स्वास्थ्य समाचार
डव, ट्रेसमी जैसे ड्राई शैम्पू से कैंसर का खतरा : एफडीए
अमेरिका के नियामक ‘फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) को यूनिलीवर के डव समेत 19 ड्राई शैम्पू प्रॉडक्ट्स में कैंसर के खतरे वाला केमिकल बेंजीन मिला है। इस कारण नियामक ने 2021 और इसके बाद बने सभी तरह के ड्राई शैम्पू बाजार से वापस मंगवाने का निर्देश दिया है। ड्राई शैम्पू में कैंसर कारक केमिकल की मौजूदगी को लेकर हिंदुस्तान यूनिलिवर लिमिटेड (एचयूएल) ने सफाई दी है। एचयूएल ने कहा कि वह भारत में ड्राई शैम्पू की मैन्यूफैक्चरिंग या बिक्री नहीं करती है। हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि एचयूएल का ड्राई शैम्पू भारत में ऑनलाइन प्लेटफार्म पर आसानी से उपलब्ध है।
एफडीए के रिकॉल नोटिस के बाद यूनिलिवर ने अमेरिका के बाजार से 19 प्रॉडक्ट्स वापस मंगाए हैं। इन प्रॉडक्ट्स में ट्रेसमी ड्राई शैम्पू, वॉल्यूमाइजिंग व बेड हेड रॉकाहोलिक डर्टी सीक्रेट ड्राई शैम्पू, डव ड्राई शैम्पू वॉल्यूम एंड फुलनेस, डव ड्राई शैम्पू कोकोनट, डव ड्राई शैम्पू फ्रेश एंड फ्लोरल, नेक्सस ड्राई शैम्पू रिफ्रेशिंग मिस्ट, नेक्सस एनर्जी फोम शैम्पू एंड रिवाइव, सुआव ड्राई शैम्पू हेयर रीफ्रेशर शामिल हैं।
बता दें कि आमतौर पर उपयोग होने वाला शैम्पू लिक्विड फॉर्म में होता है, लेकिन ड्राई शैम्पू एयरोसोल कैन में मिलता है, ताकि बालों पर स्प्रे किया जा सके।
ड्राई शैम्पू में मौजूद बेंजीन के सूक्ष्म कण शरीर में पहुँचते हैं
ड्राई शैम्पू के इस्तेमाल से बालों के रोम छिद्र बंद हो सकते हैं। बालों का विकास थम सकता है। अमेरिका नियामक एफडीए के अनुसार ड्राई शैम्पू में पाए गए बेंजीन शरीर में कई तरह से प्रवेश करता है। जब कोई शैम्पू स्प्रे करता है, तो बेंजीन के सूक्ष्म कण नाक, मुँह और त्वचा के जरिए शरीर में चले जाते हैं। इससे ल्यूकेमिया और ब्लड कैंसर का खतरा बढ़ता है।
किस कंपनी के हैं उत्पाद?
ब्रिटिश मल्टीनेशनल कंपनी यूनीलिवर पीएलसी (Unilever Plc) ने अपने डव (Dove) और ट्रेसमे (Tresemmé) समेत कई पॉपुलर ब्रैंड्स के एरोसॉल वाले ड्राई शैंपू को रिकॉल करने यानी बाजार से वापस लेने का एलान किया है। जिन ब्रैंड के ड्राई शैंपू को रिकॉल किया जा रहा है, उनमें डव और ट्रेसमे के अलावा नेक्सस (Nexxus), सुएव (Suave), और तिगी (Tigi) भी शामिल हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इन प्रोडक्ट्स को रिकॉल करने का फैसला इनमें बेंज़ीन (benzene) नाम का केमिकल पाए जाने के बाद किया गया है। इस खतरनाक केमिकल की वजह से इंसानों को कैंसर होने की आशंका रहती है।
अक्टूबर 2021 से पहले बने प्रोडक्ट्स का रिकॉल
रिपोर्ट के मुताबिक यूनीलिवर ने जिन प्रोडक्ट्स को रिकॉल करने का एलान किया है, वे अक्टूबर 2021 से पहले बने हैं। इन प्रोडक्ट्स को बाजार से वापस लिए जाने के कंपनी के फैसले की जानकारी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की वेबसाइट पर हाल ही जारी एक नोटिस में दी गई है। कंपनी के इस एलान से पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में एयरोसॉल के इस्तेमाल की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर से गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कंपनी ने यह तो नहीं बताया है कि रिक़ॉल किए जा रहे प्रोडक्ट्स में बेंजीन की कितनी मात्रा मिली है, लेकिन कंपनी का कहना है कि वो यह कदम अत्यधिक सावधानी के तौर पर उठा रही है।

