नवदीक्षित संन्यासियों की अभिव्यक्तियाँ
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स्वामी मित्रदेव जी
यदि इस संसार में शाश्वत मानव मूल्यों का कोई वास्तविक संरक्षक है ऋषि संस्कृति, भारतीय संस्कृति, भगवद् संस्कृति के वास्तविक कोई उत्तराधिकारी ध्वजवाहक है तो वे पूज्य स्वामी जी महाराज ही है। शास्त्रावगाहिनी प्रज्ञा से ओतप्रोत राष्ट्रभक्ति की यदि कोई परिसीमा है, आधुनिकता, आध्यात्मिकता, समरसता का त्रिवेणी संगम में यदि कोई अवतारी पुरुष है, तो वह स्वामी जी महाराज है। स्वामी जी साक्षात् धर्म के अवतार है। पूर्ण समर्थ क्रान्तदर्शी महामनीषी पूज्य गुरुदेव एक दिव्य, भव्य व नव्य सभ्य विश्वनिर्माण के लिए अपनी उन्नत परियोजना, संकल्पना को जिस प्रणाली से कार्यान्वित कर रहे हैं वैसा करते हुए समग्र विश्व में और कोई दिखाई नहीं देता। इतना ही नहीं स्वामी जी शुद्ध साम्यवाद, शुद्ध समाजवाद, विकासवाद, अभ्युदयवाद, विकेन्द्रीकृत शासनवाद, एकात्म शासनवाद, परमार्थवाद, शुद्धभाग्यवाद और पुरुषार्थवाद के प्रबल समर्थक, संयोजक, संवद्र्धक व संवाहक हैं। स्वामी जी को शिक्षानीति, धर्मनीति, राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, चिकित्सा, कृषि, वाणिज्य, पशुधन प्रबन्धन, निर्माण, उद्योग सञ्चालन, राष्ट्रसेवा, मानवमूल्य के सिद्धान्त आदि अनेक विषयों में एक साथ अद्भूत ज्ञान व प्रामाणिक अनुभव है। उतना ज्ञान एक साथ किसी में मिलना दुर्लभ है। वे सर्वाङ्गीण विकास के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करते हैं। एकाङ्गी विचार का न समर्थन करते है और न बहिष्कार। आज पूरे विश्व में अध्यात्म क्षेत्र में नेतृत्व करने की क्षमता यदि किसी में है तो वह स्वामी जी महाराज हैं। और आगे चलकर निश्चित ही स्वामी जी महाराज के प्रबल तप, त्याग, प्रभाव, प्रताप व पुरुषार्थ से पतंजलि योगपीठ के द्वारा बड़े-बड़े साम्राज्य स्थापित और सञ्चालित होंगे तथा वैश्विक अर्थनीति राजनीति में भी नेतृत्व का विकास होगा, इसमें कोई शंका नहीं है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि आगे चलकर विश्व मैत्री, विश्वबन्धुता, समरसता विभिन्नता को एकता के सूत्र में बांधने में स्वामी जी महाराज पूर्ण रूप से सफल होंगे। वे वर्ग संघर्ष पर नहीं अपितु वर्ग संबंध पर विश्वास रखते है। संप्रदाय निरपेक्ष, जाति निरपेक्ष, मानव मूल्य के प्रामाणिक सिद्धान्तों को अपने जीवन में जीने वाले इन मानव रत्न को भगवान् दीघार्यु करें। अन्त में ब्रह्मा से लेकर पूज्य आचार्य श्री बालकृष्ण जी महाराज तक की गुरु परम्परा को सादर प्रणाम करता हूँ।
स्वामी परमार्थदेव जी
