बालों की सही देखभाल पतंजलि वैलनेस इंटिग्रेटेड थेरेपी
डॉ. नागेन्द्र 'नीरज
निर्देशक व चिकित्सा प्रभारी - योग-ग्राम, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार
सौन्दर्यपूर्ण व्यक्तित्व के निखार एवं निर्माण में बालों का बहुत बड़ा योगदान है। घने काले केश नारी के सौन्दर्य में चार चाँद लगाते हैं। वहीं छोटे, कटे, सजे बाल पुरुष के व्यक्तित्व को निखारते हैं। हमारे सिर में लाखों बाल होते हैं। इन बालों में पुराने झड़ जाते हैं, उसके बाद नये उग आते हैं। सबसे ज्यादा भूरे बाल वालों के सिर पर लगभग डेढ़ लाख काले बाल वाले के सिर पर लगभग सवा लाख तथा सबसे कम लाल बाल वाले के सिर पर लगभग नब्बे हजार बाल होते हैं। प्रतिदिन औसतन 50 से 100 बाल झड़ते हैं। केशों का ज्यादा मात्रा में तेजी से झड़ना बालों के विभिन्न रोगों का संकेत करता है।
बालों के झड़ने का कारण
आहार में प्रोटीन, विटामिन बी-5, विटामिन बी-6, विटामिन बी-7 या बायोटिन विटामिन ए., ई., बी., सिलिकन, आयोडीन, लोहा, मैग्नेशियम तथा क्लोरीन आदि तत्वों की कमी, यौन हार्मोन के स्राव में अव्यवस्था जैसे महिलाओं में रजोनिवृत्ति के समय एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरॉन की कमी, एंड्रोजन तथा अन्य हार्मोनों में असंतुलन, निरंतर मानसिक तनाव, दबाव, अवसाद, दु:ख, ग्लानि, क्रोध, दुश्चिंता, विभिन्न जाति के बुखार जैसे टॉयफायड, वायरल आदि के अधिक दिन तक रहने पर तथा सिफलिस, क्षय आदि संक्रामक रोग, खून की कमी, लगातार जुकाम, रात्रि को अधिक देर तक जागना, ज्यादा दूरदर्शन, टैबलेट्स, लेपटाप तथा मोबाइल देखना, मेनिनजाइटिस, आर्थराइटिस, पुराना सिरदर्द, मधुमेह, गठिया, अनिद्रा आदि रोग, दूषित वातावरण, नमकीन एवं खारा पानी, एयरकंडीशन की हवा, क्लोरीनयुक्त पानी, रुक्ष हवा, अत्यधिक गर्मी, धूप, रंगीन तथा सुगन्धित तेल, विभिन्न प्रकार के शैम्पू का उपयोग, अधिक साबुन तथा शैम्पू लगाना, साबुन, शैम्पू लगाने के बाद बालों को अच्छी तरह से नहीं धोना, बालों में साबुन तथा डिटरर्जेंट के कणों का रह जाना, थायरॉयड की विकृति, कैंसर, रेडियो तथा कीमोथैरेपी, प्रोपरनोल, जेंटामाइसिन, इण्डोपेथासिन आदि दवाइयों का अधिक सेवन, खून में यूरिक एसिड, एड्रिनलिन कॉर्टिसोल तथा एंड्रोजन टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन तथा ग्लूकोस का अधिक होना, व्यायाम तथा विश्राम का असंतुलन तथा आनुवांशिक इतिहास आदि अनेक कारण हैं, जिनसे बालों का झड़ना एवं अन्य बालों के रोग होते हैं। पोनीटेल तथा बालों को हेयर ड्रायर द्वारा सीधा करना, पर्मिंग या ब्लीच करवाना, मशीनों द्वारा घुंघराले बनवाना, बालों को रंगना, कृत्रिम आहार जैसे टॉफी, चाकलेट, वनस्पति घी, शीतल पेय आदि में स्थित निकेल, जस्ता आदि खून में मिलकर बालों की जड़ फॉलिकल्स में जमा होकर, उन्हें पोषण रहित निर्जीव बना देते हैं।
लक्षण
थोड़े बहुत बाल पचास से सौ तक तो निरतर झड़ते हैं, परन्तु ज्यादा बाल गुच्छे का गुच्छा गिरने लगे तो सचेत हो जाना चाहिए।
रोग विकृतिजन्य संरचना
