स्वास्थ्य समाचार
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अमेरिका की जूठे बर्तन दो दिन तक सिंक में रखते हैं, इससे किडनी फेल से गर्भपात तक हो सकता है, बच्चे-बूढ़ों पर सबसे ज्यादा असर :
अमेरिका में हर साल सिर्फ दूषित खाने की वजह से 4.80 करोड़ लोग बीमार पड़ जाते हैं
भारत में सदियों पुरानी कहावत है, जूठे बर्तन कंगाली लाते हैं। कंगाली का तो पता नहीं लेकिन जूठे बर्तन बीमारी जरूर लाते हैं। इसलिए लोग सोने से पहले रात के जूठे बर्तन सिंक में नहीं छोड़ते। हालाँकि शहरों में बर्तन धोकर ही सोने की परंपरा टूट रही है और रात के जूठे बर्तन सुबह धोए जाने लगे हैं। अमेरिका में तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं। यहाँ हुए एक सर्वे के अनुसार, अमेरिकी औसतन 2 दिन तक जूठे बर्तन सिंक में रखते हैं। आधे लोग तो हफ्ते में सिर्फ ३ बार डिशवाशर चलाते हैं। यानि जब तक उनके पास खाने के लिए बर्तन होते हैं, वे बर्तन धोते ही नहीं। ये सारे जूठे बर्तन सिंक में पड़े रहते हैं।
एक सर्वे में यह बात भी सामने आई कि आर्थिक रूप से समृद्ध घरों में जूठे बर्तन ज्यादा समय तक सिंक में पड़े रहते हैं। इस सर्वे में यह भी पता चला कि एक अमेरिकी ने अपने फ्रीजर में पिछले साल औसतन ५ चीजें रखीं और सालभर में उनका कभी इस्तेमाल ही नहीं किया। यूएस सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, अमेरिका में दूषित खाने की वजह से हर साल ४.८० करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं।
सिंक में देर तक जूठे बर्तन पड़े रहने पर सालमोनेला, लिस्टीरिया और ई. कोली बैक्टीरिया पनपते हैं। एनएसएफ इंटरनेशनल की सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर लीजा याक्स कहती हैं, ये बैक्टीरिया स्वस्थ लोगों पर ज्यादा प्रभावी नहीं होते, लेकिन जो पहले से बीमार हैं या फिर जिनकी इम्यूनिटी कमजोर हैं, वे इन बैक्टीरिया से बीमार पड़ जाते हैं। ऐसे लोगों को उल्टी, पेट दर्द या डायरिया हो सकता है।
बैक्टीरिया के गंभीर संक्रमण से गर्भपात का खतरा -
गंभीर इन्फेक्शन होने पर किडनी फेलियर तक का खतरा होता है। ज्यादा गंभीर स्थिति होने पर गर्भपात और किडनी फेलियर का खतरा होता है। इसलिए जब भी घर में बच्चे, बूढ़े और गर्भवती महिला हो तो किचन को हर समय साफ रखें, क्योंकि ये बैक्टीरिया सबसे ज्यादा इन्हें बीमार बनाते हैं। अपने बर्तनों में लगे रबड़ की सफाई अच्छे से करें, क्योंकि एनएसएफ इंटरनेशनल को सिंक, ब्लेंडर गैसकेट और फ्रिज के वेजीटेबल बॉक्स के बाद सबसे ज्यादा बैक्टीरिया यहीं मिले हैं।
अमेरिका के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर, फूड एंड एनवायरनमेंट में एसोसिएट एक्सटेंशन प्रोफेसर रेनफ्रो कहते हैं- अपने किचन में हर चीज ये मानकर इस्तेमाल कीजिए कि वह प्रदूषित है। आप हमेशा स्वस्थ रहेंगे। वे कहते हैं कि सब्जी या मांस-मछली पकाने से पहले अच्छी तरह धोएं। उसके बाद उन बर्तनों को भी तुरंत धो लें, जिनमें इन्हें धोया गया है।
किचन में ये सावधानियां बरतें, परिवार स्वस्थ रहेगा-
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जूठे बर्तन और खाने के अवशेष किचन में ज्यादा देर तक न रखें।
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हर बार खाना बनाने के बाद किचन और गैस स्टोव को अच्छी तरह से साफ करें।
