राजा और सेनापति का संयमी, जितेन्द्रिय और ज्ञान सम्पन्न होना आवश्यक
प्रो. कुसुमलता केडिया
देवर्षि नारद द्वारा महाराज युधिष्ठिर को प्रश्नों के माध्यम से राजधर्म का उपदेश देने के क्रम में महाभारत के सभापर्व के अंतर्गत लोकपाल सभाख्यान पर्व के पांचवे अध्याय के श्लोक 17 से 46 तक में पूछे गये राजधर्म के मुख्य लक्षणों का स्मरण किया है। देवर्षि इसके आगे राजधर्म का विस्तार से उपदेश देते हुये महाराज युधिष्ठिर को और भी महत्वपूर्ण उपदेश देते हैं। वे प्रश्न के माध्यम से बताते हैं कि सेनापति को सदा हर्ष और उत्साह से सम्पन्न, शूरवीर, बुद्धिमान, धैर्यवान, अपने कार्य में कुशल, राज्य और राजा के प्रति पूर्ण निष्ठा रखने वाला तथा पवित्र जीवन जीने वाला श्रेष्ठ कुल का व्यक्ति ही होना चाहिये। इसी प्रकार सेना के अन्य महत्वपूर्ण दलपति अर्थात् विविध कमांडर सब प्रकार से युद्ध में निपुण, निर्भय और निष्कपट तथा पराक्रमी होने चाहिये। इसके बाद वे सेना से जुड़े महत्वपूर्ण कर्त्तव्य की ओर ध्यान दिलाते हैं। उन्होंने महाराज युधिष्ठिर से पूछा :-‘आप अपनी सेना के लिये भरपूर पोषण और वेतन की व्यवस्था रखते हैं ना? और यह सब समय पर सुलभ करा देते हैं ना? सैनिकों और सैन्य अधिकारियों को जो देय है, उसमें ना तो कोई कमी होनी चाहिये और ना ही विलंब होना चाहिये क्योंकि कमी या विलंब होने पर कर्मचारियों में स्वामी के प्रति क्षोभ उत्पन्न हो सकता है जो बहुत बड़े अनर्थ का कारण हो जाता है।
इसी प्रकार वे यह प्रश्न भी करते हैं कि तुम्हारे सभी मंत्री श्रेष्ठ कुल के तो होंगे ही, वे राज्य पर और शासक पर अनुरक्त तो हैं ना? क्या वे युद्ध में प्राण तक अर्पित करने के लिये तत्पर रहते हैं? कर्मचारियों में से कोई भी अनुशासनहीन तो नहीं है और युद्ध तथा अन्य राजकीय कार्यों को अपनी मनमानी से तो नहीं करता? साथ ही, कार्य को भलीभांति सम्पन्न कर लेने पर वह कहीं अधिक वेतन आदि की अपेक्षा तो नहीं करने लगता? यहाँ देवर्षि कह रहे हैं कि कार्यों को अधिक अच्छी तरह करने वाले कर्मचारी और अधिकारी को शासक को सदा ही यथायोग्य धन और सम्मान अलग से देना चाहिये परंतु स्वयं वह कर्मचारी और अधिकारी यदि इसकी अपेक्षा करने लगे, तो वह शुभ लक्षण नहीं हैं।
राजा के कर्त्तव्य राजनीति शास्त्रों के अनुसार
देवर्षि पूछते हैं कि राज्य के हित और कल्याण के लिये अपने प्राणों का बलिदान दे देने वाले अथवा किसी बड़े संकट में पड़ जाने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों की संततियों की रक्षा और पोषण आप करते हैं ना? इसी प्रकार शरणागत शत्रु यदि किसी अधिक बलवान राजा से डरकर अथवा साधनों की बहुत कमी हो जाने के कारण शरण में आया हो तो उसका पुत्रवत् पालन करते हो ना? क्या आपकी समस्त प्रजा आपको अपने माता-पिता जैसा ही विश्वास योग्य और समदर्शी मानती है? यहाँ देवर्षि के द्वारा प्रतिपादित राजा के कर्तव्य हमारे सभी राजनीति शास्त्रीय ग्रंथों में भी बारम्बार कहे गये हैं। वस्तुत: राज्य के सभी लोगों को प्रजा कहा जाता है जिसका अर्थ ही है संतति। अत: राजा प्रजा के लिये सदा पिता के जैसा ही है, यही सभी धर्मशास्त्रों और राजनीति शास्त्रों में कहा गया है।
प्रजा के प्रति संतान जैसा प्रेम और वात्सल्य
यह तो अपने राज्य में सुख, समृद्धि, समरसता और सांमजस्य रखने के लिये अनिवार्य कर्त्तव्य प्रतिपादित किये गये। परन्तु इन गुणों को देखकर कोई इस भ्रांति में नहीं पड़ जायें कि राजा को या शासक को केवल सज्जन गृहस्थों जैसा ही सत्पुरुष होना चाहिये। राजा का अधिकार और कर्त्तव्य विशेष है और इसलिये जहाँ अपनी प्रजा के प्रति संतान जैसा प्रेम और वात्सल्य आवश्यक है, जैसा कि हमने कोरोना संकट के समय स्वयं श्री नरेन्द्र मोदी जी का आचरण और व्यवहार देखा, वहीं राष्ट्र के शत्रुओं के प्रति राजा का व्यवहार इससे नितांत भिन्न होना चाहिये। देवर्षि इसीलिये अगला प्रश्न यह करते हैं कि अपने शत्रुओं को दुर्व्यसनो में फंसा देखकर या सुनकर आप उस शत्रु के सैन्यबल, मंत्रबल अर्थात् ज्ञानबल और कोषबल का सम्यक विचार करते हुये उसे दुर्बल पाकर उसपर प्रचंड वेग से आक्रमण तो करते हैं ना? स्पष्ट है कि शत्रु के साथ सज्जनता नहीं करनी है क्योंकि वह राष्ट्र का कंटक है और लोक का भी कंटक है। अत: उसकी कमजोरी को आंक कर उन्हीं पक्षों पर सर्वप्रथम प्रचंड प्रहार करना चाहिये ताकि वह नष्ट हो जाये।
भारतीय राजनीति शास्त्र में वर्णित कूटनीति
इसके आगे देवर्षि नारद ने भारतीय राजनीति शास्त्र में वर्णित कूटनीति शास्त्र पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने राजा को दैव और मानुष दोनों प्रकार के व्यसनों से बचकर रहने कहा। साथ ही शत्रु पक्ष में वे व्यसन तेजी से फैलें, ऐसा कुछ भी करते रहने को कर्त्तव्य बताया। दैव व्यसन हैं - आग, पानी, अकाल या दुर्भिक्ष और महामारी तथा अन्य रोग। अपने राज्य को इनसे मुक्त रखें और शत्रु के राज्य में आगजनी, बाढ़, दुर्भिक्ष तथा महामारियों को फैलाने का प्रयास करें अथवा वे फैल रहे हों तो उसमें सहायक बनें। यह कूटनीति है। इसी प्रकार मानुष व्यसन हैं - मूर्खों को महत्व देना, चोरी होने देना या उसमें सहायक बनना, शत्रुओं के प्रति उदासीन होना और लोभ का होना। इसके साथ ही पक्षपातपूर्ण व्यवहार भी मानुष व्यसन है। अपने राज्य में राजा को कभी भी मूर्खों को महत्व नहीं देना चाहिये और शत्रुओं के प्रति सदा सजग रहना चाहिये तथा शासन में दायित्व सौंपते समय संबंधित व्यक्ति की योग्यता का विचार करना चाहिये, ना कि वह स्वयं को प्रिय है, इस आधार पर नियुक्ति या दायित्व देना चाहिये। राज्य में चोरी को कड़ाई से रोकना चाहिये और राजा को कभी भी अपने कोष में अधिक धन किसी भी प्रकार संग्रहीत करने का लोभ नहीं रखना चाहिये। शत्रु के राज्य में ये सब दुर्गुण और दुष्प्रवृत्तियां सबल हों, यह प्रयास करना चाहिये, क्योंकि इससे शत्रु भीतर से कमजोर हो जायेगा और उसे नष्ट करना सरल हो जायेगा।
शत्रु के प्रति राजा की दृष्टि
इसी क्रम में देवर्षि ने पूछा कि आप द्वादश मंडल को और पारणीमूलं को जानते हैं और उनके प्रति अपना कर्त्तव्य सदा स्थिर रखते हैं ना? यहाँ ‘द्वादश मंडल’एक पारिभाषिक पद है जिसका अर्थ होता है - शत्रु और शत्रु के शत्रु (2), शत्रु के मित्र (2) और मित्रों के दो प्रमुख मित्र (2) इस प्रकार छ: लोग जो कि युद्ध में सदा राजा के आगे खड़े होते हैं। इसी प्रकार पृष्ठ रक्षक और उत्साह दिलाने वाला ये दो व्यक्ति तथा इनके पीछे इन दोनों की सहायता करने वाले एक-एक व्यक्ति - ये चार व्यक्ति मिलाकर दस लोग हो गये। इसके साथ ही पार्श्व भाग में उदासीन और उनके भी पार्श्व में एक और उदासीन - इन दो को मिलाकर कुल 12 लोग होते हैं। इन्हें ही ‘द्वादश मंडल कहते हैं और इन्हें ही पारणीमूलं भी कहते हैं। अपने और शत्रु के पक्ष के इन 12-12 लोगों को जानना राजा के लिये आवश्यक है, क्योंकि इन सबका विचार करके ही युद्ध किया जाता है।
देवर्षि नारद पूछते हैं कि शत्रु पर चढ़ाई करते समय सैनिकों को अग्रिम वेतन दे देते हो ना? साथ ही तुम स्वयं जितेन्द्रिय रहकर प्रमाद में पड़े हुये शत्रु को जीतने के लिये सदा सावधान रहते हो ना? इसके साथ ही शत्रु को वश में करने के लिये यह भी आवश्यक है कि तुम्हारे साम, दाम, भेद और दंड इन चारों गुणों का स्वरूप और व्यवहार की प्रकृति शत्रु तक पहुँच जाये। ताकि अवसर आने पर या आवश्यकता होने पर वह संधि का विचार कर सके।
देवर्षि नारद द्वारा प्रतिपादित नीति
महाराज युधिष्ठिर से देवर्षि का अगले प्रश्न है कि आप अपने राज्य की नींव अर्थात् मूल आधारों को दृढ़ करके ही शत्रुओं पर धावा करते हैं ना और फिर विजय के लिये पूर्ण पराक्रम करते हैं ना? इसके साथ ही वह यह भी पूछते हैं कि विजय के बाद विजित राजा यदि शरण में आ जाये और संधि कर ले तो उसकी पूर्ण रक्षा करते हैं ना? यह भारतीय राजनय की अनूठी विशेषता रही है। आधुनिक जगत में अन्य देश इस नीति का अवलम्बन नहीं करते। इसीलिये न तो उनका यश फैलता और ना ही वे बाहर के देशों में अधिक समय टिक पाते। यूरोप के सभी देशों को विदेशों में जहाँ-जहाँ उन्होंने उपनिवेश बनाये वहाँ से उन्हें पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के सौ वर्ष के भीतर हटना पड़ा। स्वयं इंग्लैंड को भारत से 90 वर्षों में ही हटना पड़ा, क्योंकि ये राज्य देवर्षि नारद द्वारा बताई गई नीति का पालन नहीं करते। इसके स्थान पर भारतीय राजाओं का प्रभाव विश्व के अनेक देशों में हजार वर्षों से अधिक समय तक रहता आया है, क्योंकि वे देवर्षि नारद द्वारा प्रतिपादित नीति पर चलते हैं। यहाँ विजय का उद्देश्य अपने पुरुषार्थ और पराक्रम को प्रमाणित करना है, अन्य के प्रति घृणा और विद्वेष रखकर उसे नष्ट करने की इच्छा इसके पीछे नहीं है।
इसी प्रकार उन्होंने यह भी पूछा कि क्या अपने और शत्रु के राष्ट्र में तुम्हारे गुप्तचर अच्छी संख्या में स्थान-स्थान पर घुसकर प्रजा को तुम्हारे पक्ष में करने का कार्य करते हैं ना? साथ ही तुम्हारे भोजन और भोज्य पदार्थ, शरीर में धारण करने वाले वस्त्र आदि और सूंघने या अन्य उपयोग में आने वाले द्रव्यों का परीक्षण पहले विश्वस्त पुरुषों द्वारा करा लिया जाता है ना? क्योंकि शत्रु इन्हीं उपायों से कई बार राजा को हानि पहुँचाने का प्रयास करते हैं। अत: देवर्षि कहते हैं कि यह आवश्यक है कि आपका धन भंडार, अन्न भंडार, वाहन, प्रधानद्वार, अस्त्र-शस्त्र तथा आय के साधनों की रक्षा अत्यन्त विश्वस्त लोग करें। रसोइया तथा अन्त:पुर के सेवक विश्वस्त होने चाहिये, इस पर शासक को विशेष ध्यान देना चाहिये। इसके आगे देवर्षि यह भी पूछते हैं कि कहीं तुम्हारे विश्वस्त सेवक तुम्हारा समय और धन जुआ खेलने या सुन्दर स्त्रियों का सेवन करने या इसी प्रकार की शृंगार क्रीड़ायें करने तथा मद्यपान आदि नशा करने जैसे व्यसनों में लगाने के प्रस्ताव तुम्हारे सामने तो नहीं लाते? क्योंकि ऐसा प्रस्ताव लाने वाले सेवक यदि सदभाव से भी यह कर रहे हैं तो भी वे राजा का अनिष्ट करने वाले ही सिद्ध होते हैं। इससे आगे जो प्रश्न देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर से करते हैं वह भी महत्वपूर्ण है। वे पूछते हैं कि राजन, राज्य कार्य के लिये धर्मानुसार आपको जो आय निर्धारित है, उसके एक चौथाई भाग से ही तुम्हारा कार्य चल जाता है ना? या बहुत अधिक व्यय की स्थिति आने पर भी उसके आधे अथवा उसके तीन चौथाई से ही काम चल जाता है ना? सम्पूर्ण आय तुम पर ही तो व्यय नहीं हो जाती? यह संयम और मितव्ययता का स्पष्ट निर्देश है।
इस प्रकार राजा के जितेन्द्रिय, संयमी और राजनीति संबंधी ज्ञान से सम्पन्न तथा वीर और कुशल प्रशासक होने के विषय में देवर्षि नारद प्रश्नों के माध्यम से उपदेश करते हैं जो किसी भी राज्य की उन्नति के लिये सार्वभौम नियम हैं।