मनुष्य के अन्दर बालों को पैदा करने वाले तत्व पाये जाते हैं। विज्ञान की भाषा में बाल या केश त्वचा का बाह्य हिस्सा एपिडर्मिस पर स्थित केरेटिन का बना होता है। यह त्वचा के बाह्य स्तर पर एपिडर्मिस पर पाया जाता है। त्वचा के जिस स्तर पर इसकी अधिकता होती है, वहाँ काफी मात्रा में बाल या शृंगीनुमा संरचना का निर्माण होता है।
त्वचा पर स्थित ट्यूबरलर हेयर फोलिकल यानि रोम कूप में बालों का विकास होता है। केश की रोम कूप की संरचना को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं। जड़ वाला आउटर या कार्टेक्स का हिस्सा जो बालों को आकार, प्रकार, मात्रा तथा विस्तार प्रदान करता है। यहीं पर बालों को रंग प्रदान करने वाला मुख्य रंजकजन्य पिगमेंट मेलानिन होता है। यह भी चार प्रकार का होता है। एयूमेलानिन (Eumelanin) रंग बाल को काला बनाता है। फिओ (Pheo) मेलानिन बालों को लाल बनाता है। सामान्य से कम एयूमेलानिन होने से बालों का रंग भूरा होता है। व्यक्ति के फॉलिक्ल्स में एयूमेलानिन अत्यल्प होता है, तो उसके बाल सुनहरे होते है। एयूमेलानिन तथा फियोमेलानिन मिलकर स्ट्राबेरी रंग के बाल बनाते हैं।
मेलानिन का नियंत्रक जीन
मेलानिन कितनी मात्र में निकलेगा इसका निर्धारण एवं नियमन (MCIR) नामक जीन करता है। यह जीन मेलानो कोर्टिन। रेसेप्टर्स उस पाथवेज का नियोजन एवं नियंत्रण करता है, जो मेलानोसाइटस कोशिकाओं को मेलानिन पैदा करने के लिए निर्देश देता है। बालों के स्वाभाविक रंग एवं स्वास्थ्य के लिए काले रंग का चॉकलेट, ब्लूबेरीज, पालक, मूली, शलगम, चुकन्दर, सरसों, केला तथा कोलार्ड, लेटूस, तथा गहरे काले रंग के पत्ते वाली अन्य सब्जियाँ, पर्किन्स बादाम, मसूर, मशरूम, संतरादि साइट्रस फ्रूट, नट्स, ब्लैक बेरीज, गाजर, लुटीन, लाइकोपिन, अस्ताजेन्थिन, प्रोबायोटिक्स, बायोटिन, कॉपर, विटामिन बी-12, बी-6, ए., सी., ई. वाले आहार ब्रेवर्स पीस्ट, एवोकोडो, ऑवला, शकरकन्द, ब्रोकॉली, बीन्स, बिनौला, सूर्यमुखी, पम्पकिन, खीरा, ककड़ी के बीज मटर आदि का प्रयोग विविध रूपों में करें। ये सभी आहार बाल त्वचा, हेयर फॉलिक्लस, आँख का आयरिश का रंगीन भाग, रेटिना के रंग को बनाने में सहायता करते है।
रिसर्च के अनुसार त्वचा तथा बाल आदि के रंग बनाने वाली खास कोशिकाए मेलोनोसाइट्स के अन्दर (TYR) जीन होता है। (TYR) जीन टायरोसिनेस एन्जाइम पैदा करने के लिए आदेश देता है। मेलानिन उत्पादन का प्रथम चरण टायरोसिनेस एन्जाइम ही होता है। यह एन्जाइम अति आवश्यक शरीर सर्जक प्रोटीन टायरोसिन को डोपाक्यूनोन (Dopaquinone) कम्पाउण्ड में बदल देता है। रंग बनाने वाले जटिल जैव रासायनिक प्रक्रिया शंृखला के अन्तर्गत डोपाक्यूनोन मेलानिक प्रक्रिया जैवरासायनिक शृंखला के अन्तर्गत डोपाक्यूनोन ही मेलानिन में रूपान्तरित होकर त्वचा, बालों के हेयर फॉलिक्लस तथा बालों के रंग आँखों का आइरिश तथा रेटिना का गहरा रंगीन हिस्सा बनाता है।
