धर्म का मर्म
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आचार्य बालकृष्ण
संसार में विज्ञान (Science) या गणित (Maths) के फार्मूलों में किसी का मतभेद नहीं है। सभी मानते हैं कि 2 और 2, चार ही होते हैं। H2O अर्थात् दो गुणा हाइड्रोजन तथा एक गुणा ऑक्सीजन मिलाकर पानी ही बनता है यह भी सर्वमान्य है, क्योंकि ये दृष्ट सत्य हैं लेकिन अदृष्ट सत्यों को लेकर दुनियां में बहुत भ्रान्तियां हैं और खासकर धर्म के नाम पर। धर्म का ठीक-ठीक बोध न होने के कारण संसार में बहुत संघर्ष है। वेद में, कुरान में, बाइबल में या गुरुग्रन्थ साहिब में क्या लिखा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं, अपितु वेद, कुरान, बाइबल आदि को मानने वाले लोग कैसे जीते हैं, यह महत्वपूर्ण है।
धार्मिक लोगों का जीवन व आचरण कैसा है यह लोग देखना चाहते हैं। एक भगवान् का विधान है जो वेदादि ग्रन्थों में उपलब्ध होता है दूसरा संसार का विधान है जो संविधान में उपलब्ध होता है, दोनों ही प्रकार के विधान का पालन करना ही ईश्वर की आज्ञापालन करना है। भगवान् का स्वरूप क्या है? सत्य, न्याय, प्रेम, सद्भाव, नैतिकता, अहिंसा ये सब भगवान् के ही रूप हैं। परमात्मा है इसका क्या प्रमाण है? निकट से देखें तो मेरा स्वयं का होना अर्थात् शरीर में हर्ट, लीवर आदि अंग-प्रत्यंगों का अहर्निश क्रिया करना तथा रस रक्तादि धातुओं का निर्माण, माँ के गर्भ में शिशु का निर्माण आदि प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
और यदि बाहर देखें तो इस विशाल ब्रह्माण्ड की रचना जिसे बनाना तो दूर देखकर समझ पाना भी नामुमकिन है यह ईश्वर के होने का दृष्ट प्रमाण है। भगवान् का दर्शन क्या है? अपनी अन्तर्रात्मा में परमात्मा की प्रेरणा को अनुभव कर लेना ही उसका आन्तरिक दर्शन करना है। दूसरा इस बाह्य जगत में सर्वत्र उसकी कृति में उस कर्ता का अनुभव करना यह बाह्य दर्शन है। भगवान् का दर्शन होगया इसका क्या प्रमाण है? यदि किसी व्यक्ति के जीवन में बाह्य या आन्तरिक स्थायी ऐश्वर्य की उपलब्धि दिखाई दे तो, उसने ईश्वर की कृपा को प्राप्त किया है इसका प्रमाण है तथा इसके अतिरिक्त यदि उसके जीवन में दिव्य ज्ञान, दिव्य प्रेम, अखण्ड निष्ठा व प्रचण्ड पुरुषार्थ दिखाई दें तो यह प्रमाणित करता है कि उसने ईश्वर का दर्शन किया है। त्रयी विद्या वेदों में दिव्य ज्ञान को ही ज्ञान योग (शुद्ध ज्ञान), दिव्य प्रेम व अखण्ड निष्ठा को ही भक्ति योग (शुद्ध उपासना) तथा प्रचण्ड पुरुषार्थ को ही-कर्मयोग (शुद्ध कर्म) कहा गया है। भगवान् कहां रहते हैं? भगवान् सदा सब प्राणियों को सर्वत्र प्राप्त हैं- 'ईशावास्यमिदं सर्वम्’ 'वासुदेव सर्वम्’ सियाराममय सब जग जानि।’ यदि वह सर्वत्र उपलब्ध है तो हम उसे प्राप्त क्यों नहीं कर पाते? दोषपूर्ण अन्त:करण से उसे नहीं पाया जा सकता। धर्म क्या है? यतोऽभ्युदयनि:श्रेयस सिद्धि: स धर्म:।’ जिससे अभ्युदय व नि:श्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। अभ्युदय क्या है? समग्र, अर्थात् शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनैतिक दृष्टिकोण से मनुष्य व मनुष्येत्तर सबका विकास यह है समग्र विकास। अत: समग्र, स्थायी, विकेन्द्रित, न्यायपूर्ण सात्विक समृद्धि ही अभ्युदय है। नि:श्रेयस क्या है? नि:=निशेष रूप से, श्रेयस=कल्याणकारी अर्थात् सम्पूर्ण रूप से जो शुभ या कल्याणकारी है अर्थात् योग, अध्यात्म व ध्यानादि के माध्यम से ज्ञान का प्रकाश पहले बुद्धि में हो जाये और फिर वह जीवन के आचरण में उतर जाये यही नि:श्रेयस है। धर्म का ठीक-ठीक बोध न होने से कहाँ संघर्ष होता है? धर्म का मर्म न जानने से सबसे बड़े संघर्ष के क्षेत्र हैं- १. साम्प्रदायिक संघर्ष, २. आर्थिक संघर्ष, ३. राजनैतिक संघर्ष, ४. शिक्षा में संघर्ष, ५. रोग: दु:ख व स्वास्थ्य सम्बन्धी संघर्ष
