श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...

श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...

मुक्ति का व्यावहारिक दर्शन व सिद्धान्त

दिव्य जीवन जीने के तीन सोपान, साधन या उपाय हैं। योगी को जीवन में तीन सबसे बड़े कार्य करने होते हैं। एक आसन व व्यायाम से शरीर की शुद्धि तथा प्राणायाम व ध्यान से अन्त:करण या चित्त की शुद्धि एवं अष्टांग योग के अन्तर्गत यम-नियमों से आचरण की शुद्धि। जब एक मनुष्य की ये तीन शुद्धि हो जाती हैं तो वह मनुष्य देवता, ऋषि, महामानव या महापुरुष बन जाता है। उसका जीवन दिव्य जीवन बन जाता है। अर्थात् शारीरिक दु:ख, मानसिक दु:ख, तनाव, उदासी, परेशानी आदि तथा जीवन में आचरण स्वभाव आदि के दोष स्वरूप दूसरों से मिलने वाले समस्त दु:खों का नितान्त अभाव हो जाता है। सभी प्रकार के अज्ञान, अभाव, दु:ख, शोक आदि से मुक्त जीवन ही वास्तव में जीवन मुक्ति है, यही मुक्ति का मूल सिद्धांत है। जो व्यक्ति इस जीवन को फूलों की तरह खिलता हुआ, हँसता हुआ, सुगन्धित (अपने सुकर्मों की गन्ध से) जीवन जीता है, वही जीवन मुक्त योगी है और इसी में जीवन मुक्त योगी को लक्षण हैं तथा वह निश्चित रूप से मरने के बाद भी मुक्त ही होता है, किन्तु जो यहाँ दु:ख से मुक्त नहीं हो पाया, वह मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त कर पायेगा, यह कहा नहीं जा सकता।

आसन व व्यायाम:

चिकित्सा विज्ञान के अब तक के अनुसंधान इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि कम से कम प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति को भी प्रतिदिन 20 से 30 मिनट आसन व व्यायाम अवश्य करना चाहिये, जिससे कि रोग, बुढ़ापा, दु:ख, तनाव व तनावजनित रोगादि से सर्वथा मुक्त रह सके।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।
गीता ६/७
अर्थात् जिसका आहार, व्यवहार, समस्त चेष्टाएं या क्रियाएं, निद्रा व जागरण सब युक्त हैं, उचित हैं, सन्तुलित हैं, उसके लिए यह योग दु:ख का नाशक बन जाता है।
कोई कितना ही बड़ा महापुरुष, योगी, तपस्वी क्यों न हो यदि वह आसन, व्यायाम या आहार आदि की अवहेलना करेगा तो शारीरिक कष्टों से मुक्त हो ही नहीं सकता, इस यथार्थ को झुठलाया नहीं जा सकता। अनेकों महापुरुषों का जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिन्हें आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ऊँचा जीवन जीते हुए भी आसन, व्यायाम आदि के अभाव में सामान्य रोगों से लेकर कैन्सर आदि बड़े रोगों से उन्हें पीडि़त होना ही पड़ा।
प्राणायामपूर्वक ध्यान:
प्रतिदिन कम से कम आधा घण्टा प्राणायाम पूर्वक ध्यान करने से अन्त:करण की शुद्धि होकर समाधि की प्राप्ति होती है। प्राणायाम का फल बताते हुए योगदर्शन में लिखा है-
'तत: क्षीयते प्रकाशावरणम्’ (योग. २/५२)
'प्राणो ब्रह्मेति’ (उपनिषद्) अर्थात् जो संस्कार हमने क्रिया योग से तनू किये थे, वे ध्यान से समूल नष्ट हो जाते हैं। 'योगाङ्गानुष्नादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरावेवकख्याते:’ (योग. १/२८) अर्थात् प्राणायाम पूर्वक ध्यान से चित्त की अशुद्धि का क्षय होने पर ज्ञान का प्रकाश बढ़ता ही रहता है जब तक कि पूर्ण विवेक प्राप्त न हो जाये।
प्राणायाम व ध्यान के अभ्यास के बिना किसी को भी इन्द्रिय व अन्त:करण की शुद्धि, मन पर विजय, चित्तवृत्तियों का निरोध, आत्मबोध व परमात्म तत्व का बोध हो ही नहीं सकता।

अष्टांग योग के अन्तर्गत यम-नियमों का पालन:

यम-नियमों का पालन करने से आत्मिक शुद्धि होती है। शुद्ध आत्मा का अन्तिम सत्य है आचरण की पवित्रता। 'आचारहीन: न पुनन्ति वेदा:।’ (ऋग्वेद) अर्थात् आचरण से हीन व्यक्ति को तो वेद की ऋचाएं भी पवित्र नहीं कर पाती हैं। आचरण की पवित्रता ही मनुष्य जीवन का परम पुरुषार्थ है। 'अथ त्रिविधदु:खात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थ:। आधिभौतिक, आधिदैविक व आध्यात्मिक तीन प्रकार के दु:खों का सर्वथा अभाव ही परम पुरुषार्थ है। 'यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानव:।। (गीता १८/४६) अर्थात् जिससे सभी प्राणी जन्म लेते हैं, जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उस परमात्मा की अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
'पवित्र मे शतायुषा’ (वेद) अर्थात् मैं पवित्रता पूर्वक जीते हुए सौ वर्ष की आयु को प्राप्त करूँ।
स्वे-स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
गीता (१८/४५)
अपने-अपने स्वकर्म में जो व्यक्ति लगा रहता है वह सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
अत: योगी आसन, व्यायाम, प्राणायाम, ध्यान व यम-नियमों का सतत पालन करते हुए अपने आचरण की दिव्यता व पवित्रता से स्वयं आनन्दित रहता हुआ सर्व जगत हितकारी बन जाता है।
यम-नियमों के पालन के बिना योगी होना तो बहुत ऊँची व बहुत दूर की बात है, वह एक अच्छा इन्सान, अच्छा माता, पिता, गुरु, शिष्य, अच्छा किसान, व्यापारी, नेता, अभिनेता व एक आदर्श नागरिक भी नहीं बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति यम-नियमों के पालन के बिना अध्यात्म की बात करता है तो वह कोरा पाखण्ड ही है, क्योंकि पूरा यम-नियम ही अध्यात्म की आधारशिला है। अध्यात्म के मूल सिद्धान्त, रीति, नीति व अध्यात्म का पूरा दर्शन यम-नियमों पर ही टिका हुआ है।

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