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जब भी बाहर से सब्जियां और फल लाएं, फ्रिज में रखने से पहले अच्छी तरह धो लेंं।
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जूठे बर्तन और खाने के अवशेष किचन में ज्यादा देर तक न रखें। कूड़ा ढके हुए बैग में रखें।
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परिवार में बच्चे से लेकर बड़े तक सबकी आदत लगाएं कि अपनी खाने की प्लेट खुद धोएं।
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खाना कभी भी खुले में न रखें। खाना बनने के 40 मिनट के अंदर खा लेना सबसे अच्छा है।
साभार - https://www.bhaskar.com/happylife/news/americans-keep-fake-dishes-in-the-sink-for-two-days-due-to-this-risk-of-kidney-failure-miscarriage-130678075.html
‘अल्ट्राप्रोसेस्ड’ खाना यानि डिमेंशिया का खतरा-
केक, बिस्कुट और चिप्स आदि अधिक खाते हैं तो संभल जाएं। दस हजार लोगों पर किए गए अध्ययन के मुताबिक अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाना दिमाग की ताकत पर असर डालता है। यह डिमेंशिया का खतरा भी बढ़ा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह सबसे नुकसानदायक स्नैक्स है जो संज्ञात्मक क्षमता पर असर डालता है। मध्य आयु वर्ग के वयस्कों पर हुए इस अध्ययन के अनुसार जिनके आहार का तीन चौथाई हिस्सा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड से युक्त होता है, उनका दिमाग दूसरों की तुलना में 28 प्रतिशत अधिक तेजी से घटता है।
हमारा शरीर दर्द व सूजन में खास भूमिका निभाने वाला एक प्रोटीन साइटोकिंस बनाता है। यह तब तेजी से बनता है, जब हम ज्यादा मात्रा में मीठी चीजें खाते हैं। केक, बिस्कुट व पेस्ट्री आदि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड में दूसरे प्रोसेस्ड फूड की तुलना में ज्यादा चीनी, नमक व संतृप्त वसा होती है। हालिया अध्ययन जामा न्यूरोलॉजी में छपा है। दिमाग के न्यूरोइमेजिंग अध्ययन के अनुसार, पश्चिमी आहार पैटर्न पर आधारित भोजन का अधिक सेवन दिमाग के हिप्पोकैंपस और संज्ञात्मक क्षमता प्रभावित करने वाले कारकों में कमी लाता है।
साभार - https://www.dw.com/hi/bad-diet-causes-cognitive-decline-fact-or-myth/a-64120737
दुनियाभर में शाकाहार के प्रति बढ़ रहा रुझान, अमरीकी ले रहे सबसे ज्यादा दिलचस्पी-
दुनियाभर में शाकाहार के प्रति रुझान बढ़ रहा है। पिछले तीन साल में कई देशों की आबादी के एक अहम हिस्से ने इसे अपनाया है। स्टेटिस्टा की ओर से किए गए वैश्विक उपभोक्ता सर्वे के अनुसार अमरीका में शाकाहार पसंद करने वालों की संख्या में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है। यूरोपीय देशों में भी यह चलन बढ़ रहा है। वहीं, भारत और चीन में गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भले ही जीव रक्षा, प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखने जैसी वजहों से यह चलन बढ़ा है, लेकिन इससे स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी।
भारत में सर्वाधिक शाकाहारी लोग-
वर्ष 2019 की तुलना में भारत में अनाज, फल और सब्जियां आदि खाने वालों की संख्या घटी है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि विश्व में सबसे ज्यादा शाकाहारी भारत में ही हैं। देश की एक-चौथाई से अधिक आबादी शाकाहारी है।
