ऋषियों की आध्यात्मिक योजना सोलह संस्कार
On
डॉ. साध्वी देवप्रिया,
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षा-दर्शन विभाग
पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूलें,
स्वार्थ साधना की आँधी में वसुधा का कल्याण न भूलें।
हम संसार में देखते हैं कि जो देश उन्नतिशील व प्रगतिशील होते हैं वे योजनाओं का एक तांता सा बाँध देते हैं। वार्षिक योजनाए पंचवर्षीय योजनाएँ दस वर्षीय योजना इत्यादि अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाते हैं। उदाहरणार्थ कितने स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय बनाने है। कितने उद्योग लगाने हैं। कितनी नई रेलवे लाइनें बिछानी हैं। फसलों की सब्जियों की फलों की पशुओं की नस्लें कितनी हाईब्रिड करनी हैं इत्यादि। ये सब होना भी चाहिये, लेकिन जिस मानव की खुशियों के लिए यह सब किया जा रहा है। आखिर उसके निर्माण की भी तो कोई योजना बननी चाहियें। क्योंकि उपरोक्तये सभी उन्नतियाँ अच्छी तो हैं मगर केवल भौतिकता तक सीमित हैं, इनसे आध्यात्मिक उत्थान की आशा नहीं की जा सकती एक तरफ उत्थान कदापि पूर्ण नहीं हो सकता और पूर्णता के बिना कभी शाश्वत सुख नहीं मिल सकता। हमारे ऋषियों ने इस मर्म को जाना था इसलिए उन्होंने कहा ''यताअभ्युदय नि:श्रेयस: सिद्धि: स धर्म:’’। उसके लिए उन्होंने 16 संस्कारों की एक आध्यात्मिक योजना बनाई थी। संस्कार किसे कहते हैं। उसका स्वरूप क्या है। चरक ऋषि कहते हैं- ''गुणान्तराधनम् हि संस्कारो उच्चते’’ अर्थात् किसी वस्तु या व्यक्ति के गुणों को परिवर्तित कर देना ही संस्कार है।
महर्षि मनु कहते हैं- ''जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विजोच्यते’’ अर्थात् जन्म से तो प्रत्येक मनुष्य शूद्र ही होता है। संस्कार के माध्यम से दूसरा आध्यात्मिक जन्म लेकर ही द्विज बनता है। मानव निर्माण की इस सर्वोच्च योजना की शुरुआत बालक के गर्भ में आने से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाती है। माता-पिता अपने ज्ञान के अनुसार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जैसी आत्मा का आह्वान करते हैं, वैसी ही आत्मा माँ के गर्भ में आती है। यह ऐसा ही है जैसा कि अपना मकान बनाने से पूर्व जैसा नक्शा हम बनाते हैं। वैसा ही मकान बनकर तैयार हो जाता है। अत: बालक के गर्भावस्था से बाहर आने पर वह दो प्रकार के संस्कार लेकर पैदा होता है। एक अपने पिछले जन्मों के और दूसरे अपनी माता के या गुरु के, क्योंकि भारतीय वैदिक परम्परा में माँ की भाँति गुरु भी अपने शिष्य को गर्भ में धरण करता है.
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त:।
तं रात्रिस्तिस्र उदरे बिभर्ति, तं जातं द्रष्टुंमभिसंयन्ति देवा:।। अथर्ववेद.11/5/3)
