हिन्दू, हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता एवं सनातन धर्म

हिन्दू, हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता एवं सनातन धर्म

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

हिन्दू के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट शब्द हैधर्म। न्यू ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में भी अब 'धर्म' शब्द की प्रविष्टि अलग है और उसका अर्थ दिया है - ‘हिन्दू तथा बौद्धधर्म के अनुसार कत्र्तव्य और स्वधर्म की दिव्य संहिता। जबकिरिलीजन शब्द की प्रविष्टि अलग है और उसका अर्थ दिया है - ‘किसी एकमात्र सर्वोच्च पूज्य देवता में विश्वास (बिलीफ)’

अत: ‘धर्मशब्द विशेषत: हिन्दू एवं बौद्ध है। सर्वविदित है कि स्वयं भगवान बुद्ध हिन्दू थे औरधर्मशब्द का प्रयोग उन्होंने हिन्दू अर्थ में ही किया है। अत: ‘धर्मही हिन्दू की विशेष पहचान है।  इस प्रकार धर्म क्या है, इसके निर्धारण का अधिकार भी हिन्दू धर्मशास्त्रों को ही है। जिस प्रकार ईसाइयत का निर्धारण बाइबिल से और इस्लाम का कुरान से होता है।धर्मका निर्धारण धर्मशास्त्रों से होता है जो विपुल हैं और विविध हैं परन्तुधर्मके विषय में सब में सर्वानुमति है। ऋग्वेद से लेकर आधुनिक काल तक यह सर्वानुमति निरंतर है। सृष्टि काधर्मसार्वभौम ब्रह्माण्डीय नियमों के सतत प्रवर्तित चक्र के रूप में है तो मानव काधर्मअहिंसा, सत्य, अस्तेय, ऋत, तप, संयम, अपरिग्रह, पवित्र जीवन, शांति और ऋजुता है। यह मनुष्य मात्र का धर्म है, केवल हिन्दुओं का नहीं। परन्तु इसे मानव धर्म केवल हिन्दू धर्मशास्त्रों में ही कहा गया है और इस प्रकार यह हिन्दू धर्मशास्त्रों की ही विशेषता है। अत: ‘धर्ममें श्रद्धा ही हिन्दू की पहचान है। स्पष्ट है किधर्मसनातन है, सदा से है और सदा रहेगा। अत: सनातनधर्ममें श्रद्धा ही हिन्दुत्व है।हिन्दुत्वशब्द व्याकरण के अनुसार हिन्दु होने के सार और मर्म का व्यंजक है। जिसमें हिन्दुत्व हो, वही हिन्दू है। जिसमें हिन्दुत्व नहीं है, वह हिन्दू हो ही नहीं सकता। यह परिभाषा से ही असंभव है। अत: हिन्दुत्व ही हिन्दू का प्राण और सार है, पहचान और निष्कर्ष है।

इस सर्वानुमति के उपरांत धर्मशास्त्रों में विद्वानों और मनीषियों की प्रतिभा तथा विशेषज्ञता के अनुसारधर्मका विशद विवेचन स्वाभाविक है। यह मूल से भिन्नता नहीं है अपितु मूल को समझाने का पुरुषार्थ है। जैसे किसी काव्य या सिद्धांत को समझाने के लिये उसकी विशद विवेचना की जाती है परन्तु किसी भी विवेचना में विवेच्य अनुपस्थित नहीं रहता। उसी प्रकारधर्मकी धर्मशास्त्रों में विशद विवेचना है परन्तु किसी भी विवेचना मेंधर्म' का मूल स्वरूप अनुपस्थित नहीं है।

