‘दृढ़ संकल्प से नशा मुक्ति'
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वंदना बरनवाल,
राज्य प्रभारी महिला पतंजलि योग समिति, उ.प्र. मध्य
मनुष्य का जीवन ईश्वर का दिया हुआ एक अनमोल उपहार है, एक ऐसा उपहार जिसका महत्त्व ज्यादातर लोग समय रहते हुए नहीं समझ पाते। खासतौर पर वे लोग जो अपने स्वास्थ्य, रहन-सहन और खानपान के प्रति लापरवाह होते हैं। जिन्दगी से लापरवाह ऐसे लोगों की लापरवाही उन पर और उनके परिवारजनों पर उस समय भारी पडऩे लगती है। जब जाने-अनजाने में ऐसे लोग किसी भी प्रकार के नशे का पहली बार सेवन करते हैं। क्योंकि यही पहली बार का सेवन ही तो वो आरंभ बन जाता है, जो उनकी बेशकीमती जिन्दगी को बेहद दुखदाई अंत की ओर धकेलने में मदद करता है। सब कुछ जानते और समझते हुए भी खुद की बेशकीमती जिन्दगी के बारे में ज्यादातर लोगों की समझ तब विकसित हो पाती है जब बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होता है। जब तक गलती का अहसास हो और कुछ समझ में आये तब तक देर हो चुकी होती है। अक्सर यह देर ऐसी होती है कि भूल सुधारना तो दूर, पछतावे का मौका भी नहीं मिल पाता। देखते-देखते जिन्दगी का सूरज इतनी जल्दी अस्त होने लगता है कि जिन्दगी भर की सारी जमा पूंजी लुटाकर और भगवान् के दर पर भटकने के बाद भी थमती सांसों में फिर से प्राणों का संचार नहीं हो पाता। मेहनत से कमाई हुई दौलत और अनमोल जीवन दोनों ही हथेली से रेत की तरह फिसलने लगते हैं। ऐसी स्थिति बीमार व्यक्ति के लिए जितनी दुखदाई होती है, उसके परिजनों के लिए उससे कम कष्टकारी नहीं होती।
इसीलिए तंबाकू के सेवन से होने वाले रोगों और उन रोगों के कारण होने वाली मृत्यु में वृद्धि की दर को देखते हुए साल 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे एक महामारी माना था और तभी से हर साल 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस यानि नो टोबैको-डे के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन का मुख्य उद्देश्य लोगों को तंबाकू से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान के विषय में सचेत करना है और साथ ही इस दिन तंबाकू या इसके उत्पादों के उपभोग पर रोक लगाने या इस्तेमाल को कम करने के लिए लोगों को जागरुक भी किया जाता है। पर नशे का कारोबार ऐसा फैला कि लोग हर तरह के नुकसान को जानते समझते हुए भी इसकी गिरफ्त से बाहर नहीं निकल सके। कोई इसे गम भुलाने के लिए तो कोई इसे तनाव से बचने के लिए इस्तेमाल करने लगा और कुछ को लगने लगा नशे की खुराक शरीर में पहुँचते ही शरीर में काम करने की अतिरिक्त ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है। नतीजा ये हुआ कि वैश्विक स्तर पर आशा के अनुरूप परिणाम नहीं मिले और वर्ष 2008 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सभी तंबाकू विज्ञापनों, प्रमोशन आदि पर बैन लगाने का आह्वान कर डाला। इस आह्वान का प्रभाव तो पड़ा पर नशे के व्यापारियों ने भी दूसरे रास्ते ढूंढ निकाले और साल दर साल उत्पादन, खपत और उसी अनुपात में होने वाली मौतें सब बढ़ते गए।
