कुल समूहों, बंधु-बाधन्वों और डाइअस्पोरा की पहचान और वैश्विक टकराव
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प्रो. कुसुमलता केडिय़ा
सैमुअल पी. हंटिंग्टन ने अपनी प्रसिद्ध और बहुचर्चित पुस्तक "The Clash of Civilizations and The Remaking of World Order" में इस बात पर बल दिया है कि विश्व में जो नई पहचान उभर रही है, वह कुल समूहों, बंधु-बान्धवों और डाइअस्पोरा (Kinship & Diasporas) की है तथा सभ्यताओं की है। दोनों परस्पर अन्तग्र्रथित हो रहे हैं। डाइअस्पोरा शब्द सबसे पहले यहूदियों के विश्वभर में फैले हुये समूहों के लिए प्रचलन में आया और फिर प्रत्येक नृवंश की संसार भर में फैली हुई इकाईयों के लिये भी प्रचलित हो गया है। जैसे कि विश्वभर में फैले हुये भरतवंशियों को Indian Diaspora कहा जाता है और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी अपने अंतर्राष्ट्रीय संबोधनों में इसका बारम्बार प्रयोग किया है।
अलग अलग समूहों के मध्य विश्व में जो अनेक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर की लड़ाईयां चल रही थीं उनको हंटिग्टन ने फाल्ट लाइन वॉर कहा है। जो कि उनकी अपनी दृष्टि से निगमित शब्द है। चूंकि कि वे दोनों महायुद्धों को ही मुख्य युद्ध कहते हैं और भविष्य में सभ्यताओं के आधार पर होने वाले किसी संभावित महायुद्ध की चिंता और तैयारी की दृष्टि से विवेचना करते हैं। इसलिये दूसरे और संभावित तीसरे महायुद्ध के बीच की लड़ाइयों को वे फाल्ट लाइन वॉर कहते हैं जिसका अर्थ है कि कोई एक समूह या राष्ट्र दूसरे समूह या राष्ट्र के किसी दावे अथवा व्यवहार को लेकर लड़ रहा है, यही फाल्ट लाइन वॉर है।
हंटिग्टन का कहना है कि ये फाल्ट लाइन वॉर सघन लड़ाईयों का रूप ले लेते हैं और प्रत्येक पक्ष अपना विस्तार करना चाहता है तथा दूसरे के विस्तार को रोकना चाहता है या उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है और इन लड़ाइयों का समाधान बहुत कम ही हो पाता है। प्राय: ये किसी विशेष मुद्दे पर प्रारंभ होते हैं परंतु फिर वे बढ़ते जाते हैं और उनमें कई अन्य मुद्दे शामिल होते जाते हैं। क्योंकि क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं की एक शृंखला चल पड़ती है। राष्ट्रों और समाजों की विविधता पूर्ण पहचान इस प्रक्रिया में प्राय: एक या दो पहचान के रूपों पर केन्द्रित हो जाती है और वही टकराव का मुख्य बिन्दु बनता जाता है। इसीलिये वस्तुत: सभी फाल्ट लाइन वॉर ‘आइडेन्टिटी वॉर’(पहचान या अस्मिता से जुड़े युद्ध) हैं ऐसा हंटिग्टन का कहना है। ‘हम’और ‘वे अन्य’की टकराहट रेखांकित होती जाती है और दोनों पक्ष अपनी-अपनी अस्मिता या पहचान का आग्रह करते हैं।
हंटिग्टन ने उक्त पुस्तक के अध्याय 11 में इस प्रक्रिया का वर्णन किया है और बताया है कि जैसे सोवियत संघ में पहले किसानों तथा अन्य समूहों के साथ एक छोटे समूह के रूप में कम्युनिस्ट भी थे परंतु फिर ‘हेट डॉयनामिक्स’अर्थात् घृणा आधारित उग्र गतिशीलता को तीव्र किया गया और अंत में सौम्य किसान नेताओं तथा सौम्य बौद्धिकों को परे ठेलकर उग्र और हिंसक कम्युनिस्ट समूहों ने सत्ता छीन ली, वही प्रक्रिया इन ‘फॉल्ट लाइन वार्स’ में भी अपनाई जाती है। इसे उन्होंने कुछ उदाहरणों से समझाया है।
