त्रिआयामी संगम योग-आयुर्वेद-नेचुरोपैथी की विशेषताएं

त्रिआयामी संगम योग-आयुर्वेद-नेचुरोपैथी की विशेषताएं

डॉ.  नागेन्द्र कुमार नीरज निर्देशक चिकित्सा प्रभारी

योग-प्राकृतिक-पंचकर्म चिकित्सा एवं अनुसंधान केन्द्र (योग-ग्राम)

एलोपैथी रोग की विरूद्ध रूढ़ीवादी चिकित्सा पद्धति है
आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की आर्थोडॉक्स, रूढ़ीवादी, पारम्परिक कॉनवेन्शनल, बायोमेडिसिन, मेनस्ट्रीम मेडिसिन तथा वेस्टर्न मेडिसिन कहा जाता है। सामान्य भाषा में एलोपैथी चिकित्सा कहते हैं। एलोपैथी शब्द ग्रीक भाषा के Allos तथा Pathos शब्द से बना है, एलोस (Allos) का अर्थ विपरित या उल्टा तथा पैथोस (Pathos) का अर्थ संत्रस्त रोगी या Suffering होता है। एलोपैथी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जर्मन चिकित्सक आविष्कारक सेमुएल हनेमेन (Hahnemann) ने किया था। रोग लक्षणों को दबाने के लिए इसके विपरित औषधियों का एलोपैथी पद्धति में उपयोग किया जाता है। वह एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में किसी रोग लक्षण जैसे- कब्ज या दर्द के मूल कारण को बिना समझे उसके उपचार के लिए लक्जेटिव या पेन किलर आदि- विपरित गुण-धर्म वाला औषधियों का उपयोग किया जाता है।
आयुर्वेद योग निसर्गोपचार स्वास्थ्य की स्वास्थ्य संवर्धन का सकारात्मक विज्ञान है
क्योंकि आयुर्वेद योग नेचुरोपैथी का एक ही लक्ष्य होता है ‘‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम् आतुरस्य विकार प्रशमनम् इति निसर्गोपचार योग: आयुर्वेदस्य मूल प्रयोजनम्’’अर्थात् स्वस्थ मनुष्य की स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा बीमार एवं रोगियों की रोग के मूल कारण विजातीय विकार को तन, मन एवं चित्त से निकालकर प्रशमन करना, निसर्गोपचार योग एवं आयुर्वेद का मूल लक्ष्य है।
आयुर्वेद दो शब्द आयुर या आयु: तथा वेद से बना है। आयु, जीवन, उम्र, एवं आरोग्य का पर्यायवाची हैं। ये सभी शब्द दीर्घायु आयुष्मान भव: के विराट् अर्थ का ज्ञान देता है। आयुर्वेद ‘‘आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेद:’’ अर्थात् आरोग्य आपूरित दीर्घायु जीवन का ज्ञान कराने वाला विज्ञान है। ‘‘आयुर्वेद तद आयुर्वेदयति इति आयुर्वेद:’’ जिस विज्ञान के द्वारा आयु यानि जीवन, आयु विभाजन यानि उसकी शाखा, आयु-विद्या, आयु-सूत्र, आयु-ज्ञान, आयु-लक्षण (प्राण होने के चिन्ह) आयु-तंत्र विभिन्न शारीरिक संरचना एनाटोमी एवं उनकी क्रियाएं फिजियोलॉजी, इन सभी विषयों का सम्पूर्ण ज्ञान देने वाला आयुर्वेद ‘‘हिताहितं सुख दु:खम आयुस्तस्य हिताहितं। मानं तच्च यत्रोक्तम् आयुर्वेद: उच्यते।। स् 3-41।।’’ अर्थात् चार प्रकार की आयु हितकारी, आयु अहितकारी रोग तथा सुखद आयु स्वास्थ्य एवं दु:खद आयु (बीमारी) है, उस चारों प्रकार के आयु के लिए हितकारी पथ्य, अहित करने वाला अपथ्य, का प्रमाण तथा उसके स्वरूप के अनुसार जो ज्ञान प्रदान करता है, वह आयुर्वेद कहलाता है।
 एलोपैथी रोग का नकारात्मक या निगेटिव विज्ञान है
