राज्यवाद और राष्ट्रवाद में है बड़ा भेद

राज्यवाद और राष्ट्रवाद  में है बड़ा भेद

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

     राष्ट्रवाद एक सर्वसम्मत जानकारी या धारणा होती तो फिर किसी नेता द्वारा उसके प्रतिपादन की कोई आवश्यकता नहीं होती परंतु राष्ट्रवाद विश्व में सैकड़ों अर्थों और संदर्भों में प्रयोग किया जाता रहा है जिनमें से कुछ अर्थ बहुत श्रेष्ठ रहे हैं तो कुछ अत्यंत निकृष्ट।
जहां तक भारत की बात है, जिन दिनों आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व, पहली बार यूरोप के विभिन्न इलाकों में नेशन स्टेट की बात चली और नेशन स्टेट का उदय हुआ, उन्हीं दिनों सनातन धर्म की चेतना से अनुप्राणित मनीषियों ने भारतीय राष्ट्रवाद को भारत माता की आराधना से जोड़ा और इस प्रकार भारत का राष्ट्रवाद जो वस्तुत: राष्ट्रभक्ति था, वह विश्व में एक अद्वितीय रूप में उभरकर सामने आया।
इसके पहले यूरोप में नेशन और स्टेट, ये  दो अलग-अलग भावनाएं या शब्द प्रचलित थे। नेशन का सामान्य अर्थ एक कौम या एक जाति समूह यानी एक बड़ा समुदाय ही होता था और स्टेट का आशय राज्य होता था।
राज्य के अनेक रूप उस क्षेत्र में उन दिनों चल रहे थे, जिनमें मुख्य था शासक का  शासितों को अपने नियंत्रण में लेना परंतु इस नियंत्रण की सामान्य विधियां भिन्न-भिन्न थीं। वे जहाँ  नियंत्रित समाज की परंपराओं, रूढिय़ों तथा प्रथाओं से प्रेरित होती थी, वहीं लगभग 11वीं शताब्दी से १७वीं शताब्दी तक यूरोपीय ईसाई चर्च ने ऐसा प्रयास किया कि उसके प्रभाव वाले राजा लोग केवल उससे सम्बंधित ईसाई पंथ के काल्पनिक या मनमाने नियमों को ही शासन का आधार मानें और ऐसे मनमाने नियमों को 'डिवाइनयानी दिव्य आधार की तरह  प्रस्तुत किया गया। जब इन तथाकथित 'दिव्य ईसाई आधारों से शासन को चलाना शासितों के जीवन को नर्क बनाने वाला सिद्ध हुआ और भयंकर पैशाचिक स्वरूप चर्च का सामने आया, तब कतिपय समझदार लोगों ने 18वीं शताब्दी में नेशन स्टेट की अवधारणा की चर्चा करनी शुरू की और 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वह धारणा साकार हुई। उसके पहले कभी भी यूरोप में कोई नेशन स्टेट नहीं था।
नेशन स्टेट यूरोप में जिस रूप में आया, उसने विभिन्न राज्यों के बीच भयंकर रक्तरंजित युद्धों की पृष्ठभूमि बनाई और साथ ही उसमें अनेक जगह मजहबी या रिलीजियस रंग जोड़ दिया। तब भी बहुत से प्रबुद्ध लोगों ने अपने अपने समाज की प्रथाओं और परंपराओं तथा कॉमन लॉ यानी नैसर्गिक नियमों को आधार बनाकर अनेक अच्छे नियम भी बनाने का प्रयास किया और राज्य को उनके प्रवर्तक के रूप में एक उदार छवि के साथ प्रस्तुत किया, यद्यपि उसमें असत्य कथन और प्रचार का बहुत बड़ा स्थान था।