मई माह की शुरूआत मजदूर दिवस से होकर तंबाकू निषेध दिवस से होती है और विडंबना देखिये कि भारत में एक बड़ा श्रमिक वर्ग नशे की चपेट में हैं। इनके पास मूलभूत सुविधाएँ तो नहीं पर फिर भी इनकी जेब के मुताबिक इनको नशे का सामान मिल ही जाता है। इसीलिए आये दिन समाचारों में जहरीली शराब से मरने वालों की खबरें भी प्रकाशित होती रहती हैं। पर ये मौतें उन मौतों के सामने कुछ भी नहीं जो तंबाकू के नियमित इस्तेमाल से उपजी बीमारी और उसके कारण प्रति वर्ष होने वाली मौतों की है। रिपोर्ट के मुताबिक तंबाकू की वजह से दुनिया भर में हर साल लगभग 80 लाख मौतें हो रही हैं और भारत में यह आंकड़ा करीब 13 लाख है। पूरी दुनिया आज जिस कोरोना वायरस और उससे होने वाली मौतों से खौफ के साए में है उसके कारण एक वर्ष में करीब 30 लाख लोगों की मृत्यु हुई। यानि तम्बाकू के सेवन के कारण मरने वाले पहले से ही इस आंकड़े से ढाई गुने से भी ज्यादा हैं। अच्छी बात है कि कोरोना से बचाव के लिए विश्व भर में सभी सरकारें चिंतित हैं और वैक्सीन के इस्तेमाल तथा शारीरिक दूरी का पालन करते कराते इसके रोकथाम के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। पर विडंबना देखिये कि नशे के कारोबार से होने वाली मौतों को लेकर लोग कितने बेफिक्र रहते हैं क्योंकि इसे हर गली मोहल्ले में बेचा जा रहा है। संभवत: बेफिक्री की एक वजह यह भी हो सकती है कि तंबाकू से होने वाली बीमारियाँ कोरोना वायरस की तरह संक्रमण के कारण नहीं फैलतीं। पर इसके बावजूद यदि नशे के कारण जीवन की ऐसी दुर्दशा हो रही है तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इसको कोरोना महामारी से कमतर हम क्यों आंकें। पिछले वर्ष कोरोना के कारण लगे पूर्ण लॉकडाउन के समय यह उम्मीद बंधी थी कि लॉकडाउन के बहाने ही सही तम्बाकू उत्पादों की बिक्री और खरीद बंद हो जाएगी और लॉकडाउन की लम्बी अवधि के कारण लोगों की नशे की आदत छूट जाएगी। पर लॉकडाउन में ढील मिलते ही सभी उम्मीदों पर पानी फिर गया और स्थिति जस की तस हो गई। चोर दरवाजे से ही सही पर लॅाकडाउन में अन्य खाद्य पदार्थों की सप्लाई चेन से कहीं ज्यादा अनुशासित सप्लाई चेन इन उत्पादों की रही और जब लॉकडाउन में थोड़ी सी ढील मिली तो लोगों की बाछें खिल गईं क्योंकि सबसे लम्बी कतारें शराब की दुकानों पर देखी गई।
लत है क्या और क्यों होती?
जब शरीर और मन किसी पदार्थ को उसके हानिकारक प्रभावों और अवांछित परिणामों के बावजूद बार-बार अनिवार्य रूप से उसकी माँग करने लगें तो समझ लीजिये कि व्यक्ति को लत लग चुकी है। एक बार लत लगने के बाद जब तक वही नशा न मिले तो पीडि़त व्यक्ति बेचैन और असामान्य होने लगता है। ऐसी स्थिति दर्शाती है कि व्यक्ति को लत लग चुकी है। यदि उसे नशे से दूर रखा जाये तो उसके शरीर में घबराहट, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, गुस्सा आना, मूड़ अचानक बदलना, तनाव, मानसिक थकावट, फैसला लेने में दिक्कत, कमजोर स्मरण शक्ति, चीजों को लेकर भ्रमित रहना, नींद न आना, सिर में तेज दर्द होना, शरीर में ऐंठन-मरोड़, भूख में कमी, धडक़न का बढऩा, ज्यादा पसीना आना, उल्टी-दस्त होना आदि कोई भी लक्षण दिखाई पड़ सकता है। लत पडऩे के पीछे सबके अलग-अलग तर्क होते हैं पर वास्तव में ये सब सचमुच व्यसन को ना नहीं कह पाने के बहाने ही हैं।
