पशुओं को अविलम्ब शक्ति प्रदान करने वाला दुग्धवर्धक पशु पूरक आहार 'शक्तिधारा’
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डॉ. बी.आर.जे.माथुर
पशु चिकित्सा सेवा प्रबंधक,
पतंजलि ग्रामोद्योग न्यास, हरिद्वार
शक्ति धारा (एनर्जी बूस्टर) नाम से ही स्पष्ट होता है कि यह शक्ति की धारा है जिसको पिलाने या खिलाने से पशु के शरीर में शीघ्र शक्ति का संचार होता है। पतंजलि ग्रामोद्योग न्यास का यह अनुपम उत्पाद पशुओं में शक्ति संचार हेतु और पशु पालक को आर्थिक लाभ पहँुचाने में अत्यंत सहायक है। वैसे तो शक्तिधारा निर्बल पशुओं को अविलम्ब शक्ति का संचार करने हेतु कभी भी दिया जा सकता है। किन्तु इसका अधिक उपयोग दुधारू पशुओं को अयन (अडर) एवं थनों के विकास हेतु प्रसव से १५-२० दिन पूर्व से दिया जाता है।
अधिकांशत: पशु पालक पशु के गर्भकाल में जब वह दूध देना बन्द कर देते है और शुष्क काल (Dry Period) में चले जाते हैं तो उनके प्रबंधन और पौष्टिक आहार में शिथिलता बरतने लगते है किन्तु प्रसव से कुछ दिन पूर्व जब पशु का अयन (अडर) एवं थनों का विकास होना प्रारंभ होता है तो पशु पालक उस पशु की तरफ अधिक ध्यान देना प्रारंभ कर देता है।
प्रकृति ने प्रत्येक माँ को अपना बच्चा पालने के लिए दूध उत्पादन करने की क्षमता प्रदान की है। उसमें से कुछ पशुओं को मनुष्य ने अपनी माँ का दूध छोड़ने के पश्चात् दूध प्राप्त करने के लिए पालना प्रारंभ कर दिया क्योंकि प्रकृति ने केवल दूध ही ऐसा पदार्थ बनाया है जिसमें भोजन के सभी छ: तत्व-कार्बाहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा (फैट), खनिज लवण, विटामिन्स तथा जल संतुलित मात्रा में विद्यमान है। अन्य कोई प्राकृतिक उत्पाद ऐसा नहीं है जिसमें ये सभी तत्व संतुलित मात्रा में उपलब्ध हो। इसलिए मनुष्य ने गाय, भैंस, बकरी का पालन-पोषण प्रारंभ किया।
शक्तिधारा दूध बनाने वाली ग्रन्थियों के विकास में सहायक है। दूध बनाने वाली ग्रन्थियों का विकास गर्भित पशु के गर्भकाल के अन्तिम चरण में ब्याने से १५-२० दिन पूर्व होना प्रारंभ होता है। यह गर्भकाल गाय का २८१ दिन, भैंस का ३१० दिन, बकरी का १५० दिन सामान्यत: होता है। यह गर्भकाल पशु की नस्ल, उसका रख-रखाव (प्रबंधन) पौष्टिक आहार इत्यादि कारणों से ५ से १० दिन कम या अधिक भी हो जाता है। किन्तु इस गर्भकाल के अन्तिम चरण यानि की ब्याने के १५-२० दिन पूर्व पशुपालक पशु का विशेष ध्यान रखना प्रारंभ करता है क्योंकि यही वह समय है जब दुग्ध उत्पादन करने वाली ग्रन्थियों का विकास होता है। इस समय में अयन (अडर) का जितना अधिक विकास होगा, उतना ही पशु के प्रसव के पश्चात् १५-२० दिन पूर्व ग्याभिन पशु को उक्त समय तक शक्तिधारा पिलाई अथवा खिलाई जाये तो दुग्ध उत्पादन इकाई (अयन-अडर-गादी-अवाज-कास-बावलु) का विकास सामान्य से अधिक होता है और जब ईकाई बड़ी या विकसित होती है तो उत्पादन जब भी प्रारंभ होता है, वह भी अधिक होता है। अत: प्रसव उपरान्त पशु अधिक दुग्ध उत्पादन करता है। शक्तिधारा बड़े पशु (गाय-भैंस को) १०० से २०० मि.