्ति का अधिकार नहीं है, वह फल है। वह कर्मफल के प्रति जिज्ञासा और अभीप्सा रख सकता है, पर फल का स्वरूप सृष्टि की विराट शक्तियों के अनुशासन से निश्चित होता है। उन शक्तियों की विराट क्रियाशीलता की संज्ञा यज्ञ है। सम्पूर्ण जीवन एक यज्ञ है। यह सृष्टि एक यज्ञ है। हमारा जीवन इसके समझने और इसमें भाग लेने का नाम है। इसीलिए सृष्टि के स्वरूप एवं रहस्य के ज्ञान की साधना ज्ञान-यज्ञ है और उसके मूल सत्त्व का सतत जप करना जप यज्ञ है। भगवान् कहते हैं 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’।
यज्ञ के मूल अर्थ में 'उत्सर्ग’ का कोई प्रश्न ही नहीं। पूर्ण में पूर्ण का हवन क्या किसी वस्तु का उत्सर्ग हो सकता है? उत्सर्ग सम्भव ही कहाँ है? चरम अर्थों में मात्र भक्ति सम्भव है। ऐसा जीवन सम्भव है, उसकी साधना सम्भव है, जिसमें सुसंगति हो, समस्वरता हो, आनन्द की झंकृति हो, आनन्द की लय और नाद हो। अत: भक्ति-साधना ही यज्ञ-साधना है। भक्ति का अर्थ ही है ज्ञान-साधना, सच्चिादानन्द-बोध की साधना।
यह सृष्टि मात्र मानवीय शक्ति पर आश्रित नहीं है। मानवीय शक्ति सृष्टि-प्रक्रिया का एक अंश है। सृष्टि की शक्तियाँ इससे बहुत विराट हैं, महत् हैं। वे देव-शक्तियाँ हैं। विश्व उन्हीं देव-शक्तियों की विसृष्टि है। अत: मनुष्य भी देव-शक्तियों की ही क्रिया और फल है। देव-शक्तियाँ ही असुर भी हैं। देवत्व और असुरत्व में कोई आत्यन्तिक विभाजन अथवा विरोध नहीं है। ऋत और सत्य से अनुशासित-मर्यादित सामथ्र्य देवत्व है। यह सामथ्र्य जहाँ मर्यादा का उल्लंघन करे वहाँ वह असुरत्व है। शक्ति वही है, अनुशासन और प्रयोजन की भिन्नता से उसका चरित्र भिन्न हो जाता है।
वैदिक साहित्य में स्पष्ट वर्णन है कि देवता ज्ञानी और शुभावह शक्तियाँ हैं। इनका स्वरूप ज्योतिर्मय है। इन चेतना-ज्योतियों के, विराट महाज्योति के, सविता-देवता के स्पन्दन में ही सृष्टि का रहस्य अन्तर्निहित है। ये शक्तियाँ ऋत-व्रत हैं। इनकी विराट क्रिया (जिससे बोध अभिन्न) ही यज्ञ है। अत: यज्ञ बोध-साधना है, भक्ति है, आनन्दोत्सव है, दिव्य लीला है, जीवन यात्रा है। स्वयम्भू यज्ञ से ही चराचर जगत की गति है। इस यज्ञ में सतत हवन की क्रिया चलती रहती है। वह हवन उत्सर्ग नहीं है। किसका उत्सर्ग? किसके लिए उत्सर्ग? जिसका हवन हो रहा है, जिसके लिए हवन हो रहा है, जिसमें हवन हो रहा है, और जिससे या जिसके द्वारा हवन हो रहा है, वे सभी परस्पर अभिन्न हैं। उनमें कोई आत्यन्तिक भेद नहीं। देव-शक्ति का सहज विधान ही यज्ञ है। यज्ञ का जो अर्थ आज किया जाता है, उस अर्थ में वैदिक युग, यज्ञ-युग नहीं था। उपनिषदों, महाभारत, पुराणों और मनुस्मृति का साक्ष्य है कि सतयुग योग तथा तप-प्रधान था, त्रेतायुग ज्ञान-प्रधान और द्वापर यज्ञ-प्रधान। कलियुग को दान-प्रधान कहा जाता है। दान का वह अर्थ विस्तृत है और उसके सन्दर्भ में इस समय विश्व की समस्त सरकारें, चाहे वे राज्य-कल्याणवादी हों या राज्य-पूँजीवादी या मुक्त-पूँजीवादी, निकृष्ट दान की ही प्रचारक हैं। जब शासक वर्ग स्वयं को दाता तथा शासितों को गृहीता पात्र समझे, तब वह व्यवस्था निकृष्ट दानमूलक ही कहलायेगी। दूसरों को विकसित करो, वर्ग-भेद मिटाओ, गरीबी-बेरोजगारी हटाओ आदि समस्त संकल्प निकृष्ट दान-भावना की अभिव्यक्ति हैं, क्योंकि वे दाता और गृहीता के बीच भेद बुद्धि की उपज हैं। जब राजा सुशासन केवल स्वधर्म भाव से लोक-परम्परा का धर्ममय पालन करते हुए स्थापित करे, तब वह राजधर्म है और उत्कृष्ट दान-भावना उसका सहज अंग है। तब राजा और राज्यकत्र्ता स्वयं को शास्ता नहीं मानेगा। तब शास्ता तो केवल वीतराग सिद्ध पुरुष ही मान्य होंगे। स्वधर्म-पालन के स्तर पर सड़क साफ कर रहे सफाईकर्मी या पुजारी ब्राह्मण और राज्यकत्र्ता में तात्विक भेद नहीं है। प्रत्येक स्वधर्म-पालन कर रहा है और धर्म से अनुशासित है। केवल संसाधनों की मात्रा या राशि में भेद है।
सृष्टि-यज्ञ के इसी बोध के कारण भारतीय संस्कृति में धर्म-पालन, स्वधर्म-बोध, तेजस्विता तथा वीरता को सर्वोपरि महत्व प्राप्त है। अपनी या समुदाय की रक्षा वीरता का अति आरम्भिक स्तर है। उन्नत वीरता वह है, जो धर्म एवं यज्ञ की रक्षा के लिए हो। इसीलिए भारतीय संस्कृति में उन्हीं वीरों का गौरव-गान है, जिन्होंने धर्मरक्षा, यज्ञ रक्षा के लिए युद्ध किया। भगवान् राम, भगवान् कृष्ण, भगवान् बुद्ध, भगवान् महावीर सभी की महिमा धर्म-चक्र प्रवत्र्तन एवं सृष्टि-चक्र अर्थात् यज्ञ-रक्षण के कारण है। धर्मोपदेश से धर्म-प्रसार होता है। धर्मयुद्ध से धर्म की रक्षा होती है।
अधर्म का विनाश और धर्म की रक्षा सर्वोपरि मूल्य है। भारत इसी शक्ति से बचा है। अन्यथा शांति, उदारता, प्रेम, करूणा तो सभी श्रेष्ठ सभ्यताओं एवं समाजों में समादृत हैं। पर केवल उतने से न इंका, मय, एजटेक सभ्यताएं बचीं, न ही बौद्ध सभ्यताएं वहां बची, जहां वीरता नहीं थी। तिब्बत नया उदाहरण है। सृष्टि-चक्र को बाधित, विकृत, विरूपित, विशृंखलित करने वाली शक्तियों एवं प्रवृत्तियों के विरुद्ध युद्ध की वीरता ही सर्वोपरि मूल्य है।
दूसरी सभ्यताओं का विनाश, दूसरे समुदायों का विनाश, पर्यावरण का विनाश, अन्यों के संसाधनों को छीनना और नष्ट करना- ये सब विकृतियां हैं, पाप हैं, अधर्म है। इनके विरुद्ध वीरता ही सर्वोपरि है। वह वीरता केवल सशस्त्र युद्ध नहीं होती। धर्मवीर, दानवीर, युद्धवीर आदि सभी प्रकार की वीरताएं महत्वपूर्ण हैं। भगवान् महावीर धर्मवीर ही तो हैं। भगवान् बुद्ध भी धर्मवीर हैं। सुशासन, न्याय एवं सुव्यवस्था स्थापित करने वाला राज्यकत्र्ता धर्मवीर है।
वीरता का, विशेषत: धर्मवीरता, दानवीरता, न्याय वीरता और पाप की शक्तियों के विनाश की योजना बनाने वाली नीति-वीरता का ही आज सर्वोपरि महत्त्व है। यह मूल्य सर्वाधिक प्रासंगिक है क्योंकि सत्य, अहिंसा, संयम, अस्तेय और जीवन- ये वीरता द्वारा ही रक्षित रह सकते हैं। इन सनातन मूल्यों की रक्षा का पुरुषार्थ ही वीरता है। यही भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक प्रासंगिक मूल्य है।
लेखक
Related Posts
Latest News
01 Mar 2025 17:58:05
With divine inspiration, I want to draw your attention towards 11 important facts. I am sure that you will