समस्त मनुष्य के लिए धर्म की अनिवार्यता

तदानुसार सामान्य धर्म वह है जो समस्त विश्व के समस्त मनुष्यों के लिये अनिवार्य है। इसे ही मानव धर्म, सामान्य धर्म, सामासिक धर्म, सार्ववर्णिक धर्म तथा साधारण धर्म भी कहा गया हैं। जो मनुष्य को, उसके सहज स्वस्थ स्वरूप को धारण करता है, वह हैधर्म(मानवधर्म) जो मनुष्य के सहज स्वरूप को बाधित और विचलित करता है, क्षीण और रूग्ण करता है, वह हैअधर्म। इस प्रकार मनुष्य मात्र के लियेधर्मका विचार करना ही हिन्दुत्व है और उस विचार को जीवन में चरितार्थ करना और निरंतर चरितार्थ करने का प्रयास करना हिन्दू होने का मूल लक्षण है।

मनु ने इन्हें दस लक्षणों के रूप में विवेचित किया। मत्स्य पुराण, वायु पुराण, विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण में भी इन्हीं गुणों को थोड़े बहुत अंतर से कहा गया है। विविध स्मृतियाँ भी इनकी ही विवेचना करती हैं। महाभारत में शांतिपर्व का कहना है कि समस्त प्राणियों और पंचमहाभूतों के प्रति द्रोह भावना का संपूर्ण अभाव और अनुग्रह योग्य व्यक्तियों और जीवों पर अनुग्रह करना और दान देना सनातन धर्म है। मन, वचन और कर्म से अन्यों के प्रति द्रोहभाव नहीं व्यक्त हो, यह देखना आवश्यक है। यही श्रेष्ठ लोगों का लक्षण है।

 

जीवन के लिए अनिवार्यधर्म, अर्थ, काम

धर्मशास्त्रों ने मनुष्यों के लियेधर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ को जीवन के लिये अनिवार्य बताया है। मोक्ष पुरुषार्थ की कामना प्रत्येक मनुष्य को करनी चाहिये, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति में यह सामथ्र्य नहीं होती कि वह मोक्ष पुरुषार्थ की साधना कर सके। अनेक जन्मों के पुण्य संस्कार संचित होने पर ही यह सामथ्र्य आती है, यह सभी धर्मशास्त्रों में सर्वसम्मति से कहा गया है। जो तीन पुरुषार्थ सबके लिये कहे गये हैं, वे तीनों ही धर्ममय होने पर हीधर्म'  का अंग हैं। अर्थात् धर्ममय अर्थ और धर्ममय काम ही पुरुषार्थ है। अधर्ममय काम और अर्थ विकृति और रूग्णता है।धर्मके विरोध में जाकर सभी संभव सुख साध्य हैं और भोग्य हैं। आप स्तम्ब धर्मसूत्र का कथन है - भोक्ता धर्माविरूद्धान् भोगान। एवंमुभौ लोकावभिजयति। यही बात उद्योगपर्व और शांतिपर्व में भी कही गई है।धर्म' के विरूद्ध जाकर काम का सेवन कभी भी नहीं करना चाहिये। उससे पाप होता है। अत: ‘धर्मही पुरुषार्थ त्रिवर्ग का मुख्य निकष है।

राष्ट्रीयता का प्रश्न इस संदर्भ में विवेचनीय है। यों तो हमारे सभी शास्त्रों का यह आदर्श रहा है कि चक्रवर्ती सम्राट को समस्त पृथ्वी परधर्मकी स्थापना करनी चाहिये। यह उसका अधिकार भी है और कर्तव्य भी, परन्तु साथ ही धर्मशास्त्रों और पुराणों से तथा इतिहासग्रंथों से यही प्रमाणित होता है कि समस्त पृथ्वी परधर्मकी स्थापना अत्यन्त प्रतापी सम्राट ही कर पाते हैं। वह एक विशेष राजधर्म है। परन्तु भारतवर्ष की भौगोलिक सीमा मेंधर्मको महत्व सनातन काल से प्राप्त है। अत: यह भौगोलिक सीमा राष्ट्रीयता का निर्धारण करती है। यद्यपि यह सीमा भी सम्राट के पुरुषार्थ के अनुरूप घटती बढ़ती रही है। क्योंकि हजारों वर्षों तक सम्पूर्ण यूरेशिया ही भारतवर्ष के राजाओं का राज्य क्षेत्र रहा है। उस सम्पूर्ण क्षेत्र में धर्मचक्र प्रवर्तित होता रहे, यह सुनिश्चित करना राजधर्म रहा है। तथापि सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र, जो वस्तुत: साइबेरिया (शिविरा) तक जाता है तथा जिसमें समस्त उत्तर चीन और रूस तथा अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, ताजकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबेजान, खोतान आदि आते हैं, वहाँ से प्रारंभ कर दक्षिण पूर्व और पश्चिम में महासागरों तक भारतवर्ष की राष्ट्रीय सीमा अत्यन्त प्राचीन काल से निर्धारित है। उनमें से जहाँ आर्यजन विशेष रूप से सदाचार का पालन करते हैं वह क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता है।

