विज्ञान एवं भारतीय दृष्टिकोण
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आचार्य भरद्वाज, वैदिक गुरुकुलम्
विज्ञान अर्थात् विशेष ज्ञान। ज्ञान विशेष तब होता है जब मनुष्य ज्ञान को आत्मसात् अर्थात् धारण कर उसके अनुकूल कर्म करता है व जीवन जीता है। विज्ञान समुच्चय है ज्ञान कर्म और उपासना का। विज्ञान हमारे जीवन को समग्रता से उन्नत और विशिष्ट बनाता है। विज्ञान सर्वकालिक है अर्थात् विज्ञान के नियम जो भूतकाल में थे, वे ही वर्तमान में हैं और भविष्य में भी होंगे। विज्ञान के नियम सत्य और ऋत नियमों पर ही आधारित हैं। जिन्हें एकाग्र व विशिष्ट प्रतिभा वाली बुद्धि के द्वारा खोजा तो जा सकता है, पर नये नियम बनाये नहीं जा सकते क्योंकि नियम अनादि हैं और इनकी नियामक स्वयं सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ सत्ता है जिसकी उपस्थिति आज के आधुनिक विज्ञान के वैज्ञानिक भी मानते हैं और उसी को भक्तगण प्रभु या ईश्वर नाम देते हैं।
ईश्वर प्रदत्त ज्ञान को ही वेद कहते हैं। यह ज्ञान अनादि अर्थात् सदा से रहने के कारण अपौरुषेय कहलाता है अर्थात् किसी व्यक्ति के द्वारा निर्मित्त नहीं है। वेद के प्रतिपाद्य विषय ४ माने जाते हैं- ज्ञान, कर्म, उपासना और इन तीनों का समुच्चय विज्ञान। इन विषयों का प्रतिपादन क्रमश: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में है। महर्षि दयानन्द जी ने वेद को सभी सत्य विद्याओं की पुस्तक माना है और कहा है कि 'सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सब का आदि मूल परमेश्वर है’ और यह कथन पूर्णत: सत्य इसलिए है, क्योंकि इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी क्रियाएँ हो रही हैं सभी परमात्मा के ऋत और सत्य नियमानुसार अर्थात् उन नियमों के द्वारा अनुशासित हैं, जो तीनों कालों में वर्तमान हैं और कभी बदलने वाले नहीं हैं।

इस संसार में जितने नियमों सिद्धान्तों की खोजें हुई जैसे गुरुत्वाकर्षण, उत्प्लवन का सिद्धान्त, सापेक्षता का सिद्धान्त, बायें हाथ का नियम इत्यादि ये सभी नियम, सिद्धान्त शाश्वत हैं और जितने भी आविष्कार हुए जैसे- वाहन, दूरदर्शन, दूरवाणी (मोबाईल), उपग्रह आदि, ये भी उन्हीं शाश्वत नियम एवं सिद्धान्तों पर कार्य करते हैं जो वैदिक हैं अर्थात् जो वेद विहित ईश्वरीय सत्य ज्ञान हैं। सार्वभौमिक, सर्वकालिक, पंथनिरपेक्ष, प्रामाणिक, वैज्ञानिक ज्ञान 'वेद’ के कथन सूत्र रूप में हैं, जिन्हें जानकर और उस सूत्र रूपी ज्ञान में एकाग्रचित्त निदिध्यासन (ध्यान) कर के मनुष्य उसके विस्तृत उपयोगों की सम्भाव्यता को जानता है। उसका यह जानना भी वैदिक नियमानुसार ही है। अत एव किसी ज्ञान पर या किसी आविष्कार पर अपनी या अपने देश की मुहर लगाना एक बचकानी हरकत और अहंकारिक प्रलाप मात्र हैं। प्रत्येक ज्ञान और आविष्कार सम्पूर्ण मानव जाति के हित के लिए होता है।
विज्ञान हमारे जीवन में समग्रता और संतुलन स्थापित करता है। विज्ञान के दो रूप हैं आन्तरिक एवं बाह्य। आन्तरिक विज्ञान से मानव अपने मन, बुद्धि को शान्त, विवेकी और प्रतिभावान् बनाता है और बाह्य विज्ञान से अपने जीवन को सुविधा पूर्ण बनाने के लिए सर्वहितकारी अर्थात् प्रकृति एवं जीवों में समरसता रखते हुये वस्तुओं का आविष्कार करता हैं।