देखा जाए तो दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो किसी प्रकार के नशे से अछूता हो। सामान्य रूप से इंसान को सत्ता, संपत्ति, सुन्दरता जैसे सुखों का नशा चढ़ता है और अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरह का नशा होता ही है। योग से जुड़े हम सभी लोगों को योग सीखने और सिखाने का नशा है। अभी तो कोरोना काल में फिजिकल योग की कक्षाएं कम हो गई हैं पर यदि साल भर पहले की स्थिति पर दृष्टि डालें तो महिला पतंजलि योग समिति से जुड़ी हजारों योग शिक्षिकाओं के भीतर भी घर-घर योग को पहुँचाने का जो जूनून था वह भी किसी नशे से कम नहीं था। सुबह-सुबह घर में सबसे पहले उठ जाना, घर की तमाम जिम्मेदारियों को निभाते हुए मुंह अँधेरे ही अपनी योग कक्षा में समय से पहुँच जाना वो भी बगैर किसी वित्तीय लाभ के लिए, क्या ये सब किसी नशे से कम था। इस नशे का असर भी इतना जबरदस्त था कि ऑफलाइन योग की कक्षएं जब छूट गयीं तो उनका स्थान ऑनलाइन योग की कक्षाओं ने ले लिया। यह भी लत है पर सात्विक और अध्यात्मिक लत जिससे स्वयं के साथ ही दूसरों की जीवनी शक्ति को भी हम बढ़ाते हैं। पर यदि किसी को सिगरेट, तम्बाकू जैसे किसी नशीले पदार्थ के सेवन का नशा लग जाए तो फिर ऐसे व्यक्ति की सिर्फ शक्ति नहीं बल्कि उसकी जीवनी शक्ति ही क्षीण पड़ जाती है। क्योंकि ये नशीले पदार्थ ना सिर्फ जिंदगी को तबाह करते हैं बल्कि जिस अंदाज में यह जिंदगी को समाप्त करते हैं वह बेहद दयनीय और दर्दनाक होती है। मुंह और गले के कैंसर के पीछे सबसे बड़ी वजह तंबाकू का सेवन ही होता है। शौकिया या दोस्तों का मन रखने के लिए की गई एक शुरुआत कब आदत और लत में परिवर्तित हो जाती है पता ही नहीं चलता, पर किसी भी सूरत में नशे के साथ की गयी यह दोस्ती जिन्दगी की दोस्त नहीं बन सकती। अंतत: यह दगा दे ही जाती है। इसलिए अगर इसको कोई अपने अकेलेपन का साथी या ऊर्जा देने वाला समझता है तो निश्चित रूप से वह अपने आपको झुठला रहा है क्योंकि तंबाकू किसी भी कीमत पर खाने वाले से दोस्ती नहीं करती बल्कि यह उन दुश्मनों में से है जो नुकसान सबसे ज्यादा करती है।
तंबाकू उत्पादों में वैसे तो लगभग पांच हजार जहरीले पदार्थ होते हैं परन्तु इसमें सबसे महत्वपूर्ण और खतरनाक घटक निकोटीन, कार्बन मोनोऑक्साइड और टार हैं। इसमें भी सबसे मुख्य और खतरनाक घटक है निकोटीन जिसका सबसे शक्तिशाली प्रभाव इंसानी व्यवहार पर पड़ता है। यही निकोटिन, हेरोइन या कोकीन की तरह ही नशे की लत पैदा करता है। तंबाकू के किसी भी रूप में सेवन के पश्चात निकोटीन बहुत तेजी से मस्तिष्क में पहुंच जाता है और सेंकण्डों में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करते हुए रक्तचाप, श्वास गति और हृदय गति को बढ़ाता है, मस्तिष्क की कुछ खास ग्रंथियों को सक्रिय कर देता है। धीरे-धीरे इंसान इसका आदी होने लगता है। लोग सोचते हैं कि पीडि़त शौक पूरा करने के लिए नशा कर रहा है जबकि पीडि़त को पता होता है कि नशा करना उसकी मजबूरी बन चुकी है। इसी तरह कार्बन मोनोऑक्साइड रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देती है जिससे कभी-कभी सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। जबकि टार एक तरह का चिपचिपा अवशेष होता है जो कैंसर के एजेंट की तरह काम करता है।
क्यों नहीं छूटती आसानी से लत?
