कर्ण रोग लक्षण कारण बचाव
घरेलू उपचार व निवारण
On
डॉ. अरुण पाण्डेय
पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज, हरिद्वार
यूँ तो हमारे शरीर का प्रत्येक अंग किसी न किसी कार्य के लिए बना है तथा अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है किन्तु हमारे शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनसे हम देखने, सुनने, स्पर्श करने आदि की शक्ति रखते हैं। इनमें एक प्रमुख अंग है हमारे कान। कान हमारे शरीर के सबसे जरूरी अंगों में से एक है। ये हमें सुनने की क्षमता प्रदान करते हैं। हम वार्ता के द्वारा जो भी कम्यूनिकेशन करते हैं वह कानों के बिना संभव नहीं है, इन्हीं के चलते हम आवाजों को सुन पाते हैं। |
दरअसल, कान के भीतर एक सेंट्रल हियरिंग सिस्टम है, जिसमें कुछ-कुछ ऑडोटरी नर्व यानी कि सुनाई देने वाले नर्व हैं और कुछ ऐसे जटिल पाथवे हैं जो मस्तिष्क तक आवाजों को ले जाने का काम करते हैं। अगर हम कान से आवाज जाने और इन आवाजों के मस्तिष्क तक पहुंचने की प्रक्रिया को समझें, तो पाएंगे कि कान तीन भागों से बना होता है।
इनमें पहला है बाहरी कान। यह कान का वह हिस्सा है जो एक छेद या सुरंग के समान प्रतीत होता है। इसके उपरान्त मध्य कान होता है जिसे इयर ड्रम कहते हैं। इसमें छोटी-छोटी अस्थियाँ होती हैं जो आवाज को बढ़ाती हैं। और तीसरा व अंतिम भाग आंतरिक कान होता है। आंतरिक कान वह जगह है जहां ध्वनियों का अनुवाद विद्युत आवेगों (sounds are translated to electrical impulses) में किया जाता है और मस्तिष्क को भेजा जाता है।
ये तीनों ही चीजें मिलकर सुनने की प्रक्रिया को सुनिश्चित करते हैं।
यदि सुनने में कोई परेशानी या बहरापन की बात आती है तो इसका कारण इन तीनों भागों में ही कहीं गड़बड़ी होना रहता है।
दरअसल, इन तीन भागों में से कोई भी बैक्टीरिया, फंगस या वायरस से संक्रमित हो सकता है। बच्चों के कान की समस्या में मुख्य तौर पर मध्य कान के संक्रमण जिम्मेदार पाए जाते हैं। यह अक्सर ओटिटिस मीडिया से ग्रस्त होते हैं। पर बड़ों में भी कान से जुड़ी कई परेशानियां होती हैं, जो कि हल्के से लेकर गंभीर हो सकते हैं।
कान की समस्याएं
1) इयर वैक्स
वैसे तो इयर वैक्स हमारे कान की सुरक्षा करता है। धूल-मिट्टी के कण इस वैक्स में चिपक जाते हैं जिससे कान के भीतरी भाग संक्रमण से बच जाते हैं। किन्तु व्यस्कों में वैक्स की एक बड़ी परत बनने लगती है, जो कि कान में कई बार खुजली और संक्रमण का कारण भी बन जाती है। ऐसे में आवश्यक है कि व्यस्क व्यक्ति समय-समय पर कानों को डॉक्टर द्वारा साफ करवाते रहें।
2) स्वीमर्स ईयर
जब नमी और गर्मी के कारण कान के अंदर की त्वचा सूज जाती है, तो इसे स्वीमर्स ईयर कहा जाता है। इसमें कान के छेद में संक्रमण हो जाता है और जिससे दर्द और खुजली भी हो सकती है।
3) ओटिटिस मीडिया
ओटिटिस मीडिया में कान के मध्य भाग यानी कि इयर ड्रम में संक्रमण होता है। ये अक्सर वायरल इंफेक्शन के कारण होता है। इसमें कान के मध्य भाग में सूजन हो जाती है और ये तरल पदार्थ के निर्माण का कारण भी बन सकती है। अक्सर ये छोटे बच्चों में होता है। इसके लक्षणों पर गौर करें, तो बच्चा इसमें रोता है, कान में दर्द महसूस करता है और हल्के बुखार और चिड़चिड़ापन से भी परेशान रहता है।
4) ग्लू इयर
इसमें पुरानी ओटिटिस मीडिया से जुड़ी परेशानी होती है। कान के पीछे मध्य कान में मोटी या चिपचिपा द्रव का निर्माण हो जाता है और ये सुनवाई हानि या बहरापन का कारण बनता है। ये परेशानी कई लोगों में बचपन से हो सकती है।
5) ओटोस्क्लेरोसिस
एक ऐसी स्थिति जहां कान के अंदर छोटी हड्डियों में से एक के आसपास असामान्य हड्डी का विकास होता है, खास कर स्टेप्स के आस पास। इसके कारण स्टेप्स हड्डी हिलने में असमर्थ हो जाती है। दरअसल, जब स्टेप्स सही से काम नहीं कर पाता है, श्रवण प्रणाली ठीक से कार्य करने में असमर्थ है। यह स्थिति आम तौर पर एक कंडक्टिव हेयरिंग लॉस का कारण बनती है। ओटोस्क्लेरोसिस का उपचार दो विकल्पों पर निर्भर करता है पहला हियरिंग एड्स पर और दूसरा सर्जरी पर। हियरिंग एड्स अक्सर उन लोगों के लिए एक बहुत ही सफल विकल्प है जिनके पास ओटोस्सेलोसिस है। सर्जिकल विकल्प को स्टेपेडेक्टोमी कहा जाता है, जो कि ईएनटी (कान, नाक और गले विशेषज्ञ) द्वारा किया जाता है।
6) कान बहना
एक ऐसी स्थिति जहां आंतरिक कान में तरल पदार्थ की अधिकता होती है। अतिरिक्त द्रव कान के संतुलन को बिगाड़ देता है और चक्कर आना, मतली, कानों में बजना, सुनने में उतार-चढ़ाव और कान के अंदर दबाव की भावना के लक्षणों को बढ़ाता है। वर्तमान में इसका कोई ज्ञात चिकित्सा उपचार नहीं है। हालांकि इस स्थिति को दवा, आहार, तनाव में कमी, प्राकृतिक उपचारों और सर्जरी के माध्यम से कुछ हद तक प्रबंधित किया जा सकता है।
7) कान का बंद हो जाना
आम तौर पर ये कान के छेद के अंदर मोम के निर्माण का परिणाम होता है। मोम कान के अंदर की छोटी ग्रंथियों द्वारा निर्मित होता है। पर कान में उत्पादित मोम की मात्रा आहार, उम्र, त्वचा की स्थिति, चिंता के स्तर और कान नहर के शरीर रचना सहित कई कारकों पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है, ग्रंथि का स्राव कम तैलीय हो जाता है, और इसका परिणाम ड्रायर और सख्त वैक्स के रूप में होता है, जो कान के छेद में फंस जाता है और आपका कान बंद हो जाता है।
8) कान में हवा भर जाना
कभी-कभी ऐसा होता है जब नाक से कान तक चलने वाली ट्यूब ब्लॉक हो जाती है और ईयरड्रम के बाहरी हिस्से में हवा का असंतुलन हो जाता है। यह स्थिति अधिकांश लोगों द्वारा अनुभव की जाती है जब वे स्कूबा ड्राइविंग, पहाड़ी क्षेत्रों में ड्राइविंग और उड़ान जैसी गतिविधियों के माध्यम से ऊंचाई के स्तर बदलते हैं। इसके लक्षणों में अक्सर कान में सनसनाहट की आवाज, चक्कर आना, दर्द और असुविधा शामिल हो सकती है। साथ ही बहरापन और कानों में भारीपन की भावनाएं हो सकती हैं।
कान के रोग के लक्षण
-
कान दर्द
-
कान बहना
-
छोटे बच्चों में सामान्य से अधिक रोना
-
कान में संक्रमण
-
नींद न आना
-
ध्वनियों को सुनने या जवाब देने में परेशानी
-
चक्कर आना
-
बुखार
-
सरदर्द
-
भूख में कमी
-
बहरापन
आमतौर पर मध्य कान (ओटिटिस मीडिया) और कान के बाकी हिस्सों में भी फैलता है। कान के संक्रमण के कई प्रकार हैं, जो इसके अलग-अलग कारणों द्वारा प्रभाषित होते हैं।
कान में संक्रमण के प्रकार
-
ओटिटिस एक्सट्रेना : एयर ड्रम और बाहरी कानों के बीच संक्रमण और सूजन।
-
ओटिटिस मीडिया : कानों के मध्य में वायरल इंफेक्शन या बैक्टीरियल इंफेक्शन हो जाना।
-
सीरस ओटिटिस मीडिया : इसमें कानों के बीच में पस या मवाद भर जाता है।
-
संक्रामक मेरिंगिटिस : इसमें कानों में छोटे-छोटे दाने और सूजन हो जाता है।
-
एक्यूट मेसटोइडिटिस : इसमें कान बहने के साथ तेज दर्द और बुखार होता है।
-
वेस्टिबुलर न्यूरोनिटिस : इसमें कानों के वेस्टिबुलर सिस्टम में इंफेक्शन हो जाता है।
-
हर्पीस जोस्टर : हर्पीस जोस्टर यानी शिंगल्स एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हमारी कानों की त्वचा पर पानी भरे हुए छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं।
कान के संक्रमण का कारण
-
ऊपरी श्वास नलिका में संक्रमण
-
हवा के दबाव में अचानक बदलाव
-
कान के अंदर की ट्यूब का बंद हो जाना
-
प्रदूषित पानी से
-
नहाते वक्त काम में पानी या साबुन रह जाने से
-
कान की अत्यधिक सफाई से, जो नाजुक ऊतकों को खरोंच दे।
कर्ण रोग में पतंजलि की उपलब्ध औषधियाँ
-
सुबह-शाम भोजन से पहले 1-1 कैप्सूल इयरग्रिट गोल्ड व इम्यूनोग्रिट सेवन करें।
-
2-2 सारीवादी वटी, 1-1 चन्द्रप्रभा वटी तथा 1-1अश्वशिला कैप्सूल सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करें।
-
सुबह-शाम 2-2 बूंद अणु तैल दोनों नासाछिद्र में डालें।
-
सुबह-दोपहर-शाम तीनों समय कान में इयरग्रिट इयर ड्रॉप डालें।


