गुरुकुलीय शिक्षा का विराट स्वरूप
साध्वी देवप्रिया कुलानुशासिका एवं संकायाध्यक्षा
पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत
11. क्या गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था का नई शिक्षा नीति से कोई सम्बन्ध है?
नई शिक्षा नीति एवं प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति में परस्पर अन्तर्सम्बंध- प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति अत्यंत महनीय, जीवनोपयोगी, आत्म-कल्याण, विश्व-कल्याण, सूक्ष्म व स्थूल जगत के ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण थी। जिस शिक्षा नीति की चर्चा आधुनिक शिक्षाशास्त्री करते रहे हैं और वर्तमान में जो नई शिक्षा नीति का लक्ष्य है। यथा- समग्रता से परिपूर्ण शिक्षा होनी चाहिए, शिक्षा जिज्ञासा केन्द्रित होनी चाहिए, शिष्य का सतत् मूल्यांकन होता रहे ऐसी शिक्षा होनी चाहिए। संस्कृति की जड़ों से युक्त शिक्षा होनी चाहिए, अनुभूति गम्य शिक्षा होनी चाहिए, क्रिया आधारित शिक्षा होनी चाहिए। छात्र के सामथ्र्य के अनुसार उसका पाठ्यक्रम होना चाहिए आदि। इसके प्रमाण हमारे वेदों, स्मृतियों, उपनिषदों, दर्शनों एवं रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थों में पर्याप्त रूप से मिलते हैं। जिसे प्राचीनकाल के गुरु-शिष्य ज्ञान परम्परा में ऋषियों के द्वारा आत्मसात किया गया था। गुरुकुलीय ज्ञान विशेषकर उपनिषदों में वर्णित शिक्षा गुरु-शिष्य संवाद, जिज्ञासा, क्रियात्मक, अनुभूतियुक्त एवं सांस्कृतिक मूल्यों से ओत-प्रोत होती थी। जिसे केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, तैतिरीयोपनिषद्, छान्दग्योपनिषद् आदि के स्वाध्याय से हम समझ सकते हैं। पिछले लगभग 200 वर्षों के बाद हमें प्रसन्नता है कि वर्तमान नई शिक्षा नीति में कुछ बिन्दु हुबहु गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति से मेल खाते हैं। उदाहरण के लिये हम दोनों शिक्षा नीतियों का तुलनात्मक अध्ययन यहाँ बिन्दुवार करेंगे।
1. Growth of physical, vital, mental, intellectual and spiritual forces.
(पाँच कोशों या आयामों को पूर्ण विकसित करने वाली शिक्षा)
जैसा कि हम गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति में पंचकोश अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश एवं आनन्दमयकोश के विकास के माध्यम से बालक के आन्तरिक विकास की चर्चा कर चुके हैं, बिल्कुल वही चर्चा वर्तमान शिक्षा नीति में शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक इन 5 शक्तियों को वर्तमान युग के शिक्षा शास्त्रियों ने विकसित करने पर बल दिया है। महर्षि श्री अरविन्द, स्वामी विवेकानन्द जी ने भी इसी प्रकार की शिक्षानीति की चर्चा अपने ग्रन्थों में की है।
ओम् अग्नये समिधमाहार्ष बृहते जातवेदसे। यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यसऽएवमहर्मायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचार्यो मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयासँ स्वाहा।। [31]
अर्थात् हे ब्रहत स्वरूप वाले अग्निदेव/आचार्यदेव आचार्यप्रवर। जिस प्रकार आप इस अग्नि में समिधाएं अर्पित कर रहे हैं और इस अग्नि को जिन्दा (प्रज्ज्वलित) रखे हुए हैं, उसी प्रकार मैं भी आयु से अर्थात् प्राण से, मेधया-बुद्धि से, वर्चसा= विशेष ज्ञान से प्रजया पशुभि= इन्द्रियों से तथा ब्रह्मवर्चसेन= bliss आनन्द से सदा प्रकाशित रहूँ। मेरा आचार्य सदा जीवपुत्र बना रहे। मैं यशस्वी, तेजस्वी, आनन्दी तथा त्यागभाव से संसार का उपयोग करने वाला बनूं।