अंग्रेजों के संपर्क में आने के बाद और इंग्लैंड जाकर पढ़ाई लिखाई करने के बाद से अंग्रेजी पढ़े लिखे भारतीयों ने भारत में भी एक नेशन स्टेट की भावना को उभारना आवश्यक समझा। परंतु अपनी महान् परम्परा के अनुरूप उसे भारत माता की आध्यात्मिक सत्ता से जोड़कर प्रस्तुत किया। अब क्योंकि वेदों में पृथ्वी को माता कहा गया है और उसके प्रति पूज्य भाव है, उसके प्रति एक दिव्य सत्ता होने का भाव है, इसलिए उसी मूल भाव को भारत माता के रूप में प्रस्तुत करना भारतवर्ष में अर्थात् सनातन धर्म के अनुयायी हिंदू समाज में सरल हो गया और इसीलिए बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रख्यात उपन्यास 'आनंद मठका विश्वविख्यात गीत 'वंदे मातरम्भारत के सभी क्रांतिकारियों और वीर सपूतों और सुपुत्रियों ने राष्ट्रगान के रूप में अथवा भारतीय चेतना के जयघोष के रूप में अपना लिया और फिर आनंदमठ के उस गान में भारत माता का जो दिव्य स्वरूप प्रस्तुत किया गया था, जो कि बंगाल के तथा उत्तर भारत के अनेक संन्यासियों के द्वारा भी उन दिनों पूजित हो रहा था, एक दिव्य चेतना और सत्ता के रूप में जगदंबा का साक्षात्कार वे महान् संन्यासी कर रहे थे इसलिए उस भाव और उस विचार को फैलने में देर नहीं लगी। स्वामी विवेकानन्द और श्री अरविन्द ने उसकी और भी गहरी आध्यात्मिक व्याख्या की और इस प्रकार संपूर्ण भारतीय राष्ट्रीयता में वन्दे मातरम् का उद्घोष और भारत माता की साधना, ध्यान और जय का एक महान् शक्ति के रूप में फैलाव व्यापक हुआ।
परंतु जैसा प्रत्येक महान् विचार के साथ होता है, जो नास्तिक अथवा आध्यात्मिक चेतना विहीन राज्यकर्ता लोग थे, उनके बोध का स्तर इतना निम्न था कि वे  कभी भी उस आध्यात्मिक रूप में भारत माता को देख ही नहीं सकते थे और केवल नारे सुन सुनकर उन्होंने उस शब्द को दोहराना शुरू किया। लेकिन उनकी समझ में कुछ नहीं आता था। विशेषकर जो लंदन से पढ़ लिखकर लौटे नेता थे, उनमें से अनेक उसे किसी एक भौगोलिक सत्ता के वाचक शब्द के रूप में प्रस्तुत करते रहे और वह एक निरर्थक शब्द बनने लगा। जबकि व्यापक लोकमानस में वह उसी दिव्य सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित था और भारत माता कहने पर सामान्य भारतीय यानी सामान्य हिंदू भाव विभोर होते थे क्योंकि उनके चित्त में जगदंबा की ही छवि उभरती थी। परंतु लंदन से पढ़कर और नास्तिक बनकर आये कुछ नेताओं के चित्त में वह एक नारा मात्र बनकर रह गया और उन्होंने लोगों को उत्तेजित और संगठित तथा आंदोलित करने के लिए उस शब्द का प्रयोग जारी रखा। परंतु ना तो वह कभी भी किसी प्रकार की आध्यात्मिक साधना करते थे, ना ही वे लोग भारत की महान् ज्ञान परम्परा, विद्या परंपरा, पुरुषार्थ परंपरा और गौरवशाली इतिहास के गंभीर अध्ययनकर्ता थे और ना ही उनमें से किसी को इतना समय था कि वह संपूर्ण भारत को ठीक से घूम कर इसकी विराट विविधता और व्यापकता को समझते।
इसलिए उनके लिए 'भारत माता की जयशब्द एक नारा मात्र बनकर रह गया। विशेषकर जब से श्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राजनीति की ठंडी धारा अर्थात् हिसाब-किताब वाली धारा यानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक नास्तिक भौतिकतावादी पंथ का उदय हुआ, तब से उनके लिए हर चीज मोबिलाइजेशन की एक तकनीक बन गई और 'भारत माताÓ मोबिलाइजेशन का एक नारा मात्र बनकर रह गया।
