जननायक भगवान राम
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नागेन्द्र प्रसाद सिंह, आई.ए.एस. (सेवानिवृत)
कार्यवाहक अध्यक्ष-भारतीय शिक्षा बोर्ड
उत्सव प्रियता हमारे देश की सांस्कृतिक भाव-भूमि में रची बसी है। कभी प्रकृति से भावगत तादात्म्य होने पर तो कभी असत्य परसत्य के विजय के उपलक्ष्य में एवं कभी अपने महान् पूर्वजों के प्रतिस्मरण-भाव और सम्मान प्रकट करने की विधा के रुप में अभिव्यक्त पर्व हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। रामनवमी पर्व उसी हमारी महान सांस्कृतिक परम्परा का समर्थ प्रतीक है। ‘राम’का नाम आते ही हमारे मनोभावों में एक पवित्रतम् तरंग की अनुभूति होती है। ‘राम’हमारी महान् भारतीय संस्कृति के मूल्यों के संस्थापक एवं संवाहक रहे हैं। ‘राम’का जीवन ही स्वयं में महाकाव्य बन जाता है, जिसमें अनेक सामाजिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक एवं रणनीतिक दर्शनों का वैशिष्ट्य समाहित है। राम आज भारत ही नहीं अपनी दूरदर्शी, समदर्शी एवं सर्व समावेशी व्यक्तित्व के कारण वैश्विक सांस्कृतिक पुनर्रचना के बिम्ब हो गए हैं। ‘राम’के व्यक्तित्व में इतनी व्यापकता है कि, प्रत्येक व्यक्ति को उसकी व्याख्या करने एवं प्रेरणा प्राप्त करने की अनेक नवीन दिशाएं मिल जाती है।
‘राम’के काल खण्ड के समय भारत भूमि पर वर्तमान में प्रचलित अनेक पंथिक विश्वास अस्तित्व में ही नहीं थे। प्रारम्भ से ही हमारी संस्कृति विविधतापूर्ण चिन्तन सौन्दर्य की विशिष्टताओं से परिपूर्ण रही हैं। इस तथ्य से कोई असहमत होने का आधार नहीं रखता कि ‘राम’भारत में निवास करने वाले सभी लोगों के पूर्वज हैं। पूर्वज का अर्थ ही है जिसका जन्म पूर्व अर्थात् पहले हुआ हो। वर्तमान में अनेक पंथों में विश्वास रखने वाले लोग सनातन धर्म से सहमति भले ही न रखें परन्तु इस तथ्य को अस्वीकार नहीं कर सकते कि ‘राम’भारत भूमि पर निवास करने वाले समस्त मानव समूह के पूर्वज हैं। अनेक पंथों का अभ्युदय विगत 2500 वर्षों की परिधि के अन्तर्गत हुआ है। उससे पूर्व इन पंथों के मानने वाले लोगों के पूर्वज भी किसी न किसी धर्म/पंथ के विश्वास से जुड़े ही रहे होंगे। इसलिए वर्तमान में विश्वासगत विभिन्नतायें हो सकती है जो एक जीवन्त राष्ट्र की शक्ति है, परन्तु ‘राम’का भारतीय सांस्कृतिक धरोहर तथा शाश्वत मूल्यों का संवाहक होना सहज प्रामाणिक है।
मैं कुछ शब्दों में व्यक्त करना चाहूँगा कि जिस रूप में राम का व्यक्तित्व मुझे अत्यधिक आकर्षित करता है-
प्रथमत:- मुझे राम का ‘राजाराम’से अधिक ‘जननायक राम’का पहलू अधिक खींचता है। जिस समय ‘सीता माँ’का विकृत मानसिकता के अहंकारी रावण द्वारा छलपूर्वक अपहरण किया गया, राम चाहते तो अपने ससुर राजा जनक से सैन्य सहायता मांग सकते थे। जनक उस समय के समस्त राजाओं के दार्शनिक पथ-प्रदर्शक थे। शायद ही कोई उनकी सलाह को ठुकरा सकता, परन्तु ‘राम’के ‘मन’में तो कुछ और भाव था। वे अपने पुरुषार्थ से संघर्ष करना