2. Student centric or Teacher centric education? (शिक्षा छात्र केन्द्रित अथवा गुरु केन्द्रित?)
पूरे विश्व में आज इस बिन्दु पर चर्चा होती है कि शिक्षा छात्र केन्द्रित होनी चाहिए अथवा गुरु केन्द्रित? कुछ लोगों का माननता है शिक्षा छात्र केन्द्रित होनी चाहिए तथा कुछ लोगों का मानना है कि शिक्षा गुरु केन्द्रित होनी चाहिए, लेकिन गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति इन दोनों से ऊपर उभयकेन्द्रित के आदर्श को मानते हुए गुरु शिष्य दोनों का सिर्फ अलग अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करती, अपितु दोनों के साथ-साथ विकास की बात करती है। जैसे कि गर्भस्थ शिशु और माँ का अस्तित्व अलग नहीं होता उसी प्रकार गुरु और शिष्य का अस्तित्व भी साथ-साथ ही विकसित होता है।
ऊँ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह: वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावध्तिमस्तु मा विद्विषावहै।। [32]
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त:।
तं रात्रिस्तिड्ड उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवा:।। [33]
सह नौ यश: सह नौ ब्रह्मवर्चसम्।। [34]
अर्थात्- हे प्रभो! हम दोनों गुरु शिष्यों का संसार में, वेद और ज्ञान-विज्ञान आदि उत्तम शिक्षा द्वारा यश फैले। हम दोनों का पढऩा-पढ़ाना तेजस्वी हो।
3. Curiosity based Education. (जिज्ञासा आधारित शिक्षा)
आधुनिक शिक्षाविदों का मानना है कि शिक्षा जिज्ञासा आधारित होनी चाहिए। ऐसा ना हो कि हम बहुत ऊँचे उपदेश देते जायें और छात्र को कुछ समझ में न आये। परीक्षा के समय वह कुछ रटकर पास हो जायें वास्तव में उसे पढऩे में आनन्द तब आयेगा जब वह स्वयं कुछ जिज्ञासा करेगा। इस बात की वैज्ञानिकता को हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषियों ने जाना था इसलिए अथर्ववेद के ब्रह्मचर्य सूक्त का प्रथम मन्त्र ईक्षण शब्द से शुरू होता है जिसका अर्थ होता है- जिज्ञासा।
ब्रह्मचारीष्णंश्चरित रोदसी उभे तस्मिन्देवा: संमनसो भवन्ति। [35] (अथर्ववेद 11.5.1)
ब्रह्मचारी दोनों लोगों के प्रत्येक पदार्थ में उस ब्रह्म को खोजता हुआ विचरण करता है। उसके इस सरल जिज्ञासु मन के साथ दिव्य शक्तियों का सम्पर्क हो जाता है।
इसी प्रकार गुरु-शिष्य का जिज्ञासा परक शिक्षा संवाद केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, तैतिरीयोपनिषद्, छान्दग्योपनिषद् एवं श्वेताश्वतरोपनिषद् में अत्यन्त प्रसिद्ध है।
केनेषितं पतति प्रेषितं मन: केन प्राण: प्रथम: प्रेति युक्त:। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति, चक्षु: श्रोत्रां क उ देवो युनक्ति। [36]
प्राचीन शिक्षा परम्परा में शिष्य गुरु से नि:संकोच उसके में मन में जो जिज्ञासा आती थी वह प्रश्न करता था जिसका समाधान गुरु देते थे। जब तक कि वह पूर्ण रूप से संतुष्ट न हो जाए। कठोपनिषद् में वर्णित जिज्ञासु शिष्य नचिकेता और ब्रह्मनिष्ठ श्रेष्ठज्ञानी-
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो। [37]
यमाचार्य की कथा अत्यन्त प्रसिद्ध है। जिसमें यमाचार्य ने प्रिय शिष्य नचिकेता की प्रशंसा की है।