परंतु इससे भी अधिक बुरी बात यह हुई कि विश्व युद्ध के दबाव के कारण और नेताजी सुभाष चंद्र बोस तथा भारतीय राष्ट्रीय सेना के भय के कारण जल्दी से जल्दी भारत छोड़कर जाने की विवशता आ जाने पर अंग्रेजों ने अपने चाटुकारों के समूह से सत्ता के हस्तांतरण की जो शर्तें निश्चित कीं और उन शर्तों को समर्पित भाव से स्वीकार करने वाले समूह को सत्ता सौंप कर जैसे ही गए, वैसे ही उनकी कृपा से सत्ता संभालने वाले नए लोग यानी नास्तिक और भौतिकतावादी नया समूह जो अब सत्तारूढ़ हुआ, वह भारत माता की सारी बातें दो अर्थों में करने लगा।
एक तो सनातन धर्म पर प्रहार करने के लिए उसने भावना पूर्ण ढंग से विवेकानंद की कही हुई यह बात कि 'कुछ वर्षों के लिए सभी देवी देवताओं की उपासना त्याग कर केवल भारत माता की उपासना करोÓ- उसका अर्थ और भाव ही विकृत कर दिया कि सामान्य हिंदू को उपासना आदि से विमुख  हो जाना चाहिए अथवा सामान्य धार्मिक उपासना करने वाले हिंदुओं को, (जो नया शिक्षित समाज नेहरू आदि  बना रहे थे, वह) कुछ बीते दौर के कुछ गए गुजरे लोगों की चीज समझ ले और यह समझे कि भारत माता वस्तुत: एक भौगोलिक क्षेत्र का नाम है जो मानो परिवार की बहुत बूढ़ी कोई माता है जिसकी हम सब संतानें हैं और अब इस बूढ़ी माता की रक्षा हमें ही करनी है। अर्थात् भारत माता में कोई दिव्य शक्ति नहीं है, वह ग्राम देवता की भांति एक कोई भावात्मक सत्ता है, स्थान देवता है और वह भी मात्र भावात्मक है। यही कारण है कि भारत माता का कोई व्यावहारिक स्वरूप उन्होंने प्रस्तुत नहीं किया अपितु एक देवी माँ की  सिंह वाहिनी छवि भर बनाकर उनकी तस्वीर रखने लगे और फिर उसके बाद इस भौगोलिक इकाई को ही भारत माता की तरह बताना शुरू कर दिया।
फिर तो यह क्रम चल पड़ा कि कभी यह कहना कि भारत माता बंदिनी है तो कभी यह कि भारत माता दु:खी है, या भारत माता का अंग भंग हो गया, भारत माता का मस्तक कट गया, इस प्रकार की तमाम गंदी और आध्यात्मिक चेतना रहित नितांत भौतिकतावादी बातों के साथ भारत माता को प्रस्तुत किया जाने लगा।
जिसका परिणाम भारत में नास्तिकता और भौतिकता के प्रसार तथा एक निरर्थक नारेबाजी के रूप में सामने आया और वर्तमान में 'भारत माता की जयबोलते हुए जहां सामान्य भारतीय एक दिव्य भावना से प्रेरित होता है, जगदंबा दुर्गा माता की जैसी छवि का ध्यान करता है, वहीं नास्तिक और भौतिकतावादी नेता लोग भारत माता की जय कुछ इस प्रकार बोलते हैं, मानो वे घर की किसी बड़ी बूढ़ी की जय बोल रहे हों, किसी एक अत्यंत वृद्धा स्त्री की जय बोल रहे हों और उसके साथ राष्ट्रवाद शब्द को ऐसे दोहराते हैं मानो कि जो वर्तमान राज्य का ढांचा है, उसी की सेवा में समर्पित हो जाना, उसको मजबूत करना, उसके बारे में कोई प्रश्न नहीं उठाना, उसके किसी भी अधर्म या पाप की ओर संकेत भी नहीं करना और राष्ट्रीय नेताओं की जय जयकार करना-  यही राष्ट्रवाद बना कर प्रस्तुत किया जाता है जो कि भारत माता की शताब्दियों पुरानी और पृथ्वी माता की करोड़ों वर्षों से प्रतिष्ठित मूर्ति तथा चेतना और ज्ञान परंपरा के नितांत विरुद्ध है तथा भारत की आध्यात्मिक परंपरा से पूर्णतया विपरीत है और इस प्रकार एक भौतिकतावादी धर्म निरपेक्ष एवं  धर्म चेतना से रहित और नास्तिक शासकों के प्रति भक्ति को ही भारत माता की भक्ति या राष्ट्रवाद बताने का एक प्रयास विविध राजनीतिक समूह करते हैं।