1. साम्प्रदायिक संघर्ष:
केवल मात्र मेरा सम्प्रदाय ही सर्वश्रेष्ठ है, सब मनुष्य मेरे ही सम्प्रदाय के अनुयायी बन जायें। केवल मेरे सम्प्रदाय को मानने से ही मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है इत्यादि भ्रम के कारण धर्म परिवर्तन आदि का संघर्ष मनुष्य से उसके मानवाधिकार छीनने में लगा है।
2. आर्थिक संघर्ष:
मेरे पास अत्यधिक धन सम्पत्ति है इसलिए मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ। मैं ही कुलीन हूँ। जबकि होना यह चाहिये कि मैं भी श्रेष्ठ हूँ तथा सभी दूसरे भी श्रेष्ठ हैं।
3. राजनैतिक संघर्ष:
मेरी पार्टी, उसके सिद्धान्त और एजेण्डा ही सर्वश्रेष्ठ हैं, इसी के चलते सब पार्टियों में संघर्ष है।
4. शिक्षा का संघर्ष:
शिक्षा में बच्चों को अनिवार्य रूप से क्या पढ़ाया जाना चाहिये इसका ठीक-ठीक निर्णय न हो पाना तथा कुछ आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी बच्चों को भी उच्च शिक्षा के अवसर न मिल पाना। अशिक्षा के कारण देश में सृजनात्मकता में न्यूनता का होना तथा कभी-कभी अयोग्य व्यक्तियों का ऊँचे पदों पर समासीन हो जाना।
5. स्वास्थ्य सम्बन्धी संघर्ष:
स्वास्थ्य से सम्बन्धित जानकारी के अभाव में कितने ही लोग रोग व दु:खादि के कारण अकालमृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं या फिर बहुत सारा धन, समय और शक्ति बीमारी के कारण नष्ट हो जाते हैं। ऐसे में पतञ्जलि का ध्येय क्या है?
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तो उपरोक्त पाँचों प्रकार के संघर्षों को दूर कर सह अस्तित्व की भावना से युक्त व भाईचारा पूर्ण, आध्यात्मिक राष्ट्र का निर्माण करना यही हमारा ध्येय है। यही वेदों की व भारत के ऋषियों की दृष्टि भी रही है।
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योग, आयुर्वेद, स्वदेशी के माध्यम से आचरण की दिव्यता व श्रेष्ठता वाले नागरिक तैयार करना, जिनका जीवन दिव्यता का एक दृष्टान्त बन सके क्योंकि गुण या दोष देखा-देखी बढ़ जाते हैं। देश में देखा-देखी योग व दिव्यता बढ़े तथा योग व कर्मयोग हमारा जीवन का ध्येय बन जाये, यह हमारा लक्ष्य है।
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बुरा विचार, बुरी भावना, बुरा कर्म इच्छा होने पर भी न करें तथा अच्छा कर्म, अच्छा विचार व भावना इच्छा न होने पर भी करें।
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मनुष्य की ऊर्जा योग व कर्मयोग के माध्यम से नकारात्मकता से हटाकर सकारात्मक कार्यों में लगाना हमारा ध्येय है।
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आजकल प्रचार का जमाना है, अगर हम योग व स्वदेशी जैसी अच्छी बातों का भरपूर प्रचार नहीं करेंगे तो इन सबका दुष्प्रचार तो चलता ही रहेगा।
पतञ्जलि का उत्तराधिकारी कौन होगा? पतञ्जलि का उत्तराधिकारी कोई व्यापारी नहीं अपितु ये विद्वान् सन्यासी पुरुष और महिलायें ही बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की विरासत को सम्भालेंगे।
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01 Mar 2025 17:58:05
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