स त्व प्रियान् प्रिय रूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षी:।[38]
सम्पूर्ण कठोपनिषद् में यमाचार्य ने शिष्य नचिकेता की जिज्ञासा को केन्द्र में रख करके उसको संतुष्ट किया। इसी प्रकार गुरु-शिष्य के संवादात्मक जिज्ञासापरक शिक्षा का अत्यन्त महत्त्व है।
महर्षि दयानन्द जी के जीवन चरित में भी गुरु-शिष्य संवाद का रोचक प्रसंग आया है जिसमें महर्षि दयानन्द जी ने अपने गुरु विरजानन्द जी से अनेक जिज्ञासाएं की हैं जिनका उत्तर दण्डी स्वामी जी ने दिया है- कभी-कभी गुरु-शिष्य में शास्त्रार्थ भी छिड़ जाता था। विरजानन्द महान् तार्किक थे, परन्तु दयानन्द भी कोई साधारण वाक्पटु न थे। गुरुजी कई बार उन्हें ‘कालजिवि और ‘कुलक्कर की उपाधियाँ दे देते थे।
प्रश्नोपनिषद् में गुरु-शिष्य संवाद का बहुत ही रोचक प्रसंग आता है जिसमें महर्षि पिप्पलाद के पास ये छ: ब्रह्म जिज्ञासु आते हैं-
ओऽम् सुकेशा च भारद्वाज:, शैव्यश्च सत्यकाम:, सौर्यायणी च गाग्र्य:, कौशल्यश्चाश्वलायनो, भार्गवो वैदर्भि:, कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्म परा ब्रह्म निष्ठा: परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति, ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्ना:। [39]
4. Mapping of knowledge status of the student. (विद्यार्थी की सामर्थ्यानुसार अध्यापन)
आधुनिक शिक्षा का बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु है कि शिक्षा छात्र की सामथ्र्य अनुसार दी जानी चाहिए। यथाशाक्ति वाचयीत।। [40]
अर्थात्- ब्रह्मचारी की शक्ति के अनुसार पढ़ावें।।
धर्माथौ यत्रा न स्यातां शुश्रुषा वाऽपि तद्विध।
विद्यया सह मर्तव्यं न चैनामूषरे वपेत्।। [41]
अर्थात्- गुरु को चाहिए कि वह योग्य, सुपात्र शिष्य को ही विद्या दान करे। किसी अयोग्य, कुपात्र शिष्य को न पढ़ावे। क्योंकि न तो इससे धर्म और न ही अर्थ की प्राप्ति होती है। यदि ऐसा न हो तो मृत्यु का वरण कर ले। पर अयोग्य शिष्य को विद्या न प्रदान करे। कारण इस प्रकार अयोग्य पात्र को दी गई विद्या ऊसर खेत में बीज बोने से कम नहीं है।
इमां धियं शिक्षमाणस्य देव क्रतुं दक्षं वरुण सं शिशाधि।
ययाति विश्वा दुरिता तरेम सुतर्माणमधि नावं रुहेम।। [42]
इस मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि हे सतत् ईक्षण करने वाले आचार्य! आप इस विद्यार्थी-समूह की बुद्धि कर्म-शक्ति और निपुणता को सम्पूर्ण और अनुशासनयुक्त बनाइये। जिससे हम लोग ज्ञान तथा अनुशासन रूपी नौका पर चढक़र अज्ञान आदि दुर्गुणों तथा दु:खों को पार कर लें।
अक्षण्वन्त: कर्णवन्त: सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवु:।
आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे।। [43]
इसके अतिरिक्त वेदों में आचार्य से संयमी, वाचस्पति (वाणी का स्वामी), वसुपति (गुणधर्म को जानने वाला), भूतकृत् (चरित्र निर्माता), ज्ञाननिधि (विषयों पर अच्छी पकड़), मनुर्भव (मननशील व विचारक), वाक्तत्त्ववित् (भाषा विज्ञानी), दूरदर्शी एवं प्रसन्नचित्त आदि गुणों से सम्पन्न होने की भी अपेक्षा की गयी है।
