गुरुसत्ता, सेवा व संगठन की महिमा
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डॉ. सुमन, मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी- पतंजलि योग समिति
हम सब अपनी-अपनी रुचि व सामथ्र्यानुसार पतंजलि योगपीठ हरिद्वार से जुड़े हैं। पतंजलि योगपीठ के बहुआयामी विस्तृत स्वरूप के परिचय से पूर्व हम यह जानने का प्रयास करें कि मूल रूप में पतंजलि योगपीठ क्या है? एक आध्यात्मिक संस्था है। इसका आधार क्या है? पतंजलि योगपीठ का मूल तत्व है सेवा, उस सेवा का माध्यम है-योग, आयुर्वेद एवं स्वदेशी, इस त्रिविध सेवा का शरीर है- संगठन या संस्थान और उस संगठन एवं संस्थान रूपी शरीर के प्राण हैं आयुर्वेद शिरोमणि श्रद्धेय आचार्य श्री व इस शरीर की आत्मा है- एक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, हार्दिक आत्मिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक व यौगिक दिव्य भागवत् शक्ति से सम्पन्न एक जागा हुआ सन्यासी। इस संस्थान का प्रारम्भ से लेकर आज तक तथा आगे भी मूल उद्देश्य है मानवता व समष्टि की सेवा। माध्यम है- संगठन और संस्थान तथा इस सबके पीछे दृष्ट शक्ति है-गुरु तथा अदृष्ट शक्ति है-भगवान् अत: इस संगठन या संस्थान से जुडऩे से पूर्व इन तीन तत्वों का (सेवा, संगठन व गुरु की महिमा) बौद्धिक चिन्तन, मनन, ज्ञान अवश्य ही कर लेेना चाहिये, पारमार्थिक अर्थ तो सेवा करते-करते स्वत: ही हमारे समक्ष उपस्थित हो जायेगा।
श्रद्धेय स्वामी जी महाराज कहते हैं कि जीवन में जब हम किसी श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, समर्थ गुरु के पास जाते हैं तो हममें सेवा, निष्ठा का भाव जागृत होता है गुरु के प्रति निष्ठा व सेवा का भाव होने से संगठित होकर जीवन में सेवा और साधना करते हुए हम पूर्णता की ओर आगे बढ़ते हैं।
I.) गुरुतत्व की महिमा:
गुरुतत्व के सन्दर्भ में तीन बातों पर हमारे सभी साधक भाई-बहनों को गंभीरता से विचार करके गुरु की शरणागति में ही एक आध्यात्मिक दिव्य जीवन जीने के लिए पूर्ण समर्पित या प्रतिबद्ध होना चाहिये।
1. अदृष्ट सत्य का दर्शयिता:
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ समर्थ गुरुसत्ता व ऋषि परम्परा के आश्रय के बिना जीवन में नये आध्यात्मिक सत्य घटित नहीं हो सकते क्योंकि आध्यात्मिक जीवन में दो तरह के सत्य हैं एक है- दृष्ट सत्य अर्थात् ईश्वर का ज्ञात, मूत्र्त, दृश्य, व्यक्त, प्रत्यक्ष तथा विश्वमय रूप का दर्शन तथा दूसरा है- अदृश्य, अज्ञात, अमूत्र्त, अव्यक्त, परोक्ष एवं विश्वातीत ब्रह्माण्ड की अनुभूति एक ब्रह्मवेता गुरु के सान्निध्य से ही हो सकती है।
2. दिव्य आलम्बन:
बिना सात्विक आलम्बन के आध्यात्मिक जीवन की यात्रा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। आधार या आलम्बन के बिना दुनिया में किसी भी जड़ या चेतन तत्व का अस्तित्व नहीं है। सांसारिक जीवन हो या फिर आध्यात्मिक जीवन हमें कोई न कोई आश्रय, आधार, आलम्बन या सहारे की आवश्यकता होती ही है। आध्यात्मिक जीवन में भगवान् की प्राप्ति या भगवान् की अनुभूति के लिये प्रत्यक्ष गुरुसत्ता का आलम्बन ही एकमात्र मार्ग है।
परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायापास्त्यकृत: कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।। (मुण्डक.-1/12)
अर्थात् 'कृत’ से 'कृत’ ही पाया जा सकता है, जिसकी उत्पत्ति है और विनाश है वही मिल सकता है। 'कृत’ से 'अकृत’ नहीं मिलता। ब्रह्म तो 'अकृत’ है, उसकी उत्पत्ति नहीं, विनाश नहीं। 'अकृत’ को 'अक्रतु’ ही पा सकता है। 'तमक्रतु: पश्यति’। उस 'अकृत’ को जानने के लिए समित्पाणि होकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु के चरणों में उपस्थित होना आवश्यक है। सभित्पाणि का अभिप्राय है हाथ में तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा रूपी तीन समिधाएं लेकर गुरु के पास शिष्य जाये। गुरु अग्रि स्वरूप है और शिष्य उस ज्ञानाग्रि रूप गुरु में स्वयं को समर्पित करके तद्रूप होना चाहता है, अग्रि स्वरूप, ज्ञान स्वरूप, गुरु स्वरूप, गुरु का प्रतिरूप होना चाहता है।
3. शाश्वत का प्रतिनिधि:
भगवान् का हम वैज्ञानिक प्रत्यक्ष दृष्ट या मूत्र्त प्रमाणों से अस्तित्व सिद्ध नहीं कर सकते। आत्मकार्य सिद्धान्त, सृष्टि चक्र, विज्ञान, कर्मफल व न्याय व्यवस्था सिद्धान्त आदि के आधार पर हम भगवान् का अस्तित्व मानते हैं। कारणाभावात् कार्याभाव: (वैशे- 1/32)। अर्थात् कारण के अभाव से कार्य का अभाव हो जाता है जैसे धागे के अभाव में वस्त्र का अभाव तथा मिट्टी के अभाव में घड़े का अभाव दिखाई देता है। मिट्टी कारण है, घड़ा कार्य है। इसी प्रकार यह संसार कार्य है और भगवान् इसका निमित्त कारण है। इसलिए संसार को देखकर इसके बनाने वाले ईश्वर का अनुमान तो होता है परन्तु वह कैसा है, इसका ज्ञान तो केवल कोई समर्थ गुरु ही करा सकता है। मूलत: ब्रह्म एक अदृष्ट परम सत्य या परमसत्ता है। गुरु भगवान् की दिव्यता से अभिभूत ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वरीय संवदेना व ईश्वरीय शक्ति के मूर्त रूप होते हैं उनमें साधना व सेवा के द्वारा ईश्वरीय दिव्यता अवतरित हो जाती है, वे इस ईश्वरीय सत्ता या शाश्वत के प्रतिनिधि या प्रतिरूप या मूत्र्तरूप होते हैं। ऐसे समर्थ गुरुसत्ता या आप्त पुरुषों का पावन सान्निध्य, सत्संग, मार्गदर्शन व शरणागति ही हमारे जीवन का परम सौभाग्य व परम कल्याण है।
4. दिव्य रूपान्तरण का कर्ता:
गुरु की महिमा को समझना यद्यपि भगवान् की महिमा को समझने जैसा है परन्तु फिर भी यथा शक्ति ग्रहण शीलता का प्रयास तो किया ही जा सकता है यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन का समस्त आमूल-चूल दिव्य रूपान्तरण करना चाहता है तो उसका एकमात्र आधार गुरु ही है। गुरुतत्व वह है जो हमारी आन्तरिक मूर्छा को तोड़कर हमें जगा दे, स्वयं से परिचय करा दे और अन्त में अपने जैसा बना दें। गुरु उस पारस के समान नहीं है जो लोहे को सोना बना दें अपितु वह तो उस भृंगी कीट की भाँति है जो भिन्न-भिन्न जाति के कीड़े अपने मिट्टी के घर में बन्द करके एक निश्चित अवधि के बाद उन्हें अपने ही स्वरूप वाला बनाकर बाहर निकलता है और तब तक बाहर की बाकि सब अवाजें बंद करके उसे एक ही आवाज सुनाता है कि तू भृंगी है। हमारे दोषों के दर्शन तो अनेक लोग ऊँगली उठाकर करते-कराते रहते हैं परन्तु उनके उन आरोपों या दोषारोपण से कोई परिवर्तन जीवन में नहीं आ पाता