एक राष्ट्रवादी संन्यासी का उद्घोष- संस्कृति एवं परम्पराओं की पुन: स्थापना

एक राष्ट्रवादी संन्यासी का उद्घोष-  संस्कृति एवं परम्पराओं की पुन: स्थापना

डॉ. रुपेश शर्मा,  योग संदेश विभाग

भारत दूध, दही, घी की नदियों का देश पुकारा जाता रहा है। भारतीय संस्कृति में गाय के दूध घी का महत्त्व आदिकाल से चला रहा है। द्वापर युग से गाय, गाय के दूध, मक्खन, घी को सर्वोच्च माना गया। हमारा देश तब से गाय के ही घी का सेवन अपने व्यजनों को पकाने में उपयोग करते रहे है। अचानक से इस देश में कुछ बाहरी आक्रमणकारियों ने हमला किया। यह हमला हमारे देश पर नहीं यह हमला पूर्णत: हमारी संस्कृति पर, हमारे रहने पर, हमारे पहनावे पर, हमारी बोली पर या कहिये कि ऐसा कोई स्थान नहीं बचा जहाँ पर इन आक्रमणकारियों ने हमला किया हो। तब से लेकर आज तक हम इस हमले का दर्द झेल रहे है। आज भी हम बाहरी आक्रमणकारी शक्तियों का रोज शिकार होते चले रहे हैं। आप इसे ऐसे समझ सकते है तब आक्रमण बाहर के देशों से आये राजाओं ने इस देश पर किया तब हमारी संस्कृति को अपने बाहुबल के तले इसे कु चला दिया गया। आज वो ही काम बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी अपने उत्पादो नीतियों से हमारी बची हुई संस्कृति को नष्ट करने के काम में अपनी ताकत लगा रही हैं।
हमारी माताओं ने, दादी-नानी ने स्वादिष्ट व्यंजनो को बनाने की जो विधियां अपने पास बचाकर रखी हुई है। आज उन व्यंजनों पर उन्हें पकाने वाली विधियों पर नजर लग गई है। श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज कहते है कि दादी-नानी के समय पर हमारे पकवान देसी तरीकों से बनाये जाते थे, वो भीगाय के दूध से बने घीसे। मेहमानों का स्वागत दूध से किया जाता था। खाने में रोटियों पर मक्खन या नौनी घी चुपडक़र रोटियां खाई जाती थी। परन्तु समय  ऐसा बदला उस देसी को जिसे हमारे  पूर्वज बरसों से अपने व्यंजनों में उपयोग करते आये थे। आज वो ही देसी घी बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों के भ्रामक विज्ञापनों के सामने औन्धें मुँह गिरा हुआ है। इन विज्ञापनों में भारतीय पारम्परिक तेल घी को इस तरह प्रदर्शित किया है कि इनके सेवन से आपको हृदयघात, कैंसर इत्यादि जैसी भयानक बीमारियां हो सकती हैं। इसका परिणाम यह हुआ आज भारतवासियों के खाने की थाली में देसी घी सरसों का तेल गायब हो गया। शुद्ध  मक्खन दही, छाछ तो आज की पीढ़ी जानती ही नहीं कि इसके सेवन से कभी स्वास्थ्य निर्माण होता था। ऐसा नहीं है कि यह सब एक दिन में हुआ है या यह कहे कि इसमें इस देश के लोगों का हाथ नहीं। इन सब परिवर्तन के पीछे कहीं कहीं हमारी पिछली सरकारें उनकी गलत नीतियां शामिल है। जिस कारण आज की पीढ़ी दो-राहे पर खड़ी हुई है।
श्रद्धेय स्वामी जी बताते हैं कि भारत विश्व में खाद्य तेल उत्पाद में अग्रणी स्थान रखता आया है। इस देश में तिलहन की खेती किसानों की आय की पहली पसन्द थी। भारत में पीली सरसों का तेल सर्वोत्तम माना गया है। उसके बाद तेल के निम्न स्रोत इस प्रकार रहे हैं- मूगंफली, रामतिल, कुसुम, नारियल, अलसी, सोयाबीन, सूरजमुखी और अरण्डी। हांलाकि अरण्डी और अलसी का तेल खाने में प्रयोग नहीं किए जाते, मगर बाकी सभी तेल आज हमारे व्यंजनों में स्वाद लाने या इन तेलों में व्यजनों को पकाने में उपयोग करते हैं।
