राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया का आधार
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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
संयुक्त राज्य अमेरिका को छोड़कर और कोई भी राष्ट्र राज्य एक इकाई के रूप में भारत से बड़ा नही है|चीन के अलावा जो राज्य क्षेत्रफल के दृष्टि से बड़े है, वे जनसँख्या में बहुत छोटे है| |
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया का क्या आधार है, क्या आधार रहे हैं और क्या आधार होने चाहिये, इस पर कोई गंभीर चिंतन या अध्ययन आज तक सामने नहीं आया है। उसके स्थान पर राष्ट्रीय एकीकरण को एक सर्वमान्य और सुविदित लक्ष्य मानकर फिर उसके लिये विविध उपाय सुझाये जाते रहते हैं और उपाय से अधिक जोशीले नारे ही लगाये जाते दिखते हैं।
भारत की स्थिति अनेक कारणों से अन्य राष्ट्र राज्यों से भिन्न है। एक तो संयुक्त राज्य अमेरिका को छोडक़र और कोई भी राष्ट्र राज्य एक इकाई के रूप में भारत से बड़ा नहीं है। जो राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़े हैं, वे जनसंख्या में भारत से बहुत छोटे हैं। चीन अवश्य जनसंख्या और विस्तार में इन दिनों बड़ा है परन्तु यह तो चीन पर चीनी संस्कृति और चीनी परम्परा के शत्रु कम्युनिस्ट समूहों के द्वारा आधिपत्य के बाद की स्थिति है। जो रूस, इंग्लैण्ड और अमेरिका के द्वारा तथा सोवियत संघ के अभिकरण के रूप में कार्यरत श्री जवाहरलाल नेहरू के द्वारा कम्युनिस्टों को सौंपे गये इलाके के कारण है। जो ज्ञात इतिहास में पहली बार चीन से संयुक्त किये गये हैं वे इलाके कभी भी फिर से चीन से विमुक्त हो सकते हैं और चीन में वर्तमान में लोकतंत्र जैसी कोई भी चीज दूर-दूर तक नहीं है, इसलिये भी चीन का उदाहरण भारत के लिये किसी काम का नहीं हो सकता। पश्चिमी यूरोप के प्रत्येक राष्ट्र राज्य को एक बनाने वाली एकमात्र शक्ति उनका रिलीजन है। यूं तो कहने को वे सभी क्रिश्चियन राष्ट्र राज्य हैं, परन्तु क्रिश्चियनिटी के अलग-अलग पंथ को मानने वाले बहुसंख्यक लोग ही इन राष्ट्र राज्यों के एकीकरण के मूल आधार हैं।
इंग्लैण्ड को एक बनाये रखने वाली शक्ति है प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियनिटी। वहां का शासन इसी पंथ का अधिकृत संरक्षण करता है। ‘चर्च ऑफ इंग्लैंड’अधिकृत राजकीय चर्च है। जिसके सर्वोच्च गवर्नर वहाँ के सम्राट या साम्राज्ञी हुआ करते हैं। इस चर्च की सदस्यता केवल ऐसे व्यक्ति को ही मिल सकती है, जो ईसाई बपतिस्मा प्राप्त करे। ऐसा माना जाता है कि गॉड, दिव्य प्रेतात्मा और जीसस क्राइस्ट - ये तीन मिलकर एक ही सत्ता हैं। ये दिव्य सत्ता हैं। इनका दृश्य रूप यह ‘चर्च ऑफ इंग्लैण्ड’है।
इंग्लैण्ड का ‘दि चर्च ऑफ इंग्लैण्ड’शासकीय स्तर पर स्थापित एवं प्रतिष्ठित क्रिश्चियन चर्च है। वह विश्व भर में फैले एंग्लिकन ईसाई समूहों का ‘मदर चर्च’है। 16वीं शताब्दी ईस्वी में इंग्लैण्ड में उभरे प्रचण्ड प्रोटेस्टेण्ट आन्दोलनों के बाद वहाँ क्रिश्चियन चर्च की कार्यशैली में कतिपय सुधार किए गए। ‘सेटिलमेंट ऑफ रेलिजन’ (धर्मपंथों या रिलिजन की विधिविहित व्यवस्था, प्रबन्धन एवं समाधान) नामक एक वैधानिक व्यवस्था तथा कानून है, जिसमें रिलिजन के 39 अनुच्छेद प्रतिपादित हैं। वे सब प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयत से प्रेरित अनुच्छेद है।
