बच्चों का आहार एवं दिनचर्या

बच्चों का आहार एवं दिनचर्या

डॉ. मनोज मित्तल, बाल रोग विशेषज्ञ, करनाल, हरियाणा

आहार पर संयम होने से अनेक बीमारियों से बचा जा सकता है। खान-पान संबन्धी जिन सिद्धान्तों का  इस लेख में वर्णन है, अनेक परिवार वालों द्वारा उनका पालन कराने से उनके बच्चे स्वस्थ पुष्ट देखे जा रहे हैं।
च्चों व बड़ों को बहुत सारी बीमारियां तो भूख से अधिक या भूख के बिना भोजन करने के कारण होती हैं। अत: तीव्र भूख लगने पर भोजन ग्रहण करायें व बार-बार न खिलायें। भोजन में सुधार करना कायाकल्प का प्रथम सोपान है। कुछ बच्चे खाने के अवसर पर कहानी सुनना पसंद करते हैं, तो कुछ बच्चे मीठी चीजें खाना पसंद करते हैं, जबकि कुछ खट्टी व चटपटी। दो स्वस्थ व्यक्ति भी समान मात्रा में आहार नहीं लेते, इसी तरह बच्चों के आहार की मात्रा में भी अंतर होता है। अत: अपने बच्चों की सामान्य क्रम में व आहार संबंधी तुलना कभी भी दूसरे बच्चों से न करें। साथ ही चीनी या अन्य मीठी चीजों के प्रति सावधान रहें अन्यथा दाँतों की समस्याओं को बढ़ावा मिलेगा। खास यह है कि जब तक बच्चा प्रसन्न और स्वस्थ है, तब तक आपको चिन्ता में पड़ने की आवश्यकता नहीं  है। बहुत सारी माताएँ अक्सर यह शिकायत करती हैं कि उनका बच्चा एक टुकड़ा भी नहीं खाता, मगर दिन भर खेलता व दौड़ता रहता है और एक मिनट भी बैठता नहीं है। पर निश्चित है कि वह अपने भोजन से पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त कर रहा है, अत: आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। आप बच्चे पर दबाव न डालें। अब बात शिशु अवस्था की करें तो तीसरे वर्ष में बच्चे की दिनभर की खुराक को 4-5 भागों में बांटने की कोशिश करें, जिससे कि बच्चे को बार-बार स्नैक्स (जंक फूड) लेने की आदत न पड़ जाय।
संतुलित आहार
शरीर बनाने वाले तत्व-प्रोटीन, ऊर्जा देने वाले कार्बोहाइड्रेटस (शर्करा) तथा वसा एवं पर्याप्त खनिज जैसे कि लौहतत्व और कैल्शियम तथा सभी तरह के विटामिन (जीवन सत्व) संतुलित आहार में निहित होने चाहिए। पर यह आवश्यक नहीं है कि मंहगा भोजन ही संतुलित भोजन है। प्राय: देखा गया है कि माताएं बच्चों को बाहरी दूध अधिक देती  हैं, यह ठीक नहीं है। इसी तरह-
प्रोटीन (Protein): यह बात ठीक है कि प्रोटीन  की जरूरत शरीर की वृद्धि में होती है। पर इसकी उचित मात्रा के लिए-अनाज और दालों की न्यायोचित मिश्रण जैसे- दाल और चावल या दाल और रोटी बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण आहार है। इसी प्रकार फलियाँ प्रोटीन का भरपूर स्रोत हैं।
कैल्शियम (calcium): माँ का दूध कैल्शियम का सर्वोत्तम स्रोत है। फलियाँ, मटर व हरी पत्तेदार सब्जियाँ भी इसके अच्छे स्रोत हैं। आयरन या लौहतत्व (iron): के लिए देखें तो हरी पत्तेदार सब्जियाँ, अनाज जैसे-गेहूं, बाजरा आदि लौह तत्व की पूर्ति के सर्वोत्तम स्रोत हैं। अंकुरित दालें या फलियाँ, अधपका या कच्चा आहार (सलाद) लगभग पूरे देश में खाया जाता है। यह उन तत्वों की पूर्ति करता है। अंकुरण करने से उनकी पाच्य क्षमता तथा पोषण महत्त्व बढ़ जाता है।
विदेशी कहावत है 'एन एप्पल ए डे कीप्स डाक्टर अवे क्योंकि उनके पास मुख्यत: एप्पल होते हैं, पर हमारे पास संतरा, आँवला, बेर, चीकू, अमरूद, पपीता आदि अनेक फल भरे पड़े हैं। इन सभी फलों में भरपूर खनिज तत्व उपलब्ध हैं।