है जबकि पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की कृपा से करोड़ों लोगों के जीवन में भिन्न-भिन्न प्रकार के दिव्य परिवर्तन घटित हुए हैं। कई बार हम गुरु को ही नसीहत या सुझाव देने लगते हैं कि स्वामी जी देश में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो दूर-दराज गाँवों में रहते हैं, गरीब हैं, ज्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं, रोगी होने पर इलाज भी नहीं करा पाते, हमें उनके बारे में भी कुछ सोचना चाहिये। फिर स्वामी जी उत्तर देते हैं इस महान् कार्य को सम्पन्न करने के लिए ही मैंने तुम्हारा चयन किया है।
5. अनन्त धैर्य, प्रेम व करुणा के अवतार:
गुरु के बारे में श्री अरविन्द लिखते हैं कि गुरु में माँ के समान अनन्त करुणा व प्रेम तथा पिता के समान अनन्त धैर्य होता है और इस रूप का दर्शन मैंने अपने गुरुदेव श्रद्धेय स्वामी जी महाराज में किया है। अत: भगवान् की अहैतुकी कृपा से ऐसा गुरु हमारे पास है। स्वयं भगवान् और गुरु आपके शरीर के माध्यम से एक बड़ी दिव्य अभिव्यक्ति करना चाहते हैं। क्या आप उन्हें वैसा करने देंगे? यदि हाँ, तो आपको अपने भाव, विचार, वाणी और क्रिया में एकरूपता लाते हुए सेवा, संगठन, संस्थान व गुरु की महिमा को जानते हुए निर्भय तथा निद्र्वन्द होकर पतंजलि योगपीठ से जुड़ जाना चाहिये। जब कभी चेतना का स्तर नीचे की ओर जाने लगे तो आपको दृढ़ता पूर्वक यह संकल्प दोहराना चाहिये कि ''मैं अपने भगवान् और गुरु की अमानत हूँ और कोई भी अशुभ मुझे छू नहीं सकता है’’ जब व्यक्ति गुरु के प्रति खुला हुआ या ग्रहणशील होता है तब गुरु कृपा उसके अन्दर तुरन्त प्रवेश कर जाती है और ऐसे चमत्कार घटित होते हैं कि वर्षों का कार्य कुछ दिनों में तथा कभी-कभी तो कुछ घंटों में भी सम्पन्न हो जाता है। व्यक्ति को लगता है कि मेरे जीवन में तो हँसते-खेलते सहज रूप से दिव्य रूपान्तरण घटित हो रहा है।
II.) सेवा का स्वरुप:
''सेवाधर्म: परम गहनो योगिनामप्यगम्य।‘’ यद्यपि यह सेवा तत्व इतना गहन व गम्भीर है कि योगियों को भी यह बहुत कठिनता से ही समझ में आता है फिर भी इस तत्व के बारे में चिन्तन करना अत्यावश्यक है। सेवा से अभिप्राय है जब हम अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, वाचिक या आत्मिक आदि किसी भी प्रकार की शक्ति को आंशिक रुप में बिना किसी स्वार्थ के, आत्म संतुष्टि हेतु दूसरों के हित के लिए खर्च करते हैं यह सेवा है। श्रद्धेय स्वामी सोमानन्द जी महाराज के शब्दों में अपनी ही इच्छा से दूसरे के दु:खों को गले से लगाना ही सेवा है। सेवा की कभी कीमत नहीं आंकी जा सकती है क्योंकि सेवा अमूल्य होती है। सेवा वह द्वार है जिसमें वह प्रवेश करके हम सहज ही उस आनन्द तक पहुँच जाते हैं, जहाँ योगियों का बड़ी-बड़ी तपस्याएं करके पहुँचना सम्भव है। जो शक्ति, सामथ्र्य व आनन्द किसी स्वामी (मालिक) को अत्यन्त अथक पुरुषार्थ करके प्राप्त हो पाता है वह एक सेवक को सहज ही उपलब्ध हो जाता है।
1. तीन प्रकार की सेवा:
तामसिक, राजसिक व सात्विक रुप में सेवा तीन प्रकार की होती है। योग और अध्यात्म के माध्यम से की जाने वाली सेवा सात्विक सेवा है। सात्विक वैचारिक सेवा के रूप में हमारे पूर्वज, ऋषि-मुनि-योगी प्रतिदिन प्रार्थना किया करते थे-''सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्’’ क्योंकि जिस प्रकार का हम चिन्तन, विचार करते हैं, उसी प्रकार की शक्तियों को हम इस धरती पर आकर्षित व अवतरित करने का आह्वान करते हैं। सेवा और कर्म में प्रकाश और अंधकार जैसा अंतर है। एक तरफ सामान्य कर्म हमारे बन्धन का कारण है तो दूसरी तरफ दिव्य कर्म या सेवा हमारी मुक्ति का द्वार है। आप अपने घर में झाड़ू लगाते हैं और एक मंदिर में जाकर लगाते हैं, एक मकान अपने घर में बनाते हैं और दूसरा किसी मंदिर, आश्रम, स्कूल या धर्मशाला में बनवाते हैं दोनों का अनुभव (स्नद्गद्गद्यद्बठ्ठद्द) अलग होता है, यद्यपि जागरूक न रहें, तो वहाँ भी अहंकार, स्वार्थपरता, एषणा आदि का प्रवेश सेवा को नष्ट कर सकता है,
2. अनन्त सुख सौभाग्य का आधार सेवा:
प्रत्येक व्यक्ति को दिन भर में कम से कम एक दो घण्टे तो ऐसे सार्थक सृजनात्मक व लोक हितकारी कर्म अवश्य करने चाहिये जिनमें उनको सांसारिक दृष्टि से कोई फल मिलने की आशा नहीं है, परन्तु यह है बहुत आवश्यक क्योंकि यही नि:स्वार्थ सेवा हमारे इस जीवन के अदृष्ट सौभाग्य अर्थात् यह सेवा अनन्त गुणा होकर हमारे वैयक्तिक, पारिवारिक व्यवसायिक व अध्यात्मिक जीवन में सुख, समृद्धि, सफलता व शान्ति का कारण बनती है तथा पुनर्जन्म में भी हमारे साथ जाती है पैसा तो इस जीवन का यही रह जाता है सेवारूपी पुण्य ही हमारे पुनर्जन्म के माता, पिता, कुल, गुरु, सफलता व समृद्धि का कारण बनती है। इसे ही समाज व शास्त्र में श्रेष्ठ प्रारब्ध या ऊँची किस्मत या भाग्य भी कहते हैं। सच्चा सेवा तत्व इस धरती पर भगवान् का वरदान है। परम सौभाग्यशाली हैं वे लोग जिन्हें यह अनमोल तत्व रत्न उपलब्ध हो गया है।
सेवा का फल:
क. बाह्य फल: योग एवं सेवा का फल क्या है- इसका इस संसार में सबसे बड़ा उदाहरण है पतंजलि योगपीठ, पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी का जीवन। पतंजलि की सामाजिक, आर्थिक व आध्यात्मिक सफलता व पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी का पुण्यों से प्रकाशित दिव्य जीवन। जिसमें इस भौतिक व आध्यात्मिक जीवन की सफलता का एक आदर्श रूप दिखता है यह सब योग ध्यान, भगवान् की भक्ति उपासना एवं सेवा का ही तो फल है।
ख. आन्तरिक फल: जिस प्रकार अन्नादि आहार शरीर की पुष्टि एवं तृप्ति के कारण बनते हैं उसी प्रकार सेवा हमारे आन्तरिक अस्तित्व, मन-बुद्धि, प्राण, हृदय व आत्मा की पुष्टि, तृप्ति व उत्कर्ष का कारण बनती है। एक सच्चे सेवक को अतिरिक्त साधन की आवश्यकता नहीं होती। हमारे आन्तरिक अस्तित्व की शुद्धि पवित्रता एवं अहंकार, राग, द्वेष, ईष्र्या आदि दोषों के नाश का कारण बनती हैं क्योंकि सेवा करते समय व्यक्ति को विविध प्रकार के लोगों के बीच, विविध संस्कारों, मान्यताओं, रुचियों व धारणाओं वाले व्यक्तियों के बीच रहना पड़ता है। वे अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थियाँ हमारे द्वन्दों की नाशक तथा द्वन्द सहन कर तपस्या करवाने की कारण बन जाती हैं। जागरूक सेवक व्यक्ति प्रत्येक घटना या परिस्थिति को भगवान् का उपहार समझकर स्वीकार करता है तथा उस उपहार को भगवान् का अनुग्रह कृपा सन्देश समझकर जीवन में आगे बढ़ जाता है। श्रद्धेय स्वामी सोमानन्द जी महाराज कहा करते थे- सेवक को ना कहने का अधिकार नहीं होता है। वे कहते थे- 'सेवक तो कोई बिरला है, जो आठों पहर रहे जाग’।
