काम-क्रोधादि हमारी मिथ्या धारणा

काम-क्रोधादि  हमारी मिथ्या धारणा

आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज

     (कामात्क्रोधोऽभिजायते) काम पूरा हो जाए तो लोभ में परिवर्तित हो जाता है, 'और-औरÓ की टेक लगाना शुरु कर देता है और यदि पूरा न हो तो क्रोध का रूप धारण कर लेता है। काम के ये दो ही परिणाम हैं, जिन्हें सत्य दृष्टि प्राप्त नहीं है वे काम से उत्पन्न लोभ के सागर में डूब जाते हैं या फिर उनके मार्ग में कोई आन्तरिक या बाह्य बाधा उपस्थित हो जाए तो क्रोध की पराकाष्ठा, आत्महत्या जैसा क्रूर-निर्दय-निर्मम-मूर्खतापूर्ण कृत्य करने पर उतारू हो जाते हैं। इस विशाल विश्व में प्रतिदिन हजारों की संख्या में ये घटनायें घट रही हैं।
महाभारत में कहा है-
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम्।
ऊर्ध्वरेता भवेद् यस्तु स देवो न तु मानुष:।।
'तप नाम से अभिप्रेत वस्तु ब्रह्मचर्य ही है। इसके अतिरिक्त तप का और क्या रूप हो सकता है? ऊर्ध्वरेता कोई मनुष्य नहीं बल्कि साक्षात् देवता ही है, लाखों में मुश्किल से कोई एक आदमी ऐसा होगा जो अपनी प्रेम-पात्र स्त्री को पाने के लिए अपने सब आदर्शों, अपनी उच्चतम दृष्टि और उस प्रत्येक वस्तु को, जो उसके लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करती है त्याग न दे| इंजील में कहा गया है- ''यदि व्यक्ति संसार पर विजय पाना चाहता है तो स्वैच्छिक मितव्ययी व्रत को धारण करे, शरीर पर विजय के लिए ब्रह्मचर्य तथा शैतान को जीतने के लिए आज्ञापालन को स्वीकार करे।
काम के इस भयावह रूप को बल्कि काम ही नहीं उसके सभी साथी गण क्रोध-लोभ-मोह-अहङ्कार-ईर्ष्या- द्वेषादि सब के सब, इस समस्त त्रिलोकी को हिला देने वाले, कँपा देने वाले, झकझोर देेने वाले रूप को, किसी को भी न बख्शने वाले प्रचण्ड रूप को हमने निकट से देखने-समझने का प्रयास किया। पर पाठकों को महान् आश्चर्य होगा, श्री महाराज का इस विषय में अलग ही दृष्टिकोण है। होना भी यही चाहिए। घटना एक है, पर देखने वाले अपनी-अपनी दृष्टि से उसे देख रहे हैं। अनन्त की ओर आरोहण करते हुए प्रत्येक यात्री के देश और काल का बिन्दु पृथक् होने से घटना का पृथक् दिखाई देना स्वाभाविक ही है। कोई एक व्यक्ति घटना से हजारों मील दूर है, कोई अत्यन्त पास खड़ा है, कोई उसे पार कर इतना आगे निकल गया है कि पीछे छूटी हुई घटना सर्वथा अदृश्य हो गयी, कोई उससे इतनी दूर खड़ा है कि अभी उसका धुँधला चित्र भी नहीं बन पा रहा। सो इस प्रकार सब द्रष्टाओं के दर्शन पृथक् ही होते हैं। जो शिखर पर पहुँच गया है उसका, और जो अभी पर्वत की उपत्यका के भी समीप नहीं पहुँच पाया है, उन दोनों का एक ही दर्शन कैसे हो सकता है? स्त्री रूपी घटना एक ही है, उसके पति को वह सुखकर, समाँ को दु:खकर, तीसरे उस व्यक्ति को जो उसे नहीं प्राप्त कर सकता है, उसके लिए मोहकर, जबकि तत्त्व ज्ञानी को न सुखकर, न दु:खकर, न मोहकर ही प्रतीत होती है।
तत्त्वज्ञानियों में भी एक उसको माता के रूप में देखता है जैसे कि हमारे श्री महाराज प्रकृति माँ के ही प्रतीक रूप में देखते हैं, जो कि मनुष्य रूप में गुह्य ब्रह्म को जन्म देने वाली जगज्जननी है। दूसरे को केवल हाड़-मांस का एक विशिष्ट ढाँचा मात्र परमाणुओं का पुंज दिखाई देता है। सो काम-क्रोधादि के विषय में महाराज की दृष्टि यह नहीं है कि ये प्रचण्ड वेगवती शक्तियाँ हमारे विरोध में खड़ी होकर हमारे रास्ते को रोक रही हैं, बल्कि उनका कहना है कि उन शक्तियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शक्ति की कल्पना तो तभी होगी जब पहले 'है कहकर स्वीकृति दी जाए। महाराज के दर्शन के अनुसार जिन चीजों का निराकरण हो जाए उनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। समस्त निषेध वर्ग का यही स्वरूप है। जैसे अन्धकार कहने के लिए है, पर वस्तुत: वह है ही नहीं, क्योंकि प्रकाश के द्वारा वह निराकृत हो जाता है। दूसरी ओर प्रकाश का कभी निराकरण नहीं किया जा सकता, केवल किसी चीज के बीच में आने से
