अन्तर्द्वन्द्व

अन्तर्द्वन्द्व

आचार्य  बालकृष्ण

     हर समय व्यक्ति के मन में उधेड़बुन, कनफ्युज़न, संशय, भ्रम, उलझन, शक, सन्देह, गफलत या अन्तर्द्वन्द्व चलता रहता है और व्यक्ति विचारों के विकारों की भीड़ के बीहड़ में ऐसा खो जाता है कि कभी-कभी तो स्वयं से भी कहीं बहुत दूर चला जाता है। स्वयं से जब दूर चला जाता है तो फिर स्वकर्त्तव्य से भी दूर हो जाता है। आत्मविस्मृति से आत्मग्लानि व आत्मघात तक का शिकार हो जाता है। इन अन्तर्द्वन्द्वों पर विजय पाना यही तप है। तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान यही क्रिया योग है। जो भी जीवन को सुख, समृद्धि, सफलता व शान्ति पूर्वक जीना चाहते हैं। उनसे निवेदन व आह्वान करते हैं कि वे इन अन्तर्द्वन्द्वों या भ्रान्तियों से स्वयं को बाहर निकालें या उबारें।

01: पछतावा

अधिकांश व्यक्तियों के मन में एक बात बार-बार उठती है कि मैंने अपने जीवन के उस समय, अमुक काम-पढ़ाई, व्यायाम, पुरुषार्थ, सेवा, साधना, संघर्ष व साहस आदि में खुद को क्यों नहीं लगाया तथा अमुक समय मैंने ये बुरा काम क्यों कर दिया। निष्कर्ष के रूप में अच्छा न करने तथा बुरे कामों को करने का मलाल सामान्यत: अन्तिम श्वास तक बना रहता है। अत: अच्छे कार्य योगाभ्यास, सेवा, साधना, स्वाध्याय, जप, तप, दान व पुण्यादि करने में हम एक बार भी प्रमाद न करें तथा एक बार भी किसी भी प्रकार का अशुभ आचरण न करें।

02: अपूर्णता

हम स्वयं से स्वयं का मूल्यांकन नहीं कर पाते और परिणामत: स्वयं में समाहित अनन्त ज्ञान, शक्ति, सामर्थ्य, सुख, शान्ति व आनन्द से कहीं वंचित से रहकर अपने भीतर एक अपूर्णता, अधूरापन, न्यूनता या अल्पता को अनुभव करते रहते हैं और बाहर के व्यक्तियों, वस्तुओं व परिस्थितियों से स्वयं को पूरा करने का भ्रान्त प्रयास करते हुए बाहर के सुख, समृद्धि, सफलता व सम्बन्धादि की अविवेक पूर्ण दौड़ में सम्मिलित होकर कहीं जीवन की सही दिशा से भटक जाते हैं। इसलिए ऋषियों ने बार-बार कहा- आत्मा वा अरे द्रष्टव्य:  श्रोतेव्य: मन्तव्य:, ओं-पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। अपने भीतर एवं बाहर स्वयं में तथा समष्टि में पूर्णता अनुभव करो। पूर्ण ज्ञान, पूर्ण निष्ठा व पूर्ण पुरुषार्थ से समष्टि के प्रति पूर्ण कृतज्ञता का भाव रखते, पूर्ण सहजता के साथ अपने स्वधर्म का पालन करो, यही योग, अध्यात्म व जीवन का पूर्ण सत्य है।

03: अव्यवस्था

अधिकतर लोगों के जीवन में बाह्य व आन्तरिक रूप से एक अव्यवस्था, अस्त-व्यस्तता उल्टा-पुल्टा काम चलता रहता है। सोने-जागने, योगाभ्यास, शौच, स्नान, व्यायाम, आत्मचिंतन, आहारचर्या एवं दिनचर्या का कोई प्रबन्धन नहीं होता। जीवन प्रबन्धन, समय प्रबन्धन, व्यवसाय प्रबन्धन एवं आत्म प्रबन्धन के बिना जीवन में सुख, समृद्धि, सफलता व शान्ति सम्भव ही नहीं है। २४ घंटे का दिन तथा चन्द दिनों का जीवन अनन्त कार्य, अनन्त ज्ञान, अनन्त असीमित संभावनाएं हमारे सामने होती हैं। हमें अपनी प्राथमिकताएं तय करके अपने उत्तरदायित्व को पूरी गम्भीरता, प्रामाणिकता, सहजता व प्रसन्नता के साथ निभाने के लिए एक व्यवस्था या सिस्टम में स्वयं को ढ़ालना ही चाहिए। इसके सिवा सुखी जीवन का कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं। आज व्यक्ति के जीवन, घर, परिवार, व्यापार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व में जहाँ-जहाँ अव्यवस्था है, वहीं-वहीं अशान्ति, अभाव, अन्याय, दु:ख, दरिद्रता एवं विनाश है।
  अत: आइए, आत्मग्लानि के स्थान पर आत्मगौरव, अपूर्णता के स्थान पर पूर्णता तथा अव्यवस्था के स्थान पर एक व्यवस्थित सधा हुआ अनुशासित जीवन जीते हुए जीवन को उत्सव बनाइए।
 
 
 

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