प्राकृतिक चिकित्सा क्या है?
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डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज, निदेशक- योगग्राम, हरिद्वार
समस्त प्राकृतिक चिकित्सा सर्वाधिक प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है। जीवन के प्रारम्भ एवं विकास के साथ ही प्राकृतिक चिकित्सा का उद्भव एवं विकास हुआ। इतिहासकारों के अनुसार ईसा से पाँच हजार वर्ष पूर्व लिखे गये वैदिक वाङ्मय में प्रकृति के पंच महाभूतों की वैज्ञानिक चिकित्सकीय महत्ता पर प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में प्राकृतिक चिकित्सा से सम्बन्धित अनेक सूत्र तथा मंत्र हैं। विश्व के कोने-कोने में प्रचलित अनेक लोकोक्तियाँ तथा कहावतें, जैसे-‘सौ दवा एक हवा’, ‘बिन पानी सब सून’, ‘जल ही जीवन है’, ‘धरती माँ है’, ‘शरीर माटी का पुतला है’, ‘क्षीति जल पावक गगन समीर’, ‘पंचतत्त्व से बना शरीर’, मिट्टी पानी धूप हवा, सब रोगों की एक दवा’आदि प्राकृतिक चिकित्सा की प्राचीनता को दर्शाती हैं।सत्रहवीं शताब्दी के अन्त में प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति जर्मनी से प्रारंभ होकर यूरोप होते हुए सारी दुनिया में छा गयी। जर्मनी के लुई कुने, एडल्फ जुस्ट, फादर नीप, विस्नेज प्रिस्निज, अमेरिका के केल्लाग, हेनरी लिण्डलहार, इंग्लैण्ड के हैर बेन्जामिन, स्टेनलीफ आदि चिकित्सकों ने प्राकृतिक चिकित्सा को जन-जन तक पहुँचाया। भारत में प्राकृतिक चिकित्सा को लोकप्रिय बनाने में महात्मा गाँधी का विशेष योगदान है। |
स्वस्थ रहना स्वाभाविक है। मात्र मनुष्य को छोडक़र सभी प्राणी स्वस्थ रहते हैं।जहाँ जानवर मनुष्य के सम्पर्क में आये, वे बीमार रहने लगे। जंगली जानवरों के लिए किसने अस्पताल बनाया है, वे हमशा स्वस्थ रहते हैं। वे शानदार तरीके से जीते हैं तथा मरते भी शानदार तरीके से हैं। वे अपनी आयु का पूर्ण भोग करते हुए शरीर जीर्ण-शीर्ण एवं जर्जर होने पर त्याग देते हैं, वैसे ही जैसे वस्त्र पुराना होने पर उसे त्याग दिया जाता है। किसी जानवर को आपने चश्मा लगाये हुए, टूथ-ब्रश करते हुए देखा है? इन जानवरों की आँखें तथा दाँत खराब क्यों नहीं होते? क्या मनुष्य की आँखें प्रकृति ने कमजोर बनायी हैं। जंगली वनस्पतियाँ, वृक्ष, पौधे कभी बीमार नहीं होते। आदमी को छोडक़र प्रकृति की गोद में विचरण करने वाले प्राकृतिक जीवन जीने वाले कोई भी वनस्पति जीव-जन्तु तनाव में नहीं होते, बीमार नहीं होते। मनुष्य ने अपने आपको इतना निरीह एवं कमजोर बना लिया है कि वह स्वस्थ, सुखी एवं शांति से रहने के बदले बीमार, दु:खी, बेचैन तथा तनाव में रहता है। |
मस्त प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य दिव्य है, ईश्वरीय है, अमृतपुत्र है। वह अपने वास्तविक स्वास्थ्य को जान जाये, नि:सर्ग के अनुसार जीवन बिताये तो वह कभी रोगग्रस्त नहीं हो।