पहला उदाहरण ईसाई राज्य फिलीपीन्स में मुसलमानों के विद्रोह का है। मुसलमानों के पक्ष में राष्ट्रीय मुस्लिम मुक्ति मोर्चा बना। लेकिन शीघ्र ही इस्लामी मुक्ति मोर्चा नामक एक अधिक उग्र संगठन ने राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे को पीछे ढकेल दिया। उसके बाद जब फिलीपीन्स सरकार इन समूहों से युद्ध विराम के लिये बातचीत कर रही थी, उसी समय अबू सैयाफ नामक एक अति उग्र मुस्लिम नेता उभरा जिसने युद्ध विराम की सभी वार्ताओं को रद्द घोषित कर दिया।
दूसरा उदाहरण सूडान का है। सूडान सरकार सदा से एक सौम्य इस्लाम से प्रेरित थी। परंतु 1980 ईस्वी के दशक में उग्र इस्लामी विचार वहां उभरे और शासन में उनका ही प्रभाव बढ़ता गया। एक दशक बाद ईसाई विद्रोही प्रभावशाली हो गये और वे स्वायत्ता के स्थान पर एक अलग राष्ट्र दक्षिणी सूडान की मांग करने लगे।
तीसरा उदाहरण इजराइल से जुड़ा है। अरब समूह इजराइल से टकराव की भावना तो रखते थे परंतु बातचीत भी चला रहे थे। फिलीस्तीन मुक्ति मोर्चा मुसलमानों का मुख्य मोर्चा था। वह इजराइल की यहूदी सरकार से बातचीत की ओर बढ़ रहा था तो अचानक मुस्लिम भाईचारे के नारे के साथ हमास नामक एक उग्र संगठन उभर आया। वह स्वयं फिलीस्तीन मुक्ति मोर्चे की इस्लाम निष्ठा पर ही संदेह करने लगा और उसने उग्र हिंसक गतिविधियां तेज कर दीं। उधर स्वयं यहूदियों में अधिक उग्र संगठन उभरने लगे जो मुसलमानों के प्रचंड विरोधी थे। वे अपनी सरकार पर ही गैर जरूरी नरमी और यहूदियों के हितों की रक्षा में शिथिलता का आरोप लगाने लगे।
चौथा उदाहरण चेचेन्या का है। रूस के साथ चेचेन्या राष्ट्रवादियों की टकराहट प्रबल थी और दूदायेव की सरकार में धीरे-धीरे उग्र मुस्लिम नेतृत्व हावी हो गया और सोवियत संघ से किसी भी प्रकार की शांतिवार्ता का विरोध करने लगा।
पांचवा उदाहरण तजाकिस्तान का है जहां प्रारंभ में लोकतांत्रित राष्ट्रवादी नेतृत्व था। परंतु शीघ्र ही वहां उग्र मुस्लिम नेतृत्व उभर आया और गरीबों तथा युवकों को संगठित कर उग्र हिंसक गतिविधियां चलाने लगा। नये युवा नेता कहने लगे कि ‘हमें युद्ध क्षेत्र में अपने फैसले लेने हैं न कि कूटनीतिक वार्ता की टेबल पर। रूस ने हमारे होमलैंड पर अत्याचार कर रखा है और हम उसे यहां से हटा कर रहेंगे।’
छठवां उदाहरण बोस्निया का है। जहां लोकतांत्रिक मुस्लिम पार्टी के स्थान पर उग्र मुस्लिम नेतृत्व उभर आया।