अत: अध्यापन से पूर्व आचार्य के लिए यह आवश्यक है कि वह छात्रों की प्रवृत्तियों का, उसके मानसिक झुकाव का, उसके स्वभाव व क्षमताओं का, उसकी पृष्ठभूमि तथा उसके पैतृक व आनुवंशिक प्रभावों का बड़ी सूक्ष्मता एवं सकारात्मक दृष्टिकोण से अध्ययन करते हुए उसे विषयों में प्रवेश करने योग्य बनाने का यत्न करें। आचार्यों में इस प्रतिभा सम्पन्नता के साथ अपने दायित्वों के प्रति निष्काम प्रतिबद्धता और फिर शिष्यों में उसका कुशलतापूर्वक प्रक्षेपण की सिद्धता तथा परिणाम द्वारा इसका स्वत: मूल्यांकन करना भी अपेक्षित माना गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् में आचार्य-शिष्य संबंधों का सूक्ष्म चित्रण करते हुए आचार्य पूर्वरूप व शिष्य को उसका उत्तररूप (अनुसर्ता) कहा गया है, विद्या सन्धि है जो दोनों का सम्बन्ध जोड़ती है और प्रवचन इनका संयोजक है-
आचार्य: पूर्वरूपम् अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या सन्धि:। प्रवचनम् सन्धनम्। इत्यधि विद्यम्। [44]
इसके साथ ही शिष्यों से भी यह अपेक्षा की गयी है कि वह अपने सेवा व शुश्रुषा के द्वारा गुरु के भीतर विद्यमान विद्या को उसी प्रकार से प्राप्त कर ले, जिस प्रकार खनित्र या फावड़े से भूमि खोदकर मनुष्य जल निकाल लेता है यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति। [45]
इस प्रकार आचार्य की अनुकम्पा से प्राप्त ज्ञान को छात्र अध्ययन (अधीति), अनुशीलन (बोध), व्यावहारिक प्रयोग (आचरण) के माध्यम से ग्रहण करते हुए लोक में इसको उचित रूप से सम्प्रेषित (प्रचारण) करने का प्रयत्न करें ताकि उनके द्वारा अर्जित ज्ञान का लाभ जन समुदाय भी उठा सके।
5. Inclusive education. (सर्वसमावेशी शिक्षा)
नई शिक्षा नीति इस बात पर बल देती है कि शिक्षा मनुष्य मात्र के लिए समान रूप से अनिवार्य है, अर्थात् चारों वर्णों एवं महिला-पुरुष सभी समान रूप से शिक्षा के अधिकारी हैं उपनिषदों में महाराजा ज्ञानश्रुति, जनक एवं अश्वपति, क्षत्रिय वर्ण से सम्बन्ध रखते हैं जबकि रैक्व, सत्यकाम, जांबाल, महिदास एवं व्यास आदि ऋषि उच्च वर्णों से सम्बन्ध नहीं रखते हैं, इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद् में गार्गी और याज्ञवल्क्य का संवाद नारी शिक्षा का प्रखर प्रमाण है। अथर्ववेद में कहा है- ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्। [46] अर्थात् अपने ब्रह्मचर्य आश्रम की परिसमाप्ति पर अर्थात् शिक्षा-दीक्षा पूर्ण होने पर कन्या अपने युवा पति को प्राप्त करे। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में शिक्षा का अधिकार समान रूप से मनुष्यमात्र को प्राप्त था।
पंचविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे। समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात् कुशलो भिषक्।। [47]
यहाँ पर नारी को पुरुष से भी अधिक शक्तिशाली व बुद्धिमती बताया गया है क्योंकि पुरुष के पास 25 वर्ष में जो शक्तियाँ संचित होती हैं, नारी 16 वर्ष मात्र में उनसे सम्पन्न हो जाती है।
यथेमां वाचघड्ढल्याणीमावदानि जनेभ्य:। ब्रह्म राजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च। [48]
6. Holistic education, ultimate goal of education. (शिक्षा में समग्रता)