अपने आश्रम में आये ब्रह्मचारी को आचार्य तीन रात्रि अपने गर्भ में धारण करता है। इस प्रसंग से मुझे स्मरण आया इस सदी के एक बहुत ऊँचे सन्त श्रद्धेय स्वामी सोमानन्द जी महाराज कहा करते थे कि मैं तो अगले जन्म में माँ बनना चाहता हूँ। जिस प्रकार अपने गर्भ में रखकर माँ अपनी सन्तति का निर्माण करती है। राम, कृष्ण, गौतम, अभिमन्यु, सीता, सावित्री व अनसूया जैसी सन्तानें उनकी माताओं ने ही तो तैयार की थी। माता जीजाबाई, माता गुजरी, मदालसा, अंजना आदि ने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि माँ जैसा चाहे वैसा निर्माण कर सकती है। उसी प्रकार बल्कि उससे भी अधिक जीवन का निर्माण गुरु करता है। गुरु एक प्रकार से दिव्य माँ की भूमिका निभाता है क्योंकि वह बड़े मनुष्य को अपने गर्भ में धरण करता है, इसीलिए तो शिष्य को अन्तेवासी कहा जाता है। और उस गुरु का भी गुरु सबसे बड़ी माँ जिससे गुरु भी ऊर्जा व प्रेरणा लेता है वह परमात्मा ईश्वर पूरे विश्व की जगदम्बा है उसके गर्भ में तो यह पूरा विश्व समाया है।
ओऽम् हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत।
स दाधार त् पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।
वेद में ही अन्यत्रा कहा-
''त्वं हि न: पिता वसो, त्वं माता शतक्रतो बभूविथ, अधाते सुम्नमीमहे।।‘’ ऋग्वेद
आज हम देखते हैं एक सांसारिक माँ तो अपनी दो-चार सन्तानों का निर्माण करती हैं लेकिन हमारे पूज्य गुरुदेव ने तो आज करोड़ों-करोंड़ों अपने जैसे अपने प्रतिरूप मानस पुत्रों व मानस पुत्रियों को जन्म दिया है। इसलिए माँ कोई शरीर नहीं बल्कि हमारी आत्मा काए आध्यात्मिकता का उत्कर्ष करने वाली एक महान् शक्ति है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या अनन्त जन्मों के संस्कारों को इस जन्म के 16 संस्कारों से मिटाया जा सकता है अथवा गर्भस्थ शिशु जो पैदा होने वाले हैं या हो चुके उनकों तो माँ संस्कारों से बदल देंगी किन्तु जो बड़े हो चुके उनका रुपान्तरण कैस हो ? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि वे अपने गुरु के गर्भ की शरण में आयें क्योंकि यदि शास्त्रोक्त वचन सम्भव नहीं होते तो शास्त्रों की रचना ही निरर्थक हो जाती। जिस प्रकार हजारों वर्षों से बन्द कमरे के अन्धकार को मिटाने के लिए एक दिया सलाई या मोमबत्ती जलाकर क्षण भर में प्रकाशित करना सम्भव है वैसे ही संस्कारों का या स्वभाव का परिवर्तन भी सम्भव है। यदि संकल्प ऊँचा हो और उसके प्रति समर्पण और अपेक्षित अखण्ड प्रचण्ड पुरुषार्थ हो तो दुनियाँ में कुछ भी असम्भव नहीं है। जब बालक अपनी माँ या गुरु के गर्भ से बाहर आता है तब उसके अपने पिछले जन्मों के संस्कार कमजोर व धुंधले व अनभिव्यक्त होते हैं और माँ से या गुरु से मिले संस्कार ज्यादा प्रबल व अभिव्यक्त होते हैं। इन्हीं संस्कारों को वंशानुगत या जैनिटिक संस्कार कहा जाता है, उसके बाद दूसरे संस्कार अपने आस-पास के पर्यावरण से निर्मित होते हैं। गर्भ से मिलने वाले संस्कारों की प्रबलता के उदाहरण माता मदालसा, सुभद्रा, अंजना, कौसल्या, जीजाबाई और नेपोलियन की जननी, प्रहलाद भक्त की माता कयादु तथा ध्रव भक्त की माता सुनीति इत्यादि हैं। उसी प्रकार गुरु के गर्भ के संस्कारों की प्रबलता के उदाहरण योगेश्वर भगवान् कृष्ण, स्वामी विरजानन्द जी महाराज, समर्थ गुरु रामदास, श्री रामकृष्ण परम हंस और आधुनिक युग में योगऋषि स्वामी जी महाराज एवं श्रेद्धय आचार्य जी हैं। आज देश भर में लाखों नहीं करोड़ों भाई-बहन स्वामी महाराज के प्रतिरूप बनते हुए स्वयं को योग सेवा में समर्पित कर चुके हैं, ये पूज्य गुरुदेव के विचारों व संस्कारों की महिमा नहीं तो और क्या है?