इसी रंजक द्रव्य के कमोबेशी के कारण बाल काले, लाल तथा भूरे होते हैं। स्वाभाविक स्थिति में उम्र बढ़ने के साथ इस पिगमेंट में कमी होने से बाल सफेद होने लगते हैं। बालों के रंगों के निर्माण में पिट्यूटरी ग्रंथि निकलने वाला हार्मोन मेलेनोसाइटिक स्टीमुलेटिंग हार्मोन एम.एस.एच. विशेष भूमिका निभाता है। यह बालों के रंग को स्वाभाविक एवं स्वस्थ बनाता है। एम.एस.एच. त्वचा पिट्यूटरी तथा हाइपोथैलमस से निकलता है। यह यू.वी. से रक्षा तथा भूख को नियंत्रित करता है। एम.एस.एच. बढ़ाने के लिए लाल, पीला एवं नारंगी रंग के गाजर, गहरे काले रंग वाले बेरीज, अंगूर खायें या रस पीयें।
रोमकूप के मध्य का हिस्सा सेन्ट्रल कोर मेड्यूला अन्दर से खाली यानि छिद्रवत होता है। इसकी जड़ त्वचा से जुड़ी हुई होती है। इसे हेयर बल्ब तथा पपीला कहते हैं। इसमें मेट्रिक्स पाया जाता है जिसके चलते बालों के झड़ते ही केरेटिन से नये बाल निर्मित हो जाते हैं। त्वचा के डर्मिस से जुड़े रोम कूपों के लघु इरेक्टर माँसपेशियों द्वारा बाल उगते हैं। हेयर बल्ब का आधार पपीला में अनेक लचकदार कनेक्टिव टिशूज तथा सूक्ष्म रक्तवाहिनियाँ होती हैं जो बालों को पोषण प्रदान कर उन्हें सशक्त स्वस्थ, सुन्दर, स्वच्छ, आकर्षक, सजीला एवं चमकीला बनाये रखती है। यह रेटिकलर लेयर गहरा होता है। इनमे रक्तवाहिनियां, नर्व अनडिग्स, हेयर फॉलिक्ल्स तथा ग्रंथियां होती हैं। इन सूक्ष्म संरचनाओं को नंगी आँखों से देखा नहीं जा सकता है।
बालों की कैसे होती है क्षति एवं दुर्गति
उपर्युक्त कारणों से निरन्तर क्षति पहुँचने से फॉलिक्ल्स हेयर बल्ब तथा पपीला सूखकर सिकुड़ने लगते हैं। केशों को पोषण मिलना रुकने लगता है, नये बाल उगने में असमर्थ हो जाते हैं। क्षतिग्रस्त बाल के बदले नये बाल आते भी हैं, तो अत्यन्त कमजोर, कम चमकदार होते हैं। बाल दो मुँखी तथा पतले हो जाते हैं।
प्रत्येक बाल रोम कूप के पपीला तथा फॉलिक्लस बल्ब से निकलते हैं। इसकी औसत आयु तीन से पाँच वर्ष होती है। बालों की औसत आयु को तीन भागों में विभक्त किया गया है। प्रतिदिन 0-37 मिमी बाल बढ़ते हैं तथा एक माह में करीब आधे से पौन इंच तक बढ़ जाते हैं। तीन वर्ष में ये अपनी लम्बाई तथा वृद्धि की पूर्णता प्राप्त करते हैं। इसे हम बालों की यौवनावस्था कह सकते हैं। यह अवस्था एनागेन यानि बालों की जवानी की अवस्था कहलाती है। इसके बाद बालों की निष्क्रिय स्थिति पैदा होती है। यह बालों की प्रौढ़ावस्था कैटगेन कहलाता है। बाल गिरने के ढाई से साढ़े तीन महीने पहले यह स्थिति प्रारम्भ हो जाती है। इसे टेलोगोन या एक्सोगेन अवस्था कहते हैं। बालों की इस ढलती-ढहती प्रौढ़ावस्था उम्र को केटेगन अवस्था कहते हैं। यह डेढ से ढाई सप्ताह का काल होता है, जिससे बालझड़ काल कहे जाते हैं। प्रत्येक केश की जगह नया केश उग आता है। प्रत्येक की जवानी की उम्र एनागेन तीन वर्ष, प्रौढ़ावस्था कैटेगन तीन महीना तथा बुढ़ापा टेलोगेन तीन सप्ताह का होता है।