इस प्रकार हंटिग्टन बताते हैं कि प्रारंभ में जो बहुआयामी पहचानों के साथ टकराव शुरू होता है, वह बाद में किसी एक मुख्य पहचान पर टिक जाता है। हंटिग्टन का कहना है कि रिलीजन या मजहब ही इसमें सबसे बड़ा आधारभूत तर्क बनकर उभरता है और वह संबंधित समूहों के मन को अधिक गहराई से प्रभावित करता है। इस तरह वस्तुत: रिलीजस या मजहबी पहचान ही मुख्य हो जाती है, जो अपनी एक अलग सभ्यता का दावा करती है और इस प्रकार यह संघर्ष सभ्यताओं का संघर्ष कहा जाने लगता है। क्योंकि इसके आधार पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन प्राप्त करना सरल हो जाता है। उदाहरण के लिये जब अफ्रीका में दो परंपरागत अफ्रीकी कबीले लड़ते हैं तो यह दो कबीलों की लड़ाई कहलाती है परंतु यदि उसमें से एक कबीला खुद को मुसलमान कहता है और दूसरा खुद को इसाई कहता है तो दोनों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहायता की अपील का आधार या कारण मिल जाता है।
उदाहरण के लिये अगर कोई अफ्रीकी कबीला खुद को मुस्लिम घोषित करता है तो उसे सूडान से धन मिल जायेगा, उसके लिये अफगान मुजाहिदीन लडऩे आ जायेंगे और ईरान से हथियार और सैन्य सलाहकार आ जायेंगे। इसी प्रकार अगर कोई कबीला स्वयं को ईसाई घोषित करता है तो यूरोप और अमेरिका से आर्थिक और विधिक तथा राजनैतिक और कूटनीतिक समर्थन उमड़ पड़ेगा।
इस प्रकार रिलीजन या मजहब सगोत्रता का एक नया रूप बन जाता है और कुल समूहों की मूल ईकाई के स्थान पर मजहबी समूह या रिलीजस समूह एक गोत्र के रूप में उभरने लगते हैं। इसके साथ ही हंटिग्टन ने डाइअस्पोरा अर्थात् राष्ट्रीय वंशों की भी पहचान का उभार होते बताया है। उनका कहना है कि विभिन्न राष्ट्रवंशों के डाइअस्पोरा जो अब यहूदियों की तरह दुुनिया भर में फैले हैं, वे अपने मूल वंश से लगाव और निष्ठा रखते हैं और इस प्रकार वे अपने मूल वंश वाले राष्ट्र को खुलकर सहायता देते हैं। हंटिग्टन ने इसके भी कई उदाहरण दिये हैं।
हंटिग्टन का कहना है कि मजहब के नाम पर सबसे अधिक अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का समर्थन तो मुसलमान ही जुटाते रहे हैं। अक्सर किसी परिवार या घराने या कबीले की लड़ाई होती है। पर उसे इस्लाम की लड़ाई घोषित करने पर व्यापक समर्थन मिल जाता है। सद्दाम हुसैन का उदाहरण इसमें उल्लेखनीय है। सद्दाम इस्लाम के मजहबी विचारों का विरोधी एक आधुनिक सोशलिस्ट नेता था और उसकी बॉथ पार्टी एक सोशलिस्ट पार्टी थी। वस्तुत: उस पार्टी का पूरा नाम ही अरब सोशलिस्ट बॉथ पार्टी था। परंतु जब ईरान से उसका टकराव हुआ और फिर कुवैत से भी टकराव हुआ और बीच मेें अंतर्राष्ट्रीय नियमों की खुली अनदेखी सद्दाम हुसैन ने की तो संयुक्त राज्य अमेरिका ने उसमें हस्तक्षेप किया और तब अचानक न केवल सऊदी अरब से लेकर पाकिस्तान और मलेशिया और इंडोनेशिया तक के सारे मुस्लिम राज्य अमेरिका के विरोध में हो गये अपितु स्वयं ईरान में भी अमेरिकी हस्तक्षेप अनुचित बताया जाने लगा। इस प्रकार यह मजहबी सगोत्रता या मुस्लिम सगोत्रता का एक विशेष दृष्टांत है। जिनके लिये अमेरिका ने हस्तक्षेप किया था। वे भी मजहब की बात आने पर अपने उस सहायक के विरूद्ध हो गये और कृतज्ञता के स्थान पर कृतघनता सामने आयी। इसी प्रकार जो सद्दाम हुसैन वस्तुत: इस्लाम का विरोधी था और सोषलिस्ट था उसके केवल ईराकी यानि तुर्क होने के आधार पर उसकी मूल मुस्लिम वंश मुस्लिम राज्यों के लिये प्रधान पहचान बन गया और वे इस्लमाी भाईचारे के नारे की तले सद्दाम हुसैन के पक्ष में एकजुट हो गये।