स्वतंत्रता से पूर्व हमारी तिलहन की फसले सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए पर्याप्त थी। सभी वर्ग के लोग सरसों अन्य तेलों का उपयोग अपने व्यंजनों को पकाने में उपयोग करते थे। इन संस्कृति और इस परम्परा पर अचानक से कुछ बाहरी लोगों की कू दृष्टि पड़ी। उन्होंने 1930 के आस-पास हाइड्रोजनेटेड वेजिटेवल ऑयल भारत में उतारा। इनका मकसद साफ था वह भारतीयों को इस प्रकार का सस्ता तेल उपलब्ध करवाकर उन्हें पारम्परिक घी, तेल से दूर किया जा सके। जो घी, तेल भारतीयों के स्वास्थ्य का परिचायक था वह घी, तेल इन सस्ते तेल के विकल्प के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया।
नीदरलैंड से आई डाडा कम्पनी जिसका मालिक एक मुस्लिम था और उसका नाम कासिम डाडा था उसने 1937 . में हिंदूस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिगं कम्पनी  (आज हिंदूस्तान लीवर) ने भारत में ही वेजीटेवल ऑयल बनाने अपने ब्रांड नेम से इसे लान्च करने का वाणिज्यिक अनुबंध किया। इसके साथ ही डा के बीच लीवर काएलजोडक़र डालडा ब्रांड नेम से भारत में वनस्पति घी, तेल बेचे जाने लगा। उस समय इस घी को विलायती घी के नाम से जाना जाता था। उन दिनों जब सामूहिक भोज का आयोजन होता था तो लोग भोजन करने से पहले पूछते थे कि रसोई विलायती घी से बनाई है या देसी घी से? धीरे-धीरे यह विलायती घी खाने में खायें जाने वाले घी का विकल्प बन गया। एक वो समय आया जब दुकानदार घी मांगने पर अपने ग्राहक को वनस्पति घी यानि डालडा घी का डिब्बा उठाकर दे दिया करता था। वनस्पति घी का पर्याय डालडा हो गया था। आज हर भारतीय रसोई में वनस्पति घी और रिफाइन्ड ने जगह ले ली हैं, इन्ही घी तेलों से भारतीय व्यजनों को बनाया जाता है। आज हर घर में वनस्पति घी और रिफाइंड तेल से ही अपने व्यंजनों को पकाया जाता है।
ऐसा ही यह विलायती कम्पनियां चाहती थी और आज सम्पूर्ण भारत के हर घर में उनकी चाल कामयाब भी हो गई। आज देश में हर साल करीब ढाई करोड़ टन के आस-पास खाने के तेल की खपत होती है। इस खपत का फायदा बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी बाहरी देश ही उठा रहे हैं। इंडोंनेसिया और मलेसिया तेल उत्पादन में प्रमुख देश है। श्रद्धेय स्वामी जी ने संकल्प किया है भविष्य में विदेश से एक बूंद भी खाद्य तेल का आयात नही हो इस संकल्प को पूरा करने के उद्देश्य से स्वामी जी एक स्वदेशी कम्पनी जो अपने मालिको की गलत नीतियों के कारण दिवालिया हो गई थी। हजारों लोग बेरोजगार होने की कगार पर खड़े थे इनसे जुड़े परिवार के सदस्य हर पल खौफ की जिंदगी जीने को मजबूर हो गये और सोचने लगे कि वो दिन जायें, जिस दिन हमें काम पर आने से रोक दिया जाए। खाने का संकट हर परिवार के सामने खड़ा हो जाए। ऐसी परिस्थिति में श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की दूरदर्शिता का परिणाम यह हुआ कि स्वदेशी रूचि सोया पर एक बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी की कू दृष्टि पड़ चुकी थी। इस बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी का भारतवर्ष में बहुत बड़ा बाजार है यदि यह कम्पनी रूचि सोया का अतिग्रहण कर लेती तो हजारों युवा इस कम्पनी से निकाल दिये जाते। साथ ही यह विदेशी कम्पनी जो मुनाफा कमाती वह भारत के विकास कार्यों में खर्च करके अपने देश अपने विकास कार्य में खर्च करते। इस कम्पनी से होने वाला मुनाफा भी उनके देश चला जाता। श्रद्धेय स्वामी जी ने आनन-फानन में स्वदेशी रूचि सोया कम्पनी को पतंजलि का हिस्सा बनाकर पुन: इस कम्पनी का गौरव वापस दिलवाया और हजारों युवा जो रास्ते पर चुके थे उन्हें दोबारा से काम पर वापस बुलवाया। श्रद्धेय स्वामी जी ने रूचि सोया के अतिग्रहण के बाद सार्वजनिक रूप से कहा कि वह आने वाले समय में 10 से 20 हजार और लोगों को रोजगार देकर उन्हे स्वाभिमान जीवन देने के अपने वचन को सार्थक करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि देश का युवा आत्मनिर्भर होगा, तो राष्ट्र स्वत: ही आत्मनिर्भर हो जायेगा।
