“देवभूमि का सांस्कृतिक गौरव”
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डॉ. महावीर अग्रवाल प्रति-कुलपति-पतंजलि विश्वविद्यालय
पूर्व कुलपति- उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार
धन्य है, भारत की यह पुण्य धरा, जिसकी पावन गोद में जन्म लेने वाले श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतम, कणाद, कपिल, पतंजलि, आचार्य शंकर, महर्षि दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि विश्ववन्द्य महापुरुषों ने संपूर्ण विश्व को मानव धर्म और वैदिक संस्कृति का अमर सन्देश प्रदान किया। समग्र विश्व ने भारत को अपना गुरु माना। देवता भी यहाँ जन्म लेने के लिए लालायित रहे। विष्णु पुराण ने उद्घोषणा की-
‘गायन्ति देवा: किल गीत कानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पद् हेतुभूते, भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वाद्।।
भारत पुण्यभूमि है। इसके कण-कण में देवत्व का वास है। ऋषि-मुनियों के तप से शोधित, यज्ञ-धूम से विशोधित, सत्कर्मों से सुशोभित, वीरों के रक्त से अभिसिंचित, कृषकों और श्रमिकों के स्वेद-कणों से सुसिंचित इस पुण्यधरा की माटी की सुगन्ध समस्त मानवता को अपनी ओर आकृष्ट करती रही है।
यूं तो इस देश के प्रत्येक क्षेत्र का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक वैभव अनुपम है, तथापि देवभूमि उत्तराखण्ड का सांस्कृतिक गौरव इतना महान् है कि उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है।
भारत के महान् कवि, कविकुलगुरु कालिदास ने अपने अमर महाकाव्य कुमार संभव का शुभारम्भ करते हुए हिमालय की इस तपोभूमि को नमन करते हुए कहा था -
‘अस्त्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:।
पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य स्थित: पृथिव्यामिव मानदण्ड:।।
नगाधिराज हिमालय की महिमा अपरंपार है। न जाने कितने ऋषियों, योगियों ने इसकी गुफाओं में साधना कर ईश्वर का साक्षात्कार किया। चारों वेदों की मधुर ऋचायें यहीं पर गूंजी थी। महर्षि वेदव्यास ने इसी हिमालय की चोटियों पर बैठकर वेदों और पुराणों को लिपिबद्ध किया था। आयुर्वेद, दर्शन, ज्योतिष आदि के उत्तमोत्तम ग्रन्थों की रचना इसी हिम प्रदेश में हुई थी। भारत के गौरव माने जाने वाले हिमालय की महिमा वेदों में भी इस प्रकार वर्णित है-
‘यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहु:।
यस्येमे प्रदिशो यस्य बाहु कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
ऋग्वेद
हिमालय के शिखरों पर प्रभात वेला में विद्यमान हिम और उस हिम पर ऋग्वेद पडऩे वाली सूर्य रश्मियाँ, ऐसा प्रतीत होता है मानो हिमालय ने मुक्ता मण्डित मुकुट ही धारण कर रखा हो।
इसी प्रकार गोमुख और गंगोत्री से प्रवाहित होने वाली साठ हजार सगर पुत्रों को मोक्ष प्रदायिनी, भारत की जीवन रेखा के रूप में विख्यात, सकलकल्मषहारिणी, पुण्यसलिला भगवती भागीरथी तो मानो भारत माता के कण्ठ में शोभायमान मुक्ताहार ही है। हिमालय और गंगा की महिमा से हमारा समग्र साहित्य भरा पड़ा है। किसी संस्कृत कवि ने ठीक ही कहा है-
त्वत्तीरे वसतां त्वदम्बु पिबतां त्वद्धामसम्पष्यताम्।
त्वन्नामामृतसेविनां पदे-पदे यानेन संभ्राजताम्।
गंगे! ते विभवं सुराजितमहो भाग्येन दिव्यं महत्।।
इसी गंगा के तटों पर स्थित ऋषिकेश, हरिद्वार, देवप्रयाग आदि तीर्थस्थान भवसागर पार करने का मन्त्र बताने वाले पावन धाम है। तीर्थ नगरी हरिद्वार में प्रत्येक बारह वर्षों में पूर्ण कुम्भ तथा छ: वर्षों में अर्धकुम्भ का आयोजन हमारी सांस्कृतिक यात्रा का दिव्य, भव्य अनुष्ठान है, जिसमें कोटि-कोटि श्रद्धालु बिना निमन्त्रण के दौड़े चले आते हैं।
भारत पुण्यभूमि है। इसके कण-कण में देवत्व का वास है। ऋषि-मुनियों के तप से शोधित, यज्ञ-धूम से विशोधित, सत्कर्मों से सुशोभित, वीरों के रक्त से अभिसिंचित, कृषकों और श्रमिकों के स्वेद-कणों से सुसिंचित इस पुण्यधरा की माटी की सुगन्ध समस्त मानवता को अपनी ओर आकृष्ट करती रही है। |
जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य ने देश को एकता के सूत्र में बांधने के लिए जिन चार पीठों की स्थापना की थी उनमें से एक जहाँ समाधिस्थ होकर परब्रह्म का साक्षात्कार किया था वह भगवान् शिव का धाम केदारनाथ हम देशवासियों का परम आस्था केन्द्र है, मंदाकिनी के तटपर समुद्र तल से लगभग 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मन्दिर ‘‘शिव के धाम’ नाम से विश्वविख्यात है। भगवान् शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक इस महाधाम में गंगोत्री से लाये जल से महादेव का जलाभिषेक किया जाता है। अगस्त्य, वशिष्ठ, कपिल, गौतम, कश्यप, परशुराम, पराशर, व्यास और शुकदेव आदि ऋषियों का हिमालय से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। वशिष्ठ गुफा, व्यास गुफा, कण्वाश्रम, परशुराम मन्दिर इसके प्रमाण है। यह माना जाता है कि रावण वध के पश्चात् कुछ समय तक अयोध्या में राज्य संचालन कर श्रीराम और लक्ष्मण हिमालय चले गये थे। जनश्रुति है कि ऋषिकेश के जिस पुल से उन्होंने गंगा पार की उसका नाम ‘लक्ष्मण झूला’पड़ गया। अलकनंदा और भागीरथी के संगम ‘देवप्रयाग’में राम की स्मृति में प्रस्थापित प्रतिमा इसका प्रमाण है।
इसी देवभूमि के दूसरे परम पवित्र धाम ‘बद्रीनाथ’की महिमा शब्दों में अभिव्यक्त नहीं की जा सकती। अलकनन्दा नदी के दक्षिण तट पर 3133 मीटर की ऊँचाई पर नर और नारायण पर्वतों की गोद में ‘बद्रीवन’में स्थित श्री बद्रीनाथ धाम हिन्दुओं के सबसे पुराने तीर्थ स्थलों में एक है। 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा इस मन्दिर की स्थापना की गई थी। प्रत्येक हिन्दू की यह प्रबल इच्छा रहती है कि जीवन में कम-से-कम एक बार तो बद्रीकाश्रम के दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ करें।
इसी प्रकार मानसरोवार, यमुनोत्री, गंगोत्री, हेमकुण्ड साहिब आदि पवित्र तीर्थ स्थान भारतीय आस्था और श्रद्धा के प्रमुख केन्द्र हैं।
इक्कीसवीं सदी में इसी पावन नगरी में योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी एवं उन्हीं के अनुज परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्णजी ने संपूर्ण देश ही नहीं अपितु विश्व को जगाने, बचाने और कल्याण मार्ग पर अग्रसर होकर मानवजीवन को कृतार्थ करने के लिए हरिद्वारदिल्ली मार्ग पर पतंजलि योगपीठ की स्थापना की। |