पर्यावरण बचाने के लिए बदला आहार-
अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका में तीन साल के दौरान शाकाहार अधिक परोसे जाने लगा है। अमरीका की दो प्रतिशत आबादी वीगन डाइट (पेड़-पौधों से प्राप्त) फॉलो करती है। सेहतमंद रहने और वजन घटाने के उद्देश्य से यहां लोग शाकाहार में दिलचस्पी लेने लगे हैं। इसी तरह ब्रिटेन में 88 लाख लोग वर्ष के अंत तक शाकाहार अपनाने का विचार कर रहे हैं। इनमें युवाओं की संख्या अधिक है। जर्मनी में लोग पर्यावरण के प्रति सजग हैं, इसलिए कई साल से यहां शाकाहार को प्राथमिकता दी जा रही है।
मशहूर हस्तियां बता रहीं फायदे-
अपने बारबेक्यू के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध दक्षिण कोरिया में भी यह चलन बढ़ा है। यहां कई मशहूर हस्तियां वेजिटेरियन या वीगन लाइफस्टाइल फॉलो करती हैं, जो समय-समय पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इनके फायदे बताती रहती हैं। इसलिए दक्षिण कोरिया में स्थानीय लोगों के साथ-साथ कंपनियां और सरकार भी इस ओर विशेष ध्यान देने लगे हैं। वहीं जिन देशों में शाकाहार में कमी आई है, उनमें मैक्सिको, ब्राजील और स्पेन शामिल हैं।
साभार- https://www.patrika.com/jaipur-news/parents-decided-be-the-cradle-of-the-fees-act-and-then-deposit-the-fe-6850205/jaipur-news/the-rise-of-vegetarianism-7843280/
प्रेगनेंसी में थोड़ा-सा भी अल्कोहल पीना है खतरनाक, बच्चे के दिमाग पर पड़ सकता है असर-
शराब या अल्कोहल ऐसी ही चीज़ है जिसका सेवन प्रेगनेंसी में मना किया जाता है। विभिन्न स्टडीज़ में यह बात साबित हो गयी है कि प्रेगनेंसी में शराब पीना बच्चे के लिए बहुत नुकसानदायक साबित होता है।
गर्भावस्था में खाने-पीने का काफी ख्याल रखना पड़ता है। खासकर, ऐसी चीज़ें खाने से रोका जाता है जिनसे उनके पेट में पल रहे बच्चे को नुकसान हो सकता है। शराब या अल्कोहल ऐसी ही चीज़ है जिसका सेवन प्रेगनेंसी में मना किया जाता है। विभिन्न स्टडीज़ में यह बात साबित हो गयी है कि प्रेगनेंसी में शराब पीना बच्चे के लिए बहुत नुकसानदायक साबित होता है।
क्यों नहीं पीनी चाहिए प्रेगनेंसी में शराब?-
कई बार महिलाएं गर्भावस्था में सिगरेट और शराब पीने से खुद को रोक नहीं पाती। थोड़ी-सी मात्रा में अल्कोहल पीना सेफ है यह समझकर महिलाएं कभी-कभार थोड़ी शराब पी लेती हैं। लेकिन, शराब की यह छोटी-सी मात्रा भी आपकी सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक साबित हो सकती है।
स्टडीज़ और रिसर्च के अनुसार, जो महिलाएं प्रेगनेंसी में शराब का सेवन करती हैं, उनके बच्चे का बर्थ वेट बहुत कम होता है। इसी तरह बच्चे के दिमागी विकास पर भी शराब पीने से दुष्परिणाम होते हैं। जी हां, विभिन्न रिसर्च इस बात का दावा करती हैं कि प्रेगनेंसी में शराब पीने से बच्चे के संज्ञानात्मक क्रियाओं पर असर पड़ता है। ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी (यूनाइटेड किंगडम) द्वारा एक रिसर्च आयोजित की गयी, जिसमें यह समझने के प्रयास किए गए कि प्रेगनेंसी में अगर कोई महिला अल्कोहल लेती है तो क्या होगा। इस रिसर्च के लिए कुल 23 पुरानी स्टडीज़ के निष्कर्षों का भी अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने रिसर्च के अंत में कहा कि गर्भावस्था में शराब पीने से बच्चे के दिमाग पर असर पड़ता है।