वैदिक ऋषियों ने विज्ञान के माध्यम से ही आन्तरिक एवं भौतिक सम्पदा को पाया जिन्हें क्रमश: नि:श्रेयस और अभ्युदय कहते हैं। परन्तु उनका ज्ञान कभी भी प्रकृति और जीवों के विरुद्ध नहीं था, बल्कि सभी की उन्नति के लिए था। ज्यादा नहीं आज से दो सौ साल पूर्व तक को हम आधुनिक विज्ञान के पूर्व का काल कह सकते हैं, क्योंकि यूरोपीय सभी आधुनिक आविष्कार दो सौ साल के अन्दर ही हुए हैं। परन्तु दो सौ साल पहले भारत आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और सुरक्षा की दृष्टि से विश्वगुरु था। भारत हर प्रकार के हितकर ज्ञान-विज्ञान और सुविधाओं से उस समय भी परिपूर्ण था जिस समय को यूरोप और अमेरिका में Dark age time of enlightment, renaissance अर्थात् अंधेरे का समय, पुनरोत्थान का समय कहते हैं। आज के विज्ञान के विस्तार का बीज और आधार विश्व को भारत से मिला था और वह ज्ञान था ही सब के लिए। Patent, Copywrite, Pyracy आदि के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान पर अधिकार करके अपनी प्रभुता दिखलाना आज का चलन है। भारतीय चलन 'सर्वजन हिताय’ एवं 'सर्वजन सुखाय’ का है।
दो सौ साल पहले भी दूरसंचार के माध्यम थे, पर्यावरण शुद्धि थी, परिवहन प्रणालियाँ थी, बड़े-बड़े महल व व्यवस्थित शहर थे, जिनकी जनसंख्या लाखों में थी। राज्य की सुरक्षा हेतु सेना व घातक हथियार थे। भाँति-भाँति के खाद्य पदार्थ थे। धातु विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, अन्तरिक्ष विज्ञान, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, समाज शास्त्र, रसायन शास्त्र, भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, भाषा विज्ञान, भवन निर्माण विज्ञान, ज्योतिष, गणित, दर्शन, वेद, उपनिषद्, युद्ध विद्या, दण्ड नीति, आन्वीक्षिकी वार्ता, त्रयी आदि विद्याओं के हजारों नहीं लाखों शिक्षा केन्द्र थे जहाँ देश-विदेश से छात्र-छात्राएं विद्यार्जन हेतु आया करते थे। जिसकी चर्चा यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने अपनी यात्रा वृतान्त 'इन्डिका’ में तथा चीनी यात्री ह्यून सांग ने अपने यात्रा वृतान्त में की है और भारत के परम वैभवशाली होने का प्रमाण अमेरिका के वर्तमान के श्रेष्ठतम अर्थशास्त्री एन्गस मेडिसन ने अपनी पुस्तक 'द वर्ल्ड इकोनामी’ में विस्तार पूर्वक दिया है। परन्तु तत्कालीन विज्ञान में कभी भी प्रकृति का दोहन करके सुविधा संचय नहीं किया गया। सुविधा का प्रयोजन है कार्य को कम समय में, कम ऊर्जा खर्च करके करना और बचे हुए समय और ऊर्जा को आत्म चिन्तन, सेवादि कल्याणकारी और उत्पादक कार्यों में लगाना। प्रकृति को वेद और भारतीय दर्शन में 'माँ’ का स्थान दिया है- 'माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या:’।