चाहते थे और उसमें सहयोगी की भूमिका के केन्द्र में आमजन को रखना चाहते थे। उन्होंने वनों के दुरूह अंचलों में रहने वाले लोगों के प्रति अत्याचार करने वाले बालि जैसे व्यक्तियों के विरूद्ध उनका साथ देकर शोषण से मुक्ति दिला कर प्रेम एवं स्नेह प्राप्त किया। उन्हीं वनवासियों ने ‘राम’के साथ अपने स्वयं के पराक्रम एवं साहस के बल पर रावण के विरूद्ध युद्ध किया। राम को विश्वास था कि समृद्धि एवं भोग-विलास में लिप्त राजाओं के सहयोग से आततायी के विरूद्ध संघर्ष संभव नहीं है, बल्कि सफलता तभी मिल सकती है, जब वंचित एवं शोषित वर्गों का समूह आत्म चेतना को वर्ग-चेतना में परिवर्तित करने का संकल्प कर ले। यह वनवासियों का संकल्प ही तो था कि रावण के वैज्ञानिक शस्त्रों का सामना पत्थरों एवं वृक्ष की शाखाओं से करके ‘राम' के विजय के सहचर बने और सीता को मुक्ति दिलाई।
मुझे यह लगता है कि कदाचित ‘राम’का यह पक्ष ही गांधी के मन में स्वतंत्रता आंदोलन में आमजन की सहभागिता को बढ़ाने की नई चेतना एवं ऊर्जा का संचार किया और वे ‘रघुपति राघव राजाराम’ के भजन से प्रार्थना सभाओं की शुरूआत करने लगे।
दूसरा पक्ष- आकर्षित करता है कि ‘राम विश्व के पहले व्यक्ति हैं, जो हजारो वर्ष पूर्व ही राज्यों के मध्य ‘फेडरेशन’एवं स्वस्थ सहकार के प्रणेता रहे हैं। ‘राम’अवसर प्राप्त होने के बावजूद साम्राज्यवादी नहीं होते हैं। वे बालि का कुशासन समाप्त कर सुग्रीव को वन क्षेत्र सौंपते हैं और रावण की आततयी व्यवस्था को समाप्त कर द्रविण क्षेत्र लंका में विभीषण का राज्याभिषेक कराते हैं। परन्तु सुग्रीव एवं विभीषण दोनों को मित्र की पदवी देते हैं। वे उन्हें सखा भाव से देखते हैं। ‘राम’आधिपत्य नहीं चाहते, सहकार के पक्षधर हैं। ‘राम’सामा्रज्यवादी नहीं बल्कि समानता पर आधारित स्वायत्त ‘फेडरेशन’को स्थापित करते हैं। आज यही फेडरेशन की अवधारणा उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा है, जिसके प्रथम अवधारक हजारों वर्ष पूर्व चक्रवर्ती उदार सम्राट राम रहे हैं।
तीसरा पक्ष- ‘राम’कभी सांस्कृतिक श्रेष्ठता के भाव से अभिजात्य की वकालत नहीं करते। वे समानता एवं समावेशी विचारधारा के पौषक थे। उनका व्यक्तित्व पूर्वत: समन्वकारी था। तद्समय भारत भूमि पर तीन प्रकार की बड़ी सामाजिक व्यवस्थाएं एवं संस्कृतियाँ विद्यमान थीं। ‘राज्य’ की अवधारण पर स्थापित आर्य संस्कृति, दूसरी वन संस्कृति एवं तीसरी ‘रक्ष’संस्कृति। राम तीनों संस्कृतियों की जीवन-पद्धति एवं आस्थाओं का सम्मान करते हुए उनके मध्य मानवीय मूल्यों को केन्द्र में रखते हुए समन्वित दृष्टिकोण को पल्लवित एवं पुष्पित करते हैं। वे ‘कौशल’या अन्य ‘राज्य’के अवधारित मूल्यों को अन्य संस्कृतियों पर थोपते नहीं, बल्कि परस्पर सहकार से एक समन्वयकारी संस्कृति के ‘विविधता में एकता’के भाव को जन्म देते हैं।
चौथा पक्ष- जो राम का अद्भुत है, वह है संघर्ष में अविचलित होते हुए स्वयं में, सत्य में, जन-शक्ति में विश्वास के बल पर संकल्पित होकर जीवन-यात्रा में सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढऩा। उनका यह स्वरूप ही उन्हें मनुष्य के रूप में अवतरण होते हुए भी भगवान् बना देता है। हम ‘राम’की आराधना करते हुए याचना करते हैं कि हमें सुख दो, समृद्धि दो एवं निर्विघ्न जीवन जीने का आशीष दो। यह भी मांगते रहते हैं कि हमारी सभी मनोकामना पूर्ण कर दो। परन्तु हम ‘राम’के समूचे जीवन की कथा पढ़ते हुए भी, उनकी लीलाओं का नियमित मंचन देखते हुए भी यह अनुभूति करने से चूक जाते हैं कि जब ‘राम’भी मानव रूप ग्रहण किए तो उनको कितने संघर्षो की शृंखला से गुजरना पड़ा। उनसे हमे यह आशीष मांगना चाहिए कि हमें भी वही सकारात्मकता एवं संकल्प शक्ति दें, जिससे हम भी संघर्षों के मध्य से नए मूल्यों के सृजन की संभावना बन सकें तथा सामाजिक फलक पर जनोन्मुख छाप छोड़ सकें।
पांचवा पक्ष- जो ‘राम’का आकर्षक है, वह है स्वयं का विरोध करने वालों के गुणो के प्रति भी आदर-भाव। जहाँ युद्ध में परास्त रावण से दीक्षा लेने के लिए लक्ष्मण को निर्देश देते हैं, वहीं वनवास भेजने वाली कैकेयी को सदैव ‘माँ’की तरह समादृत करते हैं। यह ‘राम’के व्यक्तित्व का सहिष्णुता से भी ऊपर उठकर परम उदात्तता की बोध कराता है।
छठा पक्ष- ‘राम’तदसमय व्यवहृत सभी पथों/विश्वासों के समन्वय में आस्था रखने वाले महनीय व्यक्तित्व हैं। वैष्णव, शैव एवं शाक्त-परंपरा आदि सभी मान्यताओं के प्रति समभाव रखते हुए, विविधताओं में सामंजस्य के प्रबल पक्षधर रहे हैं ।
सातवां पक्ष- राम भौगोलिक सीमाओं से परे भारतीय संस्कृति के प्रथम निर्यातक थे। उनके द्वारा भारतीय मूल्य बोध को अनेकों क्षेत्रों में प्रसारित किया गया जो आज थाईलैंड, बर्मा, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया एवं श्रीलंका आदि नामों से पृथक राष्ट्र के रूप में हैं । इन देशों में प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी अनेक धरोहर एवं परम्परागत कहानियाँ आज भी विद्यमान हैं।
हजारों वर्ष बाद जब हम अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं यथा मानवीय मूल्यों का क्षरण, युवाओं में पनपरही अवसाद ग्रस्तता एवं नैराश्य, सामाजिक समीकरणों में संकीर्णता, सांस्कृतिक उच्चता-नीचता की ग्रन्थि, आतंकवाद, साम्राज्यवादी मानसिकता, असहिष्णुता तथा ‘सहकार’एवं ‘स्वायत्त फेडरेशन’ के भाव का राष्ट्रों के मध्य अभाव आदि। ऐसी विषम् परिस्थिति में संश्लिष्ट समस्याओं के महा समुद्रीय भंवर में ‘राम’ का जीवन एक प्रकाश पुंजित द्वीप की तरह है। ‘राम’ का व्यक्तित्व एक संभावना है नव सृजन का।इस तरह ‘राम’हिन्दू सनातनता के एक सशक्त धार्मिक विम्ब ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सामाजिक व्यापक फलक पर बहुविध चुनौतियों के समाधान के लिए एक वैश्विक संभावना हैं।
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01 Mar 2025 17:58:05
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