दिव्य जीवन

दिव्य जीवन

साध्वी देवश्रुति, आचार्या- पतंजलि कन्या गुरुकुलम्, देवप्रयाग

अध्यात्म सुधा रूपी जल में स्नान से परिपूत धर्मसम्मत आचरण युक्त जीवन दिव्य जीवन कहलाता है। अध्यात्म वह आधारशिला है जिस पर दिव्य आचरण रूपी बड़े-बड़े और सुन्दर भवनों का अस्तित्व प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इस प्रकार देवत्व में प्रतिष्ठित दिव्य जीवन प्राणिमात्र के कल्याण (विश्व कल्याण) की इच्छा को ईंधन बनाकर स्वयं को उस परम पवित्र अग्रि में तपाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। दिव्य जीवन में प्रतिष्ठित होने की प्रक्रिया में सर्वाधिक महत्व मन का होता है। मन का निर्माण महत्त्व से हुआ है जो अब भी आकाश मण्डल में सर्वत्र सूक्ष्म रूप से विद्यमान है। इसे ही कुछ महापुरुषों ने विश्वमानस शब्द से सम्बंधित किया है। मनुष्य के शरीर में कार्य कर रहे मनस् तत्त्व को जो कि सम्पूर्ण शरीर में विद्यमान हैमनोमय कोषकहते हैं। इसका स्पष्टीकरण तैत्तरीय उपनिषद् में पंचकोषों में वर्णन प्रसंग में किया गया है जिसके अनुसार-

तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमय:

तेनैष पूर्ण: अर्थात् उस प्राणमय कोश के अन्दर और उससे भिन्न तत्त्व है मनोमय। उस मनोमय से यह प्राणमय पूर्ण है, व्याप्त है।
ऐतरेय उपनिषद् में कहा गया है- चन्द्रमा मनोभूत्वा हृदयं प्राविशत् अर्थात् चन्द्रमा मन होकर हृदय में प्रविष्ट हो गया। अर्थात् जिस मनस्तत्व से मन की रचना हुई है, वह चन्द्रमा की तरह प्रकाशमान है। इसलिए मन प्रकाशों का भी प्रकाश कहा गया है। मन को उसके विभिन्न कार्यों के आधार पर 5 भागों में विभाजित किया गया है। मन के इन पांच रूपों की व्याख्या यजुर्वेद के 34वें अध्याय के शिवसंकल्पसूक्त के प्रथम 6 मन्त्रों में विस्तार से की गई है। ज्ञानेन्द्रियाँ जिसके नियन्त्रण में रहकर काम करती हैं, विषयों का प्रकाशक होने के कारण मन का वह भाग दैव मन कहलाता है।
पांचों कर्मेन्द्रियाँ जिसके नियन्त्रण में रहकर कार्य करती हैं, वह यज्ञ मन कहलाता है। इसी मन का एक अंश मस्तिष्क में रहकर तर्कादि द्वारा विषयों का निश्चय करने का कार्य करता है जिसे बुद्धि कहा जाता है, इसे मन्त्रों में विज्ञान कहा गया है। मस्तिष्क में ही रहकर अनुभव किए हुए विषयों को संस्कारों के रूप में संचय करने वाले मन को चित्त कहा जाता है। इसे मन्त्रों में चेतस् नाम से कहा गया है। मनोमय तत्व का पाँचवा भाग धृतिमन कहलाता है जो कि ऐसी शक्तियों, विषयों एवं क्रियाओं को धारण किए रहता है जिनका आत्मा के भी प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान नहीं होता। मन के चार रूपों दैव मन, यक्ष मन, बुद्धि एवं चित्त को व्याप्त मन कहा जाता है क्योंकि इनकी क्रियाएँ प्रकट रूप से आत्मा के नियन्त्रण में होती हैं। इसे उद्बुद्ध मन भी कहा जाता है और धृति मन को गूढ़ व्यापृत मन।
शिव संकल्प सूक्त के प्रथम मन्त्र से हमें दैव मन के विषय में विस्तृत जानकारी जैसे- दैव मन का स्वरूप और उसकी उपदर्श स्थिति के बारे में बताया गया है। शिव संकल्पसूक्त का प्रथम मन्त्र-
यज्जाग्रतो दूरमुदैति तदुसुप्तस्य तथैवेति।
दूरङ्गम ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।।
(यत्) जो (जाग्रत:) जागते हुए का (दूरम्) दूर-दूर तक बाह्य विषयों में (उदैति) उदित होता है (तत्-) और वह ही (सुप्तस्य) सोते हुए का (तथैव) उसी प्रकार (दूरङ्गगमम्) दूर देश में गया हुआ वह (उदेति) उदित होता है (तत्) वह मेरा (ज्योतिषाम् एकं ज्योति:) इन्द्रिय रूपी प्रकाशों का एक प्रकाश (मन:) दैव मन (शिव संकल्पम्) शुभ संकल्पों वाला (अरतु) होवे।
इसका भावार्थ है कि जो जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक बाह्य विषयों तक जाता है और उन विषयों का ज्ञान आत्मा को कराता है, उसी प्रकार वह सोते हुए का भी चित्त पर पड़े संस्कारों के स्मरण स्वरूप दूर-दूर तक के विषयों में जाकर उन्हें प्रकाशित करता है। वह मेरे मन इन्द्रियों का भी प्रकाशक है, मेरा मन शुभ विचारों से युक्त होवे।
आत्मा के13 साधनों (5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं अहंकार) के द्वारा ही सब प्रकार की क्रियाएँ निष्पन्न होती हैं। दैव मन का अधिकार ज्ञानेन्द्रियों पर होता है। जो इन्द्रियाँ विषयों से सम्बद्ध होकर उन विषयों का ज्ञान आत्मा से कराती हैं, उन्हें ज्ञानेन्द्रियाँ कहा जाता है। ज्ञानेन्द्रियाँ और उनके विषय निम्र हैं-
इन्द्रियाँ- नासिका    रसना    चक्षु:     श्रोत्र     त्वक्