व्यष्टि से समष्टिगत दु:ख की अत्यन्त निवृत्ति और सुख के परम आधान का महान् उद्देश्य ही एक सन्त को जन्म देता है। जन्म जन्मान्तरों के संचित पुण्यों के फलस्वरूप ऐसा दिव्य जीवन मिलता है जिसमें श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, महान्, समर्थ गुरुओं की शरणागति प्राप्त होती है क्योंकि मेरे गुरु का स्वभाव 'देवो भूत्वा यजेद् देवम’ देव बनकर देवों का यजन करें तथा 'सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति’ सन्त कभी उदास या दु:खी नहीं होते। 'सन्त: प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानाम्’ सन्त ही दु:खी लोगों का आश्रय हैं। 'सन्तश्चाचारलक्षणा’ सदाचार ही सन्तों का परिचय है। इसलिए प्रत्येक शिष्य का यह धर्म है कि अपने गुरु का प्रियाचरण करे। अत: मैंने संन्यास को सहर्ष स्वीकार किया।
स्वामी तीर्थदेव जी
संन्यासियों के जीवन की अपरिमित शक्ति हमेशा मानवता के कल्याण में लगी है। एक-योगी, एक-संन्यासी अपने भीतर की सम्पूर्ण अपरिमित शक्ति को पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए मानव कल्याण के लिए लगाता है। एक संन्यासी के पास संचय व सीमित करने की वृत्ति नहीं होती है। संन्यासी हमेशा अपने विचार, ज्ञान को आगे प्रवाहित करता है। वह अपने दिव्य कर्म व दिव्य जीवन के माध्यम से सदैव दूसरों को प्रकाशित करता है। एक सच्चे संन्यासी का हृदय सदा समष्टि के प्रति उद्घाटित, करुणापूर्ण, वात्सल्य एवं प्रेम पूर्ण रहता है। वह समष्टि को हमेशा पक्षपात रहित होकर न्याय करता अर्थात् समग्रता से देखता और आचरण करता है।
परम पूज्य स्वामी जी महाराज कहते हैं यह जीवन परमात्मा का एक बड़ा उपहार है जीवन अमूल्य है ये दोनों प्रेरणादायी वचन मुझे हमेशा प्रेरित करते रहते हैं। जब हम उनके नियम मर्यादाओं को देखते हैं तो उनमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की दिव्य आत्मा दर्शन देती है। जब समाज को वेद, यज्ञ, स्वदेशी व अंधकार से प्रकाश का मार्ग दिखाते हैं तो महर्षि दयानन्द का प्रतिरूप दिखाई देता है। दीन-दु:खियों के प्रति उनकी करुणा-ममता वात्सल्य जब देखते हैं तो उनके अन्दर एक माँ का स्वरूप दिखाई देता है। जब राष्ट्रधर्म की बात आती है तो उनके भीतर हमारे देश के क्रांतिवीरों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा हर पल प्रेरित करती है। इतने सारे ऋषियों, समाज-सुधारकों व राष्ट्रभक्तों के कार्य को एक साथ करने व हमें हर पल प्रेरित करने वाले पूज्य गुरुवर का सान्निध्य मिला है यह मेरे परम सौभाग्य व गौरव की बात है। पूज्य गुरुवर को मैंने नहीं चुना अपितु पूज्य गुरुवर ने ही मेरा चयन किया है।
स्वामी आत्मदेव जी
मै ऑस्ट्रेलिया में जब अपनी पढ़ाई कर रहा था तब मुझे लगा कि हम देश की सेवा नहीं करेंगे तो और कौन करेगा। हम जो देश में परिवर्तन देखना चाहते हैं उसमें हमें ही सबसे पहले परिवर्तित होना पड़ेगा। उस समय में पूज्य स्वामी जी महाराज को देखकर तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती जी को पढ़ करके यही विचार आया कि मुझे तो संन्यासी ही बनना है। इसी में जीवन की सार्थकता है तथा यहाँ वैदिक गुरुकुलम् में आकर श्रद्धेय गुरु जी के सान्निध्य में यह भावना और प्रबल हुई। उनके मार्गदर्शन से, शिक्षा से तथा आचरण से यह प्रतिष्ठित हो गया कि मनुष्य को संन्यासी बनना ही चाहिए। अत: इस पुण्य कार्य में मैं भी लग गया।
