नारी-शक्ति
पंकज ‘स्वदेशी’दिव्य प्रकाशन
समाज में लोगों की आँखों और बातों का जाने क्या जवाब होगा? जब मैं निकलूँगी कामयाबी की राह पर, मेरे घर पर ही सवालों का खड़ा अम्बार होगा। हारूँगी नहीं, थकूँगीं भी नहीं लक्ष्य को प्राप्त करने का जनून मेरे सर पर जब सवार होगा। यही वह जमाना होगा, जी हजूर यही वह जमाना होगा जो हाथों में लिए गुलदस्तों व फूलों का हार होगा।
अधिकतर परिवार में सपने बेटे के हों तो उन्हें उत्साह व साथ मिलता है, लेकिन जब बेटी के सपने हों तो कई सारे सवालों का अम्बार मिलता है। जी यह कहानी अधिकतर परिवारों की है। अब ज्यादा पढ़ कर क्या करना है? इतना पढ़ लिया बहुत है घर तो अच्छे से चला लोगी और बच्चे भी पढ़ा लोगी