                        ↓        ↓        ↓                                          

विषय-       गन्ध       रस       रूप     शब्द    ↓स्पर्श
स्थूल रूप से दिखने वाले अङ्ग- नाक, जिह्वा, आँखें, कान और त्वचा को इन्द्रिय नहीं अपितु इन्द्रिय के गोलक मात्र हैं। इन्द्रिय तो वह सूक्ष्म शक्ति है जिसके कारण से विषयों का ज्ञान होता है। प्राय: देखने में आता है कि स्थूल अंगों के उपस्थित होने पर
भी वृद्धावस्था या किसी रोग आदि से क्षत हो जाने पर भी विषयों का ज्ञान नहीं हो पाता और अङ्गों के क्षत हो जाने पर भी विषयों का ज्ञान ठीक प्रकार से हो जाता है तो अङ्गों के रहते हुए भी विषयों का ज्ञान नहीं हो पाता जैसे वृद्धावस्था में सुनने, देखने आदि की क्षमता का कम हो जाना। इसी प्रकार किसी दुर्घटना में कान या नाक आदि अंगों के कट जाने या क्षतिग्रस्त हो जाने पर भी सुनने, सूंघने आदि में कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि इन्द्रिय शक्ति का क्षय वहाँ नहीं हुआ होता। इससे सिद्ध होता है कि ये अङ्ग इन्द्रियों के कार्य करने के मुख्य साधन मात्र हैं इन्द्रिय नहीं। ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से होने वाले ज्ञान की प्रक्रिया को जानना अति आवश्यक है। इस प्रक्रिया में आत्मा जब किसी विषय को जानना चाहता है तो सर्वप्रथम वह अपनी इच्छाशक्ति के बल से अपने मन के अन्दर विचार तरंग उत्पन्न करता है। वह विचार तरंग सम्बन्धित विषय की इन्द्रिय के केन्द्र बिन्दु से जा टकराती है और फिर वह इन्द्रिय उस विषय से सम्बद्ध होते ही आत्मा को प्रेरणा के अनुरूप विषय के स्वरूप को साथ लिए हुए वह तरंग उसी मार्ग से लौटकर आत्मा को उस विषय का ज्ञान कराती है।
आत्मा   → मन   →  ज्ञानेन्द्रिय  →   विषय