कॉस्मेटिक्स में पहले भी मिला है बेंजीन
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले डेढ़ साल के दौरान एयरोसॉल आधारिक कई सनस्क्रीन को भी बाजार से वापस लिया जा चुका है, जिनमें जॉनसन एंड जॉनसन के न्यूट्राजीना (Neutrogena) और एजवेल पर्सनल केयर कंपनी के बनाना बोट (Banana Boat) जैसे प्रोडक्ट्स के अलावा प्रॉक्टर एंड गैंबल के सीक्रेट (Secret), ओल्ड स्पाइस (Old Spice) और यूनीलिवर के सुएव (Suave) जैसे स्प्रे-ऑन एंटी-पर्सपिरेंट यानी पसीना रोकने वाले स्प्रे शामिल हैं. ये सभी रिकॉल मई 2021 के बाद वैलीश्योर (Valisure) नाम की एनैलिटिकल लैब में हुई जांच के दौरान इन उत्पादों में बेंज़ीन पाए जाने की वजह से करने पड़े हैं. एयरोसॉल प्रोडक्ट् में कैंसर-कारक बेंजीन पाए जाने की वजह से पिछले साल दिसंबर में पी एंड जी को अपने पैंटीन (Pantene) और हर्बल एसेंसेज़ (Herbal Essences) ड्राई शैंपू भी वापस लेने पड़े थे।
स्प्रे के प्रॉपेलेंट में क्यों मिलता है बेंजीन?
रिपोर्ट के मुताबिक कैन से ड्राई शैंपू या दूसरे प्रोडक्ट्स को स्प्रे करने के लिए जिन प्रॉपेलैंट का इस्तेमाल किया जाता है, उनमें कई बार बेंज़ीन पाया जा चुका है। दरअसल ऐसे कैन में स्प्रे के लिए आमतौर पर प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे प्रॉपेलेंट का इस्तेमाल किया जाता है, जो क्रूड ऑयल को रिफाइन करने पर मिलते हैं। पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स में बेंज़ीन की मिलावट पाया जाना एक आम बात है। FDA ने ड्राई शैंपू और दूसरे कॉस्मेटिक्स में बेंज़ीन की अधिकतम मात्रा की कोई लिमिट तय नहीं की है। लेकिन एजेंसी का कहना है कि बेंज़ीन के संपर्क में आना ल्यूकीमिया या अन्य ब्लड कैंसर की वजह बन सकता है।
साभार : https://www.financialexpress.com/hindi/consumer-news/unilever-recalls-dove-tresemm-other-dry-shampoos-over-cancer-risk/2744021/
गाय के दूध पर एंटीबायोटिक का असर : हेवी डोज के चलते दूध में रिसकर आ रहीं दवाएं, इम्यूनिटी कमजोर होने का खतरा
दुनिया में डेयरी प्रोडक्ट की मांग तेजी से बढ़ रही है। खासकर गाय के दूध की डिमांड सबसे ज्यादा है। इसे पूरा करने के लिए और उत्पादन बढ़ाए रखने के लिए गायों को एंटीबायोटिक के इंजेक्शन बार-बार दिए जा रहे हैं। नतीजा यह है कि एंटीबायोटिक गायों के दूध में रिसकर आने लगा है।
अमूमन ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन हेवी डोज के कारण यह स्थिति बन रही है। जब इस दूध का उपयोग लोग करते हैं तो उनके शरीर में इस एंटीबायोटिक की थोड़ी-थोड़ी मात्रा पहुंच रही होती है, जो इम्यूनिटी को प्रभावित करती है। इससे बीमारी के वक्त उन्हें दिए जाने वाले एंटीबायोटिक असर नहीं करते हैं।
ऐसा दूध पीने से बीमारियों की चपेट में आएंगे