विज्ञान गलत नहीं होता उसका क्रियान्वयन गलत हो सकता है। उपलब्ध विज्ञान से यूरोप में अनेकानेक खोजें हुई परन्तु उन खोजों का प्रयोग उन्होंने अपनी मान्यताओं के आधार पर किया। जहाँ प्रकृति को माता नहीं दासी माना गया है जो केवल पुरुष के भोग मात्र प्रयोजन के लिए है (Theory of Jenesis) और पुर्नजन्म, पाप-पुण्य और कर्मफल व्यवस्था भी कुछ नहीं है आदि। इन मान्यताओं पर पृथ्वी का दोहन अत्यन्त तीव्र गति से हो रहा है। विज्ञान की खोजें वरदान कम अभिशाप अधिक बनती जा रही हैं। मान्यताओं ने विज्ञान का प्रभाव उल्टा कर दिया हैं। धरती से खनिजों का ह्रास हो रहा है और मनुष्य में चरित्र का ह्रास हो रहा है। समय और ऊर्जा बचाकर टाईम पास के जरिये उसे व्यर्थ करने अथवा पाप पूर्ण कार्यों में समय व ऊर्जा लगाने के साधन भी सब के हाथ में दे दिये गये हैं। विज्ञान भोगवाद, बाजारवाद को बढ़ाने की कठपुतली बन गया है। असहाय विज्ञान स्वयं की रक्षा में असमर्थ है। षडयंत्रकारियों के द्वारा इसी चलन को आज स्वाभाविक समय की मांग, आधुनिकता, समृद्धि और उच्च स्तरीय जीवन की संज्ञा दी जाती है जिससे कि उनके बाजार व मुनाफे की रक्षा हो सके।
आज जितने सुख सुविधाओं के साधन बढ़ रहे हैं, उतनी ही बीमारियाँ भी बढ़ रही है। यंत्र जितना समय बचा रहे हैं लोगों के पास उतनी ही समय की कमी है। वो कम से कम अपने और अपने परिवार के लिए भी कुछ पल निकालने में असमर्थ हैं। महंगाई बढ़ रही है, मशीनें लगाकर भी लागत मूल्य कम नहीं हो रहा है, वस्तुएँ अधिक होने पर भी भोगने की भूख बढ़ रही है, सुख-साधन होने पर भी दु:ख, तनाव, अवसाद, निराशा, अकेलापन, भय आदि समस्याएँ बढ़ रही है। समृद्धि होने पर भी चोरी, डकैती बढ़ रही हैं।
क्या यह चक्र उल्टा नहीं चल रहा है? प्रदूषण, जनसंख्या, ग्लोबल वार्मिंग आदि समस्याएँ बढ़ रही हैं सो अलग। क्या यह है 'विज्ञान’ की देन? नहीं! यह विकृत खोपड़ियों की विकृत मान्यताओं की देन है। इस पर भय करना, किसी को कोसना, लम्बे-लम्बे भाषण आदि का व्यर्थ प्रलाप भी मीडिया आदि संचार साधनों में साथ-साथ चलता रहता है।
बात पीछे जाने की नहीं आगे जाने की है। मान्यताओं पर विचार कर उन्हें विवेक पूर्ण बनाने की है। वैदिक ज्ञान-विज्ञान के नियम-सिद्धान्त शाश्वत और अटल हैं। वही समृद्धि समृद्धि है जो सह अस्तित्व अर्थात् प्रकृति और मनुष्य दोनों के उपकार के लिए हो। 'वेद’ अर्थात् विज्ञान भारत का या केवल हिन्दुओं का नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व और संपूर्ण मानव जाति का हैं। वेदानुसार सहअस्तित्व, एकत्व, विश्वबंधुत्व और भाईचारे के साथ उन्नति करना व जीवन जीना और प्रकृति माता की रक्षा करना हमारा परम कर्त्तव्य है। जिससे हमारी भी रक्षा प्रकृति करेगी जैसी करोड़ों साल से करती आ रही है। अन्यथा वर्तमान स्थिति के परिणाम हमारे सामने हैं। धरती 100-200 साल भी बच जाए तो बड़ी बात होगी। कम-से-कम अर्थात् अति आवश्यक वस्तुओं का ही प्रयोग करें, विलासिता पूर्ण जीवन त्यागकर स्वस्थ तपस्वी जीवन जीएं, दूसरों को भी पे्ररणा दें। अपनी, अपने परिवार, धरती माँ और अगली पीढ़ी के लिए हम सब पूर्ण पुरुषार्थ करें।
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01 Mar 2025 17:58:05
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