चिकित्सा की भारतीय परंपरा
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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
स्वस्थ सदाचार सम्पन्न जीवन की एक विराट परंपरा प्राचीनतम काल से भारत में प्रतिष्ठित है। इसके लिये चारों वर्णों और चारों आश्रमों का महत्व प्राचीनकाल से प्रतिपादित है। आधुनिक काल में भी ऋषि दयानन्द सहित सभी मनीषियों ने श्रेयस्कर और सदाचारी जीवन का आध्यात्मिक और लौकिक दोनों ही प्रकार का महत्व प्रतिपादित किया। इसीलिए धर्मशास्त्रों में सम्पूर्ण जीवनचर्या की विधियां प्रतिपादित हैं। इनमें प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठने से लेकर दिनभर के समस्त कार्यों को सम्पादन करने और रात्रिशयन तक तथा पुन: प्रात: उठने तक का दिनचर्या का सम्पूर्ण क्रम विस्तार से प्रतिपादित है। प्रात: स्मरण के उपरांत शौचचार की विधियां प्रतिपादित हैं। क्योंकि कहा गया है कि ‘शौचाचारविहीनस्य समस्ता निष्फला: क्रिया:’ अर्थात् शौचाचार का पालन नहीं करने पर सारी क्रियायें निष्फल ही हो जाती हैं। बाहरी और आभ्यन्तर दोनों प्रचार के शौच का शास्त्रों में भली भांति प्रतिपादन है। उसके उपरांत आसन, प्राणायाम आदि योग की क्रियाओं की साधना स्नान की विधियों का तथा तर्पण की क्रियाओं का वर्णन है। ब्रह्मचारी और गृहस्थ तथा वानप्रस्थी और सन्यासी के लिये अलग-अलग दिनचर्या का भी प्रतिपादन विस्तार से किया गया है। इस प्रकार स्वस्थ जीवनवृत्त का सम्पूर्ण प्रावधान हमारे शास्त्रों में प्राचीनतम काल से है।
प्रतिदिन के कर्म अर्थात आह्निक कर्म ब्रह्मचारियों के अलग होते हैं, गृहस्थों के अलग और वानप्रस्थों तथा सन्यासियों के अलग। व्यवस्थित दिनचर्या के साथ ही विभिन्न कारणों से स्वास्थ में व्यवधान आने पर उनके उपचार की भी विस्तृत मीमांसा हमारे शास्त्रों में की गई है। ज्ञान की अनंतता और विविधता के कारण जीवनचर्या के स्वरूपों की विविधता और उपचार की विविधता का भी ज्ञान भारतीयों को प्राचीनकाल से है। इसीलिए कहा गया है कि आयुर्वेद अनंत है क्योंकि चिकित्सा की विधियां भी अनंत हो सकती हैं। किसी भी व्यक्ति की जन्म से लेकर चेतना के बने रहने तक की अवधि को आयु कहा जाता है और सम्पूर्ण आयु स्वस्थ रहने की विद्या ही आयुर्वेद है।
आयुर्वेद में वर्णित औषधियों का वनस्पतियों, पशुओं से प्राप्त दूध, घी, गोबर, गोमूत्र आदि और विभिन्न खनिज तत्वों तथा धातुओं के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। इस मूल आधार के कारण ही आयुर्वेदिक औषधियां मनुष्यों के लिये सब प्रकार से कल्याणकारी और निरापद कही गई हैं। इसीलिए भारतीय चिकित्सा पद्धति में केवल रोगों के निदान और लक्षण का ही प्रतिपादन नहीं है अपितु शरीर और मन के समस्त विकारों का भी विस्तार से प्रतिपादन है।
वेदों में भी मानव शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगों का वर्णन है। मस्तिष्क, कपाल, शीर्ष या सिर, ललाट, नासिका, आंखे, कान, कपोल, ठुड्डी, ग्रीवा, दांत, जीभ, हृदय, त्वचा, नाड़ी, रक्त, मांस, मज्जा, वसा, हाथ, पैर, उदर, आंते, प्लीहा, कुक्षि, नाभि, जांघे, श्रोणि, अस्थि, स्तन, वक्ष, धमनियां, कंधे, पीठ, उंगलियां, विसर्जन और प्रजनन के सभी अंगों का स्वयं अथर्ववेद में विस्तार है और वहाँ पशुओं की अस्थियों का भी अलग से प्रतिपादन है। शरीर का निर्माण करने वाली सात धातुओं का भी आयुर्वेद में विस्तृत वर्णन है- रक्त, मांस तंतु, मेद या वसा, हड्डियाँ, मज्जा, शुक्र और रस, ये सात मूल धातुएँ हैं। मनुष्य जो भोजन करते हैं उसका सार भाग रसधातु को रचता है। उसी से रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र निर्मित होते हैं। इस समस्त प्रक्रिया के मूल में ओज होता है। ओज ही धातुओं का सार है और वही मनुष्य का मुख्य बल है।