इसी प्रकार अजरबेजान के लोगों की रूस से वस्तुत: क्षेत्रीय लड़ाई थी परंतु अजरबेजान ने मुस्लिम कार्ड खेला और उसे मुसलमानों का अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिलने लगा यह मजहबी सगोत्रता का उदाहरण है। इसी तरह तजाकिस्तान में आंतरिक कलह में एक समूह ने स्वयं को इस्लाम के लिये लडऩे वाला बता दिया और उसे भी अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिलने लगा।
रूस से उत्तरी काकेशस क्षेत्र के लोगों की टकराहट 19वीं शताब्दी ईस्वी से ही चल रही थी। परंतु काकेशस के मुस्लिम युवा नेता शमील ने खुद को इस्लाम मजहब के लिये मरने वाला घोषित कर दिया और दर्जनों मुस्लिम समूह रूसी कब्जे के विरोध में शमील के साथ हो गये।
चेचेन्या में भी द्रूदायेव ने यही तरकीब अपनाई। रूस के विरूद्ध अपनी लड़ाई को उन्होंने इस्लाम के पक्ष में घोषित कर दिया और बहुत से मुल्ला मौलवी उनके पक्ष में सक्रिय हो गये। उधर येल्तसिन के पक्ष में आर्थोडॉक्स ईसाई चर्च सक्रिय हो गया और एक और अल्लाह औ अकबर के नारे लगने लगे और दूसरी और ‘अवर लार्ड जीसस’ का उद्घोष होने लगा और पूरी क्षेत्रीय लड़ाई ने अतंर्राष्ट्रीय रंग ले लिया।
हंटिग्टन ने इसी क्रम में कश्मीर का भी उदाहरण दिया है। अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी उग्रवादी समूहों ने कश्मीरी मुसलमानों को विश्व मुस्लिम बिरादरी का और पाकिस्तान नामक मजहबी राष्ट्र का अंग प्रचारित कर दिया तथा इससे हिन्दू मुस्लिम एकता की कश्मीरी पहचान लुप्त कर दी गयी। हिन्दुओं तथा बौद्धों की भी कश्मीरी पहचान को भुला देने का अभियान चलाया गया और केवल मुस्लिम पहचान को ही उछाला जाने लगा। प्रारंभ में अपेक्षाकृत नरम मुस्लिम नेता उभरे जो हिन्दुओं से तालमेल रखते थे परंतु शीघ्र ही उग्रवादी मुस्लिम समूहों ने कश्मीर की समस्या को इस्लाम की विजय की समस्या बना दिया।
बोस्निया का उदाहरण भी हंटिग्टन ने दिया है। उन्होंने बताया है, कि बोस्निया में समुदायों में वैसा अलगाव नहीं था। सर्ब, क्रोट और मुसलमान समुदाय शांतिपूर्वक पड़ोसियों की तरह घुल मिलकर रहते आये थे, और उनमें परस्पर विवाह संबंध भी होते थे। मजहबी आस्थायें शेष सामाजिक आचरण पर प्रभावी नहीं थीं परंतु यूगोस्लाविया के विघटन के बाद मजहबी नेताओं का उभार हुआ और सर्बो, क्रोटों तथा मुसलमानों में भयंकर मारकाट होने लगी। इन लड़ाइयों से पहले तक बोस्निया के मुस्लिम स्वयं को यूरोपीय कहते थे और बोस्निया के समाज में विविध मजहबों के लोगों के घुल-मिलकर रहने पर गौरव करते थे। परंतु 1990 के चुनावों में एक उग्र मुस्लिम दल ने इज्तबेगोविच के नेतृत्व में नई भावनायें पैदा कर बहुमत प्राप्त कर लिया। कम्युनिस्ट शासन ने उसे इस्लाम पर आग्रह करने के कारण जेल में डाल रखा था। कम्युनिज्म के समाप्त होने के बाद अब वह मुसलमानों का सर्वप्रिय नेता बन गया।
इन सब उदाहरणों से हंटिग्टन ने निष्कर्ष निकाला है कि मुस्लिम भावनायें प्रबल होने के बाद मुसलमान लोग गैर मुस्लिम समाजों के साथ शांतिपूर्वक रहना नहीं जानते और वे मारकाट के जरिये इस्लाम का मजहबी राज्य स्थापित करने के लिये काम करते हैं। इसका प्रारंभ वे शिक्षा और संचार माध्यमों पर कट्टर उग्रवादी मुसलमानों की नियुक्ति किये जाने के आग्रह से करते हैं और धीरे-धीरे अपने मजहब के पक्ष में वातावरण रच कर मार-काट शुरू कर देते हैं। गैर मुसलमानों की हत्या और समस्त गैर मुस्लिम समुदाय का किसी क्षेत्र से बलपूर्वक निष्कासन उनकी सुपरिचित रणनीति है। बोस्निया में भी यही हुआ। उन्होंने प्रारंभ तो इस बात से किया कि बोस्निया में विविध पंथों और मजहबों का प्रतिनिधि राज्य होगा जिसमें मुसलमान सबसे प्रभावशाली होंगे यद्यपि वहां मुसलमानों को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं था। जब गैर मुसलमानों ने इज्तबेगोविच से आग्रह किया कि आप कट्टर मुसलमानों द्वारा की जा रही इस्लामी राज्य की मांग को अस्वीकार करें तो इज्तबेगोविच ने ऐसा करने से इंकार कर दिया जिससे सभी गैर मुसलमानों में भय की लहर दौड़ गयी। फिर मारकाट शुरू हो गयी और सर्ब और क्रोट लोग मुस्लिम बहुल इलाकों से दूर जाकर बसने लगे, क्योंकि उन्हें धमकाया गया था। जो लोग उन इलाकों से बाहर नहीं गये उन्हें सामाजिक संस्थाओं में किसी भी जिम्मेदारी से बाहर कर दिया गया और प्रतिष्ठित शासकीय पदों से उन्हें हटा दिया गया। संचार माध्यमों में मुस्लिम राष्ट्रवाद की उग्र वकालत होने लगी और मिली जुली संस्कृति का खुला विरोध होने लगा। सर्ब भाषा और क्रोट भाषा से बिलकुल अलग तुर्की और अरबी भाषा की बहुलता वाली एक बोस्नियाई भाषा का आग्रह किया जाने लगा और परंपरागत सर्ब संगीत को संचार माध्यमों तथा राष्ट्रीय चैनलों से प्रसारित करना बंद कर दिया गया। मुसलमानों द्वारा गैर मुसलमानों से विवाह की निंदा की जाने लगी और जिससे विवाह हो उसे पहले मुसलमान बनाने पर बल दिया जाने लगा। इस्लाम मजहब को शासन द्वारा सभी स्तरों पर प्रोत्साहित किया जाने लगा और अधिकाधिक नौकरियां मुसलमानों को ही दी जाने लगीं। बोस्निया की सेना में मुसलमानों की भर्ती ही बहुतायत से की जाने लगी और 1995 ईस्वी तक बोस्निया की सेना में 90 प्रतिशत सैनिक मुस्लिम सैनिक हो गये। सेना में नमाज आदि मुस्लिम परंपरायें चला दी गईं और मुस्लिम प्रतीकों और चिन्हों का भरपूर प्रयोग होने लगा तथा अभिजनों की सभी संस्थायें पूरी तरह मुस्लिम हो गईं। जब क्रोटों और सर्बों ने इसका विरोध किया तो इज्तबेगोविच ने ऐसे सभी विरोधों को खारिज कर दिया और अंत में राज्य तथा सेना पूरी तरह उग्रवादी इस्लाम के नियंत्रण में आ गई।
इस तरह बालकन क्षेत्र का स्विटजरलैंड कहा जाने वाला बोस्निया बालकन क्षेत्र का ईरान बनने लगा। सर्बों और क्रूटों ने इसका प्रचंड विरोध किया और इस प्रकार ये लड़ाइयां मजहबी और सभ्यतामूलक लड़ाइयों के रूप में परिभाषित होने लगीं। सर्ब लोग खुलकर कहने लगे कि इस्लामी उग्रवाद शताब्दियों से ईसाइयत को धमकाने की कोशिश करता आ रहा है और इसलिये इनसे संवाद संभव नहीं है, हम इन्हें कुचल देंगे।
रूस के नेतृत्व ने खुलकर इस बात पर चिंता व्यक्त की कि हम पूर्व के यूगोस्लाविया के भीतर एक कट्टर मुस्लिम राज्य को मानवता के लिये खतरा मानते हैं और इसलिये उसे सहन नहीं करेंगे।
हंटिग्टन का कहना है कि इन अंतर्राष्ट्रीय टकराहटों में प्रत्येक राष्ट्र को अथवा संघर्षरत प्रत्येक पक्ष को अपने मूल राष्ट्रवंश के डाइअस्पोरा से बहुत सहायता मिलती है। दुनिया भर में फैले हुये राष्ट्रवंशी लोग अपने कुल समूह अथवा अपने सगोत्रीय लोगों की सहायता के लिये धन साधन और समर्थन जुटाते हैं और पहुंचाते हैं।
क्रोशिया के लिये संपूर्ण पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका से रैलीजस आधार पर ही सहायता पहुंची। परंतु इसमें कई जटिलतायें और पेंच भी हैं। जब क्रोशिया की सेना ने सर्बों पर आक्रमण किया तब कनाडा, जर्मनी और आस्ट्रिया से क्रोट वंश के हजारों लोगों ने धन तथा स्वयं सेवकों और प्रशिक्षण के रूप में क्रोशिया की भरपूर सहायता की। संयुक्त राज्य अमेरिका के भी क्रोट लोगों ने क्रोशिया की सहायता की जिसके दबाव से संयुक्त राज्य अमेरिका ने क्रोशिया की सेनाओं द्वारा संयुक्त राज्य संघ के निर्देषों के उल्लघंन की अनदेखी कर दी और क्रोशिया की सेना को सघन प्रशिक्षण तथा अन्य सहायता जारी रखी। उधर सर्ब लोगों के साथ आर्थोडॉक्स ईसाई एकजुट हो गये जिनकी रूस ने भरपूर सहायता की। इस प्रकार क्रोट लोगों और सर्बों में आपस में प्रचंड मतभेद रहे परंतु मुसलमानों के आधिपत्य के विरूद्ध दोनों सक्रिय रहे और दोनों ने इस्लाम को अपना साझा शत्रु घोषित किया। यद्यपि क्रोट कैथोलिक ईसाई थे और सर्ब आथोडॉक्स ईसाई थे और उनमें आपस में भी टकराहटें थीं।
इसमें इस्लाम या मुसलमानों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह है कि यद्यपि ये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम एकजुटता और भाईचारे की बात करते हैं तथा इस्लाम के लिये वैश्विक स्तर पर जेहाद या युद्ध की नारेबाजी करते रहते हैं परंतु ऐसा कोई भी युद्ध किसी एक केन्द्रीय राज्य के नेतृत्व में ही लड़ा जा सकता है और इस्लाम का ऐसा कोई भी एक ‘कोर स्टेट’(केन्द्रीय राजसत्ता) नहीं है। सऊदी अरब, इजिप्ट, सीरिया, पाकिस्तान, ईरान और मलेशिया अपनी-अपनी दावेदारी प्रस्तुत करते रहते हैं और कोई इसे दूसरे राज्य की अधीनता में कुछ भी नहीं करना चाहता। ऐसी स्थिति में केवल लड़ाका समूहों को धन तथा हथियार सुलभ कराना ही इन मुस्लिम राज्यों के हाथ में बच रहता है। परंतु इसमें भी सबसे बड़ी मुश्किल यह है, कि इन सभी उग्रवादी मुस्लिम युवकों के समूहों को प्रारंभ में धन और प्रशिक्षण सभी कुछ संयुक्त राज्य अमेकिरा के ही द्वारा दिया गया और इसीलिये इन सभी समूहों में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोपीय देशों की गहरी घुसपैठ है और इन समूहों के विषय में इन देशों को सभी कुछ ज्ञात है। अत: ये केवल नारेबाजी के स्तर पर पश्चिम का विरोध जारी रखते हैं और उस विरोध के नाम पर तथा इस्लाम की विजय की योजना या अभिलाषा के नाम पर ‘जालिम पश्चिम’के विरोध की बात करते हुये वस्तुत: आपस में ही प्रभुत्व की स्पर्धा करते हैं। मजहब या सभ्यता के रूप में ये अपनी साझी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं परंतु एक तो स्वयं मजहब के स्तर पर इनमें जबर्दस्त पांथिक मतभेद हैं और वे मतभेद जो शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदिया आदि-आदि सम्प्रदायों के आधार पर जमाती जैसे संगठनों और आंदोलनों के आधार पर प्रभावी रूप में हैं वे इन्हें व्यवहार में कभी भी एकजुट नहीं होने देते। सारी एकजुटता वाणी के स्तर पर पश्चिम के विरोध तक सिमटी रहती है। इसी प्रकार इस्लाम के विश्वव्यापी भाईचारे की बात राष्ट्र राज्य की वर्तमान ईकाइयों के विरूद्ध है और राष्ट्र राज्य का शासन कर रहा कोई भी शासक अपने प्रभुत्व का विसर्जन अंतर्राष्ट्रीय मिल्लत के पक्ष में करने को तैयार नहीं है क्योंकि मिल्लत का कोई स्पष्ट स्वरूप ही नहीं है वह केवल धारणा के स्तर पर है और दूसरों से हिंसा तथा घृणा का एक आधार उसे नारेबाजी के स्तर पर बनाया जाता रहा है परंतु आज तक किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मिल्लत ने किसी भी काफिर मुल्क से कोई लड़ाई नहीं लड़ी। यहां तक कि इजराइल से भी लडऩे कोई मुस्लिम राज्य आगे आज तक नहीं आया। इसके स्थान पर ईरान और ईराक या अफगानिस्तान और पाकिस्तान या उपराष्ट्रीयताओं के स्तर पर बलूच मुस्लिम बनाम पंजाबी मुस्लिम या जाट मुस्लिम तथा पख्तून और पठान मुस्लिम बनाम पंजाबी मुस्लिम अथवा ईरानी और कुद्र अथवा तुर्क और अरब अथवा पारसीक और तुर्क मुसलमानों में आपस में भयंकर दूरी और टकराव है और यही बात अफ्रीका के विभिन्न कबीलों के मुसलमानों के विषय में भी सत्य है। अत: अंतर्राष्ट्रीय मिल्लत नामक कोई वास्तविक चीज अस्तित्व में नहीं है।
यही बात ईसाईयत के विषय में भी सत्य है। आर्थोडॉक्स ईसाईयों और कैथोलिक ईसाईयों के बीच भयंकर टकराहटों और मतभेदों की बात स्वयं हंटिग्टन ने की है। इसके अतिरिक्त काल्विन बनाम लुथेरियन या जैकोबाइट जैसे अंतहीन साम्प्रदायों की आपसी टकराहटें ईसाईयत में भरी पड़ी हैं। उसके साथ ही और उसके समानांतर एंगल्स, सेक्षन, जूट, जर्मन, वंडाल, गाल, वल्गार, स्लाव, पोल, केल्त, हंगार, सर्ब, क्रोट आदि मुख्य समुदायों की अपनी अस्मितायें हैं जिनकी हजारों साल पुरानी स्मृतियां हैं और मैत्री और शत्रुता के अपने अपने समीकरण हैं। इस तरह इन टकराहटों को कभी सभ्यताओं और कभी मजहब या रिलीजन का नाम देकर आधार व्यापक करने और अपना पक्ष मजबूत करने की प्रक्रिया भी चलती रहती है तथा कुल और कबीलों की अपनी पहचान और स्मृतियां भी अपनी जगह कार्यरत हैं।
हंटिग्टन ने सभ्यताओं के जिस संघर्ष की बात की है वह ईसाईयत को एकजुट करने की एक बुद्धिमत्तापूर्ण कोशिश है और उसके लिये इन टकराहटों को एक स्पष्ट पहचान देने का प्रयास हंटिग्टन ने किया है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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