'भजन गायक एक तलाश’ का लक्ष्य है दुनियां में स्वरसाधना द्वारा भारतीय संस्कृति व ऋषिवाणी को विस्तार देना
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भव्य श्रीवास्तव
पतंजलि परिसर में ऐसे हुआ देश भर से 40 दिव्य भजन गायकों का चयन
जब-जब पृथ्वी पर कोलाहल मचा, वसुधैव कुटुम्बकम की सोच वाले इस भूखंड भारत ने अपनी साधना और तपस्या से विश्व को समाधान दिया। पूरी दुनियां के सभी धर्मों में जो एक बात समान है, वो यह कि मनुष्य की पीड़ा को कैसे दूर किया जाए। इस पीड़ा के निवारण के लिए सभी विधाओं व धर्मों ने अपने-अपने ढंग से समाधान दिया। वहीं संगीत कला विशेषज्ञों ने खोज द्वारा जब ब्रह्माण्ड के नाद और स्वर को ध्यान से सुना तो आ, ऊ, म का आलाप उभर के आया। संतों ने एक सुर में उस ऊँ का आह्वान किया, तो प्रकृति प्रसन्न हो उठी। दिव्य नाद फूट पड़ा। मान्यता है कि संगीत के प्रचलित सातों स्वर मोर, गाय, बकरी, क्रौंच, कोयल, घोड़े और हाथी के स्वर से लिए गये हैं। गायन प्रकृति का गुंजन और स्पंदन ही तो है, जिन्हें स्वरों से बांध दिया गया और जब स्वर को सुर और तान मिले तो रूप लिया गायन ने। यही गायन जब भक्ति के लिए गाया गया तो बना भजन। सातवीं शताब्दी से भजन भारत में सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन का आधार बना रहा। पतंजलि ने इसे पुन: राष्ट्र निर्माण की अवधारणा से जोडऩे का बीड़ा उठाया है। पूज्य योगऋषि व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण के मार्गदर्शन में विगत दिनों पतंजलि परिसर में इसी निमित्त से भारतीय भजन प्रतिभाओं का चयन किया गया।
सूरदास, तुलसीदास, कबीर, मीराबाई, स्वामी हरिदास से लेकर आज के महान गायकों ने भजन की यह फलती-फूलती धारा अपनी-अपनी संवेदनाओं में लोकार्पित किया और आज देश की अनंत श्वर तानों के प्रति संपूर्ण विश्व मुग्घ है। आस्था, श्रद्धा और विश्वास की इस चमक के पीछे परम्परा, संस्कृति और पहचान की संगीतमय ठोस बुनियाद समाहित है।
पर घरों, मंदिरों, आश्रमों में बजने और गूंजने वाली हर मधुर रचना की समय सीमा आज घट रही है। इसीलिए पतंजलि ने ठाना कि इस देश की लहलहाती, मुस्काती और बलखाती सुरीली आवाजों को चुन-चुन कर भक्ति के नए आयाम रचें जायें। इसी संकल्प से पतंजलि संतों की भूमि और कला प्रेमियों के इस जगत में ढूढऩे निकली है एक ऐसे स्वर को जो गाए तो देवता हिल जांए, ईश्वर पिघल जाए और मन की सारी बंदिशें नन्हें शिशुओं की तरह चंचल हो उठे, उसी का आगाज़ है पतंजलि का यह भजन रत्न।

भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व भजन के इन्हीं संवेगों के बीच अपनी थकान मिटाता है। गौरवमय रहा पतंजलि परिसर का वह दिन जिसमें सैकड़ों प्रतिभागियों के भीतर की हर आराधना, प्रार्थना, आरती, तपस्या और विश्वास को आवाज देने के लिए भजन समागम आयोजित हुआ, दो दिन की सुर गंगा में हर कोई भक्तिमय था। कठिन परीक्षा और प्रतीक्षा के बाद इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि जो रिजल्ट आया, उससे एक-एक प्रतिभागी संतुष्ट थे। 327 प्रतिभागियों में से 40 का चयन आसान न था, पर भजन के लिए जो आवाजें चुनी जानी थीं, वे खुद ब खुद आगे आने लगी। जजों ने अपने ज्ञान और अनुभव से 21 में एक-एक प्रतिभागी को उचित अंक दिये। चयन की प्रक्रिया के कठिन होने और कई मेधावी आवाजों के प्रतियोगिता में मंच पर मौजूद होने से स्थिति कई बार रोचक बन पड़ी। इसलिए चयन को निष्पक्ष और संतुलित रखने के लिए चतुर्थ दृष्टि का उपयोग किया गया।
चतुर्थ दृष्टि का अर्थ है कि जो हर ओर देख रहा हो और जिसकी नजर से न प्रतिभा छुपे और न ही कोई त्रुटि। जिस पर आज देश का बच्चा-बच्चा विश्वास और गर्व करता है। अनूप जलोटा और साधना सरगम जैसे प्रकाण्ड संगीत गुरुओं के दिये गये निर्णय को लेकर जब चतुर्थ दृष्टि अर्थात् पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने मंथन किया तो जो नतीजा निकला वो सबको स्वीकार्य था।
प्रज्ञा चक्षु से हृदय की आवाज बनने वाले रांची के धीरज गुप्ता को मिले सबसे ज्यादा अंक। भले ही ईश्वर ने इस बालक को नेत्र ज्योति नहीं दी, लेकिन आवाज की लौ ने इसे चालीस लोगों में सबसे ऊँचा स्थान दिलाया, पर स्वर और भक्ति के इस अनोखे मेल, भजन रत्न को चालीस के अलावा भी मिले कई और रत्न। इनमें से पांच ने तो जजेस और चतुर्थ दृष्टि का ऐसा दिल जीता कि वो खास हो गये। अब आने वाले समय में उन्हें चुने जाने का सहज पुरस्कार भी मिलेगा।
भारत रत्न के महाआडिशन की गंगा पतंजलि योगपीठ के फेस-2 में तकरबीन एक हफ्ते तक बहती रही। 11 जनवरी से ही देश के हर कोने से प्रतिभागी चयनित होने के लिए आने लगे थे। वे परिसर में जहाँ भी रहते या जाते भजन जीवंत होने लगता। रात के अंधकार में भी कई रियाज करती आवाजें पतंजलि प्रागंण को गुंजायमान कर रही थीं। चार दिन तक ऐसे ही न जाने कितने दृश्य वहाँ गढ़े गये और इन्हीं दृश्यों के बीच से आखिरकार शीर्ष 40 सुरीले भजन गायक चयनित किये गये।
जो चुने गये उन्हें मुंबई का टिकट तय ही था, उन्हें स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने अपने हाथों से प्रशस्ति पत्र प्रदान किये। जिन्हें चुने जाने का मौका नहीं मिला, उनके लिए स्वामी जी और आचार्य श्री ने दूसरे दरवाजे खोल दिये। योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि 'तनाव न लीजिए, मुस्कराइये ।’ ''शीर्ष 40 में नंबर नहीं आया तो न आए, आप सवा सौ करोड़ भारतीयों के बीच 321 में तो आये हैं। भजन रत्न तो एक तलाश है, हमें तो पूरी दुनियां में भारतीय संस्कृति, कला और ऋषियों की वाणी का प्रचार-प्रसार करना है, इस मिशन में आप लोग हमारे सहभागी भी बन सकते हो, हम पूरी दुनियां में वैदिक संस्कृति का प्रचार करना चाहते हैं, ऐसे कार्यों के लिए आप सबका मैं पतंजलि पीठ में स्वागत करता हूँ। जिनका स्वर अच्छा होगा, उन सभी को गाने का अवसर हम देंगे।’’
भजन रत्न शो के निर्माता पंकज नारायण और अपूर्वा बजाज ने कहा कि 'यह शो टीवी के इतिहास का सबसे सफल शो साबित होने जा रहा है, क्योंकि इसमें भारतीय संस्कृति को उसके उसी वास्तविक स्वरूप में प्रस्तुत किये जाने की तैयारी है, जो हर घर, हर परिवार में गाई-गुनगुनाई जाती है। टीवी के प्रसिद्ध निर्देशक संतोष बादल इस शो का निर्देशन कर रहे हैं और शो के स्क्रिप्टिंग की जिम्मेदारी निभा रहे हैं धर्म पत्रकार भव्य श्रीवास्तव। शो को भजन के संग-संग चलाने के लिए एंकरिंग चर्चित टीवी कलाकार सौरभ राज जैन और गायिका दीपिका साठे कर रही हैं।’’
इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि पतंजलि ने किसी का अनुकरण नहीं किया, बल्कि ऐसा रचाया, जिसे दूसरे अनुकरण करें। अभी तक हमें स्वामी जी के कार्यक्रमों में भजन गायकों का टोटा रहता था, लेकिन आज तो पूरा अभाव खत्म हो गया। आज देश के युवा गायक बनने का विचार कर रहे हैं।
जल्द आएगा वैदिक चैनल: योगऋषि पूज्य स्वामी जी महाराज
योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि जो लोग अच्छा गाते हैं, उनके लिए हमारे छह सात चैनल हैं, आस्था, आस्था भजन, अरिहंत, संस्कार, सत्संग और जल्द ही वैदिक चैनल को भी बड़े स्तर पर हम ला रहे हैं। देश को जरूरत है, एक ऐसे चैनल की, जो पूरी तरह से भारतीय संस्कृति को समर्पित हो, हमारे वैदिक चैनल में आधुनिकता के साथ वैदिक संस्कृति की वैज्ञानिकता का प्रचार-प्रसार किया जायेगा। इसके लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां चल रही हैं।
उन्होंने कहा भजन हमारी पहचान है, भजन हमारी जान है। देश में इस संगीत की एक समृद्ध परम्परा रही है, पर संस्कृति के मूल्यों के कमजोर होने से देसी संगीत और लोक परम्परा पर काफी आघात हुआ है। ऐसे में पतंजलि योगपीठ ने भजन को फिर से भारत की आवाज बनाने का प्रण लिया है। इस सोच को अब एक सच में बदलने का वक्त आ गया है। 'भजन रत्न’ देश में एक नई लहर की तरह स्वीकारा जा रहा है। आने वाले समय में जब भजन की ये नई आवाजें हर कोने-कोने में गुनगुनाएंगी, तो हम फिर से महसूस करेंगे कि अपनी भारतीयता की आवाज को आगाज़ देकर पतंजलि ने एक खास कदम उठाया है। इस कदम को कारवां बनते देर नहीं लगेगी और लोक धुनों, लोक भजनों में राष्ट्र की संस्कृति जीवंत हो उठेगी, ऐसा विश्वास ही इसके आगाज़ का आधार है। आइये हम भी अपने स्वर गौरव को संवारें।
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01 Mar 2025 17:58:05
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