संघर्ष एवं समाधान

संघर्ष एवं समाधान

आचार्य बालकृष्ण

   संसार में संघर्ष का सबसे बड़ा कारण है वैचारिक संघर्ष। धार्मिक, आध्यात्मिक, साम्प्रदायिक तौर पर देखें या फिर राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में, विभिन्न प्रकार के विचार, विचारधाराएं, सिद्धान्त एवं नीतियों पर एक गंभीर संघर्ष को हम पूरे विश्व में देख रहे हैं। इसी विचारभिन्नता के बाद फिर लाइक-डिस्लाइक, पसन्द-नापसन्द का उग्ररूप, मैं इस व्यक्ति, इस संस्था, संगठन, मत-पंथ, सम्प्रदाय, पार्टी के इस विचार, विचारधारा, सिद्धान्त एवं नीतियों से नफरत करता हूँ। इस प्रकार का विषम वातावरण या परिस्थिति बन जाती है। इसके बाद असहिष्णुता, बहिष्कार, संघर्ष एवं युद्ध जैसी परिस्थितियां तैयार हो जाती हैं।
सीलिए हम बार-बार कहते हैं कि जैसा विचार, वैसी ही भावना, वाणी, आहार-विहार, व्यवहार, व्यापार एवं संसार होता है। जैसा विचार वैसा संसार। हमारे वैयक्तिक जीवन के रहन-सहन, खानपान से लेकर हमारी आदत, स्वभाव, अभ्यास एवं कार्यक्षेत्र तक सब जगह यदि सबसे बड़ा तत्त्व है तो वह है विचार। हमारे पूर्वजों ने इसी विचार के परिष्कार हेतु शिक्षा, संस्कारों एवं सात्त्विक अभ्यासों का समावेश बाल्यकाल से ही हमारी जीवन पद्धति में किया था। आज पुन: उसी वैदिक जीवन पद्धति, वैदिक भारतीय शिक्षा पद्धति, वैदिक आध्यात्मिक व्यवस्था की समाज के हर क्षेत्र में आवश्यकता है। पतंजलि का सबसे बड़ा लक्ष्य इसी वैदिक विचार की प्रतिष्ठा एवं वेदानुकूल जीवन जीने वाले या आचरण करने वाले दिव्य नागरिक तैयार करना है।
पतंजलि के योग, आयुर्वेद, संस्था, संगठन, शिक्षा तथा अन्य सभी सेवा एवं साधना प्रकल्पों के मूल में यह वैदिक विचार, ऋषि विचार या सार्वभौमिक, वैज्ञानिक, सर्वहितकारी एवं पंथ निरपेक्ष विचार ही हमारा विचार, विचारधारा, सिद्धान्त या नीति है, इसके अतिरिक्त हमारा कोई भी वैयक्तिक एजेन्डा या लक्ष्य नहीं है।
यदि वेद शब्द के सन्दर्भ में भी किसी भी कारण से किसी का आग्रह हो गया है तो सत्य विचार या सत्य सिद्धान्त ही हमारा सिद्धान्त है। विचार शब्द पर बड़े-बड़े शास्त्र लिखे जा चुके हैं तथा हम भी लिख सकते हैं और विचार तत्त्व पर अनन्त मंथन हो सकता है। आइये! इस योग, आयुर्वेद एवं स्वदेशी के सत्य विचार को प्रथम तो स्वयं पूर्णत: स्वीकार कीजिए तथा इसी विचार का प्रचार करके इस संसार या सृष्टि में सुख, समृद्धि, शान्ति एवं सामंजस्य के लिए चल रहे एक महान् ईश्वरीय कार्य, सेवा कार्य या राष्ट्र कार्य में आप भी अपने सम्पूर्ण सामथ्र्य से सहयोग दीजिए, क्योंकि सब मनुष्यों की आत्मा में सत्य की पहचान की सहज स्वीकार्यता का गुण होता है। आप सभी प्रकार की मान्यताओं एवं आग्रहों से रहित होकर सोचेंगे तो आप भी पतंजलि के इस दिव्य अभियान से अवश्य जुड़ेंगे तथा आप व हम मिलकर इस संसार में एक महान् कार्य या दिव्य कार्य का निष्पादन अवश्य करेंगे। हम स्वयं योग, सत्य, सेवा व साधना के पथ पर चलें तथा औरों को चलाएं। आओ! सब मिलकर एक स्वस्थ, सुन्दर, सुखी, समृद्ध, दिव्य संसार बनाएं।

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