बालों का पी.एच. (बालों की क्षारीयता तथा अम्लता नापने का मापदण्ड) सामान्य होता है। अधिक अम्लीय तथा क्षारीय प्रसाधन बालों को नुकसान पहुँचाते हैं। बाजार में मिलने वाले शैम्पू आदि प्रसाधन या तो अम्लीय होते हैं या क्षारीय जो बालों को नुकसान पहुँचाते हैं। प्रत्येक रोम कूप सीबेसियस ग्रंथि से जुड़ा हुआ होता है। तैलीय सीबेसियस ग्रंथियाँ तेल सदृश पदार्थ निकालती हैं, जो त्वचा तथा बालों को नरम, मुलायम, लचीला तथा कोमल बनाये रखती हैं। रूखी हवाओं तथा गरम पानी से बाल तथा त्वचा की रक्षा करती है। किसी कारण वश खोपड़ी की तैलीय ग्रंथियाँ अधिक उत्तेजित होकर काफी मात्रा में तेल निकालती हैं, तो बाल तैलीय हो जाते हैं। तैलीय बाल अनेक प्रकार के रोगाणुओं का घर बन जाता है। नाना प्रकार के रोगाणु पनपना प्रारम्भ हो जाते हैं। रूसी (डेण्ड्रफ) हो जाती है। बालों में खुजली हो जाती है, वहाँ की त्वचा लाल हो जाती है। कंघी करने पर रूसी निकलती है। खोपड़ी की ऊपरी त्वचा का स्तर तेजी से नष्ट होने लगता है। कुछ विशेष प्रकार के कीटाणुओं से उत्पन्न रूसी सिबोरिक डर्मेटाइटिस यानि एक प्रकार का एक्जिमा पैदा करता है। खोपड़ी की ग्रंथियाँ ज्यादा मात्र में सीबम तेल पैदा करती हैं। इससे बाल ग्रीसी तैलीय चिपचिपे हो जाते हैं तथा पीले रंग की रूसी निकलती है। जब सीबम कम मात्र में निकलता है, तो सफेद रंग की रूसी निकलती है।
बालों तथा त्वचा के रंग को स्वाभाविक स्वस्थ तथा सुन्दर रखने के लिए पिट्यूटरी के अग्रभाग हाइपोथैलमस तथा त्वचा कोशिकाओं से एम.एस.एच. (मेलोनोसाइट स्टीमुलेटिंग हार्मोन) का स्राव होता है। इस हार्मोन की कमी के कारण बाल तथा खाल सफेद होने लगते हैं। असमय बालों का झड़ना तथा सफेद होना, वंशानुगत भी हो सकता है। बालों को झड़ने तथा सफेद करने वाले जीन्स (माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी या सात पीढ़ियों से मिलने वाले क्रोमोसोम्स) खान-दानी तौर पर विरासत में मिलते हैं। खान-दानी बालों के झड़ने, गंजा होने तथा सफेद होने की प्रक्रिया को ठीक कर पाना मुश्किल है।
उपचार
बालों को उगाने, गंजापन दूर करने, सफेद होने से रोकने आदि के लिए खूब विज्ञापन आते हैं। इन विज्ञापनों के भ्रम-जाल में अनाड़ी एवं अबोध जनमानस फँसकर आर्थिक नुकसान उठाने एवं मानसिक उलझन बढ़ाने के सिवा कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
जिस प्रकार से अन्य रोगों का कारण शरीर में संचित विकार है, उसी प्रकार बालों के विभिन्न रोगों का कारण भी एकत्रित दूषित पदार्थ ही हैं। विभिन्न कृत्रिम आहार से शरीर के अन्दर विष प्रवेश करते हैं। इन विषों को मल-मूत्र द्वारा बाहर निकल जाना चाहिए। परन्तु कब्ज या अन्य कारणों से ये जहर रक्त में मिलकर सिर के बालों में संचित होते रहते हैं। परिणमत: बालों को भरपूर पोषण नहीं मिलता है। पोषण रहित बाल सफेद होने लगते हैं या झड़ने लगते हैं। बालों के समस्त रोगों में आधा घंटा मिट्टी की पट्टी पेडू पर दें।
तीन मिनट गरम, दो मिनट ठण्डा सेक पेट तथा कमर पर क्रम से तीन बार देकर मालिश करें। एनीमा के पश्चात् गरम पाद स्नान या भाप स्नान दें। दोपहर के उपचार में आधा घंटा पेट पर मिट्टी की मट्टी तथा बालों को छोटे कराकर अथवा मुंडन कराकर सिर पर मिट्टी का भरपूर लेप करें। सिर को अच्छी तरह से नीम के पानी से रगड़-रगड़कर धोयें। स्थानीय वाष्प सिर, पेट तथा कमर पर देकर 15 मिनट ठण्डा कटिस्नान दें।
