ज्ञान की जिज्ञासा बनाम प्रभुत्व की जिज्ञासा
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भारतीय इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों और सन्दर्भों पर चर्चा से पूर्व कुछ अन्य मूलभूत तथ्य भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जानना आवश्यक है। यूरोप में विगत 200 वर्षों में ज्ञान की एक भूख जगी और उसी अवधि में ज्ञात यूरोपीय इतिहास में पहली बार राष्ट्र-राज्यों का उदय हुआ। यूरोप के लिए राष्ट्र-राज्य एक अद्भुत वस्तु थे। क्योंकि उनके ज्ञात इतिहास में एक भी बड़ा राष्ट्र-राज्य कभी हुआ ही नहीं।
रोम (जिसका मूल नाम 'रामस्’ या 'राम’ था, जिसका अर्थ भगवान राम का नगर है) मूलत: एक छोटा-सा गाँव था, जहाँ पहले आस पास के कुछ गाँवों में भरतवंशी क्षत्रिय शकों ने आधिपत्य स्थापित किया और फिर क्रमश: कुछ समय के लिए वह विशाल क्षेत्र में भी फैला। परन्तु एक तो उसकी सीमा कभी भी स्थिर नहीं थी और दूसरे वह कोई राष्ट्र-राज्य नहीं था।
रोम साम्राज्य की चर्चा वे अवश्य करते हैं, परन्तु रोम (जिसका मूल नाम 'रामस्’ या 'राम’ था, जिसका अर्थ भगवान राम का नगर है) मूलत: एक छोटा-सा गाँव था, जहाँ पहले आसपास के कुछ गाँवों में भरतवंशी क्षत्रिय शकों ने आधिपत्य स्थापित किया और फिर क्रमश: कुछ समय के लिए वह विशाल क्षेत्र में भी फैला। परन्तु एक तो उसकी सीमा कभी भी स्थिर नहीं थी और दूसरे वह कोई राष्ट्र-राज्य नहीं था। एक फैलती और सिकुड़ती जागीर थी। बाद में केवल लोगों के चित्त में एक प्रभाव और प्रचार की दृष्टि से 'होली रोमन एम्पायर’ की बात अवश्य की गयी, परन्तु सत्य यह है कि किसी एक इलाके को कभी भी 'होली रोमन एम्पायर’ नहीं कहा गया। इस तथ्य का उल्लेख पिछले अंक में किया जा चुका है।
यूरोप का जो वर्तमान क्षेत्र है, उसे यूरोप भी पहली बार 19वीं शताब्दी ईस्वी में ही कहा गया है। जैसा कि नॉर्मन डेविस की प्रसिद्ध पुस्तक 'यूरोप : ए हिस्ट्री’ में 'इण्ट्रोडक्शन’ में ही पृ.-7 पर लेखक ने स्पष्ट किया है कि यूरोप एक नितान्त आधुनिक 'आइडिया’ है। (कुछ नकलची भारतीय नेता और बौद्धिक आजकल उसी नकल में 'इण्डिया’ को भी 'आइडिया’ कहते हैं, जबकि वह लाखों वर्षों से एक वास्तविक जीवन्त भौगोलिक सत्ता से सम्पन्न राष्ट्र है।) वस्तुत: जब विज्ञान की खोजों के 17वीं शताब्दी ईस्वी में फैलने के साथ क्रिश्चियनिटी बदनाम होने लगी, तब 'क्रिस्टेनडम’ की जगह 'यूरोप’ नामक आइडिया फैलाया जाने लगा। 18वीं शताब्दी ईस्वी तक यूरोप नाम की कोई वस्तु विश्व में प्रसिद्ध नहीं थी। वह भौगोलिक क्षेत्र तो करोड़ों वर्षों से है, परन्तु उसका नाम यूरोप नहीं था। उसके नाम लगातार बदलते रहे हैं।
इस यूरोप को जो भी स्मृति विगत 200 वर्षों में है, उसमें इसे कुल 2 प्रमुख राजनैतिक इकाइयाँ विदित हैं। पहला है- रोम साम्राज्य, जो नितान्त अस्थायी वस्तु-सत्ता रही और दूसरा है- नगर-राज्य, यानी सिटी-स्टेट, जो अपने आकार और फैलाव में इस प्रकार के थे, जैसे हरिद्वार में कनखल, ज्वालापुर, मायापुरी, सप्त-सरोवर, बहादराबाद, आदि अलग-अलग सिटी-स्टेट हों। यवन क्षेत्र के तथाकथित नगर-राज्यों की आबादी भी इन इलाकों से बहुत कम थी और आकार भी। उसी की निरन्तरता में वर्तमान में 'वेटिकन सिटी’ नाम का एक राष्ट्र-राज्य है, जिसकी कुल आबादी 1 हज़ार से कम है और कुल क्षेत्रफल भी 50 हेक्टेयर से कम है।
ऐसे यूरोप के लोगों ने जब ज्ञान की पहली झलक देखते ही ख्रीस्तपंथी जकडऩ से स्वयं को मुक्त कर दुनिया को देखना शुरू किया, तो चीन और भारत को देखकर वे विस्मित रह गये। वस्तुत: यूरोप के लोगों ने सबसे पहले विशाल राज्य भारत में ही देखे। आज तो यह तथ्य भी छिपाया जाता है कि भारत के राज्यों- त्रावणकोर-कोचीन, विजयनगर, ग्वालियर, इन्दौर, जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर आदि में अनेकों अंग्रेज़, फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगीज और डच सैनिक सेवारत रहे थे। पहली बार आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान इन्हें वस्तुत: भारत से ही हुआ। यह इतना सुविदित तथ्य है, परन्तु भारत के लोगों के बीच इसे इस तरह छिपाया गया है कि इससे स्वयं पढ़े-लिखे भारतीय अवगत नहीं हैं और पहली बार सुनने पर चौंक जाते हैं। जबकि यूरोप का प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति यह तथ्य अच्छी तरह जानता है।

इसके साथ ही 18वीं शताब्दी के यूरोप के विषय में वे सामान्य तथ्य भी पढ़े-लिखे भारतीयों को ज्ञात नहीं हैं, जो यूरोप का प्रत्येक विद्यार्थी जानता है। उदाहरण के लिए, 18वीं शताब्दी ईस्वी में जब कोई बाहरी व्यक्ति लंदन पहुँचता था, तो वह शहर की गंदगी और शोर से थक जाता था। लंदन के अधिकांश लोग 19वीं शताब्दी ईस्वी में भी कैसी भयंकर दशा में रहते थे, इसका सबसे प्रामाणिक वर्णन तो पढ़े-लिखे भारतीयों के एक बड़े अंश के आराध्य महापुरुष कार्ल माक्र्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'पूँजी’ के अनेक अध्यायों में किया है। 17वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तराद्र्ध में तो लंदन में फैली हुई आग ने शहर के बहुत बड़े इलाके को भस्म कर दिया था और वे उस आग पर काबू नहीं पा सके थे। उसके बाद हड़बड़ी में जो बेतरतीब बस्तियाँ बसीं, वे आधुनिक भारत के शहरों की गंदी बस्तियों से बहुत अधिक सँकरी और गंदी थीं।
18वीं शताब्दी तक यूरोप में जल निकासी और मल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं थी। खुले गंदे नाले शहर के बीच बहते थे और शौच का कोई सुन्दर प्रबन्ध नहीं था। रात को एक ही पात्र में पूरे घर के लोग निपटते थे और सुबह खिड़की से सारा मल गलियों में फेंक देते थे, जिसे दिनचढ़े देर तक साफ करने के लिए सुअरों के झुण्ड गलियों में छोड़े जाते थे। इसी कारण शहर के लोग दिन के 10 बजे के बाद ही बाहर निकलना पसन्द करते थे। सी.पी. मॉरिज़ ने 1782 ईस्वी में लिखा है कि- ''लंदन में जगह-जगह कसाइयों के ठेले हैं, जो गंदी दशा में गोश्त की बिक्री करते हैं, चारों ओर बदबू फैली रहती है।’’