वस्तुत: आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है। इसीलिए उसे पंचमवेद भी कहा गया है। आयुर्वेद के प्रवर्तक स्वयं ब्रह्मा हैं और इसके आचार्यों की अत्यन्त विस्तृत परंपरा है। जिसमें से काय चिकित्सा की परंपरा अलग है और शल्य चिकित्सा की अलग। सामान्यत: काय चिकित्सा को ऋषि अत्रि से जोडक़र इसे आत्रेय परंपरा कहा जाता है और शल्य चिकित्सा भगवान् धन्वन्तरि की परंपरा में प्रसिद्ध है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता हमारी अत्यंत प्राचीनकाल की आयुर्वेद परंपरा के कोश हैं। विश्व में सर्वत्र शल्य चिकित्सा का मूल सुश्रुत संहिता ही है। इसके अतिरिक्त अष्टांग संग्रह, काश्यप संहिता, माधवनिदान, शांर्गधर संहिता, भावप्रकाश आदि प्राचीन चिकित्सा ग्रंथ हैं।
काय चिकित्सा में संपूर्ण शरीर को स्वस्थ रखने सम्बंधी नियमों और औषधियों का प्रशस्त प्रतिपादन है। नाड़ी का ज्ञान आयुर्वेद का मूल है और आयुर्वेद सिद्धांत तथा नाड़ी विज्ञान का आधार त्रिदोष है। वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषों और उनकी स्वस्थ स्थितियों तथा विकारों के विषय में आयुर्वेद गहराई से विचार करता है। जिन पंच महाभूतों को अर्थात पृथ्वी, जल, तेज या अग्नि, वायु और आकाश को सृष्टि में व्यक्त माना जाता है उनमें से आकाश और वायु में वात स्थित है और अग्नि तथा सूर्य पित्त का आधार हैं जबकि चंद्रमा और जल कफ का आधार हैं। बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था इन तीनों में क्रमश: वात, पित्त और कफ की प्रधानता होती है। नाड़ी ज्ञान की परंपरा भी भारत में अत्यंत प्राचीनकाल से है।
महर्षि धन्वंतरि ने कहा है कि चिकित्सक को चाहिए कि पहले समस्त विद्याओं का अध्ययन कर ले और इसके बाद चिकित्साशास्त्र को जाने। चरकसंहिता में हिमालय के शिखर क्षेत्रों में ऋषियों की परिषदें होने का वर्णन मिलता है। उन परिषदों में ही आयुर्वेद के अष्टांग विभाग किये गये जो ये हैं-
काय चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, रसायन, वाजीकरण, शालाक्य, कौमारभृत्य (बालरोग चिकित्सा), विषचिकित्सा या विषप्रशमन और भूतविद्या।
आयुर्वेद में सर्वाधिक बल दिनचर्या और रात्रिचर्या के श्रेष्ठ नियमों के पालन पर दिया गया है। चरक संहिता में और वाग्भट्ट रचित अष्टांग हृदय में दोनों चर्याओं का विस्तृत वर्णन है। ऐसी विस्तृत दिनचर्या एवं रात्रिचर्या का व्यवस्थित विवरण विश्व की अन्य किसी चिकित्सा पद्धति में उपलब्ध नहीं है। इसे ही वर्तमान में यूरो-अमेरिकी लोग जैविक घड़ी की जैविक लय (बायलॉजिकल रिद्म) कहते हैं और वर्ष 2017 का नोबुल पुरस्कार अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों को इसी विषय पर शोध के लिये मिला है। जबकि आयुर्वेद के विद्वानों ने अर्थात् हमारे ऋषियों ने करोड़ों या लाखों वर्ष पूर्व इन सब नियमों का ज्ञान विस्तार से प्रतिपादित कर दिया है।
ऋतुओं के अनुकूल जीवन जीने को ऋतुचर्या कहा जाता है। ऋतुचर्या के पालन से आयु सुखमय और हितकारक होती है। आयुर्वेद में छहों ऋतुओं में वातावरण में होने वाले परिवर्तनों और प्राणियों के शरीर में होने वाले लक्षणों और विकारों की गंभीर विवेचना है तथा उसी आधार पर पथ्य और अपथ्य तथा कुपथ्य आहार और विहार की विवेचना की गई है। समशीतोष्ण कटिबंध के लिये दिनचर्या और रात्रिचर्या अलग है और उष्णकटिबंध के लिये अलग है। भारत में छ: ऋतुयें होती हैं और उन सभी में वातावरण तथा शरीर में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों का ज्ञान आयुर्वेद शास्त्रों में है। वात, पित्त और कफ में होने वाले विकारों को पंचकर्म के माध्यम से शरीर से बाहर निकालने की विद्या आयुर्वेद में प्रतिपादित है।
हम जो आहार लेते हैं उन सभी आहारद्रव्यों के बारह भाग आयुर्वेद में प्रतिपादित हैं -
शूक धान्य (गेहूं, चावल, जौ, मक्का आदि), शमी धान्य (दालें), शाक, फल, हरित (अदरक, पुदीना, मूली आदि), जल, गोरस, इक्षु (गन्ने का रस और उससे निर्मित गुड़, खांड, शक्कर आदि), कृतान्न (पकाकर तैयार किये गये दूध के व्यंजन, सब्जियां और सूप आदि), मद्य (आसव और मादक द्रव्य), आहारयोग (घी, तेल, मसाले, नमक आदि) और मांस।