सिर को अच्छी तरह रगड़-रगड़कर पोछें। दो तीन बार कंघी करें। नुकीली कंघी से अधिक दबाकर कंघी करने से खोपड़ी की त्वचा उत्तेजित होकर रूसी (डेण्ड्रफ) पैदा करती है। साफ सुथरी काली या पीली मिट्टी को मक्खन की तरह गूधें। मुलायम मिट्टी से खोपड़ी की भलीभाँति मालिश करें। इससे डेण्ड्रफ तथा बालों के समस्त रोगों में चमत्कारी लाभ होता है। तैलीय बालों को अधिक मसल-मसल कर नहीं धोयें। ब्रुश के बदले खुले दाँतों वाली कंघी का प्रयोग करें। तैलीय बालों को मिट्टी से धोयें। इससे चिकनाहट तथा चिपचिपाहट दूर होती है। बाल रेशम की तरह मुलायम तथा चमकीले हो जाते हैं। तैलीय बालों को शैम्पू से धोते समय विशेष ध्यान रखें। प्रतिदिन सिर के बालों को धोयें। प्रतिदिन धोने से बाल झड़ते हैं, भ्रामक सच्चाई है। प्रतिदिन सिर को धोने से गंदगी, संक्रमण तथा रोगों से बचाव होता है। सप्ताह में दो-तीन दिन के अन्तर से धोने से ज्यादा गंदगी होने के कारण अधिक मात्र में शैम्पू या साबुन का इस्तेमाल होता है, जिससे बाल रुक्ष हो जाते हैं।
प्राय: शैम्पू गाढ़े तथा तीव्र डिटरजेंट वाले होते हैं। इनके सीधे प्रयोग से कपाल की खाल रुक्ष हो जाती है। बाल कड़े एवं सूखे हो जाते हैं। शैम्पू में 6 हिस्सा जल मिलाकर धोने से वे तनु हो जाते हैं। तेजी से बालों में फैल जाते हैं तथा मात्रा भी कम खर्च होती है। तैलीय बालों के लिए गुन-गुने गरम पानी का प्रयोग करें। एक बार झाग आने तक ही शैम्पू या साबुन लगायें। गुनगुने पानी में धोकर सूखे तौलिये से भलीभाँति पोछकर, सुखाकर कंघी करें। बालों को गीला न रखें। फर या ऊनी टोपी नहीं पहनें।
नमीयुक्त वातावरण तथा अंधेरे में बालों के रोगाणु शीघ्रता से पनपते हैं। अंगुली में कपड़ा लपेटकर खोपड़ी की सारी त्वचा की सूखी मालिश करने से कपाल की खाल साफ हो जाती है। केश कोष उद्दीप्त होते हैं। बालों को भरपूर पोषण मिलता है। ज्यादा साबुन, शैम्पू, ब्लीचिंग, धूप, धूल, धूआँ तथा गर्म हवा या अधिक सर्द हवा से खोपड़ी की खाल में तेल तथा नमी की कमी हो जाती है। बाल खुश्क, शुष्क, रुक्ष तथा कड़े हो जाते हैं। ऐसे रुक्ष बालों की गर्म तेल से भलीभाँति मालिश करें। सिर में तेल डालकर उँगली से धीरे-धीरे 10-15 मिनट खोपड़ी की खाल की मालिश करें।
इससे खोपड़ी की तरफ रक्तसंचार बढ़ जाता है। मालिश के बाद सिर को 10 मिनट स्थानीय वाष्प दें। इससे बालों की जड़ों तक तेल पहुँचकर पोषण देता है। रुक्षता दूर होती है। रुक्ष एवं शुष्क बाल वाले शैम्पू तथा साबुन का प्रयोग कम से कम करें।
प्राकृतिक शैम्पू, आँवला, शिकाकाई, रीठा, मुल्तानी, काली तथा पीली चिकनी मिट्टी, छाछ या दही से बालों को धोयें। बालों को धोने के बाद सुन्दर, मुलायम तथा सुव्यवस्थित करने के लिए प्राकृतिक कंडीशनर का प्रयोग करें। बालों में वैसलिन या मलहम नहीं लगायें अन्यथा बालों के झड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
-क्रमश:


