प्राणविद्या
प्राणा एवामृता आसु: शरीरं मर्त्यम् । (शतपथ ब्रा0 10.1.4.1)
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प्रो. साध्वी देवप्रिया
संकायाध्यक्षा- मानविकी एवं प्राच्य विद्या संकाय
पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
सृष्टि के आदिकाल से हमारे पूर्वज जिस योग से प्रज्ञावान, पूर्ण स्वस्थ समृद्ध व विश्व विजेता रहे, ऐसी सर्वोत्तम प्राणविद्या हमारे लिए आज भी उसी प्रकार पारसमणि के समान है जिस प्रकार यह सृष्टि के आदिकाल में थी।
1. प्राणिक ऊर्जा
पिण्ड और ब्रह्माण्ड मूर्त-अमूर्त ऊर्जाओं का एक सशक्त संघात है। भौतिक विज्ञान भी पदार्थ और ऊर्जा दो मूल घटकों को मानता है। पिण्ड की एक-एक कोशिका में तथा ब्रह्माण्ड के एक-एक अणु-परमाणु में प्रतिक्षण एक लाख से लेकर के 5 लाख तक रासायनिक गतिविधियाँ घटित होती हैं। जब प्राणायाम करते हैं तो समय के अनुपात में ये गतिविधियाँ 10 से 100 गुणा तक बढ़ जाती हैं और शरीर एक दिव्य ऊर्जा पिण्ड के रूप में रूपान्तरित हो जाता है। इसी को श्रीमद्भगवत्गीता में कहा है-
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगदुत्थिता।
यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।।
(भगवत्गीता- 11.12)
अत: प्राणायाम इस देह में अन्तर्निहित ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में उद्बुद्ध एवं रूपान्तरित करके मनुष्य को निरोगी बनाकर उसकी सामथ्र्य को अनन्त गुणा बढ़ा देता है। इसलिए शास्त्र में कहा-
न योगात् परम बलम्- (घेरण्ड संहिता)
इसी सिद्धान्त पर हमारे पूज्य गुरुदेव ने स्वयं पर और समष्टि के करोड़ों लोगों पर प्रयोग किया। इसमें साधारण रोगों से लेकर वात-पित्त कफ त्रिदोष एवं कैन्सर जैसे प्राणघातक रोगों से भी मुक्त किया है जिसके वैज्ञानिक प्रमाण पतंजलि संस्थान के पास है।
Rejuvenation का Secret है- ‘प्राण’। गलत आहार से शरीर की शक्तियों का तथा गलत विचार से मन की शक्तियों का ह्रास होता है। क्रोध-चिन्तादि के माध्यम से शरीर और मन विषैले बन जाते हैं उन्हें Detox करके अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को Healthy, Happy, Peaceful and auto-suggestions से युक्त बनाना यह प्राणायाम के द्वारा ही सम्भव है।
मूलत: वेदों में भी प्राणविद्या का वर्णन इस प्रकार है-
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रप:।
त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे। (ऋग्वेद-10.137.3)
प्राण भेषज है, अर्थात् ऑक्सीजन एक मेडिसिन है। यह औषधि ही नहीं यह विश्वभेषज पूर्ण चिकित्सा (complete medicine) है। यह ‘प्राण’ सृष्टि की समस्त दिव्यताओं का संवाहक है। प्राण एक समग्र चिकित्सा (holistic treatment) है, प्राण का आधार सम्पूर्ण आरोग्य है। भौतिक अर्थात् दैहिक परिवर्तनों के साथ-साथ प्राण के द्वारा शरीर में जो भावनात्मक परिवर्तन आते हैं उनका बहुत ही प्रामाणिक व वैज्ञानिक प्रमाण भी हमारी शास्त्र परम्परा में है।
ब्राह्मण ग्रन्थों और पुराणों में एक कथा प्रसंग आता है कि जीर्ण-शीर्ण च्यवन ऋषि को अश्विनी कुमारों ने फिर से युवा बना दिया। ये अश्विनी कुमार कोई और नहीं, बल्कि प्राण-अपान ही हैं। कठोपनिषद् में यमाचार्य ने नचिकेता को जो उपदेश दिया था वह प्राणविद्या ही है। प्राणायाम एक शाश्वत Divine Therapy है।
‘‘प्राणा एवामृता आसु: शरीरं मर्त्यम् ।।’’ (श.10.1.4.1)
अर्थात् प्राण के माध्यम से ही हम स्वयं को अजर-अमर बना सकते हैं। यह Vital Force ही है जो माँ के गर्भ से लेकर मरण पर्यन्त अहर्निश बिना विश्राम किये सतत अपना कार्य करती है। बृहदारण्यकोपनिषद् में विदेह जनक की सभा में विदग्ध शाकल्य ने याज्ञवल्क्य से देवों के बारे में प्रश्न पूछा तो उन्होंने क्रमश: 3003, 33,6,2 और 1 एक देव का निरुपण करते हुए प्राण को ही एक मुख्य देव बताया है।
‘‘कतम एको देव इति’’? प्राण इति।
स ब्रह्म तदित्याचक्षते। (बृहद- 303, 9.9)
प्राण ही प्रजापति रूप में सबके केन्द्रों में (हृदयों या गर्भ में) बैठा हुआ नाना रूप से प्रकट हो रहा है। प्रश्नोपनिषद् में पिप्लाद ऋषि प्राण की महिमा गाते हुए कहते हैं-
प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्।
मातेव पुत्रन् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न:।
(प्रश्नोपनिषद् 2.13)
अर्थात् त्रिलोकी में जो कुछ भी है वह सब प्राण के वशीभूत है। हे प्राण तुम माता के समान हमारी पुत्रवत् रक्षा करो, हमें श्री और प्रज्ञा का वरदान दो। इतनी महान् प्राणशक्ति का प्राकट्य प्राणायाम की प्रक्रिया से ही सम्भव है। अष्टाङ्गयोग सनातन धर्म की रीढ; की हड्डी के समान है। अष्टाङ्गयोग में चार बाह्य अंग हैं और तीन अन्तरङ्ग हैं और प्राण इन दोनों के बीच सेतु का काम करता है।
प्राणायाम हमारे स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार के रोग, शोक व दोषों का नाश करके हमें स्थूल और सूक्ष्म दिव्य एवं पवित्र शक्तियों से सम्पन्न बनाता है। महर्षि व्यास योग दर्शन 2-28 सूत्र का भाष्य करते हुए लिखते हैं-
‘‘योगाङ्गानुष्ठानमशुद्धेर्वियोगकारणम्’’ यथा यथा च क्षीयते
अशुद्धि: तथा तथा क्षयक्रमानुरोधिनी ज्ञानस्यापि दीप्तिर्विवर्धते।
(व्यासभाष्य 2.28)
लिङ्गपुराण
प्रसाद इति सम्प्रोक्त: स्वान्ते त्विह चतुष्टये।
(लिङ्गपुराण-1.8.55.60)
लिङ्गपुराण में प्रसाद नामक प्राणायाम-जन्य सिद्धि का स्वरूप अधिक विशद रूप से बताया गया है। वह इस प्रकार है-
प्राणोऽपान: समानश्च उदानो व्यान एव च।।61।
नाग: कूर्मस्तु कृकलो देवदत्तो धनञ्जय:।
एतेषां य: प्रसादस्तु मरुतामिति संस्मृत:।।62।।
प्रयाणं कुरुते तस्माद्वायु: प्राण इति स्मृत:।
अपानयत्यपानस्तु आहारादीन् क्रमेण च।।63।।
व्यानो व्यानामयत्यघौ व्याध्यादीनां प्रकोपक:।
उद्वेजयति मर्माणि उदानोऽयं प्रकीर्तित:।।64।।
समं नयति गात्रणि समान: पञ्च वायव:।
उद्गारे नाग आख्यात: कूर्म उन्मीलने तु स:।।65।।
कृकल: क्षुतकायैव देवदत्तो विजृम्भणे।
धनञ्जयो महाघोष: सर्वग: स मृतेऽपि हि।।66।।
इति यो दशवायूनां प्राणायामेन सिध्यति।
प्रसादोऽस्य तुरीया तु संज्ञा विप्राश्चतुष्टये।।67।।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते। (गीता-14.11)
प्राणदर्शक तालिका

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