यह तो भारत माता की मूल बोध परंपरा को नष्ट करने का उपक्रम है। इसलिए किसी भी प्रबुद्ध व्यक्ति को यह ध्यान करना आवश्यक है कि राज्यवाद राष्ट्रवाद नहीं है और राष्ट्रवाद राष्ट्रभक्ति नहीं है, भारत की राष्ट्रभक्ति का कोई अर्थ नहीं है अगर वह आध्यात्मिक चेतना से संपन्न नहीं  हो, अगर भारत की परंपराओं, ज्ञान परंपराओं और अध्यात्म परंपराओं का पोषण कोई राज्य नहीं करता तो ऐसा राज्य भारत माता का शत्रु है, भारत माता का विरोधी है, भारत माता का सेवक नहीं अपितु उस पर अन्याय करने वाला आततायी है। उसका स्वयं को भारत माता का भौतिक पुत्र बताना कुछ भी अर्थ नहीं रखता और इसीलिए ऐसे किसी भी राष्ट्रवाद का भारतीय अध्यात्म परंपरा और विद्या परंपरा तथा राज्य शास्त्रीय परंपरा से कोई भी संबंध नहीं है। यहां हमें वेदों में प्रतिपादित पृथ्वी माता के मूलभूत तत्व को स्मरण कर लेना आवश्यक है। पृथ्वी को वेदों में देवी कहा गया है। वे साक्षात् विष्णु पत्नी हैं। चेतन सत्ता हैं। कोई एक भौगोलिक क्षेत्र समझ कर फिर उसकी महिमा गाना और उसको वेदों से जोडऩा हास्यास्पद है।
वर्तमान में भारत माता के नाम से वैदिक सूक्तों को उद्धृत किया जाता है, जो गलत है। वेदों में ऐसा कोई भी शब्द नहीं है और जो लोग इसका प्रयोग भारत के लिए करते हैं, वे वस्तुत: पहले तो पृथ्वी देवी के स्थान पर भारत माता लाते हैं, फिर भारत माता के नाम से किसी दिव्य सत्ता के स्थान पर किसी एक स्त्री की कल्पना करते हैं और वह स्वयं मानो उस स्त्री की संतान बन जाते हैं। ऐसी स्त्री जिसको संतानों की सेवा की आवश्यकता है।
इस प्रकार मानो भारत माता को अब सेवा की आवश्यकता है और उसने इन्हें जन्म दे दिया, अब बदले में ये सेवा करेंगे, जो इनकी समझ में आएगा, वह करेंगे यानी किसी नेता या पार्टी या संगठन या संघ के कार्यक्रम की सेवा में पूरे देश को लगाएंगे।
इसमें यह स्थिति बनती है कि उक्त नेता या पार्टी भारतवर्ष के बारे में कोई ज्ञान रखे या न रखे, वेदों, उपनिषदों, धर्म शास्त्रों को पढ़े, ना पढ़े, भारत कितना विराट और महान् है, इसकी संस्कृति, विद्या परंपरा, ज्ञान परंपरा, पुरुषार्थ परंपरा और तप परंपरा कैसी भव्य विराट और विविधता से भरी हुई है, कितना श्रेष्ठ समाज था, जातियों और संप्रदायों में सुविभक्त और सुगठित कैसा महान् समाज था, यह सब समझ कोई पार्टी या नेता रखे या ना रखे, वह जातियों को गाली दे, धर्माचार्यों को गाली दे, धर्म शास्त्रों को बीती हुई चीज बताएं, फिर भी उस नेता या उस पार्टी की जयकार करना ही भारत माता की सेवा बताएंगे और इस प्रकार एक महान् राष्ट्र को खोखला करने या नष्ट करने को ही भारत माता की भक्ति बताएंगे। यहाँ तक कि भारत माता की संस्कृति और धर्म नष्ट करने वालों को पहले वोटर बनाकर फिर उसे भारत माता का अनिष्ट करने की छूट देते हुए उसके मत का जयकार करेंगे और इसे ही या इसे भी भारत माता की सेवा बताएंगे। फिर ये नास्तिक कहेंगे कि किसी देवी देवता की भक्ति ना करो, बस भारत माता की सेवा करो यानी हमारी जयकार करो।

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