अत: जिन आत्माओं को आगे जन्म-मरण का कारण तैयार नहीं करना, कोई कर्माशय नहीं बनाना अपितु जीवन मुक्त होकर जीने की इच्छा है, या फिर भगवान् ने उनको मोक्षाधिकारी के रूप में चुन लिया है केवल वही आत्माएं इस सेवा तत्व का या सेवाकर्म का चयन करती हैं।
सेवा के आदर्श:
क. समष्टिगत दैवी शक्तियाँ: प्रकृति में धरती माता, सूर्य, चन्द्रमा, वायु आदि दिव्य शक्तियाँ हमारे लिए सेवा के आदर्श है, क्योंकि इस सृष्टि में जो कुछ भी सृजन या क्रिया हो रही है, उसके मूल आधार ये दिव्य शक्तियां ही हैं। इनके अभाव में कोई भी कर्म होना सम्भव नहीं है, फिर भी ये मौन सेवा करते हुए कभी श्रेय लेने हेतु ताली नहीं बजवाना चाहते, मंच पर चढऩे की आकांक्षा नहीं रखते अपितु सब क्रियाओं का श्रेय हम मनुष्यों को लेने देते हैं।
ख. आदर्श महापुरुष: चेतन आत्माओं में शबरी, केवट, हनुमान जी आदि के उदाहरण हमारे लिए आदर्श है, लेकिन कुछ लोग रामायण और उसके उच्चादर्श चरित्रों को काल्पनिक मानते हैं, ऐसे जड़ बुद्धि वाले लोग सेवा के आदर्श के रूप में साक्षात पूज्य आचार्य जी तथा श्रद्धेय स्वामी जी महाराज को देख सकते हैं। आज पतंजलि योगपीठ के माध्यम से जो कुछ भी इस देश और दुनिया में हुआ, उस सब क्रिया मात्र का मूल कारण हैं- पूज्य आचार्य जी व स्वामी जी महाराज की सेवा, तप व पुरुषार्थ। परन्तु सब कुछ का मूल कारण होते हुए भी वे सदा श्रेय दूसरों को ही देते हैं। कभी भी हमने उनको कर्तृव्य के अहंकार से युक्त होते नहीं देखा अर्थात् सब कुछ करते हुए भी कुछ भी न करने जैसी विनम्रता इतना अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ करने के बावजूद भी भाग्य या कर्माशय की कोई रेखा उन्होंने अपनी हथेली पर नहीं पडऩे दी। संसार में सबसे बड़ा सौभाग्यशाली वही है जिसके हाथ में कोई भाग्य की रेखा नहीं है अर्थात् जिसने पुण्यात्मक कर्माशय भी नहीं बनने दिया अपितु निष्काम सेवा से जीवन मुक्त पद को प्राप्त किया है। अखण्ड प्रसन्नता, विनम्रता व दिव्यता से युक्त उनका जीवन हमारे लिए सेवातत्व का उच्च आदर्श है। इसलिए सेवा करते समय शास्त्रदि का ज्ञान ज्यादा ना हो तो भी पूज्य आचार्य जी व श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के आचरण, वाणी व व्यवहार व जीवन को अपने सामने रख लेना सेवातत्व के कोहिनूर से स्वत: परिचय हो जायेगा।
III.) संगठन का स्वरूप:
पूज्य स्वामी जी महाराज बार-बार एक बात को कहते हैं कि योग, अध्यात्म एवं सामाजिक जीवन का एक बहुत बड़ा सत्य है कि मनुष्य इस धरती पर भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना है तथा उसका इस संसार के प्रति सबसे बड़ा उत्तरदायित्व भी है। हमारे अस्तित्व अर्थात् हमारे जन्म से लेकर अन्तिम श्वास मृत्यु तक इस समष्टि समाज या संसार का हम पर बहुत बड़ा उपकार है। अत: एकाङ्गी जीवन व एकाङ्गी दृष्टिकोण यह जीवन के लिए शुभ नहीं होता। स्वयं योग करना तथा कराना, स्वयं पुरुषार्थ व धर्मार्थ साधना व सेवा करना तथा कराना, स्वयं सत्य, धर्म, न्याय, भगवान् व वेद के मार्ग पर चलना तथा औरों को चलाना स्वयं देशभक्त होना तथा दूसरों को भी राष्ट्रभक्त बनाना, स्वयं स्वदेशी का प्रयोग करना अन्यों को भी स्वदेशी के मार्ग पर लाना यह है- संगठन एवं संगठित जीवन का मूल सिद्धान्त।
