श्रद्धेय स्वामी जी महाराज व पूज्य आचार्य श्री के प्रवचनों से चुने हुए कुछ वाक्य पुष्प

श्रद्धेय स्वामी जी महाराज व पूज्य आचार्य श्री के प्रवचनों से चुने हुए कुछ वाक्य पुष्प

डॉ. सुमन, मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी , पतंजलि योग समिति

पंचव्रत:
1.   मैं व्रत लेता हूँ कि अपने संकल्प में विकल्प नहीं आने दूंगा। तथा अपने पुरुषार्थ में लेशमात्र भी न्यूनता नहीं आने दूंगा। योग आयुर्वेद, स्वदेशी एवं वैदिक संस्कृति के प्रति पूर्ण समर्पित रहूँगा।
2. मैं भागवत सत्ता व गुरुसत्ता का प्रतिनिधि/ प्रतिरूप/ मूर्त्तरूप होकर दिव्य जीवन जीऊँगी/ जीऊँगा।
3.  मैं वेदाज्ञा, शास्त्रज्ञा, गुरवाज्ञा व आत्माज्ञा का एक बार भी अनादर नहीं करुँगा, सत्य सनातन आर्य वैदिक हिन्दू संस्कृति के प्रति पूर्णदृढ़ता निष्ठा/ कट्टरता रखूंगा तथा सबके प्रति उदारता रखूंगा।
4.  गुरु के व संगठन के साथ कभी भी विश्वासघात नहीं करुंगी।
5.  मैं स्वयं योगव्रती, स्वदेशीव्रती बनकर एवं औरों को बनाकर अपने जीवन को दिव्य जीवन बनाऊँगा।
प्रभात संकल्प:
1.  मैं गुरु सत्ता व भागवत सत्ता एवं ईश्वरीय न्याय में अपनी निष्ठा अखण्ड रखूंगा। मैं गुरु सत्ता व शाश्वत के एक आदर्श प्रतिनिधि के अनुरूप ही अपना सम्पूर्ण व्यवहार व आचरण करूँगा। मैं 24 घंटा ब्रह्मभाव में रहूँगा, मैं सब सम्बन्धों में ब्रह्म सम्बन्ध, सब रूपों में ब्रह्मरूप तथा सब सुखों में ब्रह्मसुख का अनुभव करूँगा 'ईशावास्यमिदं सर्वम्, 'वासुदेव: सर्वम्’ 'सियाराम मय सब जग जानी
2.   मैं अपने जीवन व मन में एक क्षण के लिए भी अज्ञान, अपवित्रता आलस्य व अविश्वास (निराशा) को स्थान नहीं दूँगा। क्योंकि जीवन में दु:ख, दरिद्रता, अशान्ति व दुर्गति के ये ही कारण हैं। 'परोऽपेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि'अहमिन्द्रो न पराजिग्ये’, 'कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहित:
3. मैं व्यक्ति व समष्टि में अर्थात व्यक्ति व व्यवस्था में भगवत्ता अर्थात् भगवान् का साम्राज्य व ईश्वरीय न्याय व्यवस्था को प्रतिष्ठापित करने हेतु संकल्पित रहँगा। सैल्फ रियलाइजेशन एवं कलैक्टिव रियलाइजेशन की साधना के सिद्धान्त में पूर्ण आस्था रखूँगा। इन्द्रं वर्धनोऽप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नतो6राव्ण:।
4. अपने पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं एवं वीर वीराङ्गनाओं को आदर्श मानते हुए मेरा यह दृढ़ विश्वास हैं, कि जीवन पर पहला अधिकार भगवान् का है, दूसरा मातृभूमि का तथा तीसरा माता-पिता व गुरु का तथा अन्त में मेरा स्वयं का हैं। अत: हर पल आत्मा में परमात्मा की जो प्रेरणा, पुकार आदेश उठता है उसी के अनुरूप मैं आचरण करूँगा। अपने पूर्वजों की तरह जीवन जीऊँगा।
5.  योग, आयुर्वेद, स्वदेशी, शिक्षा व संस्कारों के द्वारा, निष्काम सेवा से मैं अपने जीवन व जगत् को पुण्यों से प्रकाशित करुँगा। प्रभात संकल्प के बाद प्राणों के साथ प्रणव का ध्यान करते हुए ध्यान योग से मैं दिव्य जीवन की साधना करुँगा।
प्रार्थना:
6.  हे प्रभो! तेरे अनुग्रह से मेरा शरीर स्वस्थ, मन संयमी, बुद्धि विवेकवती, हृदय प्रेम से भरा हुआ तथा अहं अभिमान शून्य हो।
7. हे सर्वव्यापक, सर्वरक्षक, सच्चिदानंदस्वरूप, आनन्दमय, ज्योर्तिमय भगवान्! आप अन्तर्यामी को हम हर पल अपने हृदय में अनुभव करें। शुद्धज्ञान, शुद्धकर्म एवं शुद्ध उपासना के द्वारा सदा आपकी शरणागति में रहें।
8.  हे करूणामय पिता! हमको पूर्ण विश्वास है कि हमें निमित्त बनाकर तुम ही सर्वत्र प्रकट हो रहे हो। सभी शक्तियों, सम्पूर्ण ऐश्वर्य सभी स्वरूपों, सभी सम्बन्धों तथा सभी सुखों के मूल में हे प्रभो, तेरी ही अनन्त महिमा को अनुभव करें। हे दयालु पिता! हम तेरी संतानें तेरे अनुग्रह से, तेरे प्रसाद से, तेरे प्रभाव से व तेरे प्रकाश से सदा प्रकाशित होकर तेेरे महत् तेज, दिव्य ज्ञान, कर्म व भक्ति से युक्त रहें। हे प्रभो! हमारी समस्त अपूर्णताओं, क्षुद्रताओं, दुर्बलताओं, क्लेशों, वासनाओं एवं अज्ञान का विनाशकर सदा अपनी शरणागति में हमें रखना।
9.  हे जगज्जननि जगदम्बे! हम तेरी संताने इस भारत माता व धरती माता पर फैले समस्त दु:खों, अज्ञान, अभाव, अन्याय व अधर्म का विनाश कर, सर्वत्र तेरा वैभव, न्याय व धर्म की प्रतिष्ठा करके अन्त में सदा-सदा के लिए तेरे अखण्ड, नित्य व शाश्वत आनन्द को प्राप्त करें। हे मात: इस बार का ये जन्म व जीवन अभ्युदय व नि:श्रेयस को पूर्ण रूप से सिद्ध करने वाला हो जिससे बार-बार होने वाले जन्म-मरण के प्रवाह से मुक्त होकर सदा तुझसे युक्त हो जाएं।
10.  हे प्राणेश्वर! प्राणों के साथ तुझ प्रणव, ओंकार की उपासना करते हुए योगबल से हम तेरे दिव्य ज्ञान, दिव्य दृष्टि, दिव्य भाव, श्रद्धा भक्ति व दिव्य कर्म की शक्ति से युक्त होकर दिव्य जीवन जीएं। तरे यन्त्र बनकर तेरा ही काम करके जीवन व जगत् में तेरा ही सत्य साम्राज्य स्थापित करके समस्त अज्ञान, अन्याय व अभाव को दूर करके  सर्वत्र भगवत्ता को प्रतिष्ठित करके अन्त में तेरे आनन्दधाम में पहुंचे।
  इस प्रकार प्रभात संकल्प व ध्यान योग से पूर्ण जागृत आत्माएँ तैयार होंगी और उनके माध्यम से धरती पर स्वयं ईश्वरीय शक्ति काम करेंगी, मनुष्य अपनी सभी अपूर्णताओं से मुक्त होगा, सर्वत्र भगवत्ता प्रतिष्ठापित होगी, संसार स्वर्ग बनेगा, सब अज्ञान, अभाव, अन्याय, दु:ख, दरिद्रता व अधर्म से मुक्त जीवन जीएंगे, यही हमारे जीवन का योग व लक्ष्य है।
11.   योग क्या है? एकाग्रता, प्रसन्नता व पवित्रता पूर्वक पूर्ण पुरुषार्थ के साथ अभ्युदय व नि:श्रेयस को सिद्ध करके अकाम, निष्काम, आप्तकाम या अकाम होकर दिव्य जीवन जीना ही योग है।
12.  दूसरे शब्दों में योग का अर्थ चित्त की दग्धबीज या निर्बीज अवस्था को प्राप्त करना। अन्य शब्दों में योग का अर्थ- हम भागवत के या शाश्वत के प्रतिनिधि बन जाते हैं अथवा हमारे माध्यम से भगवान् काम करने लग जायें और हम उनके यन्त्र बन जायें।
13.  योग के आध्यात्मिक लाभ- दिव्य जीवन की प्राप्ति। दिव्य जीवन क्या है?
                (क) आत्मा में परमात्मा की दिव्य प्रेरणा
                (ख) मस्तिष्क में परमात्मा का दिव्य ज्ञान
                (ग) हृदय में परमात्मा की दिव्य संवेदनाएं
                (घ) सम्पूर्ण शरीर में परमात्मा की दिव्य सामर्थ्य
                (घ) जीवन में भगवान् का दिव्य ऐश्वर्य
                (च) जीवन में भगवान् का दिव्य सुख
                (छ) जीवन में भगवान् की दिव्य शान्ति। योग के आध्यात्मिक लाभ हैं।
14.   योग के शारीरिक या भौतिक लाभ-
क.  सर्व संतुलन- सभी प्रकार के कैमिकल्स का, दोषों का (वात, पित्त व कफ), आहार का (सात्विक आहार), विचारों का (दिव्य उच्च विचार) व हरमोन्स का सन्तुलन एक-एक शैल्स से लेकर पूरे सिस्टम का संतुलन योग से होता है। यह योग का भौतिक लाभ है।
ख.  सुप्तज्ञान, शक्ति या सामर्थ्य का जागरण तथा डिजनरेट हुए शैल्स रिजनरेट होते हैं यह भी योग का भौतिक लाभ है।
ग. भौतिक स्थूल शरीर के एक-एक शैल में एक दिव्य आभा, बच्चे जैसा लावण्य, बल, पराक्रम में वृद्धि होना भी योग का भौतिक लाभ है।
15.  योग के साथ सत्संग, भजन, भक्ति, स्वदेशी का अभ्यास भी हमें करना है।
16.  समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है, हमें जो करना है उसे अविलम्ब कर लेना चाहिये, आज का दिन हमारे जीवन का सर्वोत्तम समय है अर्थात् वर्तमान का पूर्ण सदुपयोग हमें करना है।
17.  पेड़ के पत्ते और फूल दिखते है, उसके नीचे जो जड़े छिपी हैं जिनके आधार पर वह पेड़ टिका है, वे यदि मजबूत हैं तो बिना दिखे भी वे पेड़ के माध्यम से प्रतिबिम्बित (रिफलक्ट) होती ही हैं। हमारा तप, पुरुषार्थ दिखे या न दिखे हमारे जीवन, आचरण, व्यवहार के माध्यम से प्रतिबिम्बित होता ही है।
18.  साधनों की अधिकता से नहीं अपितु साधना की अधिकता से सुख मिलता है। योग मार्ग के पथिक के लिए साधना ही सम्पत्ति है।
19.  व्यक्ति को लगता है कि अब सुख या शान्ति मिलने ही वाली है, पर फिर भी कुछ-न-कुछ तो फासला (डिस्टैन्स) बना ही रहता है, इसलिए सुख यदि चाहिये तो इसी क्षण, वर्तमान क्षण में आनन्द उठा लीजिए, चाहे वह कैसी भी परिस्थति क्यों न हो। कितनी भी विषमताएं क्यों न हों। जो योगी प्रतिकूलताओं में भी प्रसन्न रह सकता है वही अन्तिम आनन्द को भी प्राप्त कर पाता है, और अभी नहीं तो कभी नहीं। इस क्षण के अतिरिक्त तो सुख की आशा लगाये बैठा रहना मन का एक भ्रम या छलावा है।
20.  हम सत्वगुण में रहते हैं तो खुद भी सुखी रहेंगे और दूसरों को भी सुख देगें। रजोगुण में रहेंगे तो खुद भी सुख-दु:ख से मिश्रित होगें और दूसरों को भी दोनों दे सकते हैं, किन्तु तमोगुण से युक्त हमारा व्यवहार निश्चित रूप से हमें भी कष्ट देगा और दूसरे को भी।
21.  दूसरों से आगे निकलना है तो सावधानी पूर्वक अत्यन्त पुरुषार्थ करके तेज दौड़ना पड़ेगा। हमें अपना तप, साधना, पुरुषार्थ अत्यन्त बढ़ाना होगा। यदि तेज दौड़ने में सावधानी नहीं रही तो गिर कर चोट भी खा सकते हैं।
22.   अत्यन्त पुरुषार्थ व अथक प्रयास करने वाले लोगों की गौरव गाथा से ग्रन्थ के ग्रन्थ भरे पड़े है पर उन महापुरुषों या ऋषियों के प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी कहलाने का हक हम तभी पा सकते हैं जब हम उतना तप और पुरुषार्थ करें।
23. कुछ विशेष पाने के लिए तुम्हें याचना नहीं पात्रता प्राप्त करनी होगी। तुम्हें आध्यात्मिक खजाने का वारिश होना है, तो उसके पात्र बनों। स्वयं माता-पिता भी अपनी सम्पत्ति का वारिश अपात्र सन्तान को नहीं बनाते हैं।
24.  जिन मूल्यों और आदर्शों की आप बात करते हैं, पहले सच्चाई से उन्हें अपने अन्दर उतार लेना फिर लोग तो खुद ही समझ जायेंगे। सूरज के उगने मात्र से अन्धकार तो स्वयं ही भाग जाता है।
25.  स्वयं के सुख के लिए जीने वाला व्यक्ति कभी दूसरों को सुख दे नहीं सकता और जो दूसरों के सुख के लिए जीयेगा, उसके सुखों की व्यवस्था भगवान् स्वयं करते हैं।
26.  हमें अच्छे दिखने का प्रयास कम और अच्छा बनने का प्रयास अधिक करना चाहिये क्योंकि कागज के फूल सुगन्ध रहित होते हैं।
27.  जब तुम्हारा अपना जीवन दिव्य व योगमय बनेगा तो उसकी गूँज बहुत दूर तक तुरन्त सुनाई देती हैं
28.  लाखों शब्दों की ध्वनि से कर्म की ध्वनि अधिक महान् होती है।
29.  योग करने का संकल्प लेकर जब योगिनी माँ इस धरती पर दिव्य सन्तानों को जन्म देगी तो अपंग बच्चे पैदा नहीं होंगे। 7 से 8 करोड़ बच्चे आज शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग हैं। इससे उनके माता-पिता व सम्बन्धी अत्यन्त परेशान होते हैं। अत: मनुष्य के दिव्य जीवन का प्रारम्भ योगिनी माँ के गर्म में आने से होता है।
30.  जिन बच्चों को गर्भ में ही योग के संस्कार मिल गए वो बच्चे जन्म से ही योग करने वाले व्रजांगी हनुमान जी जैसे बलवान बनेंगे। जो आज योगी शिशु है- वही कल योगी किशोर होगा, वही अच्छा युवा, अच्छा ग्रहस्थ, अच्छा वानप्रस्थ, अच्छा संन्यासी और दिव्य राष्ट्रवादी नागरिक बनेगा।
31.  आप कितनों को योगी बना पायेंगे यह सेकण्ड्री हैं आप ज्यादा को योग ना भी सिखा पाये तो कोई बात नहीं, आप स्वयं पूर्ण योगी बन गए तो आप अकेले ही श्रद्धेय स्वामी जी व पूज्य आचार्य श्री की भांति सैकड़ों, हजारों व लाखों लोगों जितना कार्य कर पायेंगे।
32. यदि मैने अपनी शक्ति और समय को छोटे-छोटे संघर्षों में खर्च कर दिया तो मेरा योगमार्ग में आगे बढ़ना अवरुद्ध हो जायेगा। असतो मा सद् गमय।
33.  जब दूसरे लोग आप पर मिथ्यारोप लगा रहे हैं, अपमान कर रहे हैं, सता रहे हैं, निन्दा करने में अपनी शक्ति लगा रहे हैं तब तुम उनका प्रत्युत्तर देने में, अपने आपको सही साबित करने के संघर्ष में अपनी ऊर्जा नष्ट न करके धीरे से अपने अन्दर खिसक जाओ, योग में आगे बढ़कर, कछुए की तरह अपने अंगों को बाहर से समेटकर योग का कवच पहनकर अपने अन्दर, अपने ही आनन्द में उतर जाइये, वहीं पर माँ भगवती सदियों से तुम्हारा इन्तजार कर रही हैं।
34. सेवा सामर्थ्यानुसार ही होती है, लेकिन सामर्थ्य को बढ़ाया भी जा सकता है। सेवा और साधना से ही सामर्थ्य बढ़ती है।
35.  क्रियासिद्धि सत्वे भवति महतां नोपकरणे। अर्थात् महापुरुषों की कार्यसिद्धि सत्व (सात्विक पुरुषार्थ, पराक्रम, भागवत कृपा व उत्साह) पर निर्भर होती है, उपकरणों (साधनों) पर नहीं।
36.  पंचभूत आहार विचार व व्यवहार शुद्ध हो तो हमारा यह शरीर 400 वर्ष तक काम कर सकता है।
37.  परा-अपरा विद्या- हमारा सभी प्रकार बौद्धिक शुद्ध ज्ञान अपरा विद्या है तथा शुद्ध ज्ञान के स्तर पर वैसा जीवन जीना प्रारम्भ कर दें और अशुद्ध ज्ञान से सर्वथा मुक्त हो जायें यह परा विद्या है।
38.  जिस प्रकार इन्द्रियों को सात्विक पाँच प्रकार के विषयों से (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द) मन को सात्विक विचारों से सुख मिलता है उसी प्रकार हमारे हृदय और हृदयस्थ आत्मा को परमात्मा की भक्ति और सान्निध्य से सुख विशेष मिलता है।
39.  सोने वाला कलियुग का रूप है, उठने के लिए अंगड़ाई लेने वाला द्वापर का रूप है, उठने वाला त्रेता का रूप और चलने वाला पुरुषार्थी तो साक्षात् सतयुग रूप होता है। सत युग के समान पुरुषार्थी में ही धर्म व पुण्यफल प्रतिष्ठित होते हैं।
40.   हे प्रभु! गलती होने पर डाँटने और दण्ड देने वाला भी तेरा ही रूप है और वह भी उतना ही करुणालु है जितना प्रेम करने वाला है। हे मेरे जीवन के आधार! सदा तेरी ही इच्छा।
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