परम्परा से शताब्दियों तक इंग्लैण्ड में वहां का मूल समाज दो मुख्य जातियों में विभाजित रहा था - नोबिलिटी और कामनर। इनमें विवाह केवल अपनी जाति में ही होता था। किसी भी नोबुल का विवाह किसी कामनर से नहीं हो सकता था। 20वीं शताब्दी ईस्वी में 1928 ईस्वी के बाद यह स्थिति बदली है और अपवाद स्वरूप नोबिलिटी और कामनर में परस्पर विवाह संबंध होने लगे हैं। यद्यपि यह अभी भी व्यापक नहीं है। नोबिलिटी की कुल जनसंख्या इंग्लैण्ड की जनसंख्या का दो प्रतिशत रही है। इनमें भी अनेक स्तर विन्यास रहे हैं। कामनर में भी ‘हाउसेस’और ‘फैमिलीज’ के आधार पर कठोर विभाजन और भेदभाव रहे हैं। जिनका पूरी मर्यादा से पालन होता रहा है। इसीलिये वहाँ एकीकरण का एकमात्र आधार ‘चर्च ऑफ इंग्लैण्ड’ही है। इंग्लैण्ड में पहले स्त्रियों को मताधिकार बिल्कुल नहीं था क्योंकि चर्च का यह मानना था कि स्त्रियों में आत्मा नहीं होती। अत: वे वस्तु हैं और वे अपने पति की सम्पत्ति हैं। प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियनिटी के विद्वान न्यायाधीशों के मध्य तथा चर्च के पादरियों के मध्य परस्पर इस पर निरंतर चर्चा होती रही। और इंग्लैण्ड की स्त्रियां निरंतर विनम्रता पूर्वक अहिंसक आंदोलन चलाती रहीं, जिसे प्रबुद्ध पुरुषों का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ और तब 1918 में यह निश्चय हुआ कि हाँ, क्रिश्चियन स्त्रियों में भी आत्मा होती है। अत: वे ‘पर्सन’हैं और इसीलिये यह निश्चय किया गया कि सम्पत्ति में उनका स्वतंत्र अधिकार भी एक सीमा तक मान्य होगा और इसलिये सम्पत्तिवान ऐसी स्त्रियां जो तीस वर्ष से ऊपर की हो चुकीं हैं, उन्हें भी मताधिकार प्राप्त होगा। स्त्री आंदोलन चलते रहे और अंत में 1928 में यह निर्णय हुआ कि 21 वर्ष से ऊपर के सभी स्त्रियों और पुरुषों को मताधिकार प्राप्त होगा। इसके पहले पुरुषों में भी सम्पत्तिवान पुरुषों को ही मताधिकार प्राप्त थे।
इस प्रकार इंग्लैण्ड के एकीकरण का आधार चर्च ऑफ इंग्लैण्ड ही है। जो लोग लंदन जाकर पढ़े और जिन्होंने कांग्रेस की नरम धारा का नेतृत्व किया, उन सभी लोगों को ये तथ्य पता थे, परंतु अंग्रेजों की इच्छा के अनुसार भारत का संविधान बनाते समय हिन्दुओं की किसी महासभा या किसी सर्वसमावेशी हिन्दू धार्मिक संगठन को न तो ऐसा कोई अधिकार दिया गया है और न ही राज्य के स्तर पर हिन्दुओं के धर्मपंथ को कोई मान्यता दी गई। केवल अभिव्यक्ति और उपासना की स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत उन्हें अपने ढंग से उपासना करने का मामूली अधिकार प्राप्त है, जिस पर विभिन्न आधारों और उपायों के द्वारा कभी भी शासकीय हस्तक्षेप संभव है और यह हस्तक्षेप किया ही जाता रहता है।
तब भारत के राष्ट्रीय एकीकरण का आधार क्या है? अधिकृत स्थिति यह है कि भारत का राज्य ही भारत के एकीकरण का आधार वर्तमान में है। इसलिये और भी आवश्यक है कि राज्य अपने नागरिकों के बीच शिक्षा, संस्कृति और धर्म के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करे। एक सार्वभौम मर्यादा के अंतर्गत इनका स्वतंत्र व्यवहार चलने दे। परंतु स्थिति ऐसी नहीं है क्योंकि अंग्रेजों के प्रभाव से भारत के वर्तमान सभी राजनेताओं ने भारतीय समाज को सुधारने को अपना लक्ष्य घोषित कर रखा है। यह सामाजिक सुधार वे अल्पसंख्यकों से तो उनकी राय जानकर और उनसे पूछ-पूछ करते हैं परंतु बहुसंख्यक समाज का सुधार वे मानो अपनी धुन से करते हैं। जिस पार्टी को जो धुन सवार हो गई, वह सुधार का वही एजेंडा हाथ में ले लेता है। परंतु सभी दलों के बीच कुछ बातों पर सर्वानुमति है। सभी यह मानते हैं कि भारत का राज्य अखंड और एक रहना चाहिए। सभी यह मानते हैं कि मुस्लिम राजाओं के अत्याचार से और बलपूर्वक धर्मान्तरण के कारण भारत के हिन्दुओं का ही एक बड़ा अंश मुसलमान बना है। सभी उन मुसलमानों के बीच इस्लाम मजहब की शिक्षा और इस्लामी कायदे कानूनों की शिक्षा सरकारी खर्चे पर दिये जाने के पक्ष में हैं। इसी प्रकार सभी दल यह मानते हैं कि ईसाई मिशनरियों ने भारत की कोई विशेष सेवा की है इसलिये शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं सहित समाज सेवा के प्रत्येक क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों को अनेक प्रकार की शासकीय सुविधायें, रियायतें और अधिकार प्राप्त हैं तथा सरकारी खर्चे से ईसाईयत की शिक्षा देने का सारा ही प्रबंध चर्चों के द्वारा किया जाता है और इस पर सभी दल एक राय रखते हैं कि यह काम जारी रहना चाहिये।
सभी दल यह मानते हैं कि हिन्दू समाज की समाज व्यवस्था दुनिया की सर्वाधिक अन्यायकारी समाज व्यवस्था रही है और इसलिये संसार में भले ही रंग या नस्ल या लिंग के आधार पर भयंकर भेदभाव अनेक समाजों में हुये हों तथा वर्तमान में उन भेदभावों की चर्चा भी वहां की राजनीति में नहीं की जाती हो, परंतु भारत में इन सभी भेदभावों की चर्चा रात-दिन जोर-शोर से की जानी चाहिये और अनुसूचित जातियों और अनूसचित जनजातियों पर हिन्दू समाज ने शताब्दियों तक भीषण अत्याचार किये हैं, यह मानकर उन्हें शिक्षा और शासन में विशेष सुविधायें और आरक्षण दिया जाना चाहिये तथा शेष समाज में इस विषम व्यवहार के कारण असंतोष नहीं जगे, इसलिये उस समाज की कमियों और कुरीतियों की रात-दिन चर्चा सार्वजनिक रूप से करते हुये समाज को दबाकर रखना चाहिये, ताकि वह विषम शासकीय व्यवहार का विरोध नहीं करे। यद्यपि किसी भी दल और उसकी किसी भी संस्था के पास इसका कोई प्रामाणिक साक्ष्य या अभिलेख नहीं है, कि ऐसा कोई अत्याचार शताब्दियों तक किया गया। इसके स्थान पर साक्ष्य यही है कि मुसलमानी दबंगों (जिन्हें वे नवाब आदि कहते थे) और अंग्रेज समूहों ने ही इन अनुसूचित जातियों और वनवासी जातियों पर अभूतपूर्व अत्याचार किये तथा साथ ही उनके मध्य अपने एजेंट तैयार किये जो आज राजनीति में प्रभावी रूप से सक्रिय है।
इस प्रकार भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का एकमात्र आधार एक ऐसा राज्य है जिसके शीर्ष शासक एवं अधिकारीगण निरंतर समाज को अपनी योजना के अनुसार सुधारने के लिये सक्रिय हैं और इस तरह राष्ट्र के स्वरूप का निरंतर रूपान्तरण किया जाना ही राष्ट्रीय एकीकरण बताया जाता है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या झूठ या असत्य किसी भी राष्ट्र के एकीकरण का आधार हो सकता है। असत्य प्रचार के द्वारा विशाल राष्ट्र राज्य को एकीकृत रखने की कोशिशें सोवियत संघ, चीन तथा अन्य कम्युनिस्ट राष्ट्र राज्यों में की गईं। इससे विशाल सोवियत संघ बिखर गया, चीन बिखरने की ओर है और पोल्स्का, युगोस्लाविया आदि भी अब कम्युनिस्ट नहीं हैं। अब वहां किसी न किसी प्रकार की ईसाइयत ही राष्ट्र राज्य का आधार बनाई जा रही है।
भारत में शिक्षा की स्थिति के विषय में स्वयं अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में व्यापक सर्वेक्षण किया था जिसके आंकड़े 20वीं शताब्दी ईस्वी में सबसे पहले गांधीजी ने अपने पत्रों में प्रकाशित किये, फिर सुन्दरलालजी ने अपनी पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ में उस पर एक बड़ा अध्याय लिखा, फिर श्री जे.पी. नायक तथा अन्य लोगों ने अपनी पुस्तक में उनका उल्लेख किया और अंत में श्री धर्मपाल ने उस समस्त सर्वेक्षण के आंकड़ों को संग्रहीत कर अपनी भूमिका के साथ ‘दि ब्यूटीफुल ट्री’ नाम से पुस्तक प्रकाशित की, जिसे हिन्दी और गुजराती में इन्दुमती काटदरे ने पुनरूत्थान न्यास, अहमदाबाद से ‘रमणीय विद्यावृक्ष’के नाम से प्रकाशित किया है। इन सबसे प्रमाणित है कि भारत में शिक्षा सर्वव्यापक थी और शिक्षकों में कथित अनुसूचित जाति के भी शिक्षक अच्छी संख्या में थे तथा छात्रों में भी अनुसूचित जाति के छात्र अपनी जनसंख्या के अनुपात में बड़ी संख्या में थे। इस प्रकार स्वयं अंग्रेजों के आंकड़े इन जातियों के साथ शताब्दियों के भेदभाव को झूठ ठहराते हैं और स्वयं अंग्रेजी राज की अवधि में ये भेदभाव बढ़ाये गये और बढ़े यह प्रमाणित होता है। अत: आधुनिक काल में इतिहास का इतना बड़ा झूठ रचते हुये उस झूठ के आधार पर राष्ट्र की एकता का टिक पाना असंभव है।
वस्तुत: जैसा संसार के प्रत्येक राष्ट्र में है, वहां का मूल समाज ही उस राष्ट्र का समाज कहलाता है और भारत राष्ट्र में समाज का अर्थ है हिन्दू समाज। शेष समुदाय स्वयं संविधान में अल्पसंख्यक के रूप में स्पष्ट रूप से अंकित हैं। इस तरह वे भारत के सम्मानित नागरिक हैं परंतु वे भारतीय समाज का सामान्य अंग नहीं हैं। उन्हें असामान्य बनाकर स्वयं संविधान में अंकित किया गया है। अत: राष्ट्र की एकता का आधार समाज की एकता ही है और समाज और राष्ट्र दोनों की एकता का आधार सत्य ही है और सच्चा इतिहास ही राष्ट्र को सुदृढ़ रखता है।
यह उल्लेखनीय है कि वस्तुत: भारत में भी राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा आधार है यहां के समाज का धर्म, जो वस्तुत: सनातन धर्म है। सनातन धर्म के विराट इतिहास में हुए एक से एक श्रेष्ठ और विद्या तथा वीरता एवं उदारता के प्रतिनिधि राजा और सम्राट होते रहे हैं। इसीलिए भारतीयों को अपने राष्ट्र से गहरा प्रेम है और वे शासकों से अधिक अपेक्षा नहीं रखते सिवाए इसके कि वे धर्म में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करें और धर्म मर्यादा का पालन सुनिश्चित करें। अपने अत्यंत प्राचीन इतिहास के कारण वे किसी शासक की कमियों से असन्तुष्ट होने पर भी सामान्यत: स्वयं शासन से क्षुब्ध नहीं होते। यह स्मृति और परंपरा ही 73 वर्षों से शासकों द्वारा सनातन धर्म की निरंतर उपेक्षा के बाद भी मुख्य भारतीय समाज में राज्य के प्रति प्रेम को जाग्रत रखती है और यह प्रेम ही राष्ट्रीय एकता का आधार है। आशा है कि शासक भी भारत के राष्ट्रीय एकीकरण के इस मूल आधार को पहचानेंगे और सुदृढ़ करेंगे।
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01 Mar 2025 17:58:05
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