इस पवित्र संन्यास जीवन को धारण करके बहुत ही आह्लादित अनुभव कर रहा हूँ तथा इस अस्तित्व में जो भी दोष, द्वेष, भय, कमज़ोरी आदि थे उन्हें पूर्ण रूप से नष्ट करने का सामथ्र्य भी अनुभव कर रहा हूँ। अब मुझे मार्ग मिल गया है पूर्ण होने का तथा जगत् में पूर्णता की प्रतिष्ठा करने का। जब हम रेगिस्तान में चल रहे हों और प्यास से जब हमारे पूरे अस्तित्व में बेचैनी अनुभव हो रही हो और तब कहीं मीठे पानी का तालाब दिखाई पड़े वैसा ही अनुभव मुझे पूज्य स्वामी जी जैसे गुरु पाकर हो रहा है। एक अध्यात्म के पथिक को जब समर्थ गुरु मिलता है तो यह उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हो जाती है। हमें पूज्य स्वामी जी के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में रहने का सौभाग्य मिल रहा है।
संन्यास लेने के बाद मैंने सामथ्र्य का पूर्ण सदुपयोग नि:स्वार्थ सेवा के लिये करने का लक्ष्य बनाया है। अपने मानसिक, बौद्धिक, वाचिक तथा शारीरिक बल को मैं समस्त विश्व के उत्थान, विकास व पूर्णता के लिये करना चाहता हूँ और उसके लिये मैं अपने सम्पूर्ण सामथ्र्य से स्वयं को शुद्ध करने के लिये व्यक्तिगत रूप से साधना भी करूंगा ताकि मैं अपने सामथ्र्य का अधिक से अधिक प्रभु की प्रीति के लिये उपयोग कर सकूँ तथा उस प्रभु की पूर्णता का अनुभव कर सकूँ।
स्वामी हनुमानदेव जी
समाज में ऊँचे आदर्शों को देखकर ये सहज प्रवृत्ति होती है कि मुझे ऐसे बनना है या मुझे इन जैसे जीवन जीना है। हम आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो अधिकांश युवा विशेष यश को प्राप्त किसी भी क्षेत्र में जो आदर्श होते हैं (तथाकथित आदर्श) उन जैसा बनना चाहते हैं। मैंने भी इन सभी आदर्शों को और पूज्य स्वामी जी महाराज के जीवन की तुलना की कि मुझे कैसा जीवन जीना है? किसका जीवन अधिक लोकोपकारी है, पवित्र है, पारदर्शी है? नि:संदेह मुझे पूज्य स्वामी जी महाराज का जीवन रास आया। स्वामी जी के जल के समान पवित्र जीवन को देख मैंने स्वामी जी जैसे बनने और स्वामी जी जैसे कार्य करने का निर्णय लिया। पूज्य स्वामी जी महाराज मेरे प्रेरणा स्रोत है। पूज्य स्वामी जी महाराज को गुरु रूप में पाने का जो अनुभव है वह अवर्णनीय है। इस संसार में अभी वर्तमान में भी अनेक महापुरुष सन्त है लेकिन हमारा पूज्य स्वामी जी की शरण में ही आना यह नि:संदेह भागवती योजना है। भागवती इच्छा है। ये भागवती प्रेरणा हमारे माध्यम से इस गुरुकार्य का और व्यापक रूप से इस भूतल पर विस्तार देना चाहती है। हमारा अवश्य ही जन्म-जन्मान्तरों का सम्बन्ध है पूज्य स्वामी जी महाराज के साथ इस भागवत कर्म में। अब तो बस पूज्य स्वामी जी का ही प्रतिरूप होकर इस दैवीय कार्य को करने का अभिलाषी हूँ। मैं धन्य हूँ, कृतार्थ हूँ, तृप्त हूँ पूज्य स्वामी जी को पाकर।