शहर में जगह-जगह गंदगी और मल के ढेर तथा मरे हुए जानवरों के शव पड़े रहते थे, जिनमें कुत्ते-बिल्ली, घोड़े और चूहे मुख्य थे। शहर में कहीं भी पानी की आपूर्ति के लिए धातु के पाइप नहीं थे। पेड़ के तनों की खोखल के द्वारा जगह-जगह पानी बाँटा जाता था। कुछ सम्पन्न इलाकों में इन खोखलों को जोड़कर ही पानी की आपूर्ति के लिए पाइप बनाये जाते थे। टेम्स नदी का पानी बहुत गंदा, मटमैला था, जिसमें शहर का मल भी गिरता था और जिसका पानी शहरी लोग पीते भी थे। साथ ही एक ओर से दूसरी ओर सामान लादकर पहुँचाने वाली छोटी-छोटी डोगियाँ भी चलती रहती थीं। वस्तुत: इस गंदे पानी से बचने के लिए ही शहर में शराब का चलन व्यापक हुआ। शुरू में सबसे ज्य़ादा 'जिन’ चली, जो कि सस्ती और मटमैली होती थी।
18वीं शताब्दी में सम्पूर्ण लंदन में एक भी निजी स्नानघर नहीं था। थोड़े से सामूहिक स्नानघर थे, जहाँ एक ही जलपात्र होता था, नहाने के बाद जो पानी बहता था, वह एक दूसरे जलपात्र में संचित कर पुन: पहले में डाल दिया जाता था। केवल राजमहल में स्नानघर था।
18वीं शताब्दी ईस्वी में इंग्लैण्ड के लोग बड़े पैमाने पर कोयला जलाते थे, जिसका धुँआ पूरे इलाके में छाया रहता था। ठण्ड होने के कारण वह कुहासा और धुँध बनकर दिनचढ़े देर तक फैला रहता था।
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि 18वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक यूरोप में शिक्षा केवल राजघरानों और पादरियों तक सीमित थी। 18वीं शताब्दी में पहली बार चर्च ने कुछ अन्य लोगों को भी बाइबिल पढऩे की अनुमति दी। जिसे 'एनलाइटेनमेन्ट’ कहा जाता है, वह वस्तुत: यूरोप में 18वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार उल्लेखनीय रूप में उदित हुआ। यह एनलाइटेनमेन्ट फैलाने वाले लोग स्वयं को 'फिलॉसफर’ कहते थे और खुद को यवन विद्वान सुकरात का अनुयायी बताते थे। ऐसा करते हुए वे चर्च की जकड़बन्दी से कुछ छूट पाने का प्रयास करते थे।
इन 'फिलॉसफर्स’ ने चर्च द्वारा फैलाये गये विचार कि 'मनुष्य मूलत: पापी है, क्योंकि वह स्त्री-पुरुष के मिलन से पैदा हुआ है, जो कि स्वयं में मूल पाप है’ के विरोध में यह कहना शुरू किया कि 'मनुष्य दिव्य चेतना का अंश है और इसीलिए अच्छाई तथा दिव्यता मनुष्य की मूल प्रकृति है।‘ सभी जानते हैं कि यह मूलत: भारतीय दृष्टि है और यह भी सभी जानते हैं कि हज़ारों वर्षों तक यवन क्षेत्र (जिसे केवल अंग्रेज़ी में 'ग्रीस’ कहते हैं और जो स्वयं को ऐलवंशी या हेला कहते हैं) भारतवर्ष के उत्तरापथ का एक जनपद था और सुकरात वस्तुत: भारतीय दार्शनिकों से सीखी गयी बातें ही बोलते थे। यवन क्षेत्र कभी भी मुख्य यूरोप से जुड़ा नहीं था। उसका सम्बन्ध सदा से भारत से ही था। केवल कुछ सौ वर्ष पूर्व मुख्य यूरोप के लोग यवनों के सम्पर्क में आये हैं। उससे पहले नहीं।
