त्रिआयामी संगम योग-आयुर्वेद-नेचुरोपैथी की विशेषताएं
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डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज निर्देशक व चिकित्सा प्रभारी
योग-प्राकृतिक-पंचकर्म चिकित्सा एवं अनुसंधान केन्द्र (योग-ग्राम)
एलोपैथी रोग की विरूद्ध रूढ़ीवादी चिकित्सा पद्धति है
आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की आर्थोडॉक्स, रूढ़ीवादी, पारम्परिक कॉनवेन्शनल, बायोमेडिसिन, मेनस्ट्रीम मेडिसिन तथा वेस्टर्न मेडिसिन कहा जाता है। सामान्य भाषा में एलोपैथी चिकित्सा कहते हैं। एलोपैथी शब्द ग्रीक भाषा के Allos तथा Pathos शब्द से बना है, एलोस (Allos) का अर्थ विपरित या उल्टा तथा पैथोस (Pathos) का अर्थ संत्रस्त रोगी या Suffering होता है। एलोपैथी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जर्मन चिकित्सक आविष्कारक सेमुएल हनेमेन (Hahnemann) ने किया था। रोग लक्षणों को दबाने के लिए इसके विपरित औषधियों का एलोपैथी पद्धति में उपयोग किया जाता है। वह एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में किसी रोग लक्षण जैसे- कब्ज या दर्द के मूल कारण को बिना समझे उसके उपचार के लिए लक्जेटिव या पेन किलर आदि- विपरित गुण-धर्म वाला औषधियों का उपयोग किया जाता है।
आयुर्वेद योग निसर्गोपचार स्वास्थ्य की स्वास्थ्य संवर्धन का सकारात्मक विज्ञान है
क्योंकि आयुर्वेद योग नेचुरोपैथी का एक ही लक्ष्य होता है ‘‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम् आतुरस्य विकार प्रशमनम् च इति निसर्गोपचार योग: आयुर्वेदस्य मूल प्रयोजनम्’’अर्थात् स्वस्थ मनुष्य की स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा बीमार एवं रोगियों की रोग के मूल कारण विजातीय विकार को तन, मन एवं चित्त से निकालकर प्रशमन करना, निसर्गोपचार योग एवं आयुर्वेद का मूल लक्ष्य है।
आयुर्वेद दो शब्द आयुर या आयु: तथा वेद से बना है। आयु, जीवन, उम्र, एवं आरोग्य का पर्यायवाची हैं। ये सभी शब्द दीर्घायु आयुष्मान भव: के विराट् अर्थ का ज्ञान देता है। आयुर्वेद ‘‘आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेद:’’ अर्थात् आरोग्य आपूरित दीर्घायु जीवन का ज्ञान कराने वाला विज्ञान है। ‘‘आयुर्वेद तद आयुर्वेदयति इति आयुर्वेद:’’ जिस विज्ञान के द्वारा आयु यानि जीवन, आयु विभाजन यानि उसकी शाखा, आयु-विद्या, आयु-सूत्र, आयु-ज्ञान, आयु-लक्षण (प्राण होने के चिन्ह) आयु-तंत्र विभिन्न शारीरिक संरचना एनाटोमी एवं उनकी क्रियाएं फिजियोलॉजी, इन सभी विषयों का सम्पूर्ण ज्ञान देने वाला आयुर्वेद ‘‘हिताहितं सुख दु:खम आयुस्तस्य हिताहितं। मानं च तच्च यत्रोक्तम् आयुर्वेद: स उच्यते।। च स् 3-41।।’’ अर्थात् चार प्रकार की आयु हितकारी, आयु अहितकारी रोग तथा सुखद आयु स्वास्थ्य एवं दु:खद आयु (बीमारी) है, उस चारों प्रकार के आयु के लिए हितकारी पथ्य, अहित करने वाला अपथ्य, का प्रमाण तथा उसके स्वरूप के अनुसार जो ज्ञान प्रदान करता है, वह आयुर्वेद कहलाता है।
एलोपैथी रोग का नकारात्मक या निगेटिव विज्ञान है
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में सिर्फ एवं सिर्फ रोग एवं रोग की पैथोलॉजी से रोग के निदान एवं चिकित्सा की बात की गई है। रोग विकृति विज्ञान एवं रोग शब्द ही नकारात्मक निगेटिव होता है, आयु एवं आयुष तथा वेद, ज्ञान शब्द सकारात्मक शब्द है। एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में रोग, बीमारी यानि नकारात्मक विषयों की चर्चा है। स्वस्थ कैसे रहे? इसकी कोई चर्चा ही नहीं, यह स्वास्थ्य रूपी सकारात्मक अनुभूति की निगेटिव साइन्स हैं। अब धीरे-धीरे समझ पैदा हो रही है, मेडिकल साइन्स के करिकुलम् में रोग विज्ञान के साथ स्वास्थ्य विज्ञान की भी चर्चा होने लगी है।
सनातन त्रिआयामी तन, मन एवं चेतन के मध्य स्वास्थ्य का सकारात्मक विज्ञान है
आयु कामयमानेन धर्मार्थ सुखसाधनम्।
आयुर्वेदशेषुविधेय परमादर:।। अष्टागहृदयम्।।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्षणामारोग्यं मूल मूतमम।
शरीरमाद्यखलुधर्मसाधनम्।। च सू स्था-1.14।।
अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, सुख का साधन दीर्घायु शरीर है। आयुष्मान एवं आरोग्य पूर्ण शरीर की जिस व्यक्ति की इच्छा हो उसे आयुर्वेद के उपदेशों का परम आदर के साथ पालन करना चाहिए। प्रत्येक विकास एवं रचनात्मक कार्य के लिए स्वस्थ शरीर प्रथम शर्त है। स्वस्थ तन एवं मन का सर्वांण विज्ञान प्राकृतिक योग आयुर्वेद ही है।
आयुर्वेद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा में स्वस्थ वैसे रहे इसकी चर्चा ज्यादा की गयी है। इसलिए दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या के अन्र्तगत छ: ऋतुचर्या ग्रीष्म-ऋतु, वर्षा-ऋतु, शरद-ऋतु, हेमंत-ऋतु, शिशिर-ऋतु तथा बसंत-ऋतु में हमारा जीवन-शैली, आहार-विहार-विचार, संस्कार एवं व्यवहार कैसा होना चाहिए। इसका विस्तार से वर्णन किया गया है, ताकि स्वास्थ्य की रक्षा, जीवन की रक्षा हो, अत: त्रिआयामी चिकित्सा सकारात्मक विधायक विज्ञान है।
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में शरीर के विभिन्न अंगों के रोगों की तथा उसके एलोपैथी उपचार की चर्चा की गयी है। विभिन्न अंगों का रोग ही नकारात्मक है हालॉकि रोग एवं रोग का निदान एवं चिकित्सा आवश्यक है, लेकिन रोग से सदैव बचने एवं रोकथाम के उपाय नहीं बताया जाता है। इस दृष्टि से भी यह एक नकारात्मक निगेटिव साइन्स है। व्यक्तिको स्वास्थ्य रक्षा स्वास्थ्य सम्वद्र्धन का ज्ञान दिया जाये, तभी वह आरोग्य विज्ञान अधिक उपयोगी एवं ज्यादा सार्थक होता है। यही कारण है कि प्राचीनकाल में चीन एवं भारत एवं अन्य एशियायी देशों के स्वास्थ्य रक्षार्थ एक सूत्र लागू होता था superior Pyhsician cure the illness before it is manifested & the inferior Physician only care for the illness which he was not able to prerent." आयर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में रोगों की चिकित्सा के साथ स्वास्थ्य संवर्धन तथा स्वास्थ्य संरक्षण की ज्यादा चर्चा की गयी है, इसलिए यह सकारात्मक विज्ञान है।
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में रोगों को ठीक करने के लिए सिर्फ दवाईयों के प्रयोग के विषय में बताया जाता है। स्वास्थवृत्त यानि क्या खायें?, क्या नहीं खाये?, सोना, जागना, आहार, जीवन-शैली, भावनात्मक, मनोदशा के सम्बन्ध में डॉक्टर चर्चा नहीं करते हैं। भूले-भटके रोगी आहार के सम्बन्ध में पूछ भी देता है, तो डॉक्टर रटा-रटा या एक ही वाक्य होता है, जो इच्छा हो सो खाते रहो। 7 या 15 दिन के अन्तराल पर बार-बार मेरे पास आते रहो, दिखाते रहो ताकि आपका भी काम चलता रहे और हमारा भी।