संगठन उस शक्ति को कहते है- जिसमें अनेक दिव्य आत्माएं एक साथ किसी विराट् उद्देश्य की पूर्ति हेतु किसी एक आदर्श व्यक्तित्व के आदेशानुसार अपनी वाणी, व्यवहार, आचरण, क्रियाएं व जीवन की यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। ऋग्वेद का अन्तिम सूक्त 'संगठन सूक्त भी हमें संगठन की महिमा को बतलाता है। संगठन में भिन्न आत्माएं होते हुए भी उन सबके विचार, मनन, सिद्धान्त, चित्त, हृदय तथा लक्ष्य एक समान होते हैं। जिस प्रकार रेलवे स्टेशन पर अनेकों प्लेटफॉर्म होते हैं, अनेकों यात्री होते हैं, पर उनमें से कुछ यात्री किसी एक विशेष प्लेटफॉर्म पर चुपचाप एकत्रित हो जाते हैं, ये वे यात्री हैं जिनकी यात्रा का लक्ष्य एक ही दिशा में है, उसी दिशा में, उसी ट्रेन से सबको आगे बढ़कर अपने लक्ष्य पर पहुँचना है, इसलिए वे जाति, धर्म, वर्ग, समूह, मजहब, प्रान्त, भाषा, वेशभूषा, मान्यता आदि के सब दृश्य भेदों से ऊपर उठकर एक साथ आनन्द से ट्रेन में यात्रा करते हैं।
संगठन की महिमा:
संगठन का सबसे बड़ा जीवन्त उदाहरण है हमारा शरीर में करोड़ों सूक्ष्म कोशिकाएं, उनसे बनने वाले ऊतक, अवयव, कर्मेन्दियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ एवं अन्त:करण चतुष्टय है। एक छोटे से पिण्ड में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है।
क. किसी भी बड़ी उपलब्धि का आधार-संगठन: व्यक्ति का अपना अस्तित्व, घर, समाज या सम्पूर्ण राष्ट्र एक संगठन का ही स्वरूप है, व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक या राष्ट्रीय स्तर की कोई बड़ी उपलब्धि कभी भी संगठन के बिना उपलब्ध नहीं हो सकती है। जैसे व्यक्तिगत बड़ी उपलब्धि हेतु व्यक्ति को अपने भाव, विचार, वाणी, व्यवहार, क्रिया, शरीर, मन-बुद्धि, इन्द्रियां, हृदय व आत्मा को एक ही प्लेटफार्म पर अर्थात् एक ही दिशा में लगाना होता है, यदि ये सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में गति करें तो व्यक्तिगत रूप से कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं हो सकती है इसी प्रकार परिवार के सब सदस्यों के एकमत होने से पारिवारिक, सामाज व राष्ट्र के किसी लक्ष्य विशेष के हेतु एकजुट होने से सामाजिक या राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हो सकती है। प्रकृति से भी हम संगठन की महिमा को समझ सकते हैं। चींटी या मधुमक्खी यद्यपि छोटा सा प्राणी है, मनुष्य उसकी तुलना में अत्यन्त विराट् है किन्तु वही छोटा सा प्राणी जब संगठन के रूप में संगठित हो जाता है तो बलवान् से बलवान् व्यक्ति भी उनकी शक्ति से डरकर उन्हें कोई क्षति पहुँचाने का दुस्साहस नहीं कर पाता। इसी प्रकार साधारण से दिखने वाले व्यक्ति भी जब किसी एक प्रबल नेतृत्व के सानिध्य में एकत्रित हो जाते हैं, तो वे असाधारण कार्य कर दिखाते हैं। पतंजलि योगपीठ इसका साक्षात प्रमाण है। इसी प्रकार कौओं का या बन्दरों का संगठन भी जग विख्यात है।
