भगवान बुद्ध सत्य की खोज
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योग साधिका आशा सूर्यवंशी मूठे, सेवासदन, हरिद्वार
नदी है सागर की खोज, बूंद को है गागर की खोज
घनघोर अंधेरा को है मुक्त आकाश की खोज
निर्धन को है धन की खोज
भूखे को है अन्न की खोज
प्यासे को है पानी की खोज
मुढ को है ज्ञानी की खोज
पूरा संसार एक खोज में ही लगा हुआ है। बेशक हर जीव भले ही अलग-अलग क्रियाओं में उलझा रहता है पर उसके भीतर खोज तो पुर्णत्व की, परम सत्य की ही चल रही है। इक्षवाक वंश के शाक्य कुल में कपिलवस्तु के राजा शुदधोधन और महारानी माया के पुत्रों ने भी ठीक उसी परम सत्य प्राप्ति की खोज के कारण हृदय में चल रही धधकती वैराग्य अग्नि में राज-पाट, पत्नि-पुत्र, धन-वैभव जगत् के समस्त सुखों का त्याग कर राह पकड़ी अनंत की-चीवर धारण कर सिद्धार्थ गौतम से परिव्राजक बन गये।
पथिक है तो पथ भी होना ही चाहिए। साधक के पास साधना का मार्ग भी जरूर होना ही चाहिए। बशर्ते ये बात सच है कि साधक को साधना का मार्ग कैसे मिलेगा, अंजान पथिक को पथ कैसे दिखेगा? ठीक वैसे ही जैसे भुखा लंगर खोज ही लेता है और प्यासा कुँआ ढूंढ ही लेता है, ठीक ऐसे ही सिद्धार्थ भी अपने पथ की खोज में निकल पड़े। साधना की अनेक परम्पराओं पर उन्होनें खोज किया, तपस्या की प्रचलित पद्धतियों का परीक्षण किया। उग्र तप किया, आत्म-पीडऩ के सभी साधन भी अपनाएं। नितांत अल्पाहार किया, कभी-कभी तो वृक्षों की जड़ें खाकर गुजारा किया, ‘‘बुद्ध और उनका धम्मपद’’ में सिद्धार्थ की प्रचण्ड तपस्चर्या कुछ यूँ वर्णित सिद्धार्थ जो वस्त्र धारण करने थे, वे या तोकूड़े के ढेरों पर पड़े हुए चीथड़ों के, या पेड़ की छाल या घास के बने होते थे। मेरूदण्ड, सीधा रखकर पलथी मार बैठे रहते, पैर खोलते ही नहीं, वर्षों तक उनके ऊपर मैल जमता रहा, इतना की अपने आप झर-झरकर गिरने लगा। भयंकर शीत ऋतु में और अंगारे उगलने वाली गर्म तपिश में सिद्धार्थ खुले आकाश तले अपनी देह को रखते हैं। एक समय तो ऐसा आया की वे शमशान में मुर्दों की हडिड्यों के बीच रहने लगे। तप बढ़ा तो दिनभर में सरसों का दाना खा कर रहते। छह: वर्षों तक उनका तप उग्र से उग्रतम होता गया, देह हडिड्यों का पिंजर मात्र रह गया सिद्धार्थ गौतम के भीतर तीव्र मनोमंथन चल पडा इस पीडऩ के द्वारा तो देह विजय तक संभव नहीं मुझे इन दुखों: से निवृत्ति का उपाय खोजना था। परम सत्य खोज था, उसी समय सिद्धार्थ गौतम न्यग्रोथ वृक्ष के समान बैठे थे, संयोग से एक महान् महिला विभूति- सेनानी के नाम के गृहपति की कन्या सुजाना - न्यग्रोथ वृक्ष के हेतु आई थी, उसने खीर भरकर पूजा हेतू लाया स्वर्ण पात्रों को सिद्धार्थ के ही चरणों में अर्पण किया - और वह खीर सुपत्तिटठ नामक नदी पर गये और स्नान कर भोजन ग्रहण कर शान्त से सो गये- उसी रात उनको पाँच दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त हुई। इन समस्त अनुभूतियों का केवल एक ही संकेत था, उन्हें बोधी (Enlightenment) प्राप्त होकर रहेगी। अगली सुबह वे निरंजना नदी पर बैठकर अंतर्मन से संकल्पपूर्ती की प्रार्थना करते रहे। वहीं ना दैवी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा उत्तर पाकर सशक्त होके वे राजपथ से होते हुए गया पहुँचे।
