बहुरोग चिकित्सा में सहायक पिप्पली

बहुरोग चिकित्सा में सहायक पिप्पली

आचार्य बालकृष्ण

     वैदेही कृष्णा, मागधी, चपला आदि पवित्र नामों से अलंकृत, सुगन्धित पिप्पली भारतवर्ष के उष्ण प्रदेशों में उत्पन्न होती है। राजनिघंटुकार ने इसकी चार जातियों का वर्णन किया है, परन्तु छोटी और बड़ी दो प्रकार की पिप्पली ही व्यवहार में आती हैं। बड़ी पिप्पली मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर से आयात की जाती है, परन्तु छोटी पिप्पली भारतवर्ष में प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती है। इसका वर्षा-ऋतु में पुष्पागम होता है तथा शरद्-ऋतु में इसकी बेल फलों से लद जाती है। बाजारों में इसकी जड़ पीपला मूल के नाम से मिलती है। चरक एवं सुश्रुत दोनों ने विरेचन द्रव्यों में पिप्पली की गणना की है। सुश्रुत ने इसे पित्त प्रसादनी कहा है। यद्यपि पिप्पली न उष्ण है और न शीत है, अपितु वह अनुष्णशीत है। चरक संहिता के दीपनीय, तृप्तिघ्न, हिक्कानिग्रहण, कासहर, शूलप्रशमन तथा सुश्रुत संहिता के पिप्पल्यादि गण में भी इसका उल्लेख मिलता है।
वैज्ञानिक नाम :  Piper longum linn. (पाइपर लाँगम) कुलनाम : Piperaceae (पाइपरेसी); अंग्रेजी नाम : long pepper (लॉन्ग पैपर); संस्कृत :  पिप्पली, मागधी, कृष्णा, वैदही, चपला, कणा, ऊषण, शौण्डी, कोला तीक्ष्णतण्डुला, चञ्चला, कोल्या, उष्णा, तिक्त, तण्डुला, मगधा, ऊषणा, कृकला, कटुबीज, श्यामा, सूक्ष्मतण्डुला, दन्तकफाहिन्दी : पीपली पीपर, पीपर; उर्दू : पिपल (Pipal); उडिय़ा : बैदेही (Baidehi); कोंकणी : पिपली (Pipli); कन्नड़ : हिप्पली (॥Hippali); गुजराती : पीपर (Pipar), पीपरीमूल (Piparimul); तेलुगु : पिप्पलु (Pippalu), पिप्पलि (Pippali); तमिल : टिपिलि (Tipili), पिप्पली (Pippilli); बंगाली : पीपुल (Peppul), पिप्पली (Pipali)नेपाली : पीपला (Pipla), पिपुल (Pipool); पंजाबी : पिप्पलीमूल (Piplamul); मराठी : पिंपली (Pimpali); मलयालम : तिप्पली (Tippali)। अंग्रेजी : इण्डियन लोंग पीपर (Indian long pepper), ड्राईड कैटकिन्स (Dried catkins); फारसी : फिलफिल दराज़ (Filfil daraz); अरबी : दारफुलफुल (Darfulful), डाल फिलफिल (Dalfilfil).
पिप्पली में सुगंधित तेल, पाइपरीन, पिप्पलीर्टिन नामक क्षाराभ, सिसेमिन तथा पिप्पलीस्टिरॉल पाया जाता है।
ह सुगन्धित, आरोही अथवा भूमि पर फैलने वाली, काष्ठीय मूलयुक्त, बहुवर्षायु, आरोही लता है। इसका काण्ड संधियुक्त, विसर्पी, सीधा, स्थूल, कोमल, बहुशाखित, अरोमश होता है। इसकी शाखाएँ भूस्तारी अथवा आरोही, कोमल, कोणीय, शुष्क अवस्था में गर्तयुक्त होती है। इसके पत्र सरल, एकांतर, 5-12 सेमी लम्बे एवं 3-6 सेमी व्यास के, पान के पत्तों के जैसे चिकने, नुकीले, पृष्ठ भाग पर पांच शिराओं से युक्त नीचे के पत्र बड़े तथा ऊपर के पत्र छोटे होते हैं। इसके पुष्प सूक्ष्म, एकलिंगी कक्षीय, प्रथमतया हरित वर्ण के, पश्चात् पीत वर्ण के होते हैं। इसके फल 2.5-3.8 सेमी लम्बे, 2-4 मिमी चौड़े, कच्चे शहतूत जैसे किन्तु छोटे व बारीक, पकने पर लाल रंग के व सूखने पर धूसर कृष्ण वर्ण के होते हैं। इसके फलों को ही पिप्पली कहते हैं। इसकी मूल काष्ठमय, ग्रन्थिल, कड़ी, भारी, आकार में कुछ-कुछ तगर के सदृश, कृष्णाभ-धूसर वर्ण की तथा तोडऩे पर अन्दर से श्वेत वर्ण की होती है। यह स्वाद में तीक्ष्ण एवं चरपरी होती है। इसी में से शाखायें या उपमूल निकल कर भूमि पर फैलते हैं। मूल जितना वजनदार व मोटा होता है उतना ही अधिक गुणकारी माना जाता है। इसे ही पिप्पली मूल कहते हैं। बाजारों में जो पिप्पली मूल बिकती है, उसमें मूल एवं गांठ सहित इसकी शाखाओं तथा काण्डों का ही मिश्रण रहता है।
