जीवन में प्रसन्नता

जीवन में प्रसन्नता

 ब्रह्मचारिणी सुलेखा

वैदिक कन्या गुरुकुलम्

    प्रसन्नता के रूप में भगवान् ने दुनियां का सबसे बड़ा उपहार हमारे जन्म से ही दे रखा है। हमारा स्वरूप ही आनन्द है, हमें आनन्द के लिए या प्रसन्न रहने के लिए कहीं बाहर नहीं जाना हैं, अपने स्वरूप में ही आना हैं। हम सभी का संकल्प यही होना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में हम अपनी प्रसन्नता की चाबी दूसरों के हाथ में न दें अर्थात् दूसरों की किसी भी गतिविधि से हम प्रभावित न हो, हम अपने अन्दर राग, द्वेष जैसे दु:ख को लाने वाले दोषों को स्थान न दें। अगर हम अपने आप से पूछें कि क्या प्रसन्न रहना असम्भव है? तो यही उत्तर देंगे कि नहीं हमारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। ऐसा ही हमारा संकल्प होना चाहिए। हमारे स्वामी जी महाराज हमेशा कहते हैं कि 'संकल्प में विकल्प नहीं आना चाहिएसंकल्प में विकल्प तब आता है जब हमारी सजगता कम होती है। सभी के मन में एक प्रश्न आया होगा कि सजगता कैसे आएगी? तो इसका उत्तर यह है कि जो महापुरुष अपने जीवन में सजग थे, ऐसे उन महापुरुषों, आदर्श व्यक्तियों का आलम्बन लेने से हमारे जीवन में सजगता अवश्य बनी रहेगी।
जैसे हम अग्रि का आलम्बन लेते हैं तो हमें उष्णता मिलती है। जल का आलम्बन लेते हैं तो हमें शीतलता मिलती है या फिर किसी कूड़े-कचरे के ढेर के पास से गुजर भी जाते हैं तो हमें दुर्गन्ध सहनी पड़ती है। कहने का तात्पर्य है कि हम जिस किसी का भी जाने-अनजाने में आलम्बन लेंगे वो हमारे अन्दर स्वाभाविक रूप से अवतरित हो जायेगा।
इसलिए दिव्य शक्तियों का, दिव्य विचारों का, आदर्श महापुरुषों का आलम्बन लें। इसी सन्दर्भ में कहा गया है-
एतदालम्बनšश्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।। (कठोपनिषद्-१.२.१७)
महाजनो येन गत: स पन्था:। (पञ्चतंत्र अपरीक्षित-४०)
अर्थात् महापुरुष जिस मार्ग से जाते हैं वही सच्चा मार्ग होता है।
अभी हम बातें कर रहे थे आलम्बन की लेकिन इस आलम्बन को अपने जीवन की अवनति नहीं बनने देना।
यथा-एक किसान ने कुछ पौधे लगाये, वह किसान सभी का बराबर पालन-पोषण करता था। सभी पौधे बराबर बढ़ने लगे और पौधे से पेड़ का रूप लेने लग गये। किसी दिन अचानक तूफान आया और सभी एक दूसरे से टकराने लगे, उन्हीं में से एक पेड़ टकराने के डर से उन पेड़ों के नीचे छिप गया तो उसे तूफान का झोंका नहीं सहना पड़ा लेकिन वह हमेशा छोटा सा ही पेड़ रह गया। उसमें फल-फूल कभी नहीं आए। इस दृष्टान्त से यह समझना चाहिए कि आलम्बन भी ऊँचे उठने के लिए हो, न कि नीचे गिरने के लिए और जब हम ऊपर उठेंगे तो आप अवश्य ही अपने जीवन में और अन्यों के जीवन में प्रसन्नता व खुशियाँ बिखेर पाएंगे।
प्रसन्न व्यक्ति कभी भी बीमार नहीं होता, पहाड़ जैसे दु:ख आने पर भी वह समुद्र की लहरों जैसा समझकर अपनी नाव को पार निकाल ले जाता है। जिसने हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना सीख लिया है, वह किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, उसके अन्दर भय प्रवेश नहीं कर सकता है। निर्भयता में मनुष्य का सहज विकास होने लगता है। इस तरह के सहज प्रसन्न व्यक्ति को देखकर दु:खी व्यक्ति भी प्रसन्नता अनुभव करने लगता है और अनायास ही समाज की सेवा होने लगती है। प्रसन्न मनुष्य उदार हो जाता है उसमें सहज उदारता एवं सहज सरलता आ जाती है। उसमें सभी के प्रति सहज प्रेम उत्पन्न हो जाता है। राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि दोष दूर हो जाते हैं।
योगेश्वर भगवान् श्री कृष्ण गीता में कहते है-
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते।।२.६५।।
अर्थात् प्रसन्नता प्राप्त होने पर व्यक्ति के समस्त दु:खों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्नचित्त वाले व्यक्ति अर्थात् स्वस्थ अन्त:करण वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से आकाश की भाँति स्थिर हो जाती है, आत्म रूप से निश्चल हो जाती है। प्रसन्न होने का केवल एक ही मार्ग है- राग-द्वेष से मुक्त होकर अपने इन्द्रियों के द्वारा शास्त्र सम्मत अनिवार्य विषयों का ही सेवन करें।

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