गीता का ज्ञान पाने की अभीप्सा का स्वरूप क्या है?
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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
विषय, प्रयोजन और अधिकारी से वक्ता का संबंध क्या है? तो ये संबंध है कि जो ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, पाना चाहते हैं ज्ञान और उस ज्ञान के द्वारा बल प्राप्त कराना चाहते हैं, तो ये उनका प्राप्य हुआ। यह है अनुबंध चतुष्टय: विषय क्या है, प्रयोजन क्या है, अधिकारी कौन है और विषय, प्रयोजन तथा अधिकारी के साथ इस कार्य का, इस कर्म का संबंध क्या है? यह पहले जानना आवश्यक है।
इस विमर्श से मेरा संबंध क्या है? संबंध यह है कि मैं बहुत ही कम आयु से, पिछले जन्मों के संस्कार के कारण, श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करता रहा हूँ। बहुत कम आयु में पूरे 700 श्लोक कंठाग्र हो गए थे। फिर निरंतर जीवन में यथाशक्ति यथामति अपने धर्माचरण करते हुए, कर्तव्यों का पालन करते हुए, इस ज्ञान का मनन भी करता रहा हूँ। तथापि इस पर बोला या लिखा इसलिए नहीं कि मुझे सदा लगता था कि बोलना या लिखना उचित है या नहीं। क्योंकि एक से एक ज्ञानी एक से एक संत, एक से एक महान भक्त विद्यमान हैं। उनको सुनता रहता हूँ। हम सब उनको सुनें। श्रेष्ठ विद्वान है। परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, परम पूज्य स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज सहित बीसों परम पूज्य संत हैं। उन्हें पढ़े, सुनें।
लेकिन अब मुझे लगा कि कुछ चीजें ऐसी हैं कि जो बहुत अधिक ज्ञानी लोग नहीं हैं और बहुत अधिक सिद्ध भक्त भी नहीं है बल्कि जो अभी बीच में हैं, उनके लिए मैं कुछ उपयोगी बात बता सकता हूँ। यह छोटी सी सेवा है। छोटा सा अनुष्ठान है। छोटा सा कार्य है। कर रहे हैं। यह किसी भी तरह का दावा नहीं है कि मैं गीता का परम अधिकारी हूँ या गीता ज्ञान मुझ में सबसे अधिक है। बिल्कुल नहीं।
तो हम एक तरह से साथ साथ चर्चा और विमर्श करेंगे। थोड़ा अधिक समय इसमें लगाने के कारण, थोड़ा अधिक समय इसमें मनन करने के कारण, चिंतन करने के कारण, मैं पाठकों की सहायता कर सकता हूँ। इसलिए यह शृंखला शुरू की है, और अधिक ज्ञान जिसे चाहिए तो पूज्य स्वामी जी सहित एक से एक सिद्ध पुरुष हैं भारतवर्ष में जो गीता पर ज्ञान दे रहे हैं, उनके पास जाना चाहिए। हम आपको प्रेरणा दे सकें उनके पास जाने की, यही इसकी सार्थकता है। तो केवल ऐसे लोगों को जो अभी बहुत ही उच्च कोटि के भक्त नहीं है और उच्च कोटि के ज्ञानी भी नहीं है बल्कि थोड़ा सा हमारे जैसे हैं या हमसे अभी एक दो कक्षा नीचे हैं उनको गीता के विषय में जानकारी देने के लिए यह सारा प्रयास है। यही इस लेख का संबंध है विषय के साथ।
विश्व-मीमांसा, आत्म-मीमांसा, ब्रह्म-मीमांसा
इसमें दो तीन बातें हैं। विश्व ज्ञान, आत्म ज्ञान और ब्रह्म ज्ञान। तीनों को गीता में किस प्रकार प्रतिपादित किया गया है, इसके विषय में हम चर्चा करेंगे। जो एक पारंपरिक शैली होती है ना, कि शुरू से एक-एक श्लोक उठाए, फिर उनका अर्थ बताए। वह नहीं करेंगे। यदि आपको स्वयं गीता के अनुसार, श्लोक के अनुसार जानने की बहुत जिज्ञासा है, तो गीता का श्लोक कंठाग्र कर लेना चाहिए और जो लोग सुन रहे हैं उनसे मैं यह अनुरोध भी करूंगा कि बहुत कम आयु में अपने बच्चों को गीता जहां तक हो अगर बच्चा मेधावी है और