संगठन में गुरु निर्देश सर्वोपरि:
जो व्यक्ति संगठन की शक्ति व महिमा को पहचानते हैं वे संगठन के निर्देशों का सम्मान, पावन वेदमंत्रों के समान करते हैं। महत्त्वपूर्ण यह नहीं होता कि वह निर्देश किसके माध्यम से मिला, महत्त्वपूर्ण यह है कि- निर्देश मेरे गुरु का है और गुरु इस धरती पर भगवान् का ही सगुण, साकार रूप हैं, इसलिए एक तरह से यह निर्देश मेरे भगवान् का ही है। जो पुत्र अपने माता-पिता से अत्यन्त प्रीति व विश्वास करता है वह उनका पत्र मिलने पर यह ध्यान नहीं देता कि पत्र कौन-सा डाकिया लेकर आया, अपितु उसका ध्यान तो इस पर होता है कि पत्र में क्या संदेश मेरे लिए आया है। इसी प्रकार संगठन में भी किसी एक गुरु के निर्देशानुसार सर्वहितकारी किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सब उसी दिशा में यथाशक्ति पुरुषार्थ करते हैं।
संगठन की कार्य पद्धति:
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अनासक्ति का भाव:
संगठन में सेवा करने हेतु, संगठन के मूल व्यक्ति के प्रति श्रद्धा, निष्ठा व विश्वास तथा अपने व्यक्तिगत आसक्तियों, आग्रहों व मान्यताओं का त्याग करना होता है। यदि अनासक्ति का भाव नहीं है तो व्यक्ति के माध्यम से कोई बड़ी अभिव्यक्ति नहीं हो पायेगी, संगठन कार्यों की शिथिलता का हेतु देते समय वह अपने ही परिवार की, दुकान की, बिजनेस की, मजबूरी गिनाता रहेगा। आसक्ति के कारण अपने विचारानुकूल 2-4 लोगों के ग्रुप विशेष में ही अटककर रह जायेगा। आसक्ति के कारण दोष होने पर भी अयोग्य व्यक्ति का त्याग और योग्य व्यक्ति का सम्मान या स्वीकार नहीं कर पायेगा। संगठन में सेवा करने के लिए व्यक्ति को मोहन बनना पड़ेगा। अर्थात् मोह+न। मोहन नाम ईश्वर का है। वह सबसे प्रेम तो करता है, पर मोह नहीं करता इसीलिए सबके साथ न्याय कर पाता है और इतने बड़े सृष्टि रूपी संगठन को कुशलता से चला पाता है।
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हृदय की विशालता:
संगठन में सेवा करने के लिए व्यक्ति को गणेश भी बनना पड़ता है अर्थात् 'गणाना ईश इति गणेश। गणेश के बड़े कान व बड़ा पेट इस बात का प्रतीक है कि गण के स्वामी को सबकी पूरी बात सुननी चाहिये और सुनकर उसे अपने पेट में डालकर डायजेस्ट भी करना आना चाहिये, अगर ऐसा नहीं होगा तो किसी एक पक्ष की बात सुनकर वैसा आग्रह बनाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं कर पायेगा और फलस्वरूप संगठन का विस्तार नहीं ह्रास ही होगा। संगठन में पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी महाराज सबसे ज्यादा सेवा निरन्तर करते हैं और उसका श्रेय कभी अपने मुख से स्वयं को नहीं देते सबका सम्मान, सबके साथ प्रेम, सबके साथ निर्वैर तथा निरहंकार अवस्था में रहते हुए संगठन के नेतृत्व का आदर्श, हमारे समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रकार का सेवानिष्ठ, निष्कपट आचरण करते हुए पिछले लगभग दो दशक में उन्होंने इस विराट् लक्ष्य की यात्रा को वर्तमान पड़ाव तक पहुँचाया है, हम सब उसका शतांश आचरण भी करें तो जीवन में संगठन के माध्यम से काफी बड़ी उपलब्धि को पाया जा सकता है।
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