अन्धकार प्रतीत होने लगता है, पर प्रकाश तो उस अवस्था में भी बना रहता है। जबकि सब गन्दगी, कूड़ा-करकट भी अन्तत: हटा दिया जाता है, इस प्रकार स्वच्छता स्वत: सिद्ध है, केवल गन्दगी से ढक मात्र जाती है।
यदि कोई व्यक्ति निम्न प्रकृति, भोग, अज्ञान की स्थिति में खड़ा हो तो उसे शनै:-शनै: निम्न प्रकृति से उच्च प्रकृति में, भोग से अपवर्ग में, अज्ञान से ज्ञान में, असत्य से सत्य में, मृत्यु से अमृत में आरोहण करने के लिए कृत संकल्प होना होगा। सचेतन रूप से अपने अन्दर यह इच्छा जागृत करनी होगी कि अब तुझे यह खण्डित-खण्डित होकर प्राप्त होने वाला विषय-रस नहीं चाहिए जो परिणाम में सदा विषाद को ले आता है। यह इच्छा जितनी बलवती होगी उतना ही अज्ञान, असत्य या भोगमय जीवन (जिसके कि काम-क्रोधादि विविध रूप हैं) को अस्वीकार करने में सरलता व सहजता होती जाएगी। जैसे अन्धकार को हटाने के लिए प्रकाश अविनाभावी है, उसी प्रकार काम-क्रोधादि रूप अज्ञानमय जीवन को त्यागने के लिए ज्ञान रूप साधना की अत्यन्त आवश्यकता है। उसके बिना और कोई उपाय नहीं है।
पर केवल ब्रह्मचर्य की प्रशंसा सुनने मात्र से ब्रह्मचर्य में स्थिति कभी नहीं हो सकती, जब तक अब्रह्मचर्य के दु:खों व कष्टों को व्यक्ति स्वयं अनुभव न कर ले। प्राचीन शब्दावली में इसको अभ्यास व वैराग्य का नाम दिया गया है। विषयों को महादु:खदायी समझकर उधर से सदा के लिए मुख मोड़ लेने का नाम वैराग्य है। पर दु:ख दर्शन से ही वैराग्य का जन्म होता है। जैसे व्यक्ति को जब पता चल जाता है कि यह काला सर्प है, तो वहाँ से सहज ही तत्क्षण हट जाता है, उसी प्रकार विषयों का यथार्थ स्वरूप जब व्यक्ति के मन में स्पष्ट हो जाता है, तो उससे हटने के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि सजगता काम देती है।
महाराज का कहना है कि ब्रह्मचर्य-सिद्धि के लिए इस बेहोशी को हटाने की आवश्यकता है। किसी उपाय से बेहोशी टूटे और जब वह टूट जाए तो अब आगे के लिए व्यक्ति पूर्ण सजग हो जाए, पुन: उसी स्वप्न लोक में या बेहोशी या प्रमाद की अवस्था में न जाए तो स्पष्ट है कि फिर इस विकार रूपी मगर से व्यक्ति का बचाव हो सकता है। प्रारम्भिक अवस्था में संघर्ष से यत् किञ्चित् थोड़ा-बहुत सहयोग मिलने की सम्भावना तो है, पर वह केवल मूर्छा के टूटने पर ही सम्भव है। जो विषयों के प्रहार से मूर्छित होकर पड़ा हुआ है, उस अवस्था में तो संघर्ष की कल्पना ही नहीं की जा सकती। अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति का प्रयोग करना ही तो संघर्ष का रूप है, पर जब तक व्यक्ति को विषयों में रस दिखाई दे रहा है तो उसके विरोध में इच्छा-शक्ति कहाँ से जुटायी जाए?
क्योंकि इस दयनीय व पराधीन अवस्था को प्राप्त व्यक्ति अपने समस्त उत्साह को खो बैठता है। इच्छा-शक्ति, उत्साह, जीवन की मूल्यता इन सबका एक-दूसरे के साथ आश्रय-आश्रयि भाव सम्बन्ध होता है। अन्त में मूल बात यहीं आकर टिकती है कि उपाय चाहे जो अपनाया जाए-किसी महापुरुष की वाणी, कोई शास्त्र वचन, विषयों के सम्बन्ध में अपने ही अनुभव से प्राप्त यथार्थ दृष्टि, दु:ख-दर्शन, दिव्य प्रेम, निर्मल ज्ञान, विशुद्ध भक्ति जैसे भागवत तत्त्वों को प्राप्त करने की अभङ्ग अभीप्सा, पर किसी भी उपाय से मन की मूर्छा या बेहोशी को तोड़ा जाए। शनै:-शनै: व्यक्ति को ज्ञान की वह दृढ़ आधार-भित्ति प्राप्त होगी, जिसके लिए महाराज कहते हैं कि काम-क्रोधादि हैं ही नहीं। हमारी मिथ्या मान्यता का ही ये लाभ उठा रहे हैं। बस उसे ही हटा लेना है। व्यक्ति के द्वारा इस समस्त निषेधवर्ग के प्रति उदासीनता धारण करते ही ये काम-क्रोधादि उसी प्रकार से अव्यक्त में चले जायेंगे, जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार।
तो क्यों न हम योग-प्राणायाम, आयुर्वेद अपनायें व इन मिथ्या धारणाओं से मुक्ति का अभ्यास करें।

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