वैसे तो यदि इच्छा शक्ति प्रबल हो तो दुनिया में कोई भी कार्य असंभव नहीं है पर नशे की लत को छुड़ा पाना एकदम से आसान नहीं। इस मुश्किल की सबसे खास वजह है निकोटिन के प्रभाव में आकर मस्तिष्क में डोपामाइन के स्तर का बढऩा। दरअसल निकोटिन मस्तिष्क के रिवॉर्ड सेंटर को सक्रिय करने के साथ ही मस्तिष्क में डोपामाइन के स्तर को भी बढ़ा देता है। यह बढ़ा हुआ स्तर ही तंबाकू के पुन: प्रयोग के लिए व्यक्ति को प्रेरित करता रहता है और जैसे ही निकोटिन की मात्रा शरीर में पहुँचती है व्यक्ति को अच्छा महसूस होने लगता है। इसीलिए एक बार की शुरुआत कब अच्छी लगने लगती है और कब लत बनकर आसानी से नहीं छूटती, इसका पता ही नहीं चलता।
आसानी से उपलब्धता भी है वजह
वैसे लोगों द्वारा नशे की आदत आसानी से नहीं छोड़ पाने की एक सबसे बड़ी वजह इसकी आसानी से और कम खर्च में उपलब्धता भी है। जहर के इस व्यापार के लिए न तो किसी खास पूंजी की आवश्यकता होती है और न ही किसी प्रकार के लाइसेंस की। आवश्यकता है तो बस एक छोटी सी लकड़ी की गुमटी की जिसे कहीं भी सडक़ के किनारे लगाया जा सकता है। स्वर्णिम पत्ती का कारोबार बहुतों के लिए सचमुच सोना उगलती है, इसलिए इन व्यवस्थाओं को समझ पाना आम आदमी के लिए आसान नहीं। यह जानते हुए भी कि इन गुमटियों में मौत का सामान बिक रहा है इन गुमटियों को हटाने की कभी कोई मुहीम नहीं चलाई जाती। मतलब साफ है, एक तरफ नैतिक मूल्य के पाठ पढ़ाये जायेंगे और दूसरी तरफ उन नैतिक मूल्यों से डिगाने का साजो सामान भी उपलब्ध करवाया जायेगा। राजस्व प्राप्ति और जीडीपी का मसला तो अलग है ही। इसीलिए सरकार द्वारा नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए जो कार्यक्रम चलाये जाते हैं वो कुछ वैसे ही हैं जैसे कि असंख्य छेद युक्त चलनी में पानी भरते रहना।
खतरनाक प्रभाव
अध्ययन बताते हैं कि तंबाकू की मात्र एक पीक जिंदगी के 3 मिनट कम कर देती है जबकि एक सामान्य लम्बाई की सिगरेट 9 मिनट कम कर देती है। ऐसे में उन चेन स्मोकर के बारे में सोचिये। यही नहीं धूम्रपान के सेवन से फेफड़े का कैंसर, मुंह का कैंसर, गले का कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक, अल्सर, दमा, डिप्रेशन, ब्रेन स्ट्रोक, त्वचा की बीमारियाँ, मांसपेशियों में रक्त और ऑक्सीजन की कमी आदि भयंकर बीमारियाँ हो सकती हैं। यही नहीं भारत जैसे देश में जहाँ बेरोजगारी और गरीबी के मुद्दे राजनीति में हमेशा टॉप ट्रेंड में रहते हैं, वहां के लोग हर दिन 11 करोड़ सिगरेट फूंक डालते हैं यानि एक वर्ष में 50 अरब रूपये से भी ज्यादा सिर्फ धुंए में उड़ा देते हैं।
हर रूप में हानिकारक