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की एक हालिया स्टडी में इस बात का खुलासा हुआ है। अधिकांश लोग गाय के दूध का बीमारी के वक्त ज्यादा उपयोग करते हैं। ऐसे में बीमारी से बचाव के लिए दिए जाने वाले एंटीबायोटिक का असर कम हो जाता है।
रिसर्चर डॉ. रेनाटा इवानेक का कहना है कि दुनिया में ज्यादातर एंटीबायोटिक्स का उपयोग डेयरी उद्योग में ज्यादा प्रोडक्शन के लिए किया जा रहा है। वैश्विक स्तर पर एंटीबायोटिक प्रतिरोध से निपटने के लिए गोवंश में एंटीबायोटिक के उपयोग को कम करना जरूरी है।
इसके लिए अमेरिकी नागरिकों पर एक स्टडी की गई। एंटीबायोटिक वाले दूध के डिब्बे पर आरएयू-लेबल लगाया गया। इसमें सामने आया कि लोगों में लेबल वाला दूध खरीदने की इच्छा बिना लेबल वाले दूध के समान ही थी। हालांकि लेबल वाला दूूध खरीदना लोगों की पहली पसंद थी।
आंतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया की बढ़त कम होती है
एंटीबायोटिक की अत्यधिक मात्रा गाय की आंतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया की बढ़त को कम कर देते हैं। यह बैक्टीरिया जुगाली करने वाले पशुओं की आंतों में पाया जाता है। इसका असर दूध की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
साभार : https://www.bhaskar.com/happylife/news/cow-milk-antibiotics-resistance-130589053.html
संक्रमण पर दवाइयां होने लगी हैं बेअसर : विश्व में फंगल इंफेक्शन से हर साल 50 लाख से ज्यादा मौतें
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक फंजाई (फफूंद) की रैंकिंग जारी कर ऐसे जीवाणुओं की ओर ध्यान खींचा है जिनकी अक्सर अनदेखी होती है। ये बड़े पैमाने पर फैल चुके हैं। जानलेवा हैं और इलाज प्रतिरोधी हैं।
संगठन ने 19 फंगल बीमारियों की सूची बनाई है। इनमें चार को बेहद गंभीर की श्रेणी में रखा है। दुनिया में हर साल फंगल इंफेक्शन से होने वाली बीमारियों से 50 लाख से अधिक मौतें होती हैं। कई मौतें एचआईवी, कैंसर, टीबी और अन्य बीमारियों से पीडि़त लोगों की होती हैं। ऐसे लोग संक्रमणों के शिकार अधिक होते हैं। स्वास्थ्य अधिकारी कहते हैं, फंगल इंफेक्शन से मौतों की संख्या बहुत अधिक हो सकती है क्योंकि खासकर गरीब देशों में कई अस्पतालों और क्लीनिकों के पास उनकी पहचान करने के साधन नहीं हैं। बीमारियों के नियंत्रण पर फोकस करने वाले डब्लूएचओ के अधिकारी डॉ. कारमेम पेसोआ सिल्वा का कहना है, हम समस्या की गंभीरता पूरी तरह नहीं जानते हैं। जलवायु परिवर्तन ने कुछ संक्रमणों की भौगोलिक रेंज को बढ़ाया है। कोरोना वायरस महामारी से भी फंगल इंफेक्शन में बढ़ोतरी हुई है। इंटेसिव केयर यूनिट में भर्ती कई कोरोना मरीज केंडिडा ऑरिस जैसे अडिय़ल रोगाणु के शिकार हुए। ये ऑक्सीजन ट्यूब और इंट्रावीनस लाइनों के जरिये शरीर में घुसपैठ करते हैं। भारत में दुर्लभ लेकिन बेहद आक्रामक रोगाणु म्यूकोरमाइसिस ने हजारों कोरोना मरीजों को प्रभावित किया था। बीमारी को ब्लैक फंगस भी कहते हैं। कई मरीजों को इंफेक्शन से छुटकारा पाने के लिए चेहरे को बिगाडऩे वाली सर्जरी करानी पड़ी थी। एंटीबॉयोटिक्स के लोगों और खेती में जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के कारण कई बैक्टीरिया उनके प्रतिरोधी हो गए हैं। इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में फंगल निरोधी दवाइयों का असर कम हो रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है, कमजोर लोगों के लिए घातक जीवाणु एस्परजिलस फ्यूमिगेटस पर दवाइयां ज्यादा असर नहीं करती हैं। अंगूर, मक्का और कपास जैसी कीमती फसलों में फंगस नाशक दवाइयों के भारी इस्तेमाल से ऐसा हुआ है।

मरने वालों की दर 30 प्रतिशत
फंगल इंफेक्शन के खून में प्रवेश करने के बाद इलाज मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए कैंडिडा फेमिली के फंजाई से खून में इंफेक्शन पहुंचने के बाद मरने वालों की दर 30 प्रतिशत है। डब्लूएचओ की रिपोर्ट में शामिल चार खतरनाक फंजाई में शामिल कैंडिडा ऑरिस में यह दर और भी अधिक है। यह फंगस सबसे पहले 2009 में जापान में पहचाना गया था। यह लगभग 50 देशों में फैल चुका है। इसमें अक्सर कई दवाइयों के प्रतिरोध की क्षमता है।
साभार : https://www.bhaskar.com/magazine/new-york-times/news/more-than-5-million-deaths-every-year-from-fungal-infections-in-the-world-130501850.html
बालों के लिए Straightener का इस्तेमाल करती हैं तो हो जाए सावधान, इससे हो रहा कैंसर
क्या आप भी स्ट्रेट बालों का शौक रखती हैं? और इन्हें सीधा-शाइनी और मुलायम करवाने के लिए रिबॉन्डिंग-स्मूदनिंग ट्रीटमेंट्स के लिए कई तरह के हेयर स्ट्रेंटनिंग प्रॉडक्ट्स का इस्तेमाल कर रही हैं? तो सावधान हो जाएं क्योंकि ये आपको सौगात में यूटेराइन कैंसर दे सकता है। जी हां, ये दावा हम नहीं बल्कि नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट ऑफ हैल्थ के जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में किया गया है। इस अध्ययन के मुताबिक, जिन महिलाओं ने बालों को सीधा करने वाले कैमिकल प्रॉडक्ट्स का इस्तेमाल किया उनमें लगभग 4 प्रतिशत महिलाओं में यूटेराइन यानि गर्भाशय का कैंसर देखा गया। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट द्वारा यह पहली बार दावा नहीं किया गया इससे पहले की रिपोर्ट में भी हेयर डाई का संबंध ब्रेस्ट व ओवेरियन कैंसर के साथ बताया जा चुका है। अमेरिका के रिसर्चर ने इस बात का दावा किया है कि बाल सीधा करने के लिए लगाई जाने वाली क्रीम में जो कैमिकल मिले हैं वह गर्भाश्य कैंसर के जोखिम को दोगुना कर सकते हैं।

महिलाओं में होने वाला सबसे आम कैंसर है गर्भाश्य कैंसर
अगर आप नहीं जानते तो आपको बता दें कि महिलाओं को होने वाला यह कैंसर सबसे आम कैंसर हैं। पूरी दुनिया में हर साल करीब 5 लाख महिलाओं को ये कैंसर होता है। 85 फीसदी महिलाएं विकासशील देशों से हैं जिन्हें इस कैंसर का खतरा ज्यादा है। भारत में भी 36 फीसदी महिलाओं को गर्भाशय कैंसर का खतरा रहता है खासकर जो 30 से 59 के बीच की उम्र की हैं। जिन महिलाओं का बीएमआई (BMI) 5 प्वाइंट अधिक होता है, उनमें 88 फीसदी तक अधिक गर्भाशय के कैंसर का खतरा होता है।
क्या कहती है स्टडी, खून में कैसे पहुंचता है कैंसर?
इन क्रीम में मौजूद कैमिकल खोपड़ी के माध्यम से खून में शामिल होकर गर्भाशय में पहुंच रहे हैं। वहीं अश्वेत महिलाओं को इस कैंसर का खतरा दूसरी महिलाओं से ज्यादा है क्योंकि वह हेयर स्ट्रेटनिंग प्रॉडक्ट्स का इस्तेमाल ज्यादा कर रही हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में 33 हजार महिलाओं की एक दशक से अधिक समय तक निगरानी की गई और उसी में बताया गया कि जो साल में 4 या उससे ज्यादा बार हेयर स्ट्रेटनिंग प्रॉडक्ट्स का इस्तेमाल कर रही थी उन महिलाओं में गर्भाश्य कैंसर की दर 4.05 प्रतिशत थी जबकि ऐसा ना करने वाली महिलाओं में यह दर 1.64 प्रतिशत थी। इस कैमिकल में पैराबेन्स (Parabens), बिस्फेनॉल-ए (Bisphenol-A), धातु और फॉर्मल्डेहाइड (Formaldehyde) जैसे कैमिकल जो हेयर स्ट्रेटनर में मौजूद रहते हैं जो गर्भाशय के कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं।

वहीं अमेरिकी महिला जेनिफर मिशेल (Jennifer Mitchell) ने यह दावा किया कि लोरियल के हेयर स्ट्रेटनिंग प्रोडक्ट इस्तेमाल करने पर उसे गर्भाशय का कैंसर (Uterine cancer) हो गया है। उन्होंने कहा कि वह पिछले कई सालों से लोरियल प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर रही थीं, जिसके कारण उसे कैंसर हो गया है। महिला के वकील ने कंपनी के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर किया है। बता दें कि L'Oreal फ्रांस की कंपनी है जो हेयर एंड केयर के प्रोडक्ट्स तैयार करती है। इस मामले में L'Oreal कंपनी ने अभी कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है।
क्या है गर्भाशय कैंसर?
महिला के गर्भाशय की अंदरुनी परत एंडोमेट्रियम की कोशिकाएं बढऩे से गर्भाशय कैंसर का खतरा पैदा होता है। इसके होने से महिला के मां बनने की संभावना भी खत्म हो सकती है। महिलाओं के शरीर में असंतुलित हार्मोन्स के कारण गर्भाशय कैंसर का खतरा होता है।
लक्षणों की बात करें तो
· महिला को पीरियड्स के अलावा भी ब्लीडिंग की समस्या रहती है।
· उसे पेल्विक पेन यानि पेड़ू में काफी दर्द होता है।
· बार-बार यूरिन आता है और साथ ही दर्द भी होता है।
· मेनोपॉज होने के बाद भी ब्लीडिंग होती है।
· इंटरकोर्स के समय दर्द।
· मल त्यागते समय भी परेशानी होती है।
अगर ऐसा हो रहा है या फिर लगातार बहुत ज्यादा लिक्विड डिस्चार्ज हो रहा है तो तुरंत गायनकोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए।
साभार : https://nari.punjabkesari.in/nari/news/if-you-use-straightener-for-hair-then-be-careful-it-is-causing-cancer-1702982
शराब और स्टेरॉयड से कूल्हा, मिलावटी खाने से घुटने हो रहे खराब
युवाओं के शराब और स्टेरॉयड के सेवन से कूल्हे खराब हो रहे हैं। मिलावटी खाना, पैदल न चलने और फास्ट फूड का सेवन करने से घुटने दम तोडऩे लगे हैं। ऐसे में कम उम्र में घुटना और कूल्हा प्रत्यारोपण करना पड़ रहा है।

इंजीनियरिंग, मेडिकल सहित अन्य प्रोफेशनल के छात्र 18 से 20 साल की उम्र में शराब का सेवन करना शुरू कर देते हैं। वहीं, जिम जा रहे युवा स्टेरॉयड पाउडर का सेवन कर रहे हैं। इसका लगातार पांच साल सेवन करने से कूल्हे में एक वैस्कुलर नेक्रोसिस हो रही है, इससे कूल्हे की बॉल में खून की सप्लाई बाधित हो रही है। इससे बॉल सूखने लगती है और कूल्हा खराब हो जाता है, इस तरह के केस में दोनों कूल्हे खराब होते हैं। 25 से 30 साल की उम्र के युवा कूल्हे में दर्द और चलने फिरने में परेशानी होने पर इलाज कराने के लिए आ रहे हैं। ऐसे केस में कूल्हा बदलना पड़ रहा है।
मोटापा, आराम तलब जीवनशैली के साथ ही मिलावटी खाना, सब्जी में केमिकल और पेस्टीसाइड सहित अन्य हानिकारक केमिकल खाद्य पदार्थ और पानी के माध्यम से शरीर में पहुंच रहे हैं। इससे घुटने के कार्टिलेज खराब होने लगते हैं, 40 साल की उम्र में घुटने खराब होने लगे हैं।
साभार : https://www.jagran.com/uttar-pradesh/agra-city-knee-damaged-in-young-age-by-alcohol-and-steroids-jagran-sepcial-20075558.html


