शाश्वत प्रज्ञा योग संदेश 2017 मई श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
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मनुष्य जीवन की महिमा
जीवन के संदर्भ में जैसा मैंने स्वयं अनुभव किया तथा अपने पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं से जीवन को समझा उसे आप सभी योगी भाई-बहनों से साझा करने की भावना से कुछ लिख रहा हूँ-
जीवन- कर्म व कर्म फल का परिणाम है। जीवन भगवान के अनुग्रह, करुणा व कृपा का प्रसाद है।
जीवन- योग एवं योग का फल है। जीवन हमारे अच्छे या बुरे शुभाशुभ अभ्यासों का परिणाम है।
जीवन- संतुलन, मर्यादा व आचरण का एक समग्र रूप है। जीवन विकल्परहित संकल्प व अखंड-प्रचण्ड पुरुषार्थ है।
जीवन- बीज की तरह है, जिसके अनन्त फल होते हैं। अशुभ को हमें दग्ध बीज या निर्बीज करना है तथा शुभ को पूर्ण विकसित।
जीवन- आत्म निर्माण करते हुए दिव्य मानव के निर्माण हेतु स्वयं साधना, सेवा, पुरुषार्थ, परमार्थ करना तथा अन्यों को भी इसके लिए प्रेरित करके इस दिव्य कार्य या भागवत कर्म में लगाना, यही जीवन का सबसे बड़ा प्रयोजन है।
जीवन- यथार्थ दृष्टि व दिव्य आचरण जीवन के सबसे बड़े दो ध्रुव सत्य है।
जीवन- मनुष्य जीवन में यदि अधोगमन या पतन हो तो वह भी सीमारहित अनन्त दुःखदायी है। दूसरी तरफ ऊँच उठे तो समस्त दुःखों का अन्त है। वेद भगवान का भी विधान है - उद्यानं ते पुरुष नावयानं जीवातुं ते दक्षतातिं कृणोमि ।। अथर्ववेद में भगवान कहते है- हे मनुष्य! मैंने तुझे ऊपर उठने के लिए बनाया है, नीचे गिरने के लिए नहीं। अतः हम सब आत्माएं- योग चेतना, उच्च चेतना, दिव्य चेतना, आत्म चेतना, गुरु चेतना, ऋषि चेतना व भागवत चेतना में प्रयत्नपूर्वक जीने का अभ्यास करें।

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01 Mar 2025 17:58:05
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