साध्वी देवस्वस्ति जी
एक शिष्य के लिए गुरु ही सब कुछ होता है, मेरे लिए भी मेरे गुरु ही सबकुछ हैं। मैंने परम पूज्य स्वामी जी महाराज को गुरु रूप में पाया है, यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ। जब हम अपने घर में होते हैं तो वहाँ माता-पिता, भाई-बहन, मित्र सब अलग-अलग होते हैं। माँ के अन्दर माँ का प्रेम होता है, पिता के अन्दर पिता का, भाई के अन्दर भाई का और बहन के अन्दर बहन का प्रेम होता है लेकिन स्वामी जी के अन्दर हजारों माता-पिता, भाई व बहन जितना प्रेम, करुणा, वात्सल्य, ममता है। स्वामी जी में सभी रिश्ते एक साथ देखने को मिलते हैं। कहते है कि गुरु और भगवान् हमें पात्रता से अधिक देते है बस गुरु के प्रति श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा होनी चाहिए। गुरु-शिष्य को अपना प्रतिरूप बना देता है। गुरु ने मुझे पात्रता से अधिक दिया, मुझे स्वाति से देवस्वस्ति बना दिया। इसके लिए मैं स्वामी जी की बहुत-बहुत कृतज्ञ हूँ। मैं ऐसे समर्थ गुरु को पाकर अपने आपको धन्य समझती हूँ। मैं उस परम पिता परमेश्वर को धन्यवाद करती हूँ कि जिनकी कृपा से मुझे स्वामी जी महाराज का सान्निध्य मिला।
साध्वी देववाणी जी
एक सच्चे गुरु की चाहना हर कोई करता है और करनी भी चाहिए क्योंकि गुरु के बिना गति नहीं। कहते हैं कि एक अक्षर सिखाने वाला भी गुरु होता है, लेकिन अध्यात्म में गुरु की महिमा अवर्णनीय है। एक सच्चा गुरु ही हमें वह अनन्त की राह बता सकता है जिसे यह दुनियाँ देखती हुई भी देख नहीं पाती। गुरु का आलम्बन हमें मार्ग में आने वाली प्रत्येक बाधा से मुकाबला करने में सक्षम बना देता है। परम पूज्य स्वामी जी महाराज में मैंने अपने सद्गुरु को पा लिया है। पूज्य स्वामी जी महाराज की प्रत्येक चेष्टा, प्रत्येक शब्द अपने आप में पूर्ण शिक्षा का स्रोत है। वे स्वयं में प्रमाण हैं। उन्होंने योग, अध्यात्म के शिखर को छुआ है तथा इन सत्यों को प्रामाणिकता से जीया है। मैं ऐसे गुरु की शरण पाकर धन्य अनुभव कर रही हूँ।
साध्वी देवश्री जी
यदि स्थूल रूप से देखें तो बिना संन्यास लिये और संन्यास लेकर सेवा करने में कोई विशेष अन्तर नहीं है परन्तु सूक्ष्मता से देखें तो एक बड़ा अन्तर नजर आता है क्योंकि एक माँ अपने लिए कार्य करने में आलस्य कर सकती है लेकिन अपनी संतान के लिए कभी भी आलस्य प्रमाद नहीं कर सकती, ठीक इसी तरह से बिना संन्यास लिए भी हम सद्गुणों का संचय करते हैं व उसका प्रयोग स्वयं व अन्यों के सुख के लिए करते ही है किन्तु उस समय हम स्वयं की उन्नति को केन्द्र में रखकर सद्गुणों, योग्यताओं का संचय करते है। अत: कभी भी आलस्य प्रमाद या अनिरन्तरता आने की संभावना रहती है किन्तु संन्यास के बाद