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में सिर्फ एवं सिर्फ रोग एवं रोग की पैथोलॉजी से रोग के निदान एवं चिकित्सा की बात की गई है। रोग विकृति विज्ञान एवं रोग शब्द ही नकारात्मक निगेटिव होता है, आयु एवं आयुष तथा वेद, ज्ञान शब्द सकारात्मक शब्द है। एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में रोग, बीमारी यानि नकारात्मक विषयों की चर्चा है। स्वस्थ कैसे रहे? इसकी कोई चर्चा ही नहीं, यह स्वास्थ्य रूपी सकारात्मक अनुभूति की निगेटिव साइन्स हैं। अब धीरे-धीरे समझ पैदा हो रही है, मेडिकल साइन्स के करिकुलम् में रोग विज्ञान के साथ स्वास्थ्य विज्ञान की भी चर्चा होने लगी है।
 सनातन त्रिआयामी तन, मन एवं चेतन के मध्य स्वास्थ्य का सकारात्मक विज्ञान है
आयु कामयमानेन धर्मार्थ सुखसाधनम्।
आयुर्वेदशेषुविधेय परमादर:।। अष्टागहृदयम्।।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्षणामारोग्यं मूल मूतमम।
शरीरमाद्यखलुधर्मसाधनम्।। सू स्था-1.14।।
अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, सुख का साधन दीर्घायु शरीर है। आयुष्मान एवं आरोग्य पूर्ण शरीर की जिस व्यक्ति की इच्छा हो उसे आयुर्वेद के उपदेशों का परम आदर के साथ पालन करना चाहिए। प्रत्येक विकास एवं रचनात्मक कार्य के लिए स्वस्थ शरीर प्रथम शर्त है। स्वस्थ तन एवं मन का सर्वांण विज्ञान प्राकृतिक योग आयुर्वेद ही है।
आयुर्वेद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा में स्वस्थ वैसे रहे इसकी चर्चा ज्यादा की गयी है। इसलिए दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या के अन्र्तगत : ऋतुचर्या ग्रीष्म-ऋतु, वर्षा-ऋतु, शरद-ऋतु, हेमंत-ऋतु, शिशिर-ऋतु तथा बसंत-ऋतु में हमारा जीवन-शैली, आहार-विहार-विचार, संस्कार एवं व्यवहार कैसा होना चाहिए। इसका विस्तार से वर्णन किया गया है, ताकि स्वास्थ्य की रक्षा, जीवन की रक्षा हो, अत: त्रिआयामी चिकित्सा सकारात्मक विधायक विज्ञान है। 
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में शरीर के विभिन्न अंगों के रोगों की तथा उसके एलोपैथी उपचार की चर्चा की गयी है। विभिन्न अंगों का रोग ही नकारात्मक है हालॉकि रोग एवं रोग का निदान एवं चिकित्सा आवश्यक है, लेकिन रोग से सदैव बचने एवं रोकथाम के उपाय नहीं बताया जाता है। इस दृष्टि से भी यह एक नकारात्मक निगेटिव साइन्स है। व्यक्तिको स्वास्थ्य रक्षा स्वास्थ्य सम्वद्र्धन का ज्ञान दिया जाये, तभी वह आरोग्य विज्ञान अधिक उपयोगी एवं ज्यादा सार्थक होता है। यही कारण है कि प्राचीनकाल में चीन एवं भारत एवं अन्य एशियायी देशों के स्वास्थ्य रक्षार्थ एक सूत्र लागू होता था superior Pyhsician cure the illness before it is manifested & the inferior Physician only care for the illness which he was not able to prerent." आयर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में रोगों की चिकित्सा के साथ स्वास्थ्य संवर्धन तथा स्वास्थ्य संरक्षण की ज्यादा चर्चा की गयी है, इसलिए यह सकारात्मक विज्ञान है। 
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में रोगों को ठीक करने के लिए सिर्फ दवाईयों के प्रयोग के विषय में बताया जाता है। स्वास्थवृत्त यानि क्या खायें?, क्या नहीं खाये?, सोना, जागना, आहार, जीवन-शैली, भावनात्मक, मनोदशा के सम्बन्ध में डॉक्टर चर्चा नहीं करते हैं। भूले-भटके रोगी आहार के सम्बन्ध में पूछ भी देता है, तो डॉक्टर रटा-रटा या एक ही वाक्य होता है, जो इच्छा हो सो खाते रहो। 7 या 15 दिन के अन्तराल पर बार-बार मेरे पास आते रहो, दिखाते रहो ताकि आपका भी काम चलता रहे और हमारा भी।