ली. प्रतिदिन प्रसव से पूर्व १५-२० दिन तक पिलाना चाहिए तथा छोटे पशु (बकरी-भेड़) को प्रसव से पूर्व १०-१५ दिन तक ३०-५० मि.ली. प्रतिदिन देना चाहिए। इससे अयन-अडर का समुचित विकास होगा और प्रसव पश्चात् दुग्ध उत्पादन के भी उत्साहजनक परिणाम प्राप्त होंगे। वैसे तो दूध उत्पादन को कई कारक प्रभावित करते हंै, जैसे-पशु की नस्ल, उसकी वंशावली (Pedigree), रख-रखाव/ प्रबंधन, पोषण, पशु का स्वास्थ्य इत्यादि। किन्तु शक्तिधारा का उपयोग अगर समुचित मात्रा में समुचित समय तक किया जाए तो वह अपना असर पृथक रूप से अवश्य दिखाता है और पशु अपनी क्षमता के अनुसार अधिकतम दूध उत्पादन करता है।
दुग्ध उत्पादन के अतिरिक्त प्रसव से पूर्व अगर १५-२० दिन तक समुचित मात्रा में पशु को शक्तिधारा पिलाया या खिलाया जाए तो पशु के प्रसव की प्रक्रिया भी आसान हो जाती है। प्रसव के समय नवजात बच्चे को गर्भाशय एवं बर्थ केनाल से बाहर निकालने के लिए पशु को बहुत शक्ति लगानी पड़ती है। प्रसव प्रक्रिया में गर्भाशय एवं (बर्थ केनाल) जननमार्ग की मांसपेशियों में संकुचन और फैलाव होता है और नवजात धीरे-धीरे बाहर की तरफ आता रहता है। जब पशु निर्बल होता है अथवा शक्ति लगाकर थक जाता है तो मांसपेशियों की यह संकुचन और ढीलापन की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इस प्रक्रिया को यूटेराइन इर्न्सिया कहते हैं और इसके फलस्वरूप सामान्य प्रसव नहीं होता है और मनुष्य को हस्तक्षेप कर नवजात को खींचकर बाहर निकालना पड़ता है। अगर शक्तिधारा की समुचित खुराक समुचित समय तक प्रसव से पहले दे दी जाये तो यह स्थिति टाली जा सकती है और प्रसव इतना पीड़ादायक नहीं होकर सामान्य प्रसव संभव हो सकता है। पीड़ादायक अथवा सामान्य प्रसव के पश्चात् भी तनाव (स्ट्रेस) में आ जाता है। उसमें ऋणात्मक शक्ति (नेगेटिव एनर्जी) हो जाती है। इसके अतिरिक्त नाल/जैर/प्लेसेंटा को बाहर निकालने के लिए भी पशु को बहुत शक्ति की आवश्यकता होती है। अत: प्रसव के पूर्व, प्रसव के समय अथवा प्रसव के पश्चात् भी शक्तिधारा पशु को खिलाने का उत्साहजनक लाभ होता है।
वैसे तो कोई भी पशु नर या मादा गर्मी/सर्दी/बुखार/व्याधि के कारण तनाव (स्टे्रस) में आता है तो उसको शक्तिधारा का सेवन करवाना बहुत लाभप्रद होता है। शक्तिधारा पशु को तनावमुक्त करने में बहुत सहायक है पशुओं में विषाणु (वायरल), जीवाणु (बैक्टीरियल), दुर्घटना इत्यादि किसी भी व्याधि के उपरान्त हुई निर्बलता से छुटकारा पाने और इससे हुई दुग्ध उत्पादन में कमी की पूूर्ति करने में शक्तिधारा बहुत उपयोगी पशु-पूरक आहार (फीड सप्लीमेंट) है।
नर पशुओं में शक्तिधारा शक्तिवर्धक, बलवर्धक (लिबीडो वृद्धि) करने में बहुत उपयोगी है यह नर पशुओं में प्रजनन शक्ति बढ़ाता है और वीर्य की गुणवत्ता बढ़ाता है। इस प्रकार शक्तिधारा सभी प्रकार के पशुओं में किसी भी प्रकार की निर्बलता को दूर कर शक्ति (एनर्जी) प्रदान करता है। यह पतंजलि ग्रामोद्योग न्यास का अनुपम उपहार है। इसे १ लीटर प्लास्टिक बोतल में उपलब्ध कराया गया है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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