रासायनिक संघटन:
इसमें सुगंधित तैल, पाइपरीन, पिप्पलीर्टिन नामक क्षाराभ, सिसेमिन तथा पिप्पलीस्टिरॉल पाया जाता है।
तैल में पाइपेरीन, पिप्पलीरटीन, सेसामिन, स्टीरॉल, डाईहायड्रोस्टिग्मा-स्टेरॉल, पाईपरसाईड, हाइड्रोकार्बन, एवं सेस्क्यीटर्पीन पाया जाता है।
फल में वाष्पशील तैल, रेजिन, N-हेक्साडीकेन, N-हेक्टाडीकेन, N-ओक्टाडीकेन, N-नोनाडीकेन, P-मिथॉक्सीएसिटीफीनॉन, डाईहाईड्रोकार्वीओल, फेनीथाईल, मद्य, मोनोसाईक्लीक, पिप्पलीरटीन, ट्राईएकॉन्टेन, डाईहाईड्रोस्टीग्मास्टीरॉल, ग्लाईकोसाईड तथा मिथाईल सेस्क्यीटर्पीन पाया जाता है।
मूल में 2 क्षाराभ, पाईपरलॉन्ग्युमिन, पाईपरलॉन्ग्युमिनीन, सीसेमिन, पाईपरीन एवं मिथाईल 3, 4, 5-ट्राईमिथॉक्सीन्नेमेटे पाया जाता है।

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औषधीय प्रयोग एवं विधि:

शिरो रोग:
  • शिर:शूल-पिप्पली, काली मिर्च, मुनक्का, मुलेठी और सोंठ चूर्ण को आपस में मिलाकर इसके 2 ग्राम चूर्ण को गाय के मक्खन में पकाकर, छान लें, उसकी एक से दो बूंद नाक में डालने से सिर की पीड़ा नष्ट होती है।
  • आधासीसी-पीपल और वच चूर्ण को समभाग लेकर 3 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से दो बार दूध या गर्म जल के साथ सेवन करें आधासीसी की वेदना का शमन होता है।
नेत्र रोग:
  • रतौंधी-पिप्पली का काजल बनाकर लगाने से अथवा पिप्पली को गो मूत्र में घिसकर अंजन करने से रतौंधी में ी लाभ होता है।
कर्ण रोग:
  • कर्णशूल-पिप्पली चूर्ण को निर्धूम अंगारे पर रखने से जो धुंआ निकले, उसे किसी नली द्वारा कान में प्रविष्ट कराने से शूल नष्ट हो जाता है।
मुख रोग:
  • दंतशूल- पिप्पली के 1-2 ग्राम चूर्ण में सेंधानमक, हल्दी और सरसों का तेल मिलाकर दांत पर लगाने से दंतशूल का शमन होता है।
  • दन्तहर्ष- 3 ग्राम पिप्पली चूर्ण में 3 ग्राम मधु और घृत मिलाकर दिन में 3-4 बार दांतों पर लेप करने से दन्तहर्ष में लाभ होता है।
कण्ठ रोग:
  • प्रतिश्याय व स्वर भंग पर-पीपल, पीपलामूल, काली मिर्च और सोंठ के समभाग चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ चटाते रहने से अथवा पिप्पली के क्वाथ में शहद मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाने से प्रतिश्याय में लाभ होता है।
वक्ष रोग:
श्वास कास-एक ग्राम पिप्पली चूर्ण में दोगुना शहद मिलाकर चाटने से श्वास, कास, हिचकी, ज्वर, गले की खराश व प्लीहा रोग में लाभ होता है।  यह मधु पिप्पली योग कफरोग में बहुत लाभकारी है।
  • 1 ग्राम पिप्पली चूर्ण के साथ समभाग त्रिफला मिलाकर दिन में तीन बार सुबह खाली पेट, दोपहर व रात्रि को भोजन से आधा घन्टा पहले शहद मिलाकर चाटने से हिचकी, श्वास, कफ, ज्वर और पीनस में लाभ होता है।