जिस प्रकार गर्भाधन संस्कार में माता-पिता जैसी आत्मा का आह्वान करते हैं वैसी ही आत्मा गर्भ में आ जाती है उसी प्रकार पतंजलि योगपीठ में छोटे बच्चे, युवा, प्रौढ़, बहनें-भाई जैसी भी आत्माओं का श्रद्धेय स्वामी जी महाराज आह्वान करते हैं वैसी ही आत्माएँ यहाँ आ जाती हैं और उन्हें जैसा बनाना चाहते हैं, वैसी ही वो बन जाती हैं। कोई पढ़ने में लगा है तो कोई पढ़ाने में कोई मार्केटिंग टीम में लगा है तो कोई रिसर्च में, कोई शल्य चिकित्सा में, प्राकृतिक चिकित्सा में, आयुर्वेदिक चिकित्सा में, गौशाला में, कृषि में, बागवानी में, सफाई में, सुरक्षा में न जाने कितने प्रकार का निर्माण कार्य एक समर्थ गुरुसत्ता के माध्यम से यहाँ सम्पन्न हो रहे हैं। यह सब संस्कारों की ही महिमा है। ये संस्कार केवल एक बार करके निश्चिन्त हो जायें ऐसा नहीं है, अपितु जीवन में 16 बार विशेष निर्माण की ओर ध्यान आकर्षित करने की योजना हमारे ऋषियों ने बनायी थी और वह योजना आध्यात्मिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है। अत: प्रारम्भ में गर्भाधन, पुंसवन, सीमन्तोनयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन और वेदारम्भ पर्यन्त संस्कार लगभग एक दशक तक सम्पन्न करके जीवन निर्माण की एक सशक्तआधारशिला तैयार कर दी जाती है और इसी समय बालक को द्विज कहा जाता है जब गुरु उसे सावित्री या गायत्राी माँ की गोद में प्रतिष्ठापित कर देता है।
लगभग प्रत्येक दो दशक के बाद युग परिवर्तन की सम्भावना बनती है, चूँकि इस वर्ष जो लाखों बच्चे पैदा हुए वही तो अगले बीस-पच्चीस वर्ष में युवा या गृहस्थी होंगे। और इस वर्ष जो लाखों गृहस्थी बनें वही तो अगले 40-50 वर्ष की उम्र में वानप्रस्थी बनेंगे और जो लाखों-लाखों वानप्रस्थी इस वर्ष वानप्रस्थ में दीक्षित हुए वही तो अगले 20-25 वर्ष बाद संन्यासी बनेंगे। अत: संस्कारों व वर्णाश्रमों की पावनी परम्परा जितनी अधिक सशक्तऔर पवित्र बनेगी उतना ही उत्कृष्ट मानव का जीवन व राष्ट्र होगा हम समाज में देखते हैं माता-पिता शिकायत करते हैं कि बच्चे सस्कारित बन जाएं अध्यापक चाहते हैं कि उनके विद्यार्थी बदल जायें, तथाकथित गुरु चाहते हैं कि उनके शिष्य दिव्य बनें, बॉस चाहते हैं कि उनके अधीनस्थ लोगों की कार्य प्रणाली सर्वश्रेष्ठ हो, लेकिन सफलता सबसे कोशो दूर है क्योंकि परिवर्तन की धरा उल्टी तरफ से चलती है। बालक के जन्म से पहले माता-पिता संस्कारी योगी बनें तो बच्चे योगी पैदा हो। अध्यापक गुरु, बोस पहले स्वयं को परिवर्तित करें तो उनके अनुयायी सुसंस्कृत हो सकें अत: संस्कारों की जिम्मेदारी बड़ों पर ज्यादा होती है और यही कारण है कि जैसे सूर्य आकाश में पृथ्वी से कोशों दूर होते हुए भी पृथ्वी उससे प्रकाश ताप व जीवन धारण कर रही है उसी प्रकार हमारे गुरुदेव परम पूज्य स्वामी जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य जी से हमारे करोड़ों-करोंड़ों कार्यकर्त्ता अपने-अपने घरों में भौतिक रूप कोसों दूर रहते हुए भी उनके जीवन से दिव्य प्रेरणा पाकर योगपथ परए आध्यात्म के पथ पर चलते हुए योग सेवा के माध्यम से अपने जीवन को धन्य बना रहे हैं। इसका कारण यह है कि जो सेवा, त्याग, पुरुषार्थ, योग, राष्ट्र भक्ति सदा प्रसन्नता, सहजता, सकारात्मकता पर दु:ख कातरता, करुणा, प्रेम वात्सल्य व परमार्थ के संस्कार वे उनको देना चाहते हैं। उन सब संस्कारों से वे स्वयं सर्वथा व सर्वदा विभूषित व अलंकृत रहते हैं। संस्कारों से किस प्रकार जीवन में परिवर्तन आता है, इसका सजीव उदाहरण इससे बड़ा कोई हो ही नहीं सकता। संस्कारों से युग परिवर्तन की योजना लेकर यदि हमारा प्रत्येक योग शिक्षक, योग प्रचारक, तहसील, जिला व राज्य प्रभारी योगमय, आध्यात्मिक, स्वथ्य, स्वच्छ, समृद्ध व संस्कारवान भारत का नक्शा तथा दृढ़ संकल्प व उस संकल्प के प्रतिपूर्ण समर्पण व पुरुषार्थ के साथ यदि हम आगे बढ़ें तो हमारा समाज राष्ट्र व युग वैसा ही होगा जैसा हम चाहेंगे। आमूल-चूल दिव्य परिवर्तन सर्वदा सम्भव है। यही हमारे महान् मनीषी, युगद्रष्टा ऋषियों की दिव्य मानव जीवन निर्माण की 16 संस्कारों से युक्त पावनी परम्परा व आध्यात्मिक योजना रही है।
लेखक
Related Posts
Latest News
01 Mar 2025 17:58:05
With divine inspiration, I want to draw your attention towards 11 important facts. I am sure that you will