प्राकृतिक चिकित्सा की विशेषताएँ
⇒ रोग का कारण मनुष्य स्वयं है। मनुष्य के गलत आहार, विकृत विचार तथा असंतुलित जीवनयापन से बीमारी पैदा होती है।
⇒ शरीर के अन्दर रोगकारक दूषित विकार पैदा होते हैं। ये विकार आँत (मल-त्याग), फेफड़े (साँस), गुर्दे (पेशाब) तथा चमड़ी (पसीना) से निकल जाते हैं। इन अंगों के सबल, सक्रिय तथा स्वस्थ होने पर हर रेज विष या विकार निकल जाते हैं। इन अंगों के कमजोर होने पर शरीर के अन्दर का विकार निकल नहीं पाता। शरीर के विकार बर्दाश्त करने की भी एक क्षमता है, जब इस क्षमता से विकार या विष ज्यादा हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में शरीर की जीवनी-शक्ति दूसरे ढंग से विकार निकालकर स्वत: निर्मल एवं निर्दोष होने का प्रयास करती है। शरीर के स्वत: स्वच्छ एवं स्वस्थ होने का प्रयास ही रोग कहलाता है।

⇒ शरीर के अन्दर एकत्रित विकार, गंदगी या विष को टॉक्सिक मैटर, मारबिड मैटर, पॉयजन या फॉरन मैटर आदि कहते हैं। इस विजातीय पदार्थ के कारण ही शरीर को स्वस्थ रखने वाली रोग-प्रतिरोधक क्षमता या जीवनी-शक्ति दब जाती है और कुचल जाती है। दबी-कुचली जीवनी-शक्ति का सिसकता तथा कराहना ही रोग कहलाता है। दवाओं से इस जीवनी-शक्ति को और दबा दिया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा विजातीय पदार्थ को हटाकर दबी-कुचली सिसकती-कराहती जीवनी-शक्ति को पुन: जीवन प्रदान कर पोषण कर सशक्त एवं स्वस्थ किया जाता है।
⇒ प्राकृतिक चिकित्सा स्वास्थ्य का विज्ञान है जबकि सभी प्रकार की औषध चिकित्सा पद्धति रोग का विज्ञान है। यही कारण है कि औषध चिकित्सा पद्धतियों में स्वास्थ्य की अपेक्षा निदान पर ज्यादा बल दिया जाता है। ‘ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया’वाली कहावत चरितार्थ होती है। औषध चिकित्सा पद्धतियों में रोग का उपचार किया जाता है जबकि प्राकृतिक चिकित्सा में रोगी का उपचार होता है और मूल कारण को दूर किया जाता है।
⇒ शरीर के स्वास्थ्य के लिए आहार में 75 प्रतिशत क्षारधर्मी तथा 25 प्रतिशत अम्लधर्मी (खटाई वाला) आहार होना चाहिए। भोजन में 25 प्रतिशत से अधिक अम्लीय आहार जाने से खून में खटाई जाने से खून दूषित हो जाता है। इस दूषित पदार्थ को पसीने तथा पेशाब से बाहर फेंक दिया जाता है। यदि यह बाहर नहीं निकलता है तो यह विभिन्न अंगों को क्षतिग्रस्त एवं रोगग्रस्त करता है।
⇒ जो भोजन पच नहीं पाता है, रस-रक्त यानी शरीर का हिस्सा नहीं बन पाता है, वह शरीर के लिए विजातीय पदार्थ है। उसे बाहर निकल जाना चाहिए। उसका कुछ हिस्सा भी शरीर में रह जाने पर खून के साथ मिलकर सारे शरीर में पहुँचकर दूषित विकार एवं रोग पैदा करता है।
⇒ भोजन, साँस तथा जल के द्वारा भी सूक्ष्म जीव शरीर में प्रवेश करते हैं तथा उनके प्रतिविष (टॉक्सिन्स) से शरीर में जो दूषित विजातीय पदार्थ पैदा होते हैं उन्हें स्वस्थ स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षा एवं सफाई वाली शक्ति द्वारा बाहर फेंक दिया जाता है।
⇒ निरन्तर कार्य करने से शरीर में प्रतिक्षण खरबों कोशिकाएँ टूटती-फूटती रहती हैं। हजारों रोगाणु मरते हैं और नष्ट होते हैं। ये शरीर के लिए विजातीय होते हैं। इनका निष्कासन भी मल, मूत्र, पसीना तथा साँस द्वारा होता रहता है।
⇒ चाय, कॉफी, चीनी, शराब, माँस, अण्डा, समोसे, कचोड़ी, पकोड़े आदि तले-भुने आहार, कोका कोला आदि पेय, कैफीन युक्त चॉकलेट, अन्य खाद्य पदार्थ, दर्दनाशक, उत्तेजक, कीटाणुनाशक, गर्भ निरोधक, टीके (इन्जेक्शन) तथा अन्य औषधियाँ, विटामिन तथा टॉनिक की गोलियाँ, सीरप, अति आहार, परिशोधित आहार, नि:सत्त्व परिष्कृत आहार, डिब्बाबंद प्रोसेस किया हुआ, प्रिजर्व्ड एवं कन्फैक्शनरी, जंक तथा फास्ट फूड इत्यादि शरीर में विजातीय दूषित पदार्थ ज्यादा मात्रा में पैदा करके जीवनी-शक्ति को पूर्णतया दबाकर कुचल देते हैं। रक्त-संचार तथा नाड़ी-संचार दूषित पदार्थ ज्यादा मात्रा में पैदा करके जीवनी-शक्ति को पूर्णतया दबाकर कुचल देते हैं। रक्त-संचार तथा नाड़ी-संचार दूषित एवं बाधित होता है, परिणामत: तीव्र जीर्ण एवं घातक रोग पैदा होते हैं।
⇒ प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सभी रोग एक ही हैं, सभी रोगों का कारण एक ही है, सभी रोगों का निदान तथा सभी रोगों की चिकित्सा एक ही है। यह सिद्धान्त अपने आप में अपूर्व, अद्भुत एवं सार्वभौम सत्य है।
⇒ शरीर के अन्दर एकत्रित विजातीय दूषित पदार्थ बर्दाश्त से बाहर हो जाते हैं। शरीर उन्हें जलाकर नष्ट करने के लिए ज्वर पैदा करता है अथवा उन्हें बाहर निकालने के लिए दस्त, जुकाम, खुजली, खाँसी, दर्द आदि तीव्र एक्यूट रोग पैदा करता है। सभी प्रकार के तीव्र रोग स्वयं चिकित्सक हैं। तीव्र रोगों द्वारा शरीर की पूरी सफाई हो जाती है।
प्राकृतिक चिकित्सा को विनोबाजी ने 'सत्व चिकित्सा' कहा है- सत्व-चिकित्सा प्राकृति के गूढ़तम रहस्यों तथा रोग की सच्चाई को जानता है, वही सच्चा चिकित्सक है...वह शारीर के बाहरी लक्षणों को देखकर घबड़ाता नही है, वह खान पान में सुधार कर ध्यान एवं योग द्वारा विचार को विधायक, सृजनशील, एवं स्वस्थ बनाकर तथा प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा शरीर के विकार को बहार निकालकर ही स्वास्थ प्रदान करता है|... |
⇒ उपवास, रसाहार, एनिमा आदि प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा शरीर द्वारा स्वत: स्वस्थ होने की प्रक्रिया में सहयोग कर देने से तीव्र रोग एक से तीन दिन में शान्त हो जाते हैं। दवाइयों से दबा देने तथा अनाप-शनाप आहार करते रहने से तीव्र रोग दब जाते हैं। जुकाम दबकर खाँसी ब्रोंकाइटिस तथ दमा-दस्त दबकर जीर्ण आन्त्रशोथ, बवासीर तथा अल्सर पैदा करते हैं। अत: जीवनी-शक्ति कमजोर होने पर ही जीर्ण रोग होते हैं।
⇒ रोग-प्रतिरोधक जीवनी-शक्ति सशक्त एवं प्रबल होने पर ही विकार तेजी से निकलते हैं यानी तीव्र रोग होने का मतलब है कि रोगी की रोग प्रतिरोधक जीवनी-शक्ति सबल एवं इस लायक है कि विकार तथा रोग को निकाल बाहर करे। जीर्ण तथा मारक रोगों में भी तीव्र स्थिति देखने को मिलती है।
⇒ तीव्र रोग को दवा देकर दबा देने से जीर्ण रोग स्थायी हो जाता है। ऐसे रोगी मुर्दे की तरह उत्साह एवं उमंग से रहित एवं अभिशप्त जीवन जीते हैं। गठिया, दमा, बवासीर, आन्त्रशोथ, संग्रहणी, मधुमेह, लकवा, रक्तचाप, हृदय रोग आदि जीर्ण रोग के उदाहरण हैं। इनसे जीवन नर्क बन जाता है। जीर्ण रोग में यदि अंग फेफड़ा, यकृत, हृदय, प्लीहा, सन्धियाँ आदि खराब नहीं हुई हों तथा किसी प्रकार की विकृति नहीं आई हो तो उसे प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा पुन: स्वास्थ्य प्रदान किया जा सकता है।
⇒ जीर्ण रोग की स्थिति में भी प्रकृति बार-बार विकार को निकाल बाहर करने की कोशिश करती है। परन्तु शरीर की इस भाषा को हम समझ नहीं पाते हैं। दवाई द्वारा बार-बार दबाने की कोशिश करते हैं। असंयमित आहार एवं विध्वंसक नकारात्मक चिन्तन के कारण साधारण रोग को भी घातक रोग में परिवर्तित कर देते हैं।
⇒ प्राकृतिक चिकित्सक को विनोबाजी ने ‘सत्त्व चिकित्सक’कहा है। सत्त्व-चिकित्सक प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों तथा रोग की सच्चाई को जानता है, वही सच्चा चिकित्सक है। वह शरीर के बाहरी लक्षणों को देखकर घबराता नहीं है, वह खानपान में सुधार कर ध्यान एवं योग द्वारा विचार को विधायक, सृजनशील एवं स्वस्थ बनाकर तथा प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा शरीर के विकार को बाहर निकालकर ही स्वास्थ्य प्रदान करता है। वह अच्छी तरह जानता है कि सभी रोग लक्षण का कारण संचित विकार है।
⇒ खाँसी होने पर फेफड़ा, सिरदर्द सिर, खुजली होने पर त्वचा या चमड़ी, दिल की बीमारी में दिल, आँख पर सिर्फ आँख खराब नहीं होती। इन तमाम प्रकार की बीमारियों का असली कारण तो शरीर में संचित विकार, रोग-प्रतिरोधक जीवनी शक्ति का कमजोर होना, खून की खराबी तथा नाड़ी-संचार में रुकावट आना है।
⇒ जिस अंग से विकार रोग के रूप में बाहर आ रहा है, उसे प्राकृतिक साधनों से विकारमुक्त कर सशक्त एवं स्वस्थ बनाने के साथ ही सारे शरीर को विकारमुक्त कर सबल बनाना ही प्राकृतिक उपचार है।
⇒ साइनोसाइटिस में साइनस, टॉनिसलाइटिस में टॉन्सिल, एपेंडिसाइटिस में एपेंडिक्स, अल्सर से ग्रस्त आमाशय या आँत की शल्य क्रिया करना उस रोग का सच्चा उपचार नहीं है। कई रोगी ऐसे आते हैं जिनमें शल्य-क्रिया के बाद वह रोग अधिक जटिल हो जाता है। साइनोसाइटिस या टॉन्सिलाइटिस सिर्फ बाहरी लक्षण हैं, इनका ऑपरेशन करना सच्चाई से मुँह मोडऩा है, अपने आप को धोखा देना है। टॉन्सिल शरीर का रक्षक है। इसमें निकलने वाले प्रोटेक्टिव फैक्टर रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। इसका ऑपरेशन करना ठीक वैसा ही है जैसे घर के रक्षक चौकीदार को हमलावरों से जूझते हुए घायल होने पर उसकी शुश्रूषा करने की अपेक्षा उसे मार-काट दिया जाए। इन अंगों का ऑपरेशन कराने के पहले शरीर को विकार-मुक्त करना ही सही उपचार है। चिकित्सा विज्ञान में ऑपरेशन को उपलब्धियों के रूप में स्वीकारा जाता है परन्तु आज इसका दुरुपयोग अधिक हो रहा है। पैसे के लालच में चिकित्सक सिजेरियन बच्चे पैदा करते हैं, एपेंडिक्स, पित्ताशय, गर्भाशय निकाल देते हैं और आवश्यकता न होने पर भी ऑपरेशन की सलाह देते हैं। दुर्घटना या जीवन-मरण की स्थिति में उचित ऑपरेशन करना एक उपलब्धि है परन्तु बात-बेबात ऑपरेशन करना अभिशाप है।
⇒ तीव्र रोगों में ध्यान, विश्राम, उपवास, चिकित्सीय आहार तथा पंच महाभूत- मिट्टी, पानी, धूप, आकाश एवं वायु चिकित्सा अत्यन्त कारगर सिद्ध होती है। जीर्ण रोगों में रोग की स्थिति के अनुसार उपचार-विश्राम, पंच महाभूतों की चिकित्सा के साथ व्यायाम तथा आसन उपयोगी होते हैं।
⇒ शरीर को बाहर से किसी प्रकार की औषधि की आश्यकता नहीं है। स्थिति के अनुसार शरीर स्वत: हजारों प्रकार की दवाइयों का निर्माण करता है। शरीर के अंग-प्रत्यंग दवा निर्माण करने वाली इकाइयाँ हैं। सिर्फ यकृत 500, अग्न्याशय दो दर्जन, मस्तिष्क सवा सौ, फेफड़े, हड्डियाँ यानी समस्त अवयव हजारों प्रकार की औषधियों का निर्माण करते हैं। प्रत्येक कोशिका रुग्णावस्था मं इंटरफेरॉन जैसी जादुई दवाई बनाती है तथा रोगाणुओं को नष्ट कर शरीर की प्रतिरोध क्षमता बढ़ाकर स्वास्थ्य प्रदान करती है। शरीर को उचित प्रकार से तथा जीवनदायक आहार द्वारा श्रेष्ठतम किस्म के कच्चे माल की आपूर्ति करने पर उच्चतम गुणवत्ता की औषधि बनती है जिससे तन-मन स्वस्थ रहता है।
⇒ तनाव, ईष्र्या, द्वेष, घृणा, क्रोध, हिंसा आदि विध्वंसक एवं नकारात्मक विचारों से तन तथा मन को शक्तिशाली एवं स्वस्थ बनाने वाले रसायन का रिसाव कम हो जाता है। रक्तवाहिनियों तथा हृदय की माँसपेशियों को नष्ट करने वाले रसायनों का स्राव बढ़ जाता है। प्रेम, सहानुभुति, करुणा, मंगल, मैत्रीपूर्ण विचारों से शरीर में बीटा एँड्रोर्फिन, डोपामिन, सेरोटोनिन आदि का स्राव बढ़ जाता है। ये सभी शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को सबल बनाकर स्वास्थ्य, सुख, शान्ति, शील, सौहार्द, सौन्दर्य, साहस, शक्ति एवं शौर्य प्रदान करते हैं।
योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा भारत के प्राचीन योग विज्ञानियों तथा मनीषियों की अपूर्व देन है। हमारा शरीर पंच महाभूतों- मिट्टी, पानी, धूप, हवा तथा आकाश से निर्मित है तथा इन्हीं पंच महाभूतों के असंतुलन से बीमारी होती है। इनके संतुलित प्रयोग से हम स्वस्थ रह सकते हैं।
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