  • 3 ग्राम पिप्पली मूल चूर्ण में शहद मिलाकर दिन में तीन बार चटाने से श्वास रोग में लाभ होता है।
  • पिप्पली, पीपलामूल, सोंठ और बहेड़ा को समभाग लेकर चूर्ण बना लें। इसे 3 ग्राम तक दिन में 3 बार शहद के साथ चटाने से खांसी नष्ट होती है। विशेषकर पुरानी खांसी व बार-बार होने वाली खांसी में यह अत्यन्त लाभप्रद है।
  • हिचकी-पिप्पली व मुलेठी चूर्ण को समभाग एकत्र कर उसमें चूर्ण के समभाग शक्कर मिलाकर रखें। इसे 3 ग्राम की मात्रा में लेकर सेवन करने से लाभ होता है।
हृदय रोग:
  • पीपलामूल और छोटी इलायची, बराबर-बराबर लेकर, महीन चूर्ण बनाकर 3 ग्राम तक की मात्रा में घी के साथ प्रात:-सायं सेवन करने से विबन्ध तथा हृदय रोगों में लाभ होता है।
  • पिप्पली चूर्ण में बिजौरे नींबू की जड़ की छाल का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। प्रात: काल खाली पेट 3 ग्राम इस चूर्ण को अर्जुन के काढ़े के साथ सेवन करने से हृदयशूल तथा दु:साध्य हृदय रोग में लाभ होता है।
  • पिप्पली चूर्ण में मधु मिलाकर प्रात: सेवन करने से कोलेस्ट्राल की मात्रा नियमित होती है तथा हृदय रोगों में लाभ होता है।
उदर रोग:
  • उदावर्त- पीपलामूल को पीसकर दूध और अडूसे के रस में मिलाकर पीने से उदावर्त में लाभ होता है।
  • संग्रहणी- पिप्पली, भांग और सोंठ के समभाग चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में लें, इसे शहद मिलाकर दिन में दो या तीन बार भोजन से पहले सेवन करते रहने से भयंकर संग्रहणी व आंव नष्ट होती है।
  • मरोड़- पीपल और छोटी हरड़ को बराबर-बराबर मिलाकर, पीसकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम गर्म पानी से सेवन करने से पेट दर्द, मरोड़ व दुर्गन्धयुक्त अतिसार का शमन होता है।
  • उदरशूल- पीपल के 2 ग्राम चूर्ण में 2 ग्राम काला नमक मिलाकर गर्म जल के साथ सेवन करने से उदरशूल मिटता है।
  • आंत्रवृद्धि- पिप्पली, जीरा, कूठ, बेर और गाय के गोबर को समभाग लेकर कांजी के साथ खूब महीन पीस कर लेप करने से लाभ होता है। यह प्रारम्भिक स्थिति में लाभ करता है। अधिक वृद्धि होने पर शल्य कर्म ही आंत्रवृद्धि की प्रमुख चिकित्सा है।
  • मंदाग्नि- 250 ग्राम पीपल और 250 ग्राम गुड़ का कल्क, 1 किलो गाय का घी, 4 ली बकरी का दूध (न मिलने पर गाय का दूध) चारों को मंद आंच पर पकायें, जब केवल घी मात्र शेष रह जाये तो इस घी का प्रयोग मंदाग्नि, क्षय तथा कास में करें। 1 चम्मच दिन में तीन बार लें।
गुदा रोग:
अर्श-आधा चम्मच पिप्पली चूर्ण में समभाग भुना जीरा तथा थोड़ा सा सेंधानमक मिलाकर छाछ के साथ प्रात: खाली पेट सेवन करने से बवासीर रोग में आराम मिलता है।
यकृतप्लीहा रोग:
पांडुरोग- पांडुरोग, अग्निमांद्य तथा धातुक्षय में एक भाग शहद, 2 भाग घी, 4 भाग पिप्पली, 8 भाग मिश्री, 32 भाग दूध, दाल चीनी, तमाल पत्र, इलायची, नागकेशर 6-6 भाग, सबको भली-भाँति मसलकर पकाकर लड्डू बना लें। प्रतिदिन एक लड्डू का सेवन करें।
यकृत्- प्लीहा वृद्धि-2 से 4 ग्राम पिप्पली चूर्ण में 1 चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम नियमित देने से यकृत् वृद्धि में लाभ होता है।
प्रजननसंस्थान रोग:
आर्तव विकार- पिप्पली, सोंठ, मरिच और नागकेशर को समभाग, लेकर चूर्ण बना लें। 1-2 ग्राम चूर्ण को घी में मिलाकर दूध के साथ खाने से मासिक विकारों में लाभ होता है। इससे गर्भाशय गत विकार व शोथ का शमन होता है। मासिक धर्म के समय होने वाली वेदना व अंत:स्रावी ग्रन्थि (हार्मोन्स) के विकारों में भी यह लाभप्रद है। इसे दो तीन माह तक प्रात:-सायं सेवन करें।
प्रसव कष्ट- प्रसव कष्ट में शीघ्र प्रसूति के लिए 3 ग्राम पीपलामूल में 3 ग्राम पुष्करमूल मिलाकर इसे 400 मिली पानी में पकाकर 100 मिली शेष रहने पर छानकर इसमें थोड़ा शहद व हींग मिला लें और पिलायें। इससे प्रसव पीड़ा बढ़कर, शीघ्र प्रसव हो जाता है। प्रसव के पश्चात् आंवल (अपरा/ Placenta) गिराने के लिए भी तुरन्त उसी क्वाथ को ठण्डा करके पिला देना चाहिए।
अस्थिसंधि रोग:
गृध्रसी व ऊरुस्तम्भ -3 ग्राम पिप्पली चूर्ण को 100 मिली गोमूत्र और 10 मिली अरंडी के तेल के साथ मिलाकर दिन में दो बार पिलाने से लाभ होता है।
शाखा रोग:
  • ऊरुस्तम्भ- 3 ग्राम पिप्पली चूर्ण को, 15-20 मिली गोमूत्र अथवा 15-20 मिली दशमूल क्वाथ के साथ प्रात:-सायं सेवन करने से ऊरुस्तम्भ में लाभ होता है।
  • पिप्पली, पिप्पलीमूल और भल्लातक-फल का समभाग चूर्ण (1-3 ग्राम) लेकर मधु के साथ प्रात: सायं सेवन करने से ऊरुस्तम्भ में लाभ होता है।
मानस रोग:
  • अनिद्रा- पिप्पली मूल के महीन चूर्ण को 1 से 3 ग्राम तक की मात्रा में मिश्री या दुगुने गुड़ के साथ मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करते रहने से, पाचन संबंधी विकार दूर होकर अच्छी नींद आने लगती है। नींद के लिए वृद्ध लोग इस योग का प्रयोग विशेष रूप से कर सकते हैं।
सर्वशरीर रोग:
पीड़ा- शरीर के किसी भी अंग में पीड़ा हो तो, आधा चम्मच पिप्पली मूल चूर्ण को गर्म दूध या पानी के साथ सेवन करने से शीघ्र ही आराम मिलता है और नींद भी अच्छी आती है। उस दूध में आधा चम्मच हल्दी मिलाकर यदि प्रयोग किया जाये, तो चोट-मोच के दर्द में भी अत्यन्त लाभ होगा।
मोटापा-2 ग्राम पिप्पली चूर्ण में मधु मिलाकर दिन में 3 बार कुछ हफ्ते तक नियमित रूप से सेवन कराने से मोटापा कम हो जाता है। पिप्पली चूर्ण के सेवन के एक घंटे तक जल को छोड़कर कुछ भी सेवन न करें।
कासयुक्त ज्वर- पीपर, नीम, गिलोय, सोंठ, देवदारु, अडूसा, भारंगी, नेत्रवाला, पीपरामूल तथा पोहकर मूल का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से श्वास, कासयुक्त ज्वर का शमन होता है।
बाल रोग:
  • बच्चों के जब दांत निकलते हों, उस समय 1 ग्राम पिप्पली चूर्ण को 5 ग्राम शहद में मिलाकर मसूढ़ों पर घिसने से लाभ होगा।
  • यदि बालक अधिक रोता है, तो उसे पिप्पली और त्रिफला के समभाग मिले हुए चूर्ण को 200 मिग्रा से एक ग्राम तक की मात्रा में घी और शहद मिलाकर सुबह-शाम चटाना चाहिए।
  • 500 मिग्रा पिप्पली चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करने से कास, श्वास, ज्वर, प्लीहा विकार एवं हिक्का का शमन होता है।
  • पिप्पली, सोंठ और हरड़ के चूर्ण को समान मात्रा में लेकर लगभग 3 ग्राम चूर्ण को गुड़ में मिलाकर, उसमें थोड़ा घी मिलाकर, दूध के साथ दिन में दो बार खिलाने से दुग्ध की वृद्धि होती है। यह प्रयोग लगभग दो माह तक करें।
 

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