गर्भावस्था में शराब पीने के नुकसान-
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लो बर्थ वेट यानि जन्म के समय बच्चे का वजन मानक स्तर से कम होता है।
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बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास में अड़चनें आ सकती हैं।
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बच्चों को पढऩे-लिखने में कठिनाई हो सकती है।
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जब प्रेगनेंट महिला अल्कोहल का सेवन करती हैं तो शराब खून के माध्यम से प्लैसेन्टा तक पहुंच जाती है, जो बच्चे के लिए घातक हो सकता है।
साभार-https://www.thehealthsite.com/hindi/pregnancy/drinking-alcohol-when-pregnant-side-effects-alcohol-use-during-pregnancy-can-impact-childs-brain-development-in-hindi-770905/
फ्लू के टीके से कम हो सकता है हार्ट अटैक का खतरा, रिसर्च में हुआ खुलासा -
एक लेटेस्ट रिसर्च में यह दावा किया गया है कि फ्लू का टीका लेने से दिल का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है। इन टीकों को 65 साल से अधिक उम्र के उन लोगों को लगवाना चाहिए, जो डायबिटीज, हार्ट की बीमारी, अस्थमा, सांस संबंधी बीमारी, किडनी या लिवर जैसी बीमारियों से पीडि़त हैं।
दिल के मरीजों के लिए एक अच्छी खबर है। शोध की मानें तो फ्लू का टीका लगवाने से हार्ट अटैक का खतरा कम हो सकता है। अगर सीधे शब्दों में आपको बताएं तो अब हार्ट के मरीज हेल्दी रहने के लिए फ्लू का टीका ले सकते हैं। एक लेटेस्ट रिसर्च में यह दावा किया गया है कि फ्लू का टीका लेने से दिल का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है। इन टीकों को 65 साल से अधिक उम्र के उन लोगों को लगवाना चाहिए, जो डायबिटीज, हार्ट की बीमारी, अस्थमा, सांस संबंधी बीमारी, किडनी या लिवर जैसी बीमारियों से पीडि़त हैं।
10 देशों में हुआ अध्ययन -
एम्स के कार्डियोलाजी विभाग के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इंफ्लुएंजा टीका दिल के जोखिम को कम कर सकता है। कमजोर दिल वाले या कार्डियक अरेस्ट से पीडि़त लोगों को यह टीका जरूर लगवाना चाहिए। यह दिल के दौरे के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। यह अध्ययन लांसेट में प्रकाशित हुआ था और इसका नेतृत्व एम्स कार्डियोलाजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंबुज रॉय ने किया था। यह अध्ययन एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के 10 देशों में 30 केंद्रों पर किया गया था। जिसमें से सात केंद्र भारत में, छह चीन, चार-चार फिलीपींस और नाइजीरिया, तीन सऊदी अरब, दो मोजांबिक व एक-एक जांबिया, केन्या और युगांडा में थे।
शोधकर्ताओं को क्या मिला? -
इन्फ्लुएंजा संक्रमण हृदय संबंधी घटनाओं और मृत्यु के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ है। इसलिए अधिक उम्र के पीडि़त मरीजों को टीका लेने की सलाह दी जाती है। जिन मरीजों को इस अध्ययन में शामिल किया गया उनकी उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक थी। दिल के दौरे, स्ट्रोक और अन्य हृदय रोगों में लगभग 28 प्रतिशत की कमी आई है। जिन लोगों को पहले से ही दिल का दौरा पड़ चुका है, उन्हें इन्फ्लुएंजा का टीका लेना चाहिए।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि अगर हार्ट के मरीजों को इन्फ्लूएंजा का टीका दिया जाता है, तो हार्ट फेल होने के मामलों में 50 प्रतिशत की कमी आ सकती है। यह अनुमान लगाया गया है कि हार्ट फेल के मरीजों की संख्या 1990 में 33.5 मिलियन से लगभग दोगुनी होकर 2017 में 64.3 मिलियन हो गई है।
साभार: https://www.indiatv.in/health/flu-vaccines-can-reduces-the-risk-of-heart-attack-cardiology-department-of-delhi-aiims-research-reveales-2022-11-30-907722
10 किलो अतिरिक्त वजन जिंदगी के 3 साल घटा सकता है
बिस्तर पर लेटकर मोबाइल चलाने से भी मोटापे का खतरा
ताजा नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में लगभग 23 प्रतिशत पुरुष और 24 प्रतिशत महिलाएं ज्यादा वजन या मोटापे का शिकार हैं। यही नहीं 5 साल से कम उम्र के लगभग 3.4 प्रतिशत बच्चे भी मोटापे की गिरफ्त में हैं। देश में मोटापा जल्द ही महामारी बनने जा रहा है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार अधिक बॉडी फैट से टाइप-2 डायबिटीज, 13 तरह के कैंसर, हृदय रोग और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। यही नहीं मस्तिष्क के कार्य करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। साल 2021 में दुनियाभर में लगभग 28 लाख लोगों की मौत मोटापे से जुड़ी बीमारियों के कारण हुई। एक शोध के अनुसार 10 किलोग्राम अतिरिक्त वजन औसत आयु को तीन साल तक कम कर सकता है। यानि किसी व्यक्ति का वजन 30 किलो ज्यादा है तो उसके जीवन के 10 साल कम हो सकते हैं।
तरीके जो वजन नियंत्रित करने में कारगर हैं -
नाश्ते में अधिक प्रोटीन लें : भूख वाले हार्मोन को संतुलित करता है
प्रोटीन के पचने की प्रक्रिया धीमी होती है। साथ ही यह भूख बढ़ाने वाले हार्मोन्स को भी धीमा करता है, जिससे लंबे समय तक पेट भरे होने का अहसास रहता है। नतीजा भोजन के रूप में जाने वाली कैलोरी घटती है।
दिमाग को ट्रेंड करें : क्योंकि संतुलित भोजन एक आदत है
किसी भी नई आदत या दिनचर्या को अपनाने में लंबा समय लगता है। जब किसी नई चीज (कम कैलोरी, संतुलित भोजन) को रोज फॉलो करते हैं तो मस्तिष्क धीरे-धीरे उसे अपनाकर आदत में बदल देता है।
रोजाना की वे आदतें जो वजन बढ़ाती हैं -
सुबह के समय पानी न पीना
सुबह के समय पिया गया गुनगुना पानी आंतों को साफ कर मेटाबॉलिज्म को दुरुस्त करता है जिससे कैलोरी अधिक बर्न होती है। जबकि पानी नहीं पीने से मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ता है। वजन बढऩे का खतरा बढ़ाता है।
बहुत कम या बहुत अधिक सोना : कैलोरी इंटेक बढ़ता है
जो लोग 5 घंटे या उससे कम सोते हैं उनमें बेली फैट बढऩे की आशंका दो गुनी से अधिक होती है। वहीं 9 घंटे या अधिक सोने पर मोटे होने का खतरा २१ प्रतिशत ज्यादा होता है। ऐसा भूख बढ़ाने वाले हार्मोन के कारण होता है।
रात में लेटे हुए फोन चलाना : हार्मोन मेलाटोनिन प्रभावित होता है
फोन की ब्लू लाइट नींद के साइकिल को नियंत्रित करने वाले हार्मोन मेलाटोनिन को प्रभावित करती है। जिससे नींद आने में समस्या होती है। अधूरी नींद से हार्मोन घ्रेलिन बढऩे लगता है, जिससे व्यक्ति अधिक भोजन करता है।
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