अपना जीवन समष्टि के लिए समर्पित कर देते है तो न्यून मात्रा में भी किसी कोने में प्रमाद, अनिरन्तरता विद्यमान हो तो वह समाप्त हो जाती है फिर हम अपना हर कार्य पूरी प्रामाणिकता से अपना १०० प्रतिशत लगाकर करते हैं, जिससे यह जीवन और जगत् निरन्तर सुन्दर व निर्मल होता चला जाता है। मैं मानती हूँ कि पूर्णता की ओर तीव्रता से बढऩे के लिए संन्यास लेकर सेवा करना अधिक उपयोगी है क्योंकि संन्यासी एक व्यक्तिगत इकाई नहीं बल्कि अपनी सम्पूर्ण संस्कृति, अपनी सम्पूर्ण गुरु परम्परा का प्रतिनिधि होता है। विस्तृत परिप्रेक्ष्य में कहें तो वह उस परम पिता परमात्मा का प्रतिनिधि होता है जो इस संसार का पिता है। वह सारे संसार के लिए पिता स्वरूप हो जाता है और सारा संसार संन्यासी के लिए संतान रूप हो जाता है।
साध्वी देवनिष्ठा जी
संन्यास स्वयं में एक पूर्ण और अद्वितीय परम्परा है। एक ऐसी अवस्था जिसमें प्रतिपल आनन्द ही आनन्द है। संन्यास दीक्षा के बाद एक विशेष स्वामित्व अनुभव हो रहा है। स्वामित्व किसी दूसरे पर शासन का नहीं अपितु स्वयं पर शासन का। आत्मानुशासन में रहने के लिए संन्यास अत्यन्त आवश्यक है। इन भगवा वस्त्रों में एक अलग सा तेज है जो हर क्षण अहसास दिलाता है कि इन अग्निमय वस्त्रों को धारण करके स्वयं अग्निमय होकर मुझे अग्नि की तरह स्वयं तपकर, पुरुषार्थ कर सर्वहित के लिए कार्य करना है। जीवन की इस दिव्य यात्रा में परम पूज्य श्री स्वामी जी महाराज का साथ मुझे हर समय सकारात्मक ऊर्जा में भरे रखता है। पूज्य स्वामी जी ने अपने दिव्य भागवत संकल्प के तहत हमें दीक्षा देकर हम पर अनन्त अनुग्रह किया है। ऐसे श्रेष्ठ गुरु को पाकर उनसे दीक्षित होकर, उनके शिष्य बनकर, अग्निमय होकर जो अनुभूति हो रही है, वह अप्रतिम है।
साध्वी देवामृता जी
परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज को मैं भगवान् का अवतार मानती हूँ। परम पूज्य स्वामी जी जैसे गुरु को पाकर ऐसा लगता है कि मानों मुझे दुनियां की सबसे बड़ी खुशी मिल गयी है क्योंकि स्वामी जी ने हमें अन्धकार से निकालकर हमें प्रकाश पथ दिखा दिया है। मैं स्वामी जी में एक माँ की ममता, पिता का प्रेम, मित्र जैसा साथ देखती हूँ जो मुझे प्रतिपल सन्मार्ग पर प्रेरित करता रहता है।
मैं अपने आपको भाग्यशाली समझती हँू जो मुझे ऐसे गुरु मिले। स्वामी जी हमारा आध्यात्मिक विकास तो पूर्णरूप से चाहते ही है, साथ ही हमारा भौतिक विकास भी सर्वश्रेष्ठ देखना चाहते है। जब भी मैं स्वामी जो को स्मरण करती हूँ, सुनती और देखती हूँ, तो मुझे अनुभव होता है कि मेरे माता-पिता, भाई-बहन-सखा इत्यादि सब कुछ स्वामी जी ही हैं। स्वामी जी कभी भी हमें नीचे गिरने नहीं देते हमें बार-बार जागरूक करते रहते है। भगवान् से ऐसी प्रार्थना करती हूँ कि मुझे हर जन्म में स्वामी जी ही गुरू के रूप में मिले।
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