आधुनिक शिक्षाशास्त्री मानते हैं कि शिक्षा खण्ड-खण्ड नहीं समग्रता से युक्त होनी चाहिए। यद्यपि एक-एक खण्ड अथवा विषय भी अपने-आप में पूर्ण ही होता है परन्तु वह समग्रता से सर्वदा अभिन्न ही है। छान्दोग्योपनिषद् में नारद-सनत्कुमार संवाद के 26 खण्डों में बहुत ही सुन्दर ढ़ंग से इस बात को प्रस्तुत किया गया है, यहाँ पर शब्दवित् से शिक्षा का प्रारम्भ करके आत्मवित् अथवा ब्रह्मवित् तक शिक्षा की पूर्णता को दर्शाया गया है, इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद् के षष्ठ प्रपाठक के 1 से 16 खण्ड तक आरुणि उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को शिक्षा की इसी समग्रता का उपदेश करते हैं। हमारे ऋषियों का मानना था कि शिक्षित व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार की न्यूनता नहीं होनी चाहिए। उदाहरणार्थ- संस्कारविधि: के वेदारम्भ संस्कार में गुरु कहते हैं- ‘हे बालक! त्वमीश्वरकृपया विद्वान् शरीरात्मबलयुक्त: कुशली वीर्यवान् अरोग: सर्वा विद्या अधीत्याऽस्मान् दिदृक्षु: सन्नागम्या:।। [49]
7. Observation & Project based education. (प्रेक्षण एवं परियोजना आधारित शिक्षा)
आधुनिक शिक्षाविदों का मानना है कि बालक की शिक्षा, प्रेक्षण तथा परियोजना बुद्धि से युक्त होनी चाहिये। बचपन से ही छोटे-छोटे प्रोजैक्ट कुशलता पूर्वक पूरे कर लेने पर पूरे जीवन के विराट् प्रोजैक्ट को मनुष्य बड़े आनन्द के साथ पूरा कर सकता है।
प्राचीनकाल में यह बात छान्दोग्योपनिषद् में हमें देखने को मिलती है। सत्यकाम, जाबाल को उनके गुरुजी एक परियोजना देकर जंगल में भेजते हैं और कहते हैं कि ये 400 गायें जब 1000 हो जायें तब वापस गुरुकुल में लौटना तभी हम आपको शिक्षित करेंगे। इस परियोजना को पूर्ण करने के लिए सत्यकाम जाबाल पृथ्वी से, हवाओं से, दिशाओं से, सूर्य से, गायों से एवं सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेक्षण (Observation) करते हुए ब्रह्मज्ञान से युक्त होकर गुरु के पास वापस लौटते हैं।
तमुपनीय कृशानामबलानां चतु:शता गा निराकृत्योवाचेमा: सोम्यानुसंव्रजेति। ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रमावर्तयेति। स ह वर्षगणं प्रोवास। ता यदा सहस्रइ संपेदु:।। [50]
यह एक गुरुभक्ति, विद्याप्राप्ति की जिज्ञासा हेतु प्रयोगात्मक परीक्षा रूप था। 400 गायें जब तक सहस्र हो गई तब कई वर्ष के पश्चात् उनको लेकर आश्रम में आया। तब तक सत्यकाम जाबाल को प्रकृति के अलग-अलग घटकों व श्रेष्ठ विद्वानों की संगति से अत्यंत गुह्य ज्ञान प्राप्त हो गया था।
ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि, को नु त्वाऽनुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे, भगवाइस्त्वेव मे कामं ब्रुयात्। [51] (छान्द.4.9.2)
सत्यकाम को देखकर गुरु ने कहा हे सौम्य! तुम तो मुझे ऐसे प्रतीत होते हो, जैसे ब्रह्मज्ञानी हो गये हो। आप को किसने ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है? सत्यकाम कहते हैं- हे गुरुवर! मुझे साधारण मनुष्यों से भिन्न विशेष वृषभ, अग्नि आदि प्रकृति के विभिन्न घटकों ने कुछ सिखाया है, फिर भी भगवन् मैं आप का शिष्य हूँ आप मेरी कामना को पूर्ण करें अर्थात् आप मुझे उपदेश करें।
-क्रमश:


