परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के 24वें संन्यास दिवस पर पतंजलि में प्रथम संन्यास दीक्षा महोत्सव

परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के 24वें संन्यास दिवस पर पतंजलि में प्रथम संन्यास दीक्षा महोत्सव

संन्यासी होना जीवन का सबसे बड़ा गौरव-
                                                                                           पूज्य स्वामी जी महाराज
  संन्यास परम्परा के गौरव परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने अपने 24वें संन्यास दिवस पर पतंजलि योगपीठ में एक नया इतिहास रचते हुए व्याकरण, दर्शन, वेद, वेदांग, उपनिषद् आदि में निष्णात 92 विद्वान् एवं विदुषियों को संन्यास की दीक्षा देकर राष्ट्र को समर्पित किया। धर्मनगरी हरिद्वार में माँ गंगा के पावन तट पर हुए इस ऐतिहासिक समारोह में हजारों की संख्या में श्रद्धालु, संन्यास दीक्षुओं के परिजन तथा देश के कई प्रतिष्ठित संतगण उपस्थित रहे। परम पूज्य निवृत्त शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज, दीदी माँ ऋतम्भरा जी, साधना केन्द्र आश्रम से पूज्य स्वामी प्रेमविवेकानन्द जी महाराज तथा सुत्तुर मठ के स्वाामी शिवरात्री देशीकेन्द्र महास्वामी जी महाराज के पावन सान्निध्य में परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने इस दीक्षा समारोह को सम्पन्न कराया। इस अवसर पर पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि भगवान् राम की संन्यास मर्यादा, वेद, गुरु व शास्त्र की मर्यादा में रहते हुए नव संन्यासी एक बहुत बड़े संकल्प के लिए प्रतिबद्ध हो रहे हैं।

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ज्ञात हो कि योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने भारत को एक आध्यात्मिक शक्ति बनाने की नई मुहिम शुरू की है जिसके तहत स्वामी जी महाराज का लक्ष्य सन् 2050 तक 1000 श्रेष्ठ, विद्वान् संन्यासी बनाना है। रामनवमी के दिन राष्ट्र को समर्पित इन संन्यासियों में ४१ विदूषी तथा 51 विद्वान् शामिल हैं। इसी उपलक्ष्य में नवनिर्मित ऋषिग्राम में चतुर्वेद महापारायण यज्ञ का अनुष्ठान किया गया।

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21 मार्च से नवनिर्मित ऋषिग्राम में संचालित चतुर्वेद महापारायण यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात् सभी संन्यास दीक्षुओं ने मुण्डन संस्कार तथा मुख्य विरजा होम कराया। तत्पश्चात् पूज्य स्वामी जी महाराज तथा श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने सम्पूर्ण विधिविधान से तैयार पवित्र मधुपर्क देकर संन्यास के इस पवित्र विधान को सम्पन्न किया। तत्पश्चात् सभी ने शोभा यात्रा के साथ वी.आई.पी. घाट हरिद्वार के लिए प्रस्थान किया जहाँ पतंजलि विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने पुष्पवर्षा व वेदमंत्रों के उद्घोष के साथ सभी का स्वागत किया। पूज्य स्वामी जी महाराज के गंगा स्वच्छता अभियान तथा प्रधानमंत्री की नमामि गंगे परियोजना को ध्यान में रखते हुए सभी का मुण्डन ऋषिग्राम में ही किया गया तथा सभी ऋषि-ऋषिकाओं ने गंगा में स्नान के पश्चात् सांकेतिक रूप से सभी संन्यास दीक्षुओं ने शिखासूत्र (केवल एक-दो केश) व यज्ञोपवीत पतित पावनी माँ गंगा के पावन जल में विसर्जित कर अपने श्वेत वस्त्र त्यागकर भगवा वस्त्र धारण किये। तत्पश्चात् परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज एवं अन्य प्रमुख संतों द्वारा 92 संन्यास दीक्षुओं को शिर पर पुरुषसूक्त के मंत्रों से 108 बार गंगा जल से अभिषेक कर पवित्र संन्यास संकल्प दिलाया गया। इस अवसर पर परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि संन्यासी होना जीवन का सबसे बड़ा गौरव है। अब से ये सभी संन्यासी ऋषि परम्परा का निर्वहन करते हुए मातृभूमि, भगवान्, ऋषिसत्ता तथा अध्यात्मसत्ता में जीवन व्यतीत करेंगे। 21 दिनों से अनवरत चल रहा तप व पुरुषार्थपूर्ण अनुष्ठान आज पूर्ण हुआ। जीवन में चारों वेदों को प्रतिष्ठापित कर ये सब भारत को एक आध्यात्मिक राष्ट्र बनाने हेतु संकल्पित हैं। स्वामी जी ने कहा कि धन्य हैं वे माता-पिता व परिवारजन जो अपनी सन्तानों को मातृभूमि के लिए समर्पित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पतंजलि के उत्तराधिकारी से ज्यादा हमें अपने ऋषियों के उत्तराधिकारी की चिन्ता है। हम गौतम, कणाद, पाणिनि तथा महर्षि दयानन्द के वंशज हैं। इनकी परम्परा को निभाने के लिए ही यह अनुष्ठान चलाया जा रहा है।

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स्वामी जी ने कहा कि जब तक संस्कृति, धर्म व परम्पराएँ जीवित हैं तब तक यह राष्ट्र पूर्ण सुरक्षित है और राष्ट्र की सुरक्षा से ही हम सुरक्षित हैं। संन्यासी का उत्तरदायित्व धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं को बचा कर रखना है। इसके लिए हमारे सभी संन्यासी संकल्पित हैं। लगभग १० दिन चले संन्यास के इस अनुष्ठान में स्वामी जी महाराज ने बताया कि ऋषिग्राम में 100 से ज्यादा कुटिया हैं जिनका निर्माण बिना धातु के किया गया है। यह परिसर ऋषि परम्परा का निर्वहन करने वाले साधु-साध्वियों के लिए है जहाँ मातृभूमि, भगवान्, ऋषिसत्ता तथा अध्यात्मसत्ता में जीवन व्यतीत करने वाले लोग जीवन यापन करेंगे। इनके 21 दिनों के अनुष्ठान में उपवास, मौन, योग, यज्ञादि का क्रम निरन्तर चलता रहा।

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स्वामी जी ने बताया कि ऋषिग्राम में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के साथ-साथ वाल्मीकि, दलित तथा वनवासी समाज के लोग एक साथ संन्यास की दीक्षा ले रहे हैं। यहाँ जाति की कोई बाधा नहीं है। सभी बाधाओं व अवरोधों को समाप्त करते हुए यह एक अभिनव प्रयोग है। इस दिशा में महर्षि दयानन्द अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि पहले महिलाओं को वेदों की दीक्षा नहीं दी जाती थी किन्तु यहाँ महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार दिये गये हैं।
हमने वेद विद्या के साथ-साथ, यज्ञोपवीत तथा संन्यास भी दिया है। यह कदम निश्चित ही महिलाशक्तिकरण को बल प्रदान करेगा। यदि पुरुष पवित्र है तो पुरुष को पैदा करने वाली मातृशक्ति कैसे अपवित्र हो सकती है।

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इस अवसर पर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने संन्यास धर्म की मर्यादा का उल्लेख करते हुए  कहा कि संन्यास संकल्प को सदा स्मरण रखते हुए सभी अविवेकपूर्ण कामनाओं एवं विषय भोगों से मुक्त रहकर संन्यासी होना दुनिया का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व व गौरव है। आचार्यश्री ने कहा कि गुरु बनना आसान कार्य है क्योंकि गुरु तो लोग बना देते हैं मगर एक शिष्य बनकर गुरुधर्म व राष्ट्रधर्म का पालन करना कठिन कार्य होता है। शिष्य को एक अच्छा शिष्य बनना होता है जो अपने गुरु की आज्ञा का पूरा-पूरा पालन करे तथा अपने अस्तित्व को गुरु से भिन्न नहीं माने। एक संन्यासी के लिए गुरुनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा एवं ध्येयनिष्ठा में निरन्तरता बनाये रखना ही जीवन का प्रयोजन होना चाहिए।

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इस गुरुतर कार्य के लिए जो भी तैयार हुआ है और जिन परिवार वालों ने इसे सहर्ष स्वीकृति दी है, निश्चित ही वह परिवार पुण्य का भागी है।
श्रद्धेय आचार्यश्री ने कहा कि यह पावन अनुष्ठान आने वाले हजारों-हजारों वर्षों तक वैदिक युग की पुन: प्रतिष्ठा के लिए मील का पत्थर बनेगा। इसके लिए महर्षि दयानन्द जी ने जो कार्य किये हैं उनका यह संसार हमेशा ऋणि रहेगा। इतिहास में पहली घटना है कि इतनी बड़ी संख्या में श्रेष्ठ व विद्वान् संन्यासी तैयार हो रहे हैं। ये संन्यासी जो संकल्प ले रहे हैं वह स्वयं अपने लिए नहीं अपितु समष्टि के लिए है। इनका प्रत्येक कृत्य राष्ट्र, धर्म व मानवता को समर्पित हैं।

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इस अवसर पर निवृत्त शंकराचार्य तथा भारतमाता मंदिर के संस्थापक पूज्य सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज ने कहा कि गौतम बुद्ध, शंकराचार्य तथा समर्थ गुरु रामदास के बाद इतनी बड़ी सामुहिक संन्यास दीक्षा किसी ने नहीं दी। इसके लिए योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज को साधुवाद। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में संन्यासियों को देश सेवा में समर्पित करना रामराज्य की स्थापना, ऋषि परम्परा तथा भावी आध्यात्मिक भारत के स्वप्न को साकार करने जैसा है। उन्होंने कहा कि संन्यास आश्रम सर्वश्रेष्ठ है। संन्यासी अपनी चिन्ता नहीं करता तथा सभी विषयों में विरक्त भाव रखते हुए सच्चे मन से समाज की सेवा करता है। जो अपना कुछ नहीं रखता, सारा संसार उसका हो जाता है। ये संन्यासी देश-विदेश में भ्रमण करते हुए भारत की गौरवशाली परम्परा तथा भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करेंगे। समाज की रचना में स्वामी जी का यह कार्य बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि धरा के नीचे वटवृक्ष के बीज की भाँति श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी का पुरुषार्थ भी कम नहीं है।

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इस अवसर पर वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका दीदी माँ ऋतम्भरा जी ने कहा कि आज हमारा संन्यास परिवार नव-संन्यासियों के आगमन से आह्लादित है। धन्य है यह देवभूमि, धन्य है गंगा के तट, वे परिवारजन तथा बहता हुआ गंगा का यह जल जो भारत की इस उज्ज्वल परम्परा का साक्षी बन रहा है। एक सच्चा संन्यासी वैदिक परम्परा को समर्पित होकर माँ भारती की कोख को धन्य करता है। भोगभुक्त होना भारत की परम्परा नहीं है, योगयुक्त होकर धन्य व कृतार्थ होना ही भारत की परम्परा है। साधु अनवरत बहता है, उसे बाँधकर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि भगवा वस्त्र अग्नि की भाँति हैं। इस अग्नि में तपकर संन्यासी का मन कुन्दन बन जाता है। दीदी माँ ने आचार्यश्री की तुलना हिमगिरी से करते हुए कहा कि इनके तप व पुरुषार्थ में निरन्तरता रहती है। प्रलोभनों से परे संकल्पसिद्धि के लिए ये सदैव कृत संकल्प है। इस पवित्र दृश्य की मैं साक्षी बनी इसके लिए पूज्य स्वामी जी महाराज का कोटि-कोटि धन्यवाद।
सुत्तुर मठ, मैसूर, कर्नाटक के जगद्गुरु श्री शिवरात्री देशीकेन्द्र महास्वामी जी महाराज ने कहा कि भारतवर्ष में जन्म लेना, उसमें भी हिमालय की इस उपत्यका में प्रवास होना, उस प्रवास में भी हरिद्वार में श्रद्धेय स्वामी जी का सान्निध्य प्राप्त होना तथा उस सान्निध्य में भी श्रद्धेय स्वामी जी से संन्यास की दीक्षा लेना सभी के लिए गौरव की बात है।
सामान्य रूप से सब चाहते हैं कि संन्यासी बनें लेकिन जब संन्यासी गृहस्थों से पूछते हैं कि आप अपनी संतानों को इस दिव्य संन्यास के लिए दो, तो वे ही पीछे हट जाते हैं, ऐसे में भी इन संन्यासियों के अभिभावकों ने अनुमति दी है, यह बहुत ही पुण्य का कार्य है।
राष्ट्रकर्म व राष्ट्रधर्म को अपना कत्र्तव्य मानकर अहर्निश सेवा करना ही संन्यासी का परम धर्म है। भारतीय संस्कृति दुनियाँ की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है। इसकी रक्षा हमारा परम कत्र्तव्य है। उन्होंने कहा कि बहुत से लोग महिलाओं के संन्यास की आलोचना करते हैं लेकिन पुरुष-स्त्री का भेद तो ऊपरी है, आन्तरिक व आत्मिक रूप से तो सभी समान हैं। चारों आश्रमों की शृंखला में ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास की दीक्षा लेना बहुत ही साहस का कार्य है।
इस अवसर पर साधना केन्द्र आश्रम, डुमेट, देहरादून के पूज्य स्वामी प्रेम विवेकानन्द जी महाराज ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार भारत की आत्मा का मूल तत्व आध्यात्मिकता है।
गणित, विज्ञान, राजनीति व कला आदि में विकास के साथ-साथ भारत ने अपने इस मूल तत्व को कभी नहीं छोड़ा। यह हम सबके लिए गौरव का विषय है। इस सत्प्रयास के माध्यम से यह परम्परा नया आधार पाकर पुन: प्रतिष्ठित होगी।

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