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आयुर्वेद प्राकृतिक एवं योग चिकित्सा रोग मुक्ति एवं आरोग्य पद्धति की नयी चिकित्सा पद्धति है जिसका मुख्य आधार संतुलन एवं सम्यकत्व है जिस प्रकार आहार, स्वभाव, प्रकृति, सत्त्व, रजस तथा तमस इड़ा, पिंगला एवं सुष्मुना प्राप्त ऊर्जा म्= ओम् आध्यात्मिक आत्मोर्जा का प्रतीक है। तीन गुणवाला त्रिआयामी तथा वात-पित्त-कफ, त्रिदोष ब्रह्म, विष्णु, महेश त्रिदेव, सृजन, संवर्धन, विसर्जन सृष्टि चक्र, सर्वशक्तिमान ओम् म् क्रमश: मस्तिष्क, हृदय, नाभि क्रमश: विचार, प्रेम, चेतना से सम्बद्ध है। आकाश, पृथ्वी, पाताल त्रिलोक तथा इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना त्रिऊर्जा चैनल और चेतन अद्र्धचेतन अचेतन त्रिट्रोपोग्राफिकल मानस तथा इड-इगो-सुपरइगो, त्रि-डायनेमिक मानस-संतुलन, लम्बाई, चौड़ाई, गहराई इन त्रिआयामी त्रिविम समष्टि संतुलन होने पर व्यक्तिगत स्वास्थ्य, पारिवारिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्वास्थ्य, राष्ट्रीय स्वास्थ्य वैश्विक स्वास्थ्य एवं ब्रह्माण्डीय स्वास्थ्य सही रहता हैं। आहार, विहार-विचार संयुक्ततन, मन एवं चेतन के मध्य सम्यकत्व, सम्यक् एवं संतुलन से सृजित रिदम लय-ताल के संगीत का नाम ही स्वास्थ्य है। वक्तव्य-
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु::।।16-17।।
अर्थात्- युक्त यानि संतुलित आहार, विहार, विश्राम तथा प्रयास करने वाला सफल स्वस्थ तथा योगी होता है। दु:खी एवं रोगी नहीं होता है।
सारा जगत कार्य-कारण के आधार पर चल रहा है। बिना कारण कोई बात नहीं होती है। यह सार्वभौम सिद्धान्त है। बरसात सम्यक् ज्यादा कम यानि अच्छा होने पर पैदावार अच्छी होती है। अधिक या कम होने पर पैदावार संतोषजनक नहीं होती। नींव अच्छी मजबूत होने पर मकान अच्छा मजबूत होता है, लेकिन स्वास्थ्य के सम्बन्ध में कार्य कारण के सम्बन्ध को हम भूल जाते है। रोग होने पर हम कारण को दूसरे पर थोप देते हैं, क्योंकि हम इतने महान हैं कि स्वयं दोषी कैसे हो सकते हैं? रोग होने पर स्वयं को कारण नहीं मानते हैं। कभी मौसम को दोष देते हैं- जैसे जुकाम होने पर ठण्डी, बुखार होने पर गर्मी फोड़ा-फुंसी होने पर बरसात के मत्थे दोष को मढ़ देते हैं, हालांकि मौसम का प्रभाव शरीर पर होता जरूर है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है हमारा शरीर किस प्रकार है। उसे किस प्रकार रखते हैं। उसको किस प्रकार आहार, जीवन-शैली, विचार, संस्कार दे रहे हैं। हमारे अन्दर रक्त लिम्फ, लिवर, पैंक्रियास, किडनी, पेट आदि कितने विजातीय विकार मुक्त हैं या संयुक्त हैं, उसे कमजोर बनाया है या स्वस्थ एवं सशक्त, कार्य एवं कारण को भलिभांति समझने की जरूरत है।
भगवान् श्रीकृष्ण का यह वक्तव्य हमेशा ध्यान में रखें उद्धरेत आत्मना आत्मनम आत्मनम् अवसादयेत। आत्मा एव हि आत्मन: वन्धुर आत्मैव रिपु आत्मन:।। 6/5।। बन्धु: आत्मा आत्मन: तस्ययेन आत्मा एव आत्मनाजित। अनात्मनतु शत्रुत्वे वर्तेत आत्मा एव शत्रुवत।। 6/6।। अर्थात् हम स्वयं अपने लिए गलत असम्यक् आहार गलत जीवनशैली नकारात्मक सोच-विचार, असंतुलित संस्कार, अराजक व्यवहार तथा बेसमय- बेलय विश्राम रिदम लय-ताल रहित एवं जीवन चर्चा अपना करके अपने साथ शत्रुवत व्यवहार करते हैं। अत: जागें, स्वयं आप अपने मित्र भी हैं और शत्रु भी। यदि सजगता से परिपूर्ण स्वस्थ रोग रहित स्वस्थ होते हैं, जीवन जीते हैं, तो आप अपने स्वयं श्रेष्ठतम एवं सही दिग्दर्शन के मित्र साबित होते हैं। यदि आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तो आप स्वयं अपने लिए सबसे खतरनाक शत्रु साबित होते हैं।
हमने अपने आहार-विहार-विचार-संस्कार एवं व्यवहार में किस कदर बदलाव कर लिया है कि रोग हमारी नियति बन गयी है। विरासत से मिली भारतीय सनातन हिन्दु संस्कार, संस्कृति, परम्परा, विरासत, सभ्यता, तहजीव, शिष्ठता आदि गुणों की समग्रता आज की आधुनिक जीवन शैली में स्वप्नवत सा हो गया है।कृधातु से तीन शब्द बनते हैं- प्रकृति, संस्कृति एवं विकृति। प्रकृति मूल स्थिति होती है। इससे हम चाहें तो सुसंस्कृत होकर अच्छी परम्पराओं एवं संस्कृति को अपनाकर स्वस्थ एवं परिष्कृत होकर अच्छी आदतों एवं संस्कार को अपनाकर स्वयं को सुसंस्कृत एवं स्वस्थ योगी बनायें अथवा गलत दिशा में जाकर विकृति अपनाकर एवं विकृत बनकर रोगी हो जायें। हम जो आहार लेते हैं, वस्त्र धारण करते हैं, भाषा का उपयोग करते हैं, जिस ईश्वर की उपासना करते हैं आदि हमारी सभ्यता को सूचित करता है तथा इन्हीं से संस्कृति की पहचान होती है। प्राकृतिक योग एक आयुर्वेद चिकित्सा हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की पहचान है। यह मात्र चिकित्सा पद्धति नहीं है, बल्कि स्वस्थ सशक्त सद्चरित्र जीवन का विज्ञान है। आदर्श जीवन का दर्शन एवं प्रेममय सरस, सलील, सौभाग्य एवं शांतिपूर्ण जीवन जीने की कला है। हमारी उन्नत सनातन संस्कृति की पहचान है। 
एलोपैथी रोग का सरल एवं सीधा नहीं बल्कि उल्टा उपचार है, यह रोग विरोधी ही नहीं बल्कि जीवन विरोधी चिकित्सा विज्ञान है। एलोपैथी दवाइयां स्वस्थ होने का भ्रम तो देती हैं, लेकिन साथ ही इन दवाइयों के साइड इफेक्ट्स से अन्य अनेक रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। एलोपैथी की सभी दवाओं का दुष्प्रभाव होता है। कभी-कभी इनके साइड इफेक्ट जानलेवा सिद्ध होते हैं। दवाओं के प्रतिकूल प्रतिक्रिया के रूप में अवांछनीय प्रभाव होता है। बहती नाक, सिर का भारीपन से लेकर डिप्रेशन, आत्महत्या प्रवृति यहाँ तक कि हार्ट अटैक तक हो सकता हैं। ज्यादा उम्र, कमजोर जीवनी शक्ति, मोटापा तथा अन्य विकट समस्या में साइड इफेक्ट ज्यादा होता है। जैसे ओपिओइड्स, पेनकिलर रक्त को पतला करने वाले वारफेरिन तथा दवाइयां सामान्य खुजली से लेकर रेशेस तथा जानलेवा एनाफीलेक्टिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। हृदय रोग एवं हाई बी.पी. की दवा एजियोटेन्सि कन्विर्टिग एन्जाइम (ACE) इन्हिवटर्स लिसिनोप्रिल, फैप्टोप्रिल, एनालेप्रिल, रेमिप्रिल आदि से एन्जियोएडिमा मुंह, जीभ, गला में सूजन होकर सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। समय पर इनका उपचार नहीं होने पर जानलेवा सिद्ध होता है। डाइबिटीज की दवा मेटाफॉमिन से डायरिया रक्त में लैक्टिक एसिड बढऩे से सिरियस हाइपोटेन्सन, हाइपोथार्मिया रक्तचाप तथा तापमान का काफी कम हो जाना, दर्दनाशक दवा के साथ एसिटेमिनोफेन, पैरासिटामोल से लिवर डैमेज, एन.एस..आई.डीएस. से पेट से ब्लीडिंग, गैस्ट्रिक अल्सर, किडनी डैमेज, हाई बी.पी., हार्टअटैक, ब्रेनस्ट्रोक लकवा आदि होते हैं।
 रोग का मुख्य रोगाणु नहीं बल्कि जीवनी शक्ति वायटलिटी का कमजोर होना है
