सुखमय जीवन Only Possible with 'पुरुषार्थ'

सुखमय जीवन Only Possible with 'पुरुषार्थ'

पंकज स्वदेशी, दिव्य प्रकाशन विभाग

सुख किसको प्रिय नहीं है? यह तो संसार के प्रत्येक मनुष्य एवं पशु-पक्षी भी सुख की कामना है। एक क्षण के दु: से मनुष्य एवं पशु-पक्षी दोनों ही व्याकुल तथा विचलित हो उठते हैं, यहाँ तक की एक दूसरे के खून के प्यासे तक हो जाते हैं। मनुष्य तो फिर भी इस दु: से मुक्त हो सकता है, परन्तु पशु-पक्षी के लिए तो यह संभव ही होगा। क्योंकि मनुष्य तो पशु की अपेक्षा कई गुणा अधिक संवेदनशील, समझदार एवं विवेकशील है।
प्रश्न उठता है, आखिर इन दुखों से मुक्त होने में हमारी संवेदनशीलता, समझदारी एवं विवेकशीलता कैसे कारगर हो सकती है? जीवन के अंतिम क्षणों में भी हम इसे क्यों समझ नहीं पा रहे हैं? यह शास्त्र एवं ऋषि आखिर किस परम सुख की बात कर रहे हैं? शक्ति सम्पन्न एवं सामर्थशाली होते हुए भी हम आज दुखी क्यों हैं? और इस परम सुख से वंचित क्यों है? क्या हमारे सुख को खोजने की दिशा ठीक है? जिसमे हम सुख को खोज रहें है, क्या वह वाकई में सुख है? कहीं कोई इसमें भ्रान्ति तो नहीं है? सुख की अभिलाषा रखने वाले मानव का इस दिशा में चिंतन होना परम आवश्यक है, तभी तो उसकी सुख को पाने की राह ठीक हो पाएगी। इस चिंतन के बिना तो सुख संभव ही नहीं है और साधक बने बिना यह चिंतन हमारे मस्तिष्क में उत्पन्न भी होगा। अत: परम सुख की कामना करने वाले मनुष्य का सर्वप्रथम साधक बन साधना करना अनिवार्य है।
प्रश्न उठता है : यह साधक कैसे बना जाता है? इसमें किसकी साधना करनी पड़ती है? यह मार्ग कितना कठिन है?
उत्तर है : परम सुख की प्राप्ति एवं साधक के रूप में जीवन जीने के लिए तो स्वाध्याय करना परम आवश्यक है? स्वाध्याय करके विषयों को जानना जानकर वैसा ही जीना, बस इतनी ही तो साधक को साधना करनी पड़ती है। यह मार्ग तो उतना ही सरल है, जैसे एक स्वस्थ शरीर में भोजन स्वत: ही रच-पच जाता है, ठीक वैसे ही विषयों का सही-सही बोध होने के कारण व्यक्ति दुखों से हटता चला जाता है और साधक बन सुखों को प्राप्त करता हुआ परम सुख को प्राप्त कर लेता है। बस विषय हमें बहा ले जाएँ, इसके लिए हमें दिव्य संकल्पों को धारण कर अटल जीवन जीना होगा। एक-एक क्षण सावधान रहने से ही जीवन की साधना हो सकती है। जैसा ज्ञान वैसा जीवन, जैसा दर्शन वैसा प्रदर्शन, जैसा ज्ञान वैसी क्रिया। जिस प्रकार विषयों में सुख का दर्शन करने वाला व्यक्ति विषयों का क्षणिक सुख लिए बिना नहीं रह सकता। ठीक उसी प्रकार विषयों में दु: दर्शन करने वाला व्यक्ति कैसे विषयों से जुड़ा रह सकता है? जब दर्शन बिगड़ता है तो कर्म और उपासना (मन का लगाव) भी उसी के अनुरूप हो जाते हैं। दर्शन शुद्ध भी होता है और अशुद्ध भी। इसकी पहचान हमारी अन्तरात्मा, शास्त्र गुरुओं से होती रहती है। सुख की कामना करने वाले व्यक्ति को सर्वप्रथम अपने हृदय में शुद्ध दर्शन को प्राप्त करने की चाह उत्पन्न करनी होगी। वह चाह ही उसके सुख की आगे की राह खोज लेगी। यह संसार तो हर प्रकार से मनुष्य को उत्तेजित करने के लिए तैयार रहता है। साधक की कुशलता इसी में है कि वह कैसे भी अपने आप को अनुत्तेजित रखें। प्रतिक्षण सजग, चौकन्ना, सचेत प्रमादरहित रहते हुए विषम से विषम परिस्थितियों में भी सहजता से उनसे पार हो जाए। साधक! सावधान! बस अपनी यात्रा में चलता चले। बुद्धिमान मनुष्य तो उसे ही कहना चाहिए जिसने एक बार देख लिया की विषयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग, द्वेष आदि) में दु: है तो, उनसे सदा-सदा के लिए दूर हो जाए। यही है सच्चा वैराग्य।
वैराग्य का मतलब यह नहीं है कि हमें भौतिक उन्नति के सभी दरवाजे बंद कर संसार से दूर पहाड़ों, मंदिरों की शरण में चले जाना चाहिए। बल्कि ज्ञानपूर्वक जीते हुए निष्काम सेवा भाव से हमें जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के परम शिखर को पाना है, यह लक्ष्य हमें अपने समक्ष रखके पुरुषार्थ के साथ जीना चाहिए। प्रेरणा के रूप में योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं आयुर्वेद शिरोमणि परम श्रद्धेय आचार्य श्री जी का जीवन, उनके दिव्य आलोक में संचालित सेवा प्रकल्प (पतंजलि आयुर्वेद दिव्य फार्मेसी) उनके ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, मानव सेवा, अखंड पुरुषार्थ का एक जीवंत उदाहरण हम सभी के समक्ष है।
जीवन में संकल्प लेना अत्यंत सरल है। परन्तु संकल्प को साकार, निरंतर पुरुषार्थ के माध्यम से ही किया जा सकता है। मन के विकारों पर विजय प्राप्त करनी हो या निष्काम सेवा भाव से परम ऐश्वर्य को पाना  हो। केवल ज्ञान के साथ किया गया पुरुषार्थ ही इसमें एकमात्र माध्यम है। हमारी जीवन यात्रा में वैराग्य एवं ज्ञान का प्रकाश सदा प्रतिष्ठित रहे तथा हम सहजता से जीवन को समझ पाएँ, इसके लिए प्रात:स्मरणीय परम श्रद्धेय आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज ने साधकों के लिएसाधना पथनामक पुस्तक का बहुत ही सुन्दर सरल लेखन हम सभी जिज्ञासुओं के लिए किया है। यह एक पुस्तक मात्र सभी साधकों के मार्ग को ज्ञान से प्रकाशित करने, जीवन में अज्ञान को देखने-समझने तथा जीवन को सुखमय बनाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगी। इस पुस्तक के मात्र स्वाध्याय एवं अनुकरण करने से, हम जीवन को समझने तथा प्रकाशित करने में समर्थ होंगे।

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