आहार-चर्यार् (dietary habit): भोजन न ज्यादा गर्म हो और न ज्यादा ठंडा हो। यथा सम्भव शरीर के तापमान के अनुरूप हो। भोजन चबा-चबा कर खायें। एक ग्रास (ड्ढद्बह्लद्ग) को बार-बार चबाएं, पेय पदार्थों को धीरे-धीरे पीयें। (for good health eat liquids and drink solids) भोजन के मध्य में आवश्यकतानुसार थोड़ा सा जल लें, अन्यथा जल भोजन से आधा-पौना घंटा पहले या इतने ही समय बाद लें।
समय का महत्त्व: नाश्ता में प्रात: 7 से 9 बजे हल्का पेय व फल आदि लें। दोपहर का भोजन- ११ से २ बजे तक, सायंकाल का भोजन 7 से 9 बजे तक अवश्य लें। विद्यार्थी स्कूल से आकर एकदम भोजन न करें। पहले हाथ-मुँह धोयें, कपड़े बदलें फिर कुछ देर बाद भोजन करें। दोपहर के भोजन के बाद कुछ समय आराम करें और सायं के भोजन के बाद थोड़ा बहुत टहलना अति आवश्यक है। सायं के भोजन के लगभग १ घण्टा उपरांत ही सोयें।
घर के बाहर, होटल में एवं गाड़ी में खाने से बचे। घर से बाहर खाने की आवश्यकता पड़े तो छिलके वाले फल जैसे-केला, मौसमी, अनार, चीकू लें। सेब, अमरूद, बेर आदि अच्छी तरह धोकर लें। घर से टिफिन ले जाएं। बड़े बच्चों के लिए ड्राईफूटस: अंजीर, मुनक्का, किशमिश, बादाम भिगोकर दे। चने, मूंगफली भी उत्तम आहार हैं।
बच्चे आहार में क्या न लें?
बच्चों को तली- भुनी हुई चीजें, अधिक मिर्च-मसाले, मैदे की चीजें, प्रोसेस्ड एवं चिप्स आदि जंक फूड, घी-तेल से युक्त वस्तुएँ, प्रिजवर्ड फूड, ज्यादा अचार-चटनी नहीं देना चाहिए। एक तो इनमें पोषक तत्व न्यूनतम मात्रा में पाये जाते हैं, दूसरे ये पेट को खराब करते हैं। परांठा, बिस्कुट आदि का कभी कभार ही उपयोग करें। इनसे बच्चे तरह-तरह के पाचन संबंधी विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं। जंक फूड से आंतों की अवशोषण क्षमता कमजोर होती है और शरीर में लौह तत्व की भी कमी हो जाती है। जंक फूड से एसिडिटी, मुँह छाले, निद्रा संबंधी रोग, मोटापा आदि हो जाते हैं। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) कमजोर होती है। जिससे बच्चों को टाँसिल के संक्रमण बार-बार होते हैं और बच्चों का विकास अधूरा रह जाता है। जंक फूड से शरीर की सभी कोशिकाओं का डी.एन.ए धीरे-धीरे विघटित (denatured) होता है, जिससे शरीर के सभी तन्त्रों (system) की कार्यप्रणाली (physiology) अव्यवस्थित हो जाती है और शरीर बीमारियों के लिए अग्रसर हो जाता है।
शाकाहार सर्वोत्तम आहार
जैविक खेती (जैविक खाद व जैविक कीटनाशक) द्वारा उत्पन्न किया गया अन्न व साग सब्जियाँ स्वास्थ्य के लिए उत्तम वरदान हैं। यदि हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह, रक्तचाप, अस्थमा तथा नपुंसकता जैसी बीमारियों से अपने बच्चों को बचना है, तो शीध्र ही मांसाहार बंद करें। यह चेतावनी अमेरिका के फिजीशियन कमेटी फॉर रिस्पॉन्सिबल मैडिसन के चेयरमैन डॉ. नील बनार्ड ने अमदाबाद के एन.एच.एल. म्यूनिसिपल मेडिकल कॉलेज में दी थी।
यदि पूर्ण मांसाहारी मनुष्य भी मात्र तीन सप्ताह के लिए शाकाहारी बन जाएं तो उसका कोलेस्टरॉल, यूरिक अम्ल, आक्सेलेट, रक्तचाप, कब्ज आदि नियन्त्रित हो सकते हैं। क्योंकि मासांहार से क्रोध, उद्दण्डता, आवेग एवं आपराधिक वृत्ति बढ़ती है, जो इन रोगों के कारक हैं।
बच्चे बीमार क्यों होते हैं?
यह सोचने की बात है कि पूरा ध्यान रखने व संतुलित भोजन लेने पर भी बच्चे या बड़े क्यों अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण प्रकृति से दूर जाना है।
प्राकृतिक भोजन: का आशय है जो भोजन पकाने की कम से कम प्रक्रिया से गुजरता है या जिसकी प्रोसेसिंग नहीं होती है- जैसे फल, सलाद, उबला हुआ भोजन, भुना (बिना तेल) या कम मसालेदार भोजन। इस प्रकार के भोजन में कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन  आदि सरल रूप (simple form)  में होते है, जिससे इसको पचाना (absorption) बहुत आसान हो जाता है। यह भोजन तो बीमार व्यक्ति को भी स्वस्थ कर देता है यदि
स्वस्थ व्यक्ति यह भोजन करें, तो हमेशा ही स्वस्थ रहेंगे।
अप्राकृतिक भोजन: जो आहार पकाने की ज्यादा से ज्यादा प्रक्रिया से गुजरता है जैसे-तना-भुनाअधिक मसालेदार, अचार, प्रिजवर्ड फूड व चिपकने वाले पदार्थ जैसे मिठाइयाँ, चॉकलेट आदि। इनमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट आदि सरल रूप में नहीं रह पाते, अपितु वे ज्यादा पककर काफी जटिल (स्रद्गठ्ठड्डह्लह्वह्म्द्गस्र) हो जाते है। जिससे उनका पाचन पूरा नहीं हो पाता। ऐसे भोजन का बिना पचा भाग सड़ने लगता है, जिससे अनेक बीमारियाँ होती हैं। अप्राकृतिक भोजन में रेशेदार पदार्थ (roughage & fibre) भी नहीं होते। चूंकि भोजन खाने से हमें ऊर्जा मिलती है, अत: हमें उस ऊर्जा का पूरा इस्तेमाल करना चाहिए। जैसे हम कार न चलाएं और रोज पेट्रोल डालते रहें तो नुकसान होगा। उसी प्रकार बच्चों एवं बड़ों को प्राकृतिक भोजन के साथ-साथ स्नायुओं से पसीना निकालने वाला 1 घंटे का व्यायाम प्रतिदिन करना ही चाहिए। यह हमें पूर्ण रूप से स्वस्थ रखता है।
बच्चों को ऐसे बचायें अतिभार से
स्पष्ट है कि छोटी उम्र में अतिभार बच्चे आगे चलकर अधिक भार वाले वयस्क बनते हैं। अत: यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि आप शिशु के आहार पर यथोचित ध्यान दें व उसे अतिभार  (मोटा) होने से बचाएँ। खाने के अन्तर्गत होने वाली सामान्य गलतियों के कारण ये समस्याएँ आती हैं। जैसे- शिशु को बहुत जल्दी एवं अनाश्वयक रूप से कई खाद्य पदार्थों को एक साथ खिलाने की शुरुआत करना, बहुत सारी मिठाइयां तथा मक्खन खिलाना, छोटे बच्चों की माताएं कई बार लाड़वश अधिक आहार खिला देती है या अधिक खिलाने की इच्छा रखती हैं, यह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।
थोड़े बड़े बच्चों में मोटापे या अतिभार का कारण दोपहर व शाम के खाने के बीच अल्पाहार (नाश्ता) लेना है। ये बच्चे नमक भी ज्यादा लेते हैं। आजकल टीवी पर अनेक आहार एवं अल्पाहार कम्पनियाँ बच्चों के लिए आहार मॉडल प्रस्तुत करती हैं जिसमें अल्पाहार से शिशु के संतुलित आहार वाले पदार्थों को घटाते हैं, इस मॉडल से बच्चों में एक बार खाने की आदत पड़ जाये ते इसे रोक पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। २ से ५ साल की आयु के बीच बच्चों में तरह-तरह के भोजन की सनक या झक पैदा हो जाती है। माता-पिता इस पर ध्यान दें। इसी के साथ आवश्यक है बच्चों को स्वस्थ रखने के लिए उसकी दिनचर्या को शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें एवं स्वयं भी उनके साथ आउटडोर गेम्स खेलें।

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