आरोहण के चार सोपान
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श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज
जो मनुष्य अपने जीवन को ऊँचाई की तरफ ले जाना चाहता है,उसके जीवन में शुद्धि अत्यावश्यक है। शुद्धि अर्थात् स्वच्छता, पवित्रता। यह शुद्धि बाहर की भी होती है और भीतर की भी। व्यक्ति जहाँ रहता है उस परिवेश की शुद्धि जैसे कि आवास स्थान, पाकशाला, शौचालय आदि और साथ-साथ शरीर, दाँत, उदर आदि की भी। अग्रिहोत्र के द्वारा पर्यावरण की शुद्धि का उपक्रम किया गया है। अग्रिहोत्र वृष्टि और वायु को शुद्ध करने का एक सशक्त साधन है। प्रकृति माता वृक्षों के द्वारा सतत इस शुद्धि के कार्य में सहभागी बनी हुई है। प्रकृति माँ ने सूर्य के रूप में शुद्धि का एक महान् स्रोत हमें दिया है। वायुमण्डल में जो धूल-धूएँ और गैसों के रूप में अशुद्धि फैल जाती है, मेघ उसे वर्षा के द्वारा धो डालते हैं। शुद्धि की यह सारी व्यवस्था न होती तो यहाँ पृथ्वी पर जीवन ही दूभर हो जाता।
मनुस्मृति के पञ्चम अध्याय में शुद्धि करने के लिए वो कौन-कौन से पदार्थ हैं तथा कौन किससे शुद्ध होता है, इसे भी गणना करके दर्शाया है। वहाँ कहा है-
ज्ञानं तपोऽग्रिराहारो मृन्मनो वार्युपाञ्जनम्।
वायु: कर्मार्र्ककालौ च शुद्धे: कर्तृृणि देहिनाम्।। मनु० ५.१०५।।
अर्थात् 'ज्ञान, तप, अग्रि, आहार, मिट्टी, मन (विचार), जल, लेप करना, वायु, कर्म, सूर्य और काल’ ये प्राणियों की शुद्धि करने वाले पदार्थ हैं। इनमें से 'ज्ञान, तप, मन और कर्म’ ये चार पदार्थ ऐसे हैं जिनसे आन्तरिक शुद्धि होती है, बाकि जो बच गये वे बाह्य शरीरादि की शुद्धि में निमित्त होते हैं। तप और काल को उभय शुद्धि में गिना जा सकता है। भीतर की अशुद्धि राग-द्वेष के कारण होती है। उससे मुक्त होने के लिये व्यक्ति को सबसे पहला काम तो यही करना होता है कि वह अपनी ही ज्ञान की आँखों से अपने को ठीक-ठीक देख पाये कि मुझ में यह अशुद्धि है। यदि इतना काम हो जाता है तो आगे की यात्रा सरल हो जाती है। मनुस्मृति में अर्थशुचिता पर भी विशेष ध्यान दिलाया गया है। कहा गया है-
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।
योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचि: शुचि:।। मनु० ५.१०६।।
अर्थात् जो धर्म ही से पदार्थों का संचय करता है वही सब पवित्रताओं में उत्तम पवित्रता है। जो अन्याय से किसी पदार्थ का ग्रहण नहीं करता वही पवित्र है। जल व मृत्तिका आदि से जो पवित्रता होती है वह धर्म के सदृश उत्तम नहीं हो सकती। आयुर्वेद के आचार्यों ने भी एक निष्कर्ष दिया कि जो 'ऋतभुक्’ (सत्य कमाई का ही भोग करने वाला) होता है वह रोगी नहीं होता।
मनु ने यह भी बताया है कि धर्माचरण से विविध चरित्र दोषों की शुद्धि कैसे होती है-
क्षान्त्या शुद्ध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिण:।
प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमा:।। मनु० ५.१०७।।
विद्वान् लोग क्षमा से, दुष्टकर्मकार सत्संग और विद्यादि शुभ गुणों के दान से या जो उनके पास है उसके दान (श्रमदान, धनदान, द्रव्यदान, वस्त्रदान, जलदान, भूमिदान, सहानुभूतिदान इत्यादि) से, गुप्त पाप करने वाले विचार से उस पाप का त्याग करके और वेदवित् उत्तम विद्वान् तप से (ब्रह्मचर्य तथा सत्यभाषणादि से) शुद्ध होते हैं। आगे शरीर, मन, आत्मा व बुद्धि की शुद्धि के उपाय बताए हैं-
अद्भिर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति मन: सत्येन शुद्ध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यति।। मनु० ५.१०९।।
जल से स्वेदादि युक्त शरीर के बाहर के अवयव, निषिद्धचिन्तादि से दूषित हुआ संकल्प-विकल्प रूप मन सत्याचरण से अर्थात् सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य करने से शुद्ध हो जाता है, विद्या (ब्रह्मविद्या) और पापक्षय के हेतुभूत तप से जीवात्मा शुद्ध होता है अर्थात् शुद्ध परमात्मस्वरूप में अवस्थित रहता है और विपर्ययज्ञान युक्त बुद्धि यथार्थ ज्ञान से शुद्ध होती है।
विद्या और तप के द्वारा जीवात्मा की शुद्धि की बात और ज्ञान के द्वारा बुद्धि शुद्धि की बात कही जाती है, हम इसके अभिप्राय को समझते चलें?