अक्सर बीड़ी या बिना फिल्टर की सिगरेट पीने वाला व्यक्ति मूर्खतापूर्ण तर्कों के साथ फिल्टर वाली सिगरेट पीने लगता है और फिल्टर युक्त सिगरेट पीने वाला ई-सिगरेट। वैसे ई-सिगरेट के दुष्प्रभाव को देखते हुए भारत में सितंबर 2019 में ही इसके उत्पादन, बिक्री, इंपोर्ट, एक्सपोर्ट, स्टोरेज और विज्ञापन पर सभी पर पाबन्दी लगा दी गई है। दरअसल ई-सिगरेट एक इलेक्ट्रॉनिक इनहेलर है जिसे श्वहृष्ठस् अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक निकोटिन डिलिवरी सिस्टम कहा जाता है। यह एक बैटरी संचालित होती है जिसमें निकोटिन और दूसरे लिक्विड केमिकल भरे जाते हैं जिसे भाप में बदल देता है और पीने वाले को सिगरेट पीने जैसा अहसास होता है। वर्ष 2004 चाइना ने इसको ‘तंबाकू के स्वस्थ विकल्प’के रूप में प्रचार-प्रसार करके ‘हानि रहित उत्पाद’बताया था। इसलिए जहर तो जहर ही होता है, उसका काम मौत को हराना नहीं बल्कि मौत को जिताना होता है। इसलिए अपने मन में किसी भी प्रकार की खुशफहमी नहीं पालें और ना ही दिलासा देने के लिए स्वयं को बेकार के तर्कों से संतुष्ट ही करें। क्योंकि अंत अंतत: एक ही होता है- एक खतरनाक और दर्दनाक मौत।
आजकल युवाओं के बीच हुक्का पीना भी स्टेटस सिंबल बन गया है। रेस्टोरेंट और शादी-विवाह में भी इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है। ज्यारदातर लोगों को लगता है कि हुक्को हानिकारक नहीं होता पर शोध के मुताबिक हुक्का पीना धूम्रपान के अन्य तरीकों की तुलना में ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि 45 मिनट के हुक्का सेशन में आप एक सिगरेट से 36 गुना ज्यादा टार व 70 फीसदी ज्यादा निकोटीन निगल जाते हैं। इसी तरह होंठों के नीचे खैनी दबाकर रखने वाले लोग फिल्टर वाली खैनी दबाने लगते हैं और गुटखा खाने वाले लोग पान मसाले में अलग से जर्दा मिलाकर खाने लगते हैं। पर निकोटिन का किसी रूप में उपयोग हानिकारक है और ऐसा करके लोग अपने आपको बहलाते, फुसलाते और मूर्ख बनाते हैं। यही नहीं पर्यवरण की दृष्टि से भी अगर देखा जाए तो सिगरेट पीने के बाद जो टुकड़ा बच जाता है उसे डीकंपोज होने में पच्चीस साल लगते हैं और इधर-उधर फेंके हुए रंग बिरंगे गुटके के पाउच के बारे में तो क्या ही कहना।
बचाव के लिए जानें कुछ घरेलू नुस्खे
एक गुटखे का पाउच मुश्किल से पांच सात रूपये का आता है जिसमें पांच से दस ग्राम सामग्री होती है। यानि हजारों रुपये का गुटखा चबाकर लोग यूँ ही थूक देते हैं। इसलिए अगर खाना ही है तो सौ-पचास रूपये किलो का कोई भी सीजनल फल खा लीजिये, सेहत के लिए अच्छा रहेगा। जैसे कि सत्तर-अस्सी रुपये किलो वाला अंगूर जो कि तुरंत उर्जा से भर देता है। गुटखा छुड़ाने के लिए एक कारगर उपाय यह भी है कि अदरख के छोटे छोटे टुकड़े बनाकर उसमें नींबू का रस मिलाकर धूप में सुखा लें और जब भी गुटखा खाने की तलब हो इसका एक टुकड़ा मुंह में रखकर चूसें। बस ध्यान रहे कि इस टुकड़े को चूसना है चबाना नहीं है, गुटखा खाने की याद नहीं आएगी। यही नहीं बीड़ी, सिगरेट, शराब छोडऩे में भी अदरख सहायक होता है क्योंकि इसमें सल्फर पाया जाता है। दरअसल व्यसन करने वालों के शरीर में सल्फर की कमी हो जाती है और फिर उन्हें इसकी तलब लगती है। इसलिए अदरख का सेवन उस तलब को पूरा करने में सहायक होता है।