श्रद्धेय स्वामी जी महाराज ने जब रुचि सोया कम्पनी को पतंजलि परिवार का हिस्सा बनाने की सोच रहे थे तब उन्होंने देश की जनता से वादा किया और कहा कि रुचि सोया कम्पनी को पतंजलि परिवार कोई व्यापार करने के  लिए नहीं इसका अधिग्रहण कर रही है क्योंकि रुचि सोया एक स्वदेशी कम्पनी है और इसे दिवालिया होते देखना एक स्वदेशी कम्पनी अर्थात़् पतंजलि के लिए राष्ट्र हित में नहीं था। इसलिए पतंजलि परिवार ने संकल्प लिया कि इस स्वदेशी कम्पनी को पतंजलि परिवार अपने परिवार का हिस्सा बनायेंगी, चूंकि पतंजलि के लिए भारत केवल एक राष्ट्र नहीं अपितु भारत में रहने वाला हर परिवार पतंजलि परिवार का सदस्य हैं। इसलिए पतंजलि परिवार इस राष्ट्र को बाजार के रूप में नहीं देखता जैसा कि विलायती कम्पनी भारत को देखती है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज का कथन है कि पतंजलि ने रुचि सोया कम्पनी का अधिग्रहण कोई बिजनेस करने के लिए नहीं किया क्योंकि पतंजलि का एक अपना सिद्धांत है कि भारत देश हमारे  लिए कोई बाजार नहीं है, इसलिए यहाँ पर किसी भी प्रकार का कोई व्यापार नहीं किया जा सकता। पतंजलि ने  इससे पूर्व भी कई बार कहा है कि पतंजलि उत्पादों को बेच कर जो भी
धन प्राप्त होता है, उसे पतंजलि 100% चैरिटी करता है और इस देश के विकास कार्यों में खर्च करता है। जब रुचि सोया कम्पनी का अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही थी तब रुचि सोया के पास सम्पत्ति के  तौर पर 22 फैक्ट्रीयां थी। भारतीय बाजार में रुचि सोया एक  स्थापित नाम था यदि पतंजलि इसका अधिग्रहण करती तो भारत की 70-80% एडिबल ऑयल मार्केट पर MNC  का राज हो जाता। यह F.M.C.G.  सेक्टर में पतंजलि के टेक ओवर का प्रश्न ही नहीं है। इस देश में हमारा सपना था कि आर्थिक और सांस्कृतिक लूट जो सम्पूर्ण भारत में हो रही है। उससे इस देश को बचाना है और पतंजलि इस दिशा में अपना कार्य निरन्तर कर रही है। जिसका परिणाम यह है कि रुचि सोया आज पतंजलि परिवार का अंग है और यह साकार हुआ सपना किसी और का नहीं बल्कि स्वामी जी ने जब रूचि सोया को अपने परिवार का हिस्सा बनाया था तब रूचि सोया पर 9,300 करोड़ से अधिक का बैंक का कर्ज था। रूचि सोया को पतंजलि ने लगभग 5000 करोड़ रूपये की लागत से खरीदा। रूचि सोया के पास तब 22 फैक्टरियां थी और ढाई लाख हेक्टर जमीन जिस पर पाम प्लांटेशन का भारतीय किसानों के साथ अनुबंध किया है यह पाम प्लांटेशन आने वाले दिनों में तीन से पांच हजार करोड़ रुपये का हो जाएगा ऐसा अनुमान लगभग लगाया जा रहा है। खराब परिस्थितियों में भी रूचि सोया का टर्न ओवर 13 हजार करोड़ था तभी श्रद्धेय स्वामी जी ने घोषणा की थी। आने वाले वर्षों में हम रूचि सोया का टर्न ओवर 25-30 हजार करोड़ रूपये तक लेकर जायेंगे। यह हमारे श्रद्धेय स्वामी जी का सपना भी है और संकल्प भी।