 

ज्ञान
इस प्रक्रिया में एक भी व्यवधान होने पर ज्ञान की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो पाती। कई बार देखने में आता है विषय के सामने होने इन्द्रिय के स्वस्थ होने पर भी विषय का ज्ञान नहीं होता क्योंकि मन ज्ञानेन्द्रियों से सम्बद्ध नहीं होता या ठीक से सम्बद्ध नहीं होता। अत: ज्ञान कराने की प्रक्रिया में मन का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि दैव मन को सुनियन्त्रित कर लिया जाए तो आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की उन्नति बहुत ही तीव्र गति से होती है। इसी कारण से दैव मन को इन्द्रियों का भी प्रकाशक कहा है। इसी दैव मन के स्वरूप प्रतिपादन करते हुए मन्त्र में कहा गया है- यज्जाग्रतो दूरमुदैति अर्थात् यह मन जागते हुए या जाग्रत अवस्था में पूर्वोक्त प्रक्रिया के अनुसार अनेकानेक विषयों का ज्ञान कराता है, तदु सुप्तस्य तथैवेति अर्थात् उसी प्रकार सोते हुए भी दूर-दूर तक बाह्य विषयों से सम्बद्ध होकर ज्ञान कराता है परन्तु स्वप्रावस्था में मन ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विषय से जुडक़र विषय का ज्ञान नहीं कराता अपितु चित्त पर पड़े संस्कारों के स्मरण के फलस्वरूप विषयों का ज्ञान कराता है। यह मन ज्योतिषां ज्योतिरेकं अर्थात् प्रकाशकों का भी प्रकाशक है। कहने का तात्पर्य है कि जब ज्ञानेन्द्रियों विषय से सम्बद्ध होकर विषय का ज्ञान कराती है तब यह ज्ञानेन्द्रियों का प्रकाशक होता है, उनसे सम्बद्ध होता है।
इस प्रकार दैव मन की शक्तियों एवं उसके स्वरूप को बताते हुए ऋषि ने मन्त्र के चौथे पाद में प्रार्थना की है वह मेरा दैव मन जो अनन्त सामर्थ्य से युक्त है, देवों (ज्ञानेन्द्रियों) का स्वामी है, आत्मा रूपी राजा का प्रधानमन्त्री या प्रधान सेवक है, वह मेरा मन सदा सर्वदा शुभ संकल्पों से, शुभ विचारों से, शुभ भावनाओं से युक्त होवे क्योंकि अनन्त शक्ति और सामर्थ्य का योग शुभ संकल्पों कल्याणकारी विचारों से होते ही जीवन जगत का स्वरूप बदल जाता है और उसी प्रकार शक्ति या सामर्थ्य का योग अशुभ संकल्पों से होते ही प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी बात को सुस्पष्टतया समझाने के लिए हमारे ऋषियों ने अनेकानेक चार वेदों की ऋचाओं, संदेशों आदि के माध्यम से मनुष्य मात्र को प्रेरित करने का प्रयास किया है, जैसे- ‘भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा: भद्रं पश्येम अक्षभिर्यजत्रा:’ अर्थात् कल्याण को चाहने वाला मनुष्य कानों से भद्र (कल्याणकारक) ही सुने, आँखों से भद्र ही देखे इत्यादि। सबके कल्याण की भावना ही वैदिक संस्कृति का आधार है और यह परम सत्य है कि सबके कल्याण की भावना वास्तविक रूप में यदि किसी के मन में उत्पन्न हो जाए तो उस व्यक्ति की आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है क्योंकि विश्व की उन्नति का मार्ग ही आत्मोन्नति है।

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