इसी तरह नशे के कारण शरीर में आयी व्याधियों को दूर करने में मुनक्का भी बहुत लाभकारी होता है। मुनक्के में थोड़ी सी दालचीनी, छोटी इलायची और काली मिर्च को मिलाकर अच्छे से पीस लें और फिर उसकी गोलियां बनाकर रख लें। इन गोलियों को चूसने से गुटखा, तम्बाकू, पान मसाला आदि व्यसनों से छुटकारा मिलने के साथ ही इनके प्रयोगों से शरीर में जो दुष्प्रभाव आ चुके हैं उनसे भी छुटकारा मिल जाता है।
इसके अतिरिक्त अजवाइन का प्रयोग भी नशा मुक्ति के लिए बहुत ही प्रभावशाली और असरकारक पाया गया है। इसके लिए अजवाइन को आठ गुना पानी में इतना पकाइए कि वह लगभग एक चौथाई रह जाए और फिर इस मिश्रण को शीशी में भरकर रख लीजिये। जिसको शराब की आदत हो उसको खाना खाने से पहले एक इस मिश्रण का एक कप पिला दीजिये। इसी तरह जो लोग सिगरेट पीते हों या तम्बाकू का सेवन करते हों उनके लिए अजवाइन को भूनकर उसमें लौंग, इलायची एवं दालचीनी को मिलाकर शीशी में भरकर रख लीजिये और जब तलब लगे तो इस मिश्रण को चबाइए। इस प्रयोग से सत्तर से नब्बे प्रतिशत तक लाभ मिलता है। यही नहीं अजवाइन के प्रयोग से लीवर भी ठीक हो जायेगा।
जहर ही नहीं जीवनदाता भी
तंबाकू केवल जहर ही नहीं बल्कि इसमें औषधीय गुण भी होते हैं। यदि आप फोड़े-फुंसियों से परेशान हैं तो इसका पत्ता सेंककर फोड़े पर बांधने से एक दो दिन में पस निकलकर बाहर आ जाता है। दांत के दर्द में इसके पत्ते, गेरू और काली मिर्च को 10-10 ग्राम कूटकर छान लिया जाता है और उस पाउडर से दांतों में मंजन करने से दर्द में आराम मिलता है। यही नहीं हालिया एक शोध में शोधकर्ताओं ने हुक्का तंबाकू की एक नई प्रजाति भी खोज निकाली जिसमें निकोटिन बहुत ज्यादा मात्रा में है। इसका इस्तेमाल एंटी बैक्टीरियल और एंटी फंगल दवाएं बनाने में किया जायेगा।
चलते-चलते बस इतना और कि जीवन जीना और स्वस्थ जीवन जीना दो अलग चीजें हैं। यदि किसी को लगता है कि नशा करने से शरीर में त्वरित ऊर्जा बढ़ जाती तो उनको एक बार योग के नशे का सेवन अवश्य करना चाहिए। क्योंकि ऊर्जावान मन और ऊर्जावान शरीर के लिए परम पूज्य श्रद्धेय स्वामी जी से श्रेष्ठ उदाहरण शायद ही कोई और हो। इसलिए आइये इस 31 मई को हम लोगों तक जहरीले नशे से छुटकारा पाने का सन्देश पहुंचाएं और फिर आगामी 21 जून को उनको योग के नशे में डूबने के लिए प्रेरित करें। क्योंकि योग के माध्यम से लोगों को स्वस्थ करने के साथ ही नशा मुक्ति अभियान चलाने की प्रेरणा भी श्रद्धेय गुरुवर और हमारे संगठन ने हमें दी है। स्वयं महाराजश्री अपने योग शिविरों में नशा मुक्ति का अभियान चलाकर गुरु दक्षिणा और भिक्षा के तौर पर लोगों से उनसे नशे की आदत को छोड़ देने का संकल्प दिलाया।
‘इससे बचने का एक उपचार, दृढ़ संकल्प और शुद्ध विचार’
लेखक
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01 Mar 2025 17:58:05
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