पतंजलि योगपीठ के 26वां स्थापना दिवस पर अपने भावुक उद्बोधन में श्रद्धेय स्वामी जी ने बताया कि 26 वर्ष पहले उन्होंने शून्य से अपनी कर्म यात्रा प्रारम्भ किया था और आज 26 वर्ष बाद पतंजलि योगपीठ की आभा पूरे विश्व में पहचानी जाने लगी है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज का संकल्प है कि भारत को आर्थिक सांस्कृतिक गुलामी से आजादी दिलाई जाये और पतंजलि परिवार इसी दिशा में निरन्तर अग्रसर है।
इस अवसर पर पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि पतंजलि खाद्य तेल उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनें और जल्दी मलेशिया और इंडोनेशिया पर निर्भरता को खत्म किया जाये। पाम ऑयल प्लांटेशन विभिन्न प्रकार के तेल तथा सरसों के तेल का भारत में अधिक से अधिक उत्पादन हो। इस दिशा में पतंजलि बड़ा कदम उठाने जा रही है, इस कदम से देश का 2.5 लाख करोड़ रूपये की जो विदेशी मुद्रा है उसे श्रद्धेय स्वामी जी के प्रयासों से बचाया जायेगा। वर्तमान में पतंजलि योगपीठ की सहयोग कम्पनी रूचि सोया की तरफ प्रत्येक राष्ट्रवादी बड़ी उम्मीद की नजर से देख रहा है। आज रूचि सोया का मार्केट कैंप का आंकलन 1.5 से 2 लाख करोड़ रूपये का माना गया है। श्रद्धेय स्वामी जी का अगला लक्ष्य हिंदुस्तान यूनिलीवर, कोलगेट, नेस्ले, कोला-कोला तथा पेप्सी जैसी तमाम तरह की विदेशी कम्पनियों को उखाडक़र देश से बाहर फेंकना है। इन विदेशी कम्पनियों का विशुद्ध रूप से एक ही लक्ष्य है कि यह आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर देश को आर्थिक गुलामी की ओर धकेलना है। आज हमें अपने देशवासियों में यह विश्वास जगाना होगा कि हम दुनियां में बेहतर कर सकते है। हमारे स्वदेशी उत्पाद इन विदेशी उत्पादों से कही भी कम नहीं है।
श्रद्धेय स्वामी जी महाराज ने कहा कि पतंजलि परिवार स्वास्थ्य को लेकर काफी सजग रहा और इसी बात को ध्यान में रखकर पतंजलि परिवार न्यूट्रिला ब्रांड के तहत तीन नये उत्पाद बाजार में उतारने जा रहा यह उत्पाद हृदय, कॉलेस्ट्राल और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को ध्यान में रखकर उत्पाद किये जायेंगे। पतंजलि परिवार इसे न्यूट्रिला गोल्ड नाम से खाद्य तेल को आपके परिवार के लिए पेश करेगा। न्यूट्रिला हनी और न्यूट्रिला प्रोटीन आटा जो काफी न्यूट्रीशियन के साथ आपकी रसोई का हिस्सा बनेगा। यह सभी ब्रांड न्यूट्रिला, रूचि सोया की अपनी पहचान से आपके बीच आयेंगे। रूचि सोया इन प्रोडक्ट के अलावा भी कई और प्रोडक्ट बाजार में उतारे जायेगे जैसे- रूचि गोल्ड इत्यादि।
श्रद्धेय स्वामी जी हमेशा भारतवर्ष में काम कर रही स्वदेशी कम्पनियों के पक्षधर रहे है इसलिए स्वदेशी कम्पनी से बने उत्पादों को उपयोग करने की बात समय-समय पर करते रहते है। वह चाहते है कि आज देश की जनता जाने भी कि स्वदेशी कम्पनी का मिलता-जुलता नाम रखकर बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी हमारी भोली-भाली जनता को कैसे भ्रमित करने का कार्य करते हैं आज समय गया है कि इसका जवाब देश की जनता अपनी खरीदने की ताकत से दे। आज बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी कौन-कौन सी है और वह क्या बनाती है  और उसी उत्पाद को भारतीय या स्वदेशी कम्पनी किस नाम से उस उत्पाद को बनाती है। उसका समझना भी जरुरी है ताकि भविष्य में इन बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों के झांसे में सके। भारतीय बाजार में खाने वाले तेल में कुछ इस प्रकार से कम्पनियां काम कर रही है।
  •    डालडा: यह एक बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी लिपटेन इण्डिया लिमिटेड कम्पनी के द्वारा बनाया जाने वाला वनस्पति घी है।
  •    गगन, रूचि सोया, धारा: यह स्वदेशी कम्पनी है जो वनस्पति घी बनाती है स्वास्थ्य स्वाद को ध्यान में रखकर।
  •   पतंजलि रूचि सोया, रिफाइंड आयल: यह स्वदेशी कम्पनी द्वारा निर्मित सोयाबीन से बना खाने वाला तेल है, जो सोयाबीन के स्वाद को आपके खाने के साथ परोसता है।
  •    सन-ड्रोप: यह बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी सिगरेट बनाने वाली कम्पनी आईटीसी से जुड़ी हुई है, जो भारत में एग्रोटेक फूड लिमिटेड के नाम से भारत में अपना व्यापार करती और सूरजमुखी के फूल के बीजों से निकलने वाले तेल को भारत में बेचती है।
  •   पतंजलि सन फ्लोवर ऑयल, सनरिच ऑयल, पनघट: भारतीय परिवार की अपनी कम्पनी पतंजलि सन फ्लोवर ऑयल, सन रिच ऑयल सूरजमुखी के फूलों बीच के अर्क से बनाया हुआ खाने का तेल हैं। इसमें भारतीय व्यंजनों को पकाया जाता है, व्यंजनों से निकलने वाली खुशबू सूरजमुखी के फूलों की खुशबू से कम नहीं है।
  •  अनिक घी: यह विदेशी कम्पनी देश में लिप्टन इण्डिय़ा लिमिटेड के लिये काम करती है और भारत में डेरी प्रोडक्ट को बनाकर भारतीय बाजार में बेचती है। अनिक घी गाय से बने घी को बेचने का दावा करती है। यह कम्पनी सफेद झूठ बोलकर देश की जनता के साथ छलावा कर रही है। उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि इन घी बनाने वाली कम्पनियों के पास कोई स्वयं की कोई गौशाला नहीं है और कभी इस दिशा में कभी कोई कार्य किया है।
  •   पतंजलि घी, अमूल घी: पतंजलि गाय का घी भारतीय देसी गाय से निर्मित शुद्ध दानेदार घी है। पतंजलि गाय का घी हो या कोई भी डेरी प्रोडक्ट पतंजलि परिवार अपनी गऊशाला से उत्पन्न शुद्ध दूध से बनायें जाते हैं। गाय के दूध, घी का स्वभाविक पीलापन इस घी को शुद्ध होने की प्रमाणिकता को स्वत: साबित करता है। इस घी में बने भारतीय व्यंजन स्वाद स्वास्थ्य दोनों का ध्यान रखते है। यह भारतीय उत्पाद भारतीय अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने में सराहनीय कार्य करती है।
श्रद्धेय स्वामी जी महाराज ने 72वें गणतंत्र दिवस पर प्रतिज्ञा लेते हुए कहा कि आज भारत कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर है दालों में, खाद्यानों, चीनी उत्पादनों आदि में भारत अग्रणी श्रेणी में आता है। मगर अन्य दिशाओं में भी भारत आत्मनिर्भर हो उसके लिए श्रद्धेय स्वामी जी ने प्रतिज्ञा के तौर पर कहा कि पतंजलि परिवार आने वाले समय में 5 लाख किसानों को साथ में जोडक़र देश में पाम ऑयल के रूप में जो लूट हो रही है। उसके अन्त का समय गया है। जिसके लिए श्रद्धेय स्वामी जी महाराज ने लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को व्यक्तिगत पत्र भी लिखा, जिसमें पतंजलि परिवार पाम ऑयल को लेकर एक बड़ा उद्यम लगा रहा है। इस उद्यम से हजारों बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिलेंगा। लाखों किसानों को साथ में जोडक़र उनकी आमदनी को दोगुनी करने का प्रयास किया जायेगा। साथ ही सबसे बड़ी बात पाम ऑयल के उत्पादन से लगभग 2 से 2.50 लाख करोड़ रुपया जो बहार के देशों में चला जाता है। उसे रोकने का प्रयास पतंजलि परिवार पूर जोर-शोरसे के करेगा और यह प्रयास देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम करेंगे।

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