सबसे पहले देखें कि बुद्धि की अशुद्धि क्या है? वस्तुत: बुद्धि के दो काम हैं, अपने आत्मस्वरूप (Subject) का ठीक-ठीक निश्चय करना और वस्तु या किसी भी विषय (Object) का ठीक-ठीक निश्चय करना। जो बुद्धि इन दो कामों को ठीक से नहीं कर पा रही है यही बुद्धि की अशुद्धि है, बुद्धि की यह अशुद्धि ज्ञान (सम्यक् दर्शन) से ही दूर होती है। अयथार्थ देखना (अतस्मिन् स:) बुद्धि की अशुद्धि है और यथार्थ देखना (तस्मिन् स:) बुद्धि की शुद्धि है। 'जो वस्तु जैसी है उसको वैसा ही देखना’ बुद्धि में यह सामर्थ्य शनै: शनै: कई उपायों से विकसित होता है- शास्त्र के श्रवण-मनन-निदिध्यासन के द्वारा, ज्ञानवान् लोगों के साथ चर्चा के द्वारा, स्वयं के विचार-मन्थन या आत्म-मन्थन के द्वारा, सत्य-दृष्टि प्राप्त करने के लिये अपनी आन्तरिक माँग (अभीप्सा) के द्वारा, प्रार्थना के द्वारा, अपनी या दूसरों की भूलों के द्वारा, मन व इन्द्रियों की एकाग्रता (तप) इत्यादि के द्वारा। इन सभी उपायों से जब बुद्धि शुुद्ध हो जाती है और जिस किसी विषय में व्यक्ति को पूर्ण निश्चय हो जाता है कि यह ऐसा ही है तो इस सम्यक् दर्शन को श्लोक में 'विद्या’ शब्द से कहा गया है। जिसका संकेत अन्यत्र 'विद्ययाऽमृतमश्नुते’ इन शब्दों के द्वारा हुआ है। विद्या और तप के सम्मिलित साधन से जीवात्मा शुद्ध हो जाता है। अर्थापत्ति से यह निकला कि अविद्या (अयथार्थ दर्शन) व अतपस्या से जीवात्मा की अशुद्धि बढ़ती जाती है। अशुद्ध ज्ञान ही जीवात्मा की अशुद्धि का परम हेतु है। अशुद्ध ज्ञान से अशुद्ध इच्छाएँ, अशुद्ध कर्म और अशुद्ध संस्कार; इस प्रकार अशुद्धि का यह अन्तहीन सिलसिला चालू हो जाता है।
छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि साधक को सर्वप्रथम षडिन्द्रियों (मन व ज्ञानेन्द्रियों) के द्वारा ग्रहण किये जाने वाले आहार को शुद्ध करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आहार के शुद्ध होने पर अन्त:करण शुद्ध हो जाता है। अन्त:करण का सत्त्व गुण प्रधान होना ही अन्त:करण की शुद्धि है। अन्त:करण के शुद्ध होने पर साधक की आत्मस्मृति या भूमा रूप की स्मृति निश्चल (ध्रुव) हो जाती है। भूमा रूप की स्मृति या आत्मस्मृति के निश्चल होते ही हृदय की गाँठें (अनन्त जन्मों की विविध वासनाएँ) जिनके कारण व्यक्ति में विविध कामनाओं का जन्म होता है, वे सब छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। व्यक्ति समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है (आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि: सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति:, स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:।। छान्दो ७.२६.२) सो अन्त:शुद्धि की इस प्रक्रिया में से इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, भाव-भावनाएँ, जीवात्मा इत्यादि सभी को गुजरना पड़ता है।
शुद्धि के इस प्रथम सोपान पर आरोहण करने पर द्वितीय सोपान आता है 'मुक्ति' का। जैसा कि ऊपर कहा गया कि ज्ञान के शुद्ध होते ही वह व्यक्ति को समस्त बन्धनों (अहंकार, भूतकाल की शुभ-अशुभ स्मृतियों, वर्तमान के आवेग, भविष्य की कल्पनाओं) से मुक्त कर देता है 'ज्ञानान्मुक्ति:’ (सांख्य ३.२३)।
तृतीय सोपान है 'आनन्द’। मुक्त व्यक्ति में आनन्द का सहज प्रस्फुटन हो जाता है। अज्ञान के कारण व्यक्ति को अहंकार (अस्मिताक्लेश) घेरे रहता है। अहंकार के साथ ही राग-द्वेष-भय आदि दूसरे क्लेश भी अपने आप चले आते हैं। अहंकार के आते ही स्वत: ही अनेकानेक कामनाएँ पैदा हो जाती हैं। कामनाओं के पूर्ण होने पर लोभ (और-और की माँग) और अपूर्ण होने पर क्रोध, खिन्नता, तनाव, विषाद, दूसरों के साथ स्पर्द्धा व ईर्ष्या आदि सभी का सहज प्रवाह चालू हो जाता है। व्यक्ति को बेबस होकर दु:ख के इस कुचक्र से गुजरना पड़ता है। मुक्त व्यक्ति को इस कुचक्र का कभी भी सामना नहीं करना पड़ता।
चतुर्थ सोपान है- 'पूर्णता’। पूर्णता को प्राप्त हुआ ज्ञानी व्यक्ति इस सृष्टि में मनुष्य के रूप में साक्षात् भगवान् की तरह पूर्ण होकर जीता है। जीवन की यह चरम उपलब्धि है। अब वह दूसरों की पूर्णता के लिये अपने आपको समर्पित कर देता है। बल्कि यह कहना चाहिए कि दूसरा उसके लिये कोई बचता ही नहीं। उसकी दृष्टि अपरिच्छिन्न हो जाती है वह सर्वभूतात्मभाव के रूप में सब प्राणियों को देखने लगता है। भेददृष्टि का अन्त हो जाता है, एकत्व उसका स्वभाव हो जाता है। यजुर्वेद चालीसवें अध्याय के छठे-सातवें मन्त्र में इसी स्थिति का वर्णन हुआ है।
ज्ञान, गुण, व्यवहार और प्रसन्नता की दिव्य शृङ्खला
प्रज्ञावान् पुरुष कहते हैं कि मनुष्य की पहचान ज्ञान से होती है। ज्ञान को देखकर मनुष्य का पता चल सकता है और ज्ञान की पहचान होती है गुणों से। गुण हैं तो अवश्य ही उनके मूल में ज्ञान होता है। किसी के जीवन में गुणों का प्रवेश या गुणों का प्राकट्य ज्ञान के द्वारा ही होता है, ज्ञान के बिना गुण नहीं आ सकते। इस प्रकार गुणों को देखकर ज्ञान का अनुमान हो जाता है। गुणों की पहचान व्यक्ति के आचरण या व्यवहार से होती है। इस प्रकार जीवन में जब गुण धारित हो जाते हैं तो वे व्यक्ति के आचरण या व्यवहार को देखने में परिलक्षित होने लगते हैं। व्यक्ति के अच्छे-बुरे आचरण या व्यवहार को देखकर उसके गुणवान् या गुणहीन होने का अनुमान होता है। पर अन्तिम बात कि व्यक्ति के अच्छे आचरण की पहचान का साधन क्या है? तो प्रज्ञावान् बताते हैं अच्छे आचरण की पहचान उसकी प्रसन्नता से होती है। निकटवर्ती लोग उससे कितना प्रसन्न रहते हैं। यदि निकटवर्ती प्रसन्न रहते हैं तो निश्चित ही वह व्यक्ति आचरणवान् होता है। ऐसा आचरण ही जीवन के शिखर आरोहण का मार्ग प्रशस्त करता है। आइये हम सभी क्रमश: श्रेष्ठता की धारा से जुड़ें और जीवन को धन्य बनायें।
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