भारत सनातन धर्म की साधना का केन्द्रीय क्षेत्र

हिमालय क्षेत्र से विन्धय क्षेत्र और उससे दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक फैला हुआ क्षेत्र आर्यावर्त है। जिसके दक्षिण-पूर्व और पश्चिम में समुद्र है। यह आर्यावर्त ही यज्ञ के विशेष रूप से योग्य क्षेत्र है। जहाँ वैदिक यज्ञ नहीं हों, वह क्षेत्र म्लेच्छ क्षेत्र कहा जाता रहा है। इस प्रकार भारत राष्ट्र सनातनधर्मकी साधना का केन्द्रीय क्षेत्र है। शक्ति और तप तथा पुरुषार्थ के अनुसार इस क्षेत्र को निरंतर विकसित करना राजधर्म है, परन्तु इतने भौगोलिक क्षेत्र की रक्षा करना तो अनिवार्य कत्र्तव्य है। यह भौगोलिक क्षेत्र ही राष्ट्रीयता का आधार है। यद्यपि शास्त्रों से यह भी स्पष्ट है कि सनातन धर्म का पालन करने वाले लोगों की जहाँ-जहाँ तक प्रधानता हो, वहाँ-वहाँ तक भारतीय राष्ट्रीयता का प्रसार मानना चाहिये। इस प्रकार भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित रहने की कोई बाध्यता नहीं है, परन्तु ऐतिहासिक रूप से हिमालय से इन्दु सरोवर अर्थात् हिन्द महासागर और सिन्धु महासागर तक विशेषत: भारत का राष्ट्रीय क्षेत्र है। यहाँ सामान्य धर्मों के पालन के साथ ही यहाँ के निवासी अपने-अपने विशिष्टधर्मअर्थात स्वधर्म का पालन करते रहे हैं। यह स्वधर्म पालन सशक्त राज्य के होने पर ही संभव है। जहाँ सशक्त राज्य नहीं हो, वह क्षेत्र अराजक हो जाता है। अराजक जनपद की दशा भयावह होती है। यह बात रामायण, महाभारत और सभी पुराणों में बारम्बार कही गई है। अत: सम्पूर्ण राष्ट्र में सनातनधर्मका पालन सुनिश्चित करने के लिये एक राष्ट्रीय राज्य का होना आवश्यक है। यह भाव ही राष्ट्रीयता का आधार है।

इसीलिये राजधर्म को सभी धर्मों का सार कहा गया है। महाभारत में शांतिपर्व में कहा है -

 

सर्वे धर्मा राजधर्मप्रधाना: सर्वे वर्णा: पाल्यमाना भवन्ति।।

सर्वस्त्यागो राजधर्मेषु राजन्। त्यागं धर्मं चाहुरग्य्रं पुराणम्।।

मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायां। सर्वे धर्मा: प्रक्षयेयुर्विबुद्धा:

सर्वे धर्माश्चाश्रमाणां हता: स्यु: क्षात्रे त्यक्ते राजधर्मे पुराणे।।

सर्वे त्यागा राजधर्मेषु दृष्टा: सर्वा दीक्षा राजधर्मेषु चोक्ता:

सर्वा विद्या राजधर्मेषु युक्ता: सर्वे लोका राजधर्मे प्रविष्टा:।।

(राजधर्म ही सबसे प्रधान धर्म है क्योंकि राजधर्म के संरक्षण में ही सभी वर्ण धर्मों का पालन हो पाता है। इसीलिये राजधर्म का पालन करना सम्राट का सर्वोपरि त्याग है। ऐसा ऋषियों ने कहा है। यदि दण्डनीति ही नष्ट हो जायेगी, तो वेदों की प्रतिष्ठा रहेगी और ना ही समाज में धर्मों का पालन और उत्कर्ष हो पायेगा। राजधर्म के लोप होने से वर्णों और आश्रमों के सभी धर्मों का लोप हो जाता है। अत: राजधर्म की दीक्षा ही सर्वश्रेष्ठ दीक्षा है। राजधर्म का ज्ञान कराने वाली विद्या ही समस्त विद्याओं का आश्रय है और सम्पूर्ण लोकों का संरक्षण राजधर्म द्वारा ही होता है।)

इन्द्र और मान्धाता संवाद

शांतिपर्व के 65वें अध्याय में प्राचीनकाल में हुये इन्द्र और मान्धाता के संवाद का उल्लेख है जिसमें मान्धाता को इन्द्र ने बताया है कि यवनों, किरातों, गान्धारों, चीन के लोगों, शबरजन, बर्बरजन, शकों, तुषारों, कंक लोगों, पह्लव लोगों, आन्ध्रों, मन्द्रकों, पौंड्रों, पुलिन्दों और काम्बोज निवासियों सहित समस्त ब्राह्माणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शिल्पियों का सनातन धर्म है- माता-पिता की सेवा और शुश्रूषा, आचार्यों और विद्वानों तथा आश्रमों में रहने वाले मुनिजनों की शुश्रूषा (उनकी बात को ध्यान से सुनना ही शुश्रूषा है), राजाओं के प्रति आदर भाव, वैदिक कर्मों और धर्म का अनुष्ठान, पितरों का श्राद्ध, कूप, वापी, तड़ाग आदि खुदवाना, जल क्षेत्र चलाना अर्थात् सार्वजनिक रूप से लोगों के लिये जल सुलभ कराना। दान देना, धर्मशालायें बनवाना, सत्यभाषण, अहिंसा, क्रोधरहित बर्ताव, अन्यों की आजीविका की रक्षा करना, अपनी पैतृक सम्पत्ति की रक्षा करना, पत्नी और संततियों का भरण पोषण, पवित्र जीवन जीना और किसी के प्रति द्रोह भाव नहीं रखना। यह सब मनुष्यों का धर्म है। इन धर्मों का निर्बाध पालन हो, यह देखना राजा का कर्तव्य है। इसमें बाधा पैदा करने वालों को दण्डित करना राजधर्म है। जब शासक राजधर्म का पालन नहीं करते तो सभी प्राणी कत्र्तव्य और अकत्र्तव्य का विवेक खो बैठते हैं।

इस प्रकार राजधर्म का पालन करने वाला राज्य ही राष्ट्रीयता को सुरक्षित रखता है। राष्ट्रीयता के बाधक तत्वों का दमन ही कण्टक शोधन है। कण्टक शोधन प्रधान राजधर्म है। राष्ट्रीयता की रक्षा में राज्य की सक्षम दण्डनीति सर्वोपरि आवश्यक है। इसके साथ ही सुरक्षित राज्य में शास्त्रचर्चा और धर्मचर्चा अबाधित होती रहे तथा धर्ममय परंपराओं का निर्बाध पालन होता रहे, यह देखना राजधर्म है। राजधर्म के अभाव में राष्ट्रीयता खंडित होती है और सनातन धर्म बाधित होता है।  

 

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