गया में उन्होनें पीपल वृक्ष देखा उसकी छांव तले पद्मासन लगाकर बैठ गये। नेत्र मूंदने से पहले एक महान् संकल्प लिया, जो युगांतकारी था, जो युग-युर्गान साधकों के लिए प्रेरणा के स्वर्णिम अक्षर है। वह महासंकल्प था- मैं बोधि पाए बिना इस आसन से नहीं हिलुँगा। पूर्णता: को प्राप्त किये बिना मैं अपनी साधना की शृंखला को नहीं तोडूँगा। यह मेरा अटल संकल्प है।
हरी-हरी पत्तियों के छाया तले ध्यानस्थ बैठे गौतम पर ‘मार’ ने पूरे दल-बल के साथ उसके मन और चित्त पर आक्रमण किया। मार यानि बुरे विचार, विकार, प्रारब्धवश रहे कुसंस्कार को कहते हैं। उधर गौतम ने पूर्ण साहस और धैर्य से ‘मार’को चुनौती दे डाली। मुझ में श्रद्धा है, मुझमें वीर्य है, मुझमें प्रज्ञा है। हे मार! तू मुझे कैसे पराजित कर सकता है? मैं अज्ञेय साधक हूँ। मैं अपने संकल्प से रत्तीभर भी पीछे डिग नहीं सकता। मुझसे कराले तू खण्ड-खण्ड-पूर्ण विदिर्ण होगा। मेरा संकल्प विजय का शिखर ही लेगा।
हुआ वही! चार सप्ताह तक गौतम प्रगाढ़ ध्यान में लीन रहे। पूर्ण प्रकाश प्रखर हुआ। ज्ञान का भुवनभास्कर अंतर्जगत में दैदिप्यमान हो उठा। शाक्यमुनि सिद्धार्थ गौतम ने रात्रि के चतुर्थ प्रहर में जब सारा चराचर जगत शांत सोया था। अविनाशी पद (Enlegttened) पद प्राप्त किया। सिद्धार्थ गौतम सर्वज्ञ भगवान् बुद्ध हो गये। बुद्ध यानि आकाशसम अनंत ज्ञान, दु:खरूपी समुद्र में डूब रहे संसार को अपने ज्ञान की विशाल नौका से वे पार ले गये। उन्होंने धर्म की किसी नदी प्रवाहित की, जिसमें प्रज्ञा का जल था, शील का तट था और समाधि की शीतलता थी। इसी धर्म-नदी के जल को पीकर तृष्णा की पिपासा से व्याकुल संसार तृप्त-मुक्त-शांत हो गया।
काशी के मृगदाव में महात्मा बुद्ध के करुणायुक्त वचनों को पहली बार कौंडिन्य, अश्वजीत आदि पाँच भिक्षुओं ने प्रथम सुना। इसलिए कौंडिन्य को प्रधान धर्मवेत्ता कहते है वह दिव्य अमृत धम्मज्ञान यह था। मेरी दृष्टि से मैंने चार आर्य सत्य जाने हैं - (1) दु:ख (2) दु:ख का कारण (3) दु:ख निरोध (4) दु:ख निरोध के उपाय। मेरे इस मध्यमार्ग का प्रकाशक सम्यक् दृष्टिरूपी सूर्य है तथा सम्यक् संकल्प रूपी रथ इस सुंदर मार्ग पर चलता है। सम्यक् वाणी मे विश्राम पाता है। सम्यक् आचरण के उपवन में विहार करता है। सम्यक् आजीविका ही उसका शुद्ध भोजन है। सम्यक् व्यायाम (प्रयत्न) उसके सेवक है। सम्यक् स्मृति रूपी मनोहारी नगरी में वह थोती पाता है और सम्यक् समाधि रूपी शय्या पर समाधानपूर्वक सोता है। यहीं से भगवान् बुद्ध ने जो धीरे-धीरे मृत्युलोक और देवलोक में भी हो गया।