एलोपैथी चिकित्सा में रोग का कारण पैथोजेनिक बैक्टीरिया, वायरस, फंगस, मौसम वातावरण आदि को माना जाता है, जबकि मूल कारण आपकी जीवनी शक्ति, वायटलिटी, इम्यूनिटी रेजिस्टेन्स पावर तथा डिफेन्स मेकानिज्म़ का कमजोर होना है। यदि वायटलिटी इम्यूनिटी सही हो तो कोई भी रोग प्रभावित नहीं कर पाता है अगर होता भी है, तो आकर लौटकर चला जाता है। शक्तिमान इम्यूनिटी के सामने रोग एवं रोगाणुओं की लाख प्रयास करने पर भी दाल नहीं गलती है। रोग उन्मूलन तथा स्वास्थ्य रक्षक यह इम्यूनिटी दो प्रकार की होती है।
इनेट या नेटिव इम्यूनिटी जिस जाति, जनजाति समाज में किसी खास रोगाणु से लोग वर्षों पूर्व संक्रमित हुए हो तो उस जाति समूह, देश-प्रदेश में उस रोग के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है, जैसे मनुष्यों का प्लेग तथा चेचक जानवरों का रिड्रपेस्ट जैसे अनेक रोग जिससे विगत् में लाखों लोग का अकाल काल कवलित हो चुके हैं। वे बीमारियां अब नहीं दिखती हैं, होता भी है, तो जानलेवा नहीं होती है।
दूसरा एडोप्टिव इम्यूनिटी के अन्तर्गत प्रथम मैटरनल पैसिवयूमोरल इम्यूनिटीतथा द्वितीयमैटरनल सेल मेडिएटेड इम्यूनिटीहोता है।
मैटरनल पैसिव हयूमोरल इम्यूनिटी के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के एण्टीबॉडी जैसे गर्भ के तीसरे माह में प्लासेन्टल नियोनेटल FCRN रिसेप्टर्स के साथ मैटरनल एण्टीबॉडी IgG गर्भस्थ शिशु में पहुँचता है। दूसरा एण्टीबॉडी IgM तथा तीसरा IgD एण्टीबॉडी गर्भस्थ शिशु के पांचवें महीने में दोनों साथ-साथ अभिव्यक्त होते हैं। चौथा एण्टीबॉडीज ढ्ढद्द्र प्रसवोपरान्त माँ के प्रथम दूधपान ब्रेस्ट फीडिंग के कोलोस्ट्रम के साथ शिशु के शरीर में पहुँचता है।
मैटरनल सेल मेडिएटेड इम्यूनिटी माता-पिता के स्वस्थ सक्रिय सशक्त अंडाणु-शुक्राणु के मिलने से सृजित भू्रण के विकास के प्रथम सप्ताह में भू्रणीय अण्डपीत्त कोश (Embryoneic Egg yolk sac) में पहला इम्यूनिटी हिमोपोएटिक स्टेम सेल्स विकसित हो जाता है। समयान्तराल पर जन्म के बाद यह लिवर, स्प्लीन से होते हुए अस्थि मज्जा में पहुंचता है। यहीं पर बी. तथा टी. लिन्फोसाइट की नीव पड़ती है फिर ये थायमस में क्लोनाइज होते हैं। यहीं पर बी. लिम्फोसइट अपनी क्षमता के अनुसार प्लास्मा कोशिका तथा दूसरा स्मृति की कोशिका के रूप में तथा टी. लिम्फोसाइट नेचुरल किलर सेल्स (इनेट इम्यून सेल्स) तथा साइटोकटॉक्सिक टी. (एडॉप्टिव इम्यून) सेल्स, हेल्पर टी. सेल्स, रेग्युलटरी टी. सेल्स तथा मेमोरी टी. सेल्स के चयनित कर ट्रेनिंग दी जाती है। थायमस इम्यूनिटी सैनिकों का प्रशिक्षण केन्द्र है। इनके सहयोग के लिए अनेक असंख्य करोड़ों न्यूट्राफिल, बेसोफिल, मैक्रोफेजेस, डेन्डिट्रिक सेल्स, साइटोकाइन्स, किमोकाइन्स, प्रोपरडिन, ब्रैडिकाइनिन आदि अनेक रोगाणुओं से लडऩे वाले सैनिक होते हैं। रोग एवं रोगाणुओं से लडऩे के लिए वायटलिटी एवं इम्यूनिटी बढ़ानी चाहिए इसके लिए सम्यक् आहार संतुलित जीवनशैली एवं रचनात्मक विचार आवश्यक है। अभी हाल ही में कोविड-19 से अप्रैल 2024 तक पूरी दुनियां में लगभग 7 करोड़, 10 लाख, 81 लोग मरे यानि पूरी दुनियां की आबादी कुल 8,122,426000 यानि 8.1 बिलियन (अरब) है, अर्थात् बचने वालों की संख्या सर्वाधिक है, यानि जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक थी, वे बच गये। मूल प्रश्न है कि रोग की प्रतिरोधक क्षमता को कैसे बढ़ायें? सम्यक्-आहार, सम्यक्-जीवनशैली, संतुलित-सोच, सकारात्मक चिन्तन, सम्यक्-व्यायाम, योगासन, प्राणायाम, ध्यान, उपासना, अच्छे संस्कार एवं संतुलित व्यवहार से हम अपने रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं।
वास्तव में शरीर के बाहर या अन्दर जहाँ गन्दगी टॉक्सिक मैटर मॉरबिड मैटर टॉक्सिन्स होगा वहीं रोगाणु बैक्टीरिया, वायरस तथा फंगस आदि पनपते हैं। यदि शरीर को डिटॉक्सीफाइ, टॉक्सिक एवं टॉक्सिन्स से मुक्त रखेंगे तो बीमारी होने की संभावना खत्म हो जाती है। इसलिए प्राकृतिक योग एवं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में डिटॉक्सीफाइड आहार, ताजे-फल, हरी-सब्जियां, अंकुरित अनाज, सूखे मेवे, बादाम, अखरोट, मूंगफली, काजू में मौजूद मैक्रोन्यूट्रिएन्ट कार्बोज, प्रोटीन, फैट, कोबाल्ट, माइक्रोन्यूट्रिएन्ट में कैल्शियम, मैग्नेशियम, आयरन, आयोडिन इत्यादि। विटामिन- , बी, सी, डी, इत्यादि के साथ प्रो-विटामिन प्याज, पालक अल्फाकैरोटिन, बीटा कैरोटिन, बीटाक्रिप्टोजेन्थिन आदि कैरोटेनॉयक फल्वेनॉयड आदि माइक्रोन्यूट्रिएन्ट तथा इम्यूनोग्रीट जड़ी-बूटी वाली दवा जुकाम, आँख, त्वचा, फेफड़ा से लेकर कैंसर आदि 500 बीमारियों से रक्षा करता है। पालक में मौजूद जियाजेन्थिन तथा ल्यूटिन आँखों के रेटिना के पीछे मैक्यूला ल्यूटिया फोविया में मैक्यूलर पिंगमेन्टशन ऑप्टिकल डेन्सिटी के रूप में संचित होकर सेन्ट्रल विजन को सही रखते हैं, जो किसी पदार्थ को स्पष्ट देखने में सहायता करता है। रोग प्रतिरोध क्षमता को बढ़ाते हैं। इसी प्रकार से नाना प्रकार के फ्लेवेनॉइड रूप के फ्लेवोन्स, रूटिन, लूटियोलिन, क्यूरेसेटेगेटिन, सिबेलिन गॉसपेटिन, पोटूलेटिन आदि फ्लेवोन्स मार्यांरीसेटिन फ्लेवेनॉल्स, एंथोसायनिन तथा कैरोटिन वाले आहार रंग-बिरंगे, लाल, नारंगी, पीले, काले, बैगनी रंग वाले आहार-पपीता, आम, जामुन, ब्लूबेरी तथा बैगनी रंग के मलबेरी, अंगूर, बैगन, पत्तागोभी, शकरकन्द, नारंगी, ग्रेफ-फ्रूट का प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता को शानदार ढंग से वृद्धि करता है।
एलोपैथी दवाइयों से रोग मुक्ति का भ्रम होता है, लेकिन रोग जड़ मूल से जाता नहीं है। एक रोग से ठीक होने का भ्रम होता है, दूसरा-तीसरा रोग साइड इफेक्ट से हो जाता है Medicine, Biological therapy as genetic therapy Immunotherapy & targeted therapy udertakes to cure one disease by producing another cancer, Allergy Anxiety etc. जिस प्रकार एड्स रोग से लाखों लोग जान गंवा चुके हैं उसी प्रकार यह नया रोगएड्स यानि एडवर्स इफेक्ट ऑफ ड्रग्स (Aeds) से पीडि़त होकर लाखों लोग एण्टीबायोटिक्स के अंधाधुंध प्रयोग से एक्स ट्रीम मल्टी ड्रग्स रेजिस्टेन्स जैसे MRSA, ESBL, VRE, CPE स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी आदि है। ESB तथा MDRO कार्बोपेनम रेजिस्टेन्स ग्राम निगेटि बैक्टीरिया तथा भांति-भांति के नित्य नूतन नये-नये रोगों से ग्रस्त होकर अस्पतालों में भर्ती होकर मौत की प्रतिक्षा कर रहे हैं, इनका कोई इलाज नहीं है। यही कारण है कि आज से बरसों पूर्व एलोपैथी दवा के दुष्प्रभाव के प्रति विश्व के महान वैज्ञानिक डॉ. थोमस अल्वा एडिसन ने भविष्यवाणी की है तथा बचने का उपाय बताया है। ‘The doctor of the future will give no medicine but will interest his patient in the care of human frame in diet & in cause of & prevention of disease.
आधुनिक चिकित्सा एलोपैथी पद्धति के पितामह कहे जाने वाली हिपोक्रेट्स का 2400 वर्ष पूर्व का वक्तव्य “food be thy medicine and Medicine be the food & walking is man’s best medicine.’’ रोग के विषय में वे कहते हैं कि “Disease is the natural process of the body and the symploms are the reaction of the body to the disease. The chief function of the Physician is the aid the natural process of the body. Give the power to creat a fever & I can cure any disease.” लेकिन आज का एलोपैथी चिकित्सक हिपोक्रेट्स के नाम पर शपथ लेते हैं, लेकिन उनके कथन का पालन नहीं करते हैं। इसके लिए उनके कैरिकुलम् में आहार एवं जीवन चर्या के सम्बन्ध में ज्यादा चर्चा ही नहीं की गयी है जिस प्रकार आयुर्वेद प्राकृतिक एवं योग चिकित्सा विज्ञान में चर्चा है।
एक अन्य चिकित्सक सर विलियम औसलर चिकित्सा समुदाय में प्रथम बैरोनेट FRS, FRCP डॉक्टर थे, ये भी फादर ऑफ मेडिसिन, फाउण्डर प्रोफेसर ऑफ जॉन हॉपकिन्स हॉस्पिटल तथा उनकी चिकित्सा पद्धति साइन्स और आर्ट ऑफ मेडिसिन के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका वक्तव्य “One of the best & first duties of the doctor is to educate the masses not to take medicine, the best doctor gives the least medicine. What Nature cannot cure nobody cancure.” 
आयुर्वेद योग नेचुरोपैथी में भी ज्वर को शरीर के समस्त विकारों तथा रोगाणुओं को जलाकर भस्म करने वाला माना जाता है तथा उपचार उपवास आदि प्राकृतिक साधनों एवं चिरायता, तुलसी, गिलोय आदि जड़ी-बूटी के काढ़ा द्वारा करते हैं।
आयुर्वेद का मूलमंत्र है ‘‘यद्य पथयम् किम् औषधया: यदि पथ्यं किम् औषधै:’’ आगे और विस्तार से ‘‘पथ्ये सति गर्दास्य किम् औषध: निषेवणम्। पऽयेअसति गदार्तस्य किम् औषध निषेवणम्।।’’अर्थात् यदि पथ्य आहार सही है, तो दवा की क्या आवश्यकता है, यदि पथ्याहार सही नहीं है, तो दवा की जरूरत क्या है? लाख रूपये की दवा खाते रहो, रोग जायेगा नहीं।
विनापि भेषजै व्याधि पथ्यादेव निवर्तते।
तु पथ्यविहिनस्य भेषजानां शतैरपि।।
ये आहारविहारेण रोगाणाम् उद्भवा भवेत।’’
अर्थात- आहार सुधार के बिना रोग जायेगा नहीं, फलत: जीवन भर बीमार रहोगे।
आहार को बिना संतुलित रखे रोग से कैसे मुक्ति मिलेगी? जब तक रोग निवारक मल एवं विष-निष्कासक पथ्य आहार को प्रयोग नहीं करेंगे रोग से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी, भले आप लाख रूपये के दवा क्यों खायें। क्योंकि आहार से बढक़र दुनियां में कोई भी औषधि नहीं है ‘‘ आहार समं किञ्चित भेषज्यंमुपलभ्यते। शक्यतेऽप्यन मात्रेण नर: कर्तु निरामय:।।’’
सिर्फ आहार सुधार से रोगी मनुष्य को निरोगी निरामय किया जा सकता है। यही कारण है कि विभिन्न रोगों की चिकित्सा में आहार चिकित्सा के महत्व को स्वीकार करते हुए एलोपैथी के विख्यात डॉक्टर एवं प्रो. Alexis Carrel ने अपने वर्षों के चिकित्सकीय अनुभव का सार-निचोड़ निम्न शब्दों में अभिव्यक्त किया है “Unless the doctors of today become dietician of tomorrow & the dietician of today will become the doctor of tomorrow.” किस प्रकार का आहार स्वास्थ्यप्रद होता है। इसकी अत्यन्त वैज्ञानिक व्याख्या भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में किया है। मानसिक शारीरिक एवं चेतना को स्वस्थ एवं सशक्त बनाने वाला आहार निम्न होता है-
आयु सत्व बल आरोग्य प्रीतिविवर्धना:
रस्या स्निग्धा स्थिरा हृद्या: आहारा: सात्त्विकप्रिया:।।17-8।।
व्यक्ति के लिए वह आहार जो उसकी उम्र, स्वास्थ्य, सुख, अस्तित्त्व, बल, बुद्धि, घी, धृति, मेधा, स्मृति, सहिष्णुता गुणों की स्थिरता तथा प्रेम को बढ़ाने वाला तथा हृदय मस्तिष्क के लिए हितकारी हो। ऐसे सिंचित तथा स्निग्ध चिकनाई से भरपूर ताजे फल एवं सब्जियां, गोघृत, निरापद, सात्विक अन्न एवं अंकुरित अन्न से निर्मित, सुपाच्य एवं स्वादिष्ट व्यंजन आहार ही आरोग्य एवं आयुष्मान आंकाक्षी स्वस्थ एवं सात्विक लोगों के लिए प्रिय है।
मानसिक रोग पैदा करने वाला आहार
कटु अम्ल, लवण अति उष्ण, तीक्ष्ण-रूक्ष-विदाहिन:
आहार राजसस्य इष्टा: दु: शोक आमय प्रदा:।।17-9।।
अर्थात् अति कड़वा, खट्टा, नमकीन, अत्यधिक गरम, तीखा, रूखा-सूखा, अधिक दाह, जलन पैदा करने वाला आहार जैसे तले-भूने, मिर्च-मसाले वाले आहार जैसे पिज्जा, बर्गर, हेमबर्गर, हॉटडॉग, नूडल्स, पुरी, कचौड़ी, पकौड़ी, चाय, कॉफी, शराब, ब्रेड, नमकीन तथा भांति-भांति के स्नैक्स, शराब, तम्बाकू, नशा पैदा करने वाला आहार आदि राजस प्रवृत्ति के लोगों की प्रिय होते हैं। ऐसे आहार में अम्लीय तत्वों की अधिकता होती है। ऐसे आहार न्यूरोकेमिकल को दुष्प्रभावित करके मानसिक एवं स्नायविक बीमारियां पैदा करते हैं। सकाम तथा बिना श्रम सफलता प्राप्त करने वालों को इस प्रकार का आहार प्रिय होता है। टाइप - पर्सनैलिटी वाले लोगों में तीन गुण हरी (जल्दी बाजी) वरीज यानि चिन्तातुर करी यानि मिर्च, मसाले, तले-भुने आहार खाने वाले (Hurry, Worry, Curry …., Fast life, Full of Worry stress, strain, Fast fried fatty, spicy food, Confectionary, Synthetic & Processed, Fast food, Pizza, Burger, Hot dog, Hemberger etc.) प्रयोग करने वाले प्राय: मानसिक एवं शारीरिक समस्याओं से जूझते रहते हैं। शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक रूग्णता पैदा करने वाले तामसिक आहार- ‘‘यातयामम् गत रसं पूति प्रर्युसितम यत। उच्छिष्टम् अपि अमेध्यम् भोजनम तामस प्रियम्।। 17-10।।’’ अर्थात् जो भोजन सड़ा हुआ रस एवं स्वादरहित, दुर्गन्धित, बासी तथा सर्वाधिक अपवित्र मांसाहार वाला होता है। वह तामसी प्रवृत्ति वालों का आहार होता है, जो अनेक रोगों का जन्मदाता है।
भारतीय धर्म एवं विज्ञान की विशेषता रही है कि वह जीवन के विकास के लिए धर्म एवं विज्ञान को एक साथ समन्वय किया है। कुछ अज्ञानी लोग धर्म को विज्ञान के विरूद्ध मानते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। निम्न सभी समीकरणों को सदैव स्मरण रखें। धर्म तथा विज्ञान जुडऩे से व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं वैश्विक मानव जीवन एवं समष्टि का विकास होता है।
धर्म+विज्ञान= जीवन का विकास
धर्म-विज्ञान= पाखंड, अंधश्रद्धा
विज्ञान-धर्म= विनाश का दुखद प्रत्यक्ष उदाहरण
6 अगस्त 1945 . का आण्विक विनाश की दुखद घटना जापान की है। अमेरिका द्वारा अटोमिक बम्बिंग्स से हिरोशिमा-नागासाकी के प्रारम्भ में हिरोशिमा में 1 लाख 50 हजार तथा नागासाकी में 2 लाख 46 हजार लोग मारे गये और आज तक वहाँ रेडिएशन से उत्पन्न कैंसर के खतरे की संभावना के साथ बच्चे जन्मते हैं। वर्तमान में इजरायल, हमास, प्लेसटाइन, हेजबोल्हा, इरान, सीरिया, रसिया-यूक्रेन की लड़ाई भी इसी का प्रतिफल है। हर धर्म प्रेम एवं शान्ति का सन्देश देता है, यदि इसे सभी मान लें तो लड़ाई का कोई स्थान नहीं होगा।
महाउपनिषद् का यह मंत्र सारी दुनिया में सदैव प्रेम, मैत्री तथा विश्व भ्रातृत्त्व-भगनित्त्व (Brothesterhood) का संदेश देता है -
अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
अर्थात- यह मंत्र राष्ट्र-राष्ट्र, पड़ोसी-पड़ोसी के सारे तनाव लड़ाई-झगड़ा को नष्ट कर करूणा, प्रेम, त्याग एवं स्वास्थ्य समृद्ध बनाता है।
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