इस प्रकार इन 'फिलॉसफर्स’ ने चर्च से अपना सम्बन्ध बौद्धिक स्तर पर तोड़ दिया। यद्यपि शारीरिक और मानसिक स्तर पर उनका चर्च से सम्बन्ध बना रहा। ज्ञान के इसी प्रसार के साथ वे लोग विश्व के विषय में विशेषकर भारत और अमेरिका के विषय में अधिक से अधिक जानकारियाँ संग्रहीत करने लगे और उन्हीं दिनों उन्होंने पहली बार भारत और अमेरिका में बड़े राज्य देखे, जिसकी प्रेरणा से 19वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार यूरोप में राष्ट्र-राज्य का उदय हुआ।
इस प्रकार यूरोपीय लोगों को यवन क्षेत्र और भारत की मुख्य भूमि के प्रभाव से जिज्ञासा के लिए प्रशस्त क्षेत्र मिला और वे किसी बच्चे की तरह हर चीज़ को जानने और सँजोने में लग गये। परन्तु चर्च और क्रिश्चियनिटी के दबाव से उनकी जिज्ञासा ज्ञानपरक उतनी नहीं रही, जितनी कि शक्तिपरक हो गयी। सारी जिज्ञासा और उससे संग्रहीत जानकारी का उपयोग किस प्रकार अपनी और अपने पंथ की या समूह की शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाए, यह विचार प्रधान हो गया और सचमुच सत्य क्या है, तथ्य क्या हैं, इसे अविकल रूप में जानने की जिज्ञासा शमित-दमित होती गयी।
इसकी छाया हम समस्त आधुनिक यूरोपीय एकेडमिक्स में और उनके भारतीय चेलों में पाते हैं। वहाँ जिज्ञासा ज्ञान की नहीं, शक्ति के विस्तार की है। जिज्ञासा से इकठी की गयी जानकारियों को सत्य को जानने के स्थान पर अपनी प्रभुता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करना ही आधुनिक शिक्षित चित्त का एक बड़ा लक्षण बन गया है। यद्यपि यह सामान्य कथन सब पर लागू नहीं होता। क्योंकि हम सभी जानते हैं कि सभी मनुष्य ब्रह्मा की संतानें हैं और वे मनुष्य ही हैं इसीलिए कि वे सब महाराज मनु के वंशज हैं। इसलिए मनुष्य भारत का हो या यूरोप का या अफ्रीका का, अपने मूल में तो सबमें तो एक आधारभूत एकता है। परन्तु अभिव्यक्त रूप शिक्षा, संस्कार और संस्कृति के प्रभाव से भिन्न-भिन्न होते रहते हैं। यही कारण है कि खुद भारत में भी यूरोप के आधुनिक अकादमिक लोगों की तरह प्रभुता के संवर्धन में जिज्ञासा की सामथ्र्य का उपयोग करने वाले लोग बहुत अधिक हो गये हैं और प्रशान्त विवेक के साथ सत्य की साधना करने वाले लोग अत्यल्प हो गये हैं।
इस प्रकार जिज्ञासुओं के भी दो नितान्त भिन्न वर्ग हो गये हैं। एक है- ज्ञान की प्राप्ति का जिज्ञासु और दूसरा शक्ति के संवद्र्धन के लिए जिज्ञासु व्यक्ति। जब हम यूरोप के जिज्ञासुओं के विषय में चर्चा करते हैं, तो उनकी जिज्ञासा के इस स्वरूप को स्मरण रखना आवश्यक है कि उन्होंने अपने जिज्ञासा की तृप्ति के लिए जहाँ सराहनीय परिश्रम किया है, वहीं उनका प्रयोजन ज्ञान नहीं, अपने समाज या पंथ या क्षेत्र की शक्ति का विस्तार है। इसीलिए संग्रहीत तथ्यों की प्रस्तुति और व्याख्या दोनों में ही वे अनेक प्रकार की वक्रताएँ करते हैं।
उनका तो यह स्वभाव है और संस्कार भी है। परन्तु जो लोग भारत में भारत के विषय में भी ऐसे प्रभुत्व-प्रेमी जिज्ञासुओं की बातों को ही आधारभूत प्रमाण मानकर सोचते अथवा बोलते और लिखते हैं, उन पर तो दया ही की जा सकती है।
लेखक
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01 Mar 2025 17:58:05
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