राजपुत्र सिद्धार्थ की अनंत-अनंत प्यास और जिज्ञासाओं का एकमात्र संपूर्ण समाधान था- भगवान बुद्ध। बुद्ध किसी व्यक्ति का नाम नहीं, वह ज्ञान की अवस्था है। संन्यास वस्त्रों का मोहताज नहीं। वह अवस्था अनंत ज्ञानावस्था है। राजपुत्र सिद्धार्थ की स्वयं से ही शुरु की सत्य की खोज स्वयं की प्राप्ति में गायी। वेदान्ती जिसे ब्रह्म कहते हैं। उसी की जगत में जो अवस्था है, उसे ही बुद्ध निर्वाण कहते हैं। बुद्धिसम का सार यही है स्वयं की सुप्त निर्वाणावस्था से पुन: प्राप्ति वस्स! बुद्धत्व-पूर्ण परम सत्य की जिज्ञासा से शुरु होने वाले सफर की मंजिल अंतिम गन्तव्य परम अवस्था, हम सबका परम ध्येय' The ultimate good of teman life राजपुत्र सिद्धार्थ से भगवान् बुद्ध तक का सफर हम सबको हमारे जीवन की मंजिल की ओर ही इंगित करता है। स्वामी विवेकानन्द ग्रंथावली में स्वामी विवेकानन्द ने आश्वासन दिया था कि मेरा पुत्र विश्वास है। भगवान् बुद्ध के बाद भी ऐसी ही महान् विभूति फिर से इस धरा पर अवतरित होगी और ऐसा ही महान कार्य फिर से करेगी। सम्यक्ता ही नींव है। बुद्ध के उपदेशों की उसी को चरितार्थ होते हुए पूरे विश्व ने देखा है। सम्यक् संतुलन सम्राट (सम्यक्) योग ऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के जीवन उदाहरण में स्वयं के हाथों से स्वयं की मुक्ति कर पूर्ण आत्म साधना जगत में संपूर्ण आत्मनिर्भर जीवन जीने का मंत्र देने वाले भगवान् बुद्ध का भिक्षुओं को संदेश था ‘आपो दिपो भव:’। अपना दीप स्वयं बन जा, पर कलयुगी भगवान् बुद्ध परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज तो अपने हर एक साधकगण को ‘निर्माण पद’प्राप्ति हेतु दीप ही नहीं, सूर्य बनने का संदेश देते है। ‘अपने सूर्य स्वयं बन जाओ, बुझ न सके वो चिराग जलाओ।’A light of Asia इस ग्रन्थ में बार-बार उल्लेखित होता है कि बुद्ध का सारा उपदेश एक ही तत्त्व पर आधारित था। ‘नि:स्वार्थ बनो’, हमने बुद्ध की वाणी से, श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के मुख से यही अमृतवचन सुना है कि जगत में अध्यात्मिकता की सर्वाेच्च उपलब्धि ही निष्काम, नि:स्वार्थ, अकाम, अचाह होना है। मात्र कहा नहीं ऐसे निष्काम , नि:स्वार्थ, अकाम अचाह साधु-साध्वियों की फौज ही खड़ी की है परम श्रद्धेय गुरुवर ने। बुद्ध को पृथ्वी के कोने-कोने तक पहुँचाया था उनके निष्ठावान और अत्यन्त पवित्र संन्यासियों ने। आज का पतंजलि योगपीठ का प्रांगण भी इसी बात की राष्ट्रवासियों की गवाही दे रहा है, कि आज भी वहीं कर्मठ, पुरुषार्थी, पवित्र आचरण, प्रखर प्रज्ञा सम्पन्न, निष्ठावान साधु-साध्वीगण, आज के भगवान बुद्ध के अनुयायी तैयार हो चुके है। निष्कामना की बलिवेदी पर समर्पित हो मानवता की सेवा के लिए, उर्वरा भूमि भारत की इस सनातनी गौरवमयी बुद्धों की अक्षुण्ण परम्परा को कोटि नमन।
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01 Mar 2025 17:58:05
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