इनमें से प्रत्येक के गुणधर्म का प्रतिपादन आयुर्वेद ग्रंथों में है और उनके असर से आहार-विहार संबंधी पथ्य-अपथ्य और कुपथ्य का वर्णन करते बहुत से मुहावरे, कहावतें और कवितायें समाज में लोकजीवन में फैली हैं। जिनके कारण गांव और वनों में रहने वाले सर्वसाधारण भारतीय को भी आहार-विहार के सामान्य नियमों का भी ज्ञान है और चिकित्सा के नियमों का भी। गांव में पालतू पशुओं की हड्डियां टूटने पर हडजोड़ को खपच्चियों के सहारे बांधने की कला बहुविदित है और लाखों पशुओं का इस तरह उपचार होता रहता है। किस ऋतु में क्या खाया जाये और किस रोग के उभरने पर क्या खाकर उसे शमित किया जाये, इसका विस्तृत विवरण भारत में सर्वत्र ज्ञात है। किस शरीर के लिये किस प्रकार का भोजन अनुकूल है, इसका भी ज्ञान इन्हीं आयुर्वेद ग्रंथों और वैद्यों के कारण भारत के गांव-गांव और वनों सहित सर्वत्र व्याप्त है।
किस आहार अथवा किस औषधि को किस पदार्थ के साथ किस मात्रा में लिया जाये, इसे ही अनुपान कहा जाता है। सही अनुपान के साथ लिया गया आहार और औषधि बहुत लाभ करता है और अनुपान का चयन व्यक्ति की प्रकृति, आयु, अवस्था और रोग की स्थिति के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार स्वास्थ्य रक्षा के सूक्ष्मतम विषयों का विचार आयुर्वेद की भारतीय चिकित्सा पद्धति में है। इसी प्रकार परस्पर विरोधी कौन से आहार हैं, जिनका एक साथ सेवन कभी नहीं करना चाहिये, इसका भी विचार भारतीय चिकित्सा पद्धति में विस्तार से है। जैसे दूध और दही या दूध और मूली या जामुन और घी और शहद को समान मात्रा में मिलाकर खाना या दही के साथ पनीर या गर्म भोजन के साथ खीरा या केला के साथ मट्ठा या मूली, लहसुन आदि खाकर दूध पीना - ये सब विरूद्ध आहार हैं जिनसे अनेक रोग होते हैं। उन सब विरूद्ध आहारों और उनसे होने वाले रोगों का वर्णन भी भारतीय चिकित्सा पद्धति में है जो एक विशेष और अपवाद बात है। अन्यत्र, विशेषकर ऐलोपैथी चिकित्सा में विरूद्ध आहार का ऐसा कोई विस्तृत विचार उपलब्ध नहीं।
शरीर और मन में प्रकृति से ही अर्थात् स्वभाव से ही अनेक वेग उत्पन्न होते हैं। इनमें से कुछ वेग ऐसे होते हैं, जिन्हें रोकना नहीं चाहिये। भारतीय चिकित्सा पद्धति में इन्हें अधारणीय वेग कहा जाता है जैसे मलमूत्र त्यागने की इच्छा, अपानवायु, वमन, डकार, जंभाई, आंसू, भूख, प्यास, नींद और अधिक श्रम करने पर चलने वाली तेज सांस, खांसी और शुक्र का वेग- इन 13 वेगों को रोकने का निषेध है अर्थात् इन्हें रोकना नहीं चाहिये।
दूसरी ओर तीन प्रकार के वेग धारणीय वेग हैं, जिन्हें अवश्य रोकना चाहिये। इनमें कायिक, वाचिक और मानसिक धारणीय वेग हैं। दूसरों को कष्ट पहुंचाने की तीव्र इच्छा या चोरी या चोट पहुंचाने की इच्छा या हिंसक विचार आदि शारीरिक या कायिक धारणीय वेग हैं। इन्हें रोकना ही चाहिये। इसी प्रकार कठोर वचन, चुगली, झूठ, बिना सही अवसर के बोलना, द्वेष, वितंडा और विवाद वाचिक धारणीय वेग हैं। इन्हें अवश्य रोकना चाहिये। इसी प्रकार लोभ, क्रोध, ईष्र्या, दूसरों का धन या अधिकार हड़पने की लालसा, अभिमान, भय, शोक, निर्लज्जता और अनुचित कामवासना- ये मानसिक धारणीय वेग हैं। इन्हें भी अवश्य रोकना चाहिये।
ज्वर यानी बुखार के विभिन्न भेदों प्रभेदों का वर्णन अथर्ववेद से लेकर आयुर्वेद ग्रंथों तक में भरे पड़े हैं। इसी तरह जोड़ों की पीड़ा या शिरोरोग या हृदयाघात या पीलिया या गलित कुष्ठ आदि का भी वर्णन हमारे आयुर्वेद शास्त्रों में है। वेदों में तथा आयुर्वेद ग्रंथो में औषधियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। इस प्रकार चिकित्सा की भारतीय पद्धति सांगोपांग है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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