मृत्यु
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आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज
सामान्यत : जीवन के दो छोर माने जाते हैं- प्रथम जन्म और दूसरा मृत्यु (जायते... विनश्यति)। जन्म के द्वारा जीवन अभिव्यक्त या प्रकट हो जाता है और मृत्यु के द्वारा अप्रकट। इसलिये व्याख्याकार जीवन को दो अंधेरों के बीच जलता हुआ एक चिराग बताते हैं।
रत संहिता के निर्माता कृष्णद्वैपायन (वेदव्यास) ने धृतराष्ट्र के मुख से सनत्सुजात ऋषि के समक्ष एक समस्या रखी कि मृत्यु क्या है? सनत्सुजात ने कहा - 'प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि तथाऽप्रमादममृतत्वं ब्रवीमि। ‘अर्थात् प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद ही अमृत है। प्रमाद के सिवाय इस भूतल पर मृत्यु नाम की अन्य कोई भी चीज नहीं है (नास्ति मृत्यु:)। इसी प्रकार की एक कथा ब्राह्मण ग्रन्थों में भी आती है कि प्रजापति ने सब पदार्थों को उत्पन्न करके उन्हें मरणधर्म से संयुक्त कर दिया, किन्तु ब्रह्मचारी को अपने पास रख लिया। मृत्यु ने आग्रह किया कि कृपया इसमें भी मुझे भागीदार बना लीजिए। मृत्यु के आग्रह पर प्रजापति एक शर्त के साथ ब्रह्मचारी में भी उसको हिस्सा देने के लिए राजी हो गये। प्रजापति ने कहा कि ब्रह्मचारी जिस अहोरात्र में अग्रिहोत्र न करे, तत्काल आप उसे पकड़ लें। अत: मान्यता है कि ब्रह्मचारी जिस अहोरोत्र में समिधाधान से अमृत अग्रि की परिचर्या नहीं करता, मृत्यु उसे पकड़ लेती है। दूसरे शब्दों में जीवात्मा ही वह वैश्वानर अतिथि है जो नरों में अतिथि रूप में बसा हुआ है। ब्रह्मचारी को मृत्यु से बचने के लिये प्रमादरहित होकर इस वैश्वानर अग्रि (आत्मा अग्रि) की परिचर्या करनी होती है। यजु. ३.१-३ कहता है:-
समिधाऽग्रिं दुवस्यत घृतैर्बोयताऽतिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन।। सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्रये जातवेदसे।। तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठय।। अर्थात् अपने सद्विचार और सद्भावरूपी समिधाओं की इस अग्रि में आहुति देनी होती है। ऋषि कहता है आसक्ति पूर्वक प्रकृति (षडिन्द्रियों के विषयों) के साथ सम्बद्ध होने का नाम ही प्रमाद है और यह साधक को निश्चित ही आत्माग्रि से विमुख कर देता है।
प्राचीन ऋषि जब कहते हैं- 'मृत्योर्माऽमृतं गमय’ 'मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्’ (यजु. ३.६०) 'परं मृत्यो अ परेहि पन्थां यस्ते स्व इतरो देवयानात्’ 'मृत्यो: पदं योपयन्तो यदैत’ 'अन्तर्मुत्युं दधतां पर्वतेन’ (ऋग्. १०.१८.१, २, ४) तो इस प्रकार के सभी प्रसङ्गों में मृत्यु व अमृत को एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में पढ़ा गया है। 'मृत्यु’ समस्त अशुभ, अमङ्गल, अशिव, दु:ख, दर्द, पीड़ा, कष्ट आदि का उपलक्षण है। इसी प्रकार 'अमृत’ शुभ, मङ्गल, शिव, आनन्द, शान्ति, दिव्यता आदि का उपलक्षण है। एक जीवन के लिये अभिलषित है, इष्ट है, वांछित है और उपादेय है, तो दूसरा है अनभिलषित, अनिष्ट, अवांछित और हेय।
सृष्टि के आदिकाल से ही मनुष्य की यह आन्तरिक अभीप्सा सहज रूप से बहती हुई चली आ रही है। मनुष्य इस सत्य को कितना ही अनदेखा करे, कितना ही इस सत्य से पलायन (Escape) करे, कितना ही मुँह मोड़े तो भी अपनी इस अन्तरतम की माँग को हटा नहीं सकता। यह उसकी अन्तिम आवश्यकता है। यह सत्य वह साथ लेकर जन्मा है। मनुष्य के लिये इस तथ्य से बचकर निकल भागना असम्भव है।
अन्य दृष्टि से इस विषय पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि भूतकाल के प्रति मर जाने का नाम है 'मृत्यु’। मृत्यु पुराने को नया बना देने वाली एक शक्ति विशेष है। आज जो बीज के रूप में है, भूमि में पहुँचते ही उसमें अंकुर फूट पड़ता है। बीज यदि न मरे तो अग्रिम जीवन की शुरुआत कैसे हो सकती है? अंकुर से पौधा, पौधे से वृक्ष के विकास की प्रक्रिया में उत्तररूप के जन्म के लिये पूर्वरूप को मरना ही होता है। अथर्ववेद के ब्रह्मचर्य सूक्त में आचार्य के पाँचरूपों का वर्णन आता है, उनमें से एक रूप मृत्यु भी है जिसको कि प्रथम स्थान पर रखा है। 'आचार्यो मृत्युर्वरुण: सोम ओषधय: पय:’ अर्थात् आचार्य मृत्यु है, वरुण है, सोम है, औषधि है, गोदुग्ध है। यहाँ मन्त्र में आचार्य को 'मृत्यु’ कहने का तात्पर्य यही है कि आचार्य मृत्यु बनकर बालक के पशुरूप को, अबोध रूप को, अज्ञानी रूप को, उच्छृङ्खल रूप को मार कर मनुष्य, ऋषि व देवरूप में बदल देता है। ज्ञातव्य कि बालक के अशुभ-संस्कारों का नाश करना बहुत ही आवश्यक होता है, जिससे शुभ-संस्कारों का उत्पादन संभव हो सके। यह महान दोहरा दायित्व आचार्य ही निभा सकता है।
अध्यात्म विश्लेषक बहुत संवेदनशील रहस्य को प्रकट करते हैं कि उम्र बढ़ते-बढ़ते वृद्धावस्था में व्यक्ति को होना तो हल्का चाहिये, किन्तु अज्ञान के कारण वह अपने को अत्यधिक बोझिल बना लेता है। वह शरीर से ही नहीं, बल्कि मन से भी अत्यन्त कुरूप शिकायतों का ढेर लगाकर उत्साहहीन, बेबस, दु:खी, परेशान, पराधीन, विषाद और तनाव से ग्रस्त हो जाता है। यही कारण है कि एक बूढ़ा व्यक्ति ऐसी दुरावस्था में पहुँच जाता है कि प्रकृति की ओर से मृत्यु की यह अद्भुत व्यवस्था न होती तो इस नरक से उसे मुक्ति भी कैसे मिल सकती है? मृत्यु एक झटके में सब कुछ को मिटाकर उसे फिर एक सुनहरा अवसर दे देती है। वह वृद्ध से बालक बनकर फिर उसी उत्साह, उमंग व तरंग से जीना आरम्भ कर देता है।
आप देखेंगे बालक के जीवन में वृद्ध के जीवन से सर्वथा विपरीत लक्षण देखने को मिलते हैं- एकदम निर्भार, सीखने की अदम्य चाह, सदा प्रसन्न, सरल, ऊर्जा, सौन्दर्य व प्रेम से भरा हुआ। जो वृद्ध अपने सम्पूर्ण जीवन के नीरस भूतकाल को मजबूर होकर ढो रहा था, उसे ही अब बालक बनकर 'वर्तमान में जीना कितना सौभाग्यप्रद व हर्षप्रद होता है। यह है मृत्यु का चमत्कार।
मनुष्य यदि ध्यान से सृष्टि का अवलोकन करें तो मृत्यु में कष्ट, बाधा, पीड़ा, दु:ख जैसा कुछ है ही नहीं, बस शर्त यह है कि वह स्वाभाविक हो, जीवन का सहज परिणाम हो। जैसे एक वृक्ष के पत्ते हरी-भरी अवस्था से धीरे-धीरे पीले होकर कितने आराम से वृक्ष से अलग हो जाते हैं। इसी प्रकार मयूर आदि पक्षियों के पुराने पंख झड़ते हैं, यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक होती है कि उन्हें पता भी नहीं चलता। हम दूर क्यों जाएँ हमारे शरीरों में लाखों कोशिकाएँ रोज मर जाती हैं, उससे हमको तनिक सी भी बाधा महसूस नहीं होती। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जो कुछ भी हम से अलग होता है यदि उसकी सहज स्वीकार्यता हो जाती है, तो वह कभी भी हमारे लिये कष्टदायक नहीं होता। मृत्यु एक अर्थ में जो हमारे पास था, उसका अलग होना ही तो है। यदि हम इस सत्य को समझकर स्वीकार कर लेते हैं तो यहाँ आनन्द के सिवाय कुछ भी हमें दिखाई ही नहीं देगा।
ऋषि कहता है (आनन्दाद्धि खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति) अर्थात् सब भूतों की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय (मृत्यु) के मूल में आनन्द का वास है। आनन्द के सहारे ही यह अनादि-अनन्त सृष्टि चक्र सतत प्रवृत्त है, मृत्यु भी हमारी आनन्दावस्था ही तो है।
महापुरुष कहते हैं कि जो जीवन भूतकाल के प्रति हर क्षण भूलना जानता है, वही श्रेष्ठतम जीवन है। जैसे कोई गरुड़ आकाश में उड़ता हुआ अपने पीछे कोई संस्कार, कोई हल्की सी भी रेखा नहीं छोड़ता, जबकि धरती पर चलने वाला प्राणी सदैव अपना चिन्ह छोड़ता हुआ आगे बढ़ता है, यही उसका दुखद पक्ष बन जाता है। ज्ञानी का जीवन गरुड़ की तरह होता है, न कि धरती पर चलने वाले प्राणियों की भाँति। वेद में मनुष्य को आदेश दिया गया है कि 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:’ उसका ठीक-ठीक भाव यही हो भी सकता है कि जीवन ऐसा हो कि भूतकाल के संस्कारों से बोझिल न हो। जीवन में कर्म तो हों पर उसके संस्कार न बनें, जो बिना ज्ञान की भित्ति पर खड़े हुए कैसे सम्भव हो सकता है? यह सम्भव है तो मात्र 'प्रतिक्षण भूतकाल के प्रति मरते रहने से’ जीवन के इस विशिष्ट कला से युक्त होकर कर्म करने से नित्य हल्केपन, उत्साह, आशा, नवीनता की कल्पना की जा सकती है। ऐसा जीवन हल्का, सहज, सरल, प्रेममय, शान्तिमय, संगीतमय व सर्वथा मुक्त जीवन होगा। फिर कौन मृत्यु से डरेगा। आइये हम सब भी नित नवीनता युक्त मृत्यु का वरण करें और जीवन को धन्य बनायें।
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