उसकी स्मरण शक्ति अच्छी है तो उसे कंठाग्र करा देना चाहिए। इसके बहुत लाभ हैं। वो अर्थ नहीं जानेगा। जैसे अष्टाध्यायी हम रटते हैं तो शुरू में तो उसका अर्थ नहीं पता होता। गुरु मुख से सुनते हैं। बारंबार अभ्यास करते हैं। तब जाकर व्याकरण का ज्ञान होता है। मैं तो आज तक दावे से नहीं कह सकता कि मैं पूरा व्याकरण जानता हूँ क्योंकि विधिवत पर्याप्त समय नहीं लगाया। तो मैं तो सदा यहां तक कि जो ब्रह्मचारी हैं, उनसे पूछता हूँ भाई इस शब्द की धातु क्या है? इससे इसका बनना सिद्ध कैसे होगा? जरा बताइए। क्योंकि बहुत से नए-नए शब्द ऐसे आ जाते हैं, उतना समय नहीं लगाया है। लेकिन फिर भी रटना तो चाहिए। अष्टाध्यायी रटनी चाहिए, रुचि रखते हैं तो योग दर्शन के सारे सूत्र रट लेने चाहिए और कुछ नहीं करें तो भी गीता के 700 श्लोक रटना तो कोई कठिन नहीं है और इसके बहुत लाभ हैं। ऐसे बहुत से मित्र हैं जो मेरे जैसी परिपक्व आयु का हो जाने के बाद मेरे संपर्क में आए और क्योंकि राष्ट्र भक्ति मेरी सबसे प्रबल वासना थी, आकांक्षा थी, तो मैं अपनी समझ से देश के विषय में ज्यादा सोचता, पढ़ता व लिखता रहा : इतिहास और राजनीति शास्त्र आदि ही ज्यादा पढ़ता लिखता रहा। तो कइयों ने कहा कि भाई, आप तो कभी इसे पढ़ते नहीं दिखते। गीता आपने तो नहीं पढ़ी। ऐसे बहुत से लोग हैं जो कहते हैं आप तो 25 वर्षों में गीता और उपनिषद् पढ़ते नहीं दिखते। लेकिन जब आप बोलते हैं तो आप श्लोक बोलते हैं, मंत्र बोलते हैं तो यह कहां से आया? तो वही बचपन में जो अच्छे से स्मरण कर लिया था बारंबार, उससे आया। इसलिए 700 श्लोक रट लेना कोई कठिन चीज नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति को उसे रट लेना चाहिए। कम से कम अपने बच्चों को किशोरावस्था में ही रटा देना चाहिए। मुझे भी 11 वर्ष की उम्र तक सब कुछ रट गया था अष्टाध्यायी और गीता के 700 श्लोक भी। ऐसा करना चाहिए। अगर नहीं किया तो भी इस चर्चा में आप अवश्य शामिल हो सकते हैं। पर रटा देने से बहुत लाभ होता है इसलिए बहुत से लोग पहले रटते ही थे।
अब तो शायद वैसा नहीं है, नहीं तो पहले आसपास यह परिवेश व्याप्त रहता था कि अरे ये गीता पढ़ेगा तो संन्यासी हो जाएगा। मेरे माता-पिता भी बहुत भयभीत रहते थे क्योंकि पिताजी और माताजी रामचरित मानस तो बहुत पढ़ते थे, गाते भी थे लेकिन गीता उन्होंने नहीं पढ़ा था। केवल सुनते थे। कभी-कभी तो उनको भी ये भय हुआ। मोहल्ले वालों ने भी कहा कि ये तो संन्यासी हो जाएगा। लेकिन भाग्य की बात है कि उन्होंने रोका नहीं और फिर मैं सन्यासी हुआ भी नहीं। वैसे ये मत समझिए कि असर नहीं होता। गीता का असर होता है और एक समय मेरे मन में संन्यास की प्रचंड आकांक्षा भी जगी थी। दीक्षा की तिथि भी तय हो गई थी। परंतु फिर एक सिद्ध पुरुष मिले और उन्होंने कहा कि अभी तुम में रजोगुण भी है और उन्होंने मेरे मस्तक को देखते हुए कहा कि अभी तुम में तो गृहस्थ होने के लक्षण हैं। अभी तुम आगे चलके गृहस्थ होने वाले हो। तब मेरी बहुत कम आयु थी तो उन्होंने कहा कि तुम तो गृहस्थ जीवन जियोगे। उसके बाद फिर भले चाहो तो संन्यास ले लेना या नहीं लेना। संन्यासी जैसे ही रहोगे। लेकिन पहले एक बार तुम्हें गृहस्थ जीवन में जाना होगा। तो क्योंकि मैं उनके प्रति बहुत श्रद्धा रखता था, मैं मान गया। तो दीक्षा की तिथि तय होकर भी फिर मैंने संन्यास नहीं लिया और उनकी बात सही सिद्ध हुई। पर संन्यास कोई ऐसी निंदनीय बात भी नहीं है कि अगर आपका बच्चा गीता पढक़र कम आयु में संन्यास ले लेता है, तो वह शुभ ही होगा। ‘धन्य जन्म जगती तल तासू’ जो भगवान राम के द्वारा प्रतिपादित धर्म का अनुयाई हो, उसका जीवन तो धन्य है ना। और यह भी कहा है:- ‘धन्य जन्म जगती तल सोई। रघुपति भगत जासु सुत होई।’ जिसका पुत्र भगवान श्री राम और भगवान कृष्ण का भक्त हो, गीता पढऩे लगे, रामायण पढऩे लगे, उसी में खो जाए, तो ना केवल उस बच्चे का जीवन धन्य है बल्कि उसके माता-पिता का भी जीवन धन्य है। तो डरिए नहीं।
वैसे लाखों में एकाध ऐसे होते हैं जो केवल इस तरह से पढ़ के संन्यासी हो जाएँ। गीता का महत्व इसलिए भी है कि वह सभी शास्त्रों का सार है। सभी शास्त्रों का अध्ययन करना केवल उनके लिए है, जिनके जीवन में संस्कार हैं, परिवेश है और प्रेरणा है। लेकिन सनातन धर्म के प्रत्येक अनुयाई को उनको सार रूप में अगर जानना है जो कि जानना ही चाहिए, तो गीता अवश्य पढऩी चाहिए। तो इसलिए हम सबको गीता का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए और फिर इसके बाद उसको पढ़ लेने से या उसका सामान्य अर्थ जान लेने से नहीं होता, बारंबार गुरु मुख से अथवा विद्वानों के मुख से, अनेक संतो महात्माओं के मुख से उसको सुनकर उसका मनन करना चाहिए। तब वह धीरे-धीरे दृढ़ होता है। इसमें समय क्यों लगता है? हम कोई भी चीज सुन लें, फिर उसमें चित्त स्थिर क्यों नहीं रहता? इसका भी उत्तर गीता में ही है। अभी आज केवल भूमिका रूप में एक बात बता देते हैं कि सामान्यत: अर्जुन जो शंकाएं उठाता है, क्या होगा, सब मर जाएंगे और फिर तो कुल प्रदूषित हो जाएगा और हम सब नरक में जाएंगे और हमें कितना कलंक लगेगा -
अहो वत् महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद् राज्यसुख-लोभेन हन्तुं स्वजनं उद्यता:।। (1/45)
जितनी जितनी शंकाएं उठाता है अर्जुन, सबका भगवान खंडन कर देते हैं। खंडन तो शुरू से ही करते हैं - ‘अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।’ (2/11)
‘अरे तू क्या पंडिताई झाड़ रहा है, प्रज्ञावाद झाड़ रहा है और जबकि तू ऐसी बातों के लिए सोच कर रहा है, चिंतन और चिंता कर रहा है जो सोचने के योग्य ही नहीं है। तो तू मूर्ख है। एक तरह से कह दिया। या कह दिया: ‘क्लैव्यं मास्म गम: पार्थ’ - अरे पार्थ क्लैव्य को मत प्राप्त हो। क्लैव्य का अर्थ है सिकुडऩा। लोग उसको काम संबंधी विषय में ले लेते हैं। जबकि उसका सही अर्थ है सिकुडऩा। पूरी तरह खिला नहीं होना। सिकुड़ जाना। तो भगवान अर्जुन से कहते हैं:- तेरा मन सिकुड़ गया है। तू क्लीव हो रहा है। क्लीव कौन है? जिसका मन बुझ गया है। जिसका मन सिकुड़ गया है। तो जिस विषय में आप का मन सिकुड़ गया है उस विषय में आप क्लीव हैं, नपुंसक हैं। हमारे यहां वो केवल रति से संबंधित नहीं है। जिस विषय में भी आपकी गति नहीं है। राजनीति में बहुत से लोग नपुंसक हैं। राजनीति में रहकर आपको बड़े-बड़े पद मिल गए और फिर भी आप कुछ नहीं करते तो कहेंगे- ‘अरे, तू नपुंसक है, नपुंसक राजपुरुष है।’ सेक्स-लाइफ से उसका संबंध नहीं। तुम सत्ता में गए हो और सत्ता का जो उपयोग घोषित किया था तुमने कि हम देश की सेवा करेंगे, समाज की सेवा करेंगे, देश की रक्षा करेंगे, सीमाओं की रक्षा करेंगे, लोगों का कल्याण करेंगे, समाज में धर्म मर्यादा स्थापित रखेंगे, लॉ एंड ऑर्डर को मेंटेन रखेंगे, जो भी आप प्रतिज्ञा करते हैं, जब आप उसे नहीं करते तो धर्मज्ञजन कहते हैं - ‘तू नपुंसक है। इस विषय में नपुंसक। जिस विषय का तूने दावा किया था, उस विषय में तू नपुंसक है।’
तो भगवान कहते हैं:- अरे, तू तो यहां लडऩे आया था ना? शूरवीर के रूप में आया था ना। कायर तो नहीं आया था रण भूमि में। तो यहां आकर तेरा मन सिकुड़ रहा है। हे पार्थ, क्लैव्य को मत प्राप्त हो। छाती खोल के लड़। कैसे लड़? आगे वर्णन करते हैं:- क्लैव्य को मत प्राप्त हो। सिकुड़ मत। इतना हिसाब-किताब मत कर। इनको यह कि हमारे नाना हैं, बाबा हैं, दादा हैं, पिता हैं, चाचा हैं, ताऊ हैं, भाई हैं, अमुक हैं, मर जाएंगे। इतना हिसाब-किताब करके मन को सिकोड़ लेना, सिकुड़ जाना, यह क्लैव्य है। बहुतेरे नेता इस अर्थ में क्लीव हैं। धर्म की रक्षा नहीं करते। सत्ता के हिसाब किताब में लगे रहते हैं, तो धर्म की दृष्टि से वे क्लीव हैं।
मुख्य बात यह कि जो जो भी शंकाएं अर्जुन उठाता है, ऐसे तो नहीं होगा, वैसे तो नहीं होगा, मैं कल को अगर इसका पालन नहीं कर पाया तो कहीं नष्ट तो नहीं हो जाऊंगा? छिन्न-भिन्न तो नहीं हो जाऊंगा? न यहां का रहूँगा, ना वहां का रहूँगा।
भगवान उन सबको कह देते हैं कि नहीं, नहीं। ‘न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गति तात गच्छति।।’ (6/40) कल्याण के मार्ग में उठाया कोई भी पग निष्फल नहीं होता। सबका समाधान कर देते हैं। जो जो शंका उठाता है अर्जुन, चाहे वह अपने पिता-चाचा-ताऊ-भाई के वध, भाभी चाची को विधवा बनाने या भाइयों के वध के विषय में हो, पिता-चाचा-पितामह आदि के वध से संबंधित हो, उससे पडऩे वाला पाप हो, भाइयों से राज्य छीनने से होने वाला पाप हो, मैं योग से स्खलित हो गया तो? कहीं मैं नष्ट ना हो जाऊं? ‘कच्चिन्नो भयविभ्रष्टश्छिन्ना भ्रमित नश्यति।’ (6/38) ऐसा ना हो जाए। तो सब का भगवान कृष्ण खंडन कर देते हैं। नहीं, नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है। कहीं कहते हैं तू क्लैव्य को मत प्राप्त हो। तू अशोचनीय को मत सोच। तू ज्यादा पंडिताई और प्रज्ञावाद मत झाड़। तू तो मूर्ख है और प्रज्ञावाद झाड़ रहा है। पंडिताई की बात कर रहा है। सब कह देते हैं। हर बात का खंडन करते हैं। बस एक ही शंका है अर्जुन की, जिसको भगवान स्वीकार कर लेते हैं कि हाँ, ये तेरी शंका सही है।
वो क्या है? जब वो कहता है कि -
‘योऽयं योग: त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात् स्थितिं स्थिराम्।।’ (6/33)
हे भगवान, आपने ये जो योग बताया है, मैं इसमें स्थिर रह पाऊंगा, ऐसा मुझे नहीं लगता। चंचलम् हि: मन: कृष्ण। हे कृष्ण, मन तो चंचल है। तो यही एक शंका है जिसको भगवान कृष्ण तत्काल स्वीकार कर लेते हैं।
‘असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।’ (6/35)
इसे तत्काल भगवान कृष्ण स्वीकार कर लेते हैं कि हां, व्यक्ति का मन चंचल है। एक ही बात, अर्जुन की एक ही शंका ऐसी है जिसको वे कहते हैं कि हाँ, यह तेरी शंका सही है।
भगवान कहते हैं - ‘असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्’
हे महाबाहु, असंशय। इसमें कोई संशय ही नहीं है कि ये जो मन है, इसका निग्रह बहुत कठिन हैं और यह चंचल है।
तो हम जो भी कुछ सुनते हैं, जो भी शास्त्र सुनते हैं वह हमारे चित्त में स्थिर रहे, इसके लिए तो मन का संयम आवश्यक है ना? अर्जुन ने भी यही कहा था ना?
‘चंचलं हि मन: कृष्णा, प्रमाथि बलवद् दृढ़म।।’ (6/34)
हे मधुसूदन, यह मन स्वभाव से चंचल है, चित्त को मथता रहता है, बहुत बलवान है और इस प्रवृत्ति में यह दृढ़ है, इसी वृत्ति में लगा रहता है। काम के समान इसमें वेग है बलवद् है, बहुत ही बलवान है और दृढ़ है। तो भगवान भी कहते हैं - असंशयं महाबाहो, मनो दुर्निग्रहम् चलमं’’।
तो मन को कैसे इस योग्य बनाया जाए कि वह शास्त्र के ज्ञान को चित्त में स्थिर कर सके। तब फिर जाकर इसकी पात्रता आती है कि हम शास्त्र के ज्ञान को ग्रहण करें, शास्त्र के ज्ञान का अनुशीलन करें। उसको चित्त में ऐसे स्थिर करें कि वो हमारे कर्म में फलित हो। यानी शास्त्र हमारे संस्कार का अंग बन जाए। हमारी स्मृति में स्थिर हो जाए।
प्रत्येक स्मृति किन्ही आकांक्षाओं को जन्म देती है और प्रत्येक आकांक्षा अंत में किन्ही स्मृतियों को जन्म देती है। इसलिए योग साधना में आगे जाकर स्मृति पर भी नियंत्रण किया जाता है और आकांक्षाओं पर तो किया ही जाता है। प्रत्येक स्मृति का फल किसी ना किसी आकांक्षा में होता है। आपको जो भी याद आएगा, उससे कहीं ना कहीं कोई इच्छा होगी ना? मिठाई याद आएगी तो अरे किसी दिन खाया जाए, बहुत अच्छी मिठाई है वो। या यह कि उन्होंने बहुत अच्छा भोजन बनाया था।
हर स्मृति किसी आकांक्षा को जन्म देती है। हमारे पूर्वज ऐसे वीर थे, ये स्मृति हमको वीरता का भाव देगी। हम भी वीर बनें। इसीलिए जो दुष्ट हैं अथवा जो दुष्टों के गुलाम हैं भारत में इस समय, अपने आप को हिंदुत्व निष्ठ आदि कहने वाले बहुत से लोग हैं जो वस्तुत: उन दुष्टों की बुद्धि के गुलाम हैं। मूढ़ता के कारण, अज्ञान के कारण, जो कि आपको नष्ट करना चाहते हैं, जो सनातन धर्म को और हिंदू राष्ट्र को नष्ट करना चाहते हैं, उनके गुलाम लोगों में सबसे अधिक ये दम्भ है कि हम हिंदू राष्ट्र को सुदृढ़ बनाएंगे और हम तो हिंदू राष्ट्र के लिए जी रहे हैं। लेकिन वह स्मृति भ्रष्ट हैं तो बकते रहते हैं कि हम तो सदा से गुलाम रहे हैं, अरे हम तो क्या है? हमारे पूर्वज तो ऐसे थे, हमने तो यह भी नहीं किया, वो भी नहीं किया। ग्लानि है दास्य भाव। जब तुम में हीनता आ गई, ग्लानि ही आ गई तो तुम क्या भला करोगे समाज का? तुम तो मनोरोगी हो जाओगे। तो ऐसे भी लोग हैं स्मृति भ्रष्ट। आपकी स्मृति भ्रष्ट हो गई, अगर आपकी स्मृति अवसाद या ग्लानि की ओर ले जाने वाली हो गई, अगर आपकी स्मृति ऐसी हो गई कि आप में अपने प्रति, अपने पूर्वजों के प्रति, अपने राष्ट्र के प्रति, अपने धर्म के प्रति, ग्लानि है, क्लैव्य है, मन सिकुड़ा हुआ है, अब तो क्लीव भी नहीं, विकृत है, जो घटित ही नहीं हुआ वो आपने ऊपर आरोपित कर लिया है। आपके शत्रु ने कहा कि आप तो मुसलमानों से बहुत हारे। आपने भी रट लिया:- हां-हां, हम तो क्या बताएं, मुसलमान बड़े नीच हैं, वो तो हमको मारते ही रहे हैं।
अरे भाई, कब मारा? आपके बाप को मारा? आपके बाप के बाप को मारा? किसको मारा? आप किसकी बात कर रहे हैं? यहां तो राजाओं के वृत्त भरे पड़े हैं तमाम राजपूत राजाओं के। मराठों का वृत्त पढ़ते चले जाइए। वीरता के वृत्त हैं। हां, यह कहना सही है कि वह शत्रु बहुत नीच था, पापाचारी था, दुष्ट था, राक्षस था, हमने उसको ऐसे ठीक किया। अमुक-अमुक कष्ट सहते हुए भी। हमारे बेटे को मार डाला। सभी को मार डाला। फिर भी हम धर्म पर दृढ़ रहे। तो हमारे जो पूर्वज हैं, वीर पूर्वज, उनकी स्मृति तो ऐसी है। एक ही घटना है। उसके अन्याय को, अनाचार को वो भी याद करते हैं लेकिन अपनी वीरता के साथ कि अच्छा वो इतना अन्यायी था, उसको भी हमने हरा दिया, उसको भी हमने कुचल दिया, उसका भी हमने नियंत्रण कर दिया। ये है स्मृति साधन।
आपने नहीं किया तो आप क्या कहते फिरते हैं? ये तो ऐसा देश है 2000 साल से, कुछ मूर्ख लोग कहते हैं 2000 साल से देश गुलाम था। तुम्हारे पिताजी गुलाम रहे होंगे। तुम्हारे पूर्वज गुलाम रहे होंगे। यहां तो ऐश्वर्य ही ऐश्वर्य रहा है। संसार में सबसे बड़ा योद्धा समाज है भारत। इसको आप क्या-क्या बकते हैं।
अगर आपकी स्मृति भ्रष्ट है तो क्या होगा? आपकी आकांक्षा भी नहीं होगी। जिसकी स्मृति भ्रष्ट है, जिसकी स्मृति अवसाद की ओर ले जाने वाली है, जिसकी स्मृति देश के विषय में भी ऐसी है कि उससे उसका मन बुझ जाता है, तो वह कुछ नहीं करेगा। ‘गाण्डीवं संरसते हस्तात् त्वक्चैव परिदह्यते।’ (1/30) हाथ से गाण्डीव नीचे खिसक रहा है, त्वचा जल रही है चिंता से। उससे पूर्व क्या स्थिति है:- ‘सीद्न्ति मम गात्राणि, मुखं च परिशुष्यति।’ शरीर शिथिल हो रहा है और मुँह सूख रहा है।
अगर अर्जुन का यह हाल है कि पसीना आने लगा, शरीर कांपने लगा और गांडीव हाथ से खिसकने लगा। स्मृति के कारण। ऐसी स्मृति आ गई कि अरे यह होगा, अरे वो होगा। तो फिर आपने अगर देश के विषय में ऐसी स्मृति कर ली कि जिससे आपको लगता है कि सब अंधेरा ही अंधेरा है तो आप किसी काम के नहीं हैं। आप एक मनोरोगी हैं। आप देश के किसी काम के नहीं है। अर्जुन से अधिक बलवान तो आप नहीं हैं ना? जब अर्जुन ही कांपने लगा, जब अर्जुन का ही गांडीव खिसक गया, जब अर्जुन के ही शरीर में दाह उत्पन्न हो गया तो आपके तो जीवन भर दाह रहेगा। भारत के विषय में अगर आपने ग्लानि पाल ली, तो आपके सारे जीवन केवल आपका मन जलेगा, आपकी बुद्धि कुंठित रहेगी, आप उदासीन रहेंगे। तो स्मृति का साधन कैसे करें? इसके लिए मन की स्थिरता आवश्यक है। ‘व्यवसायत्मिका बुद्धि: एकेह कुरु नंदन’। एकाग्रता। बुद्धि की एकाग्रता कैसी हो? मन की एकाग्रता कैसी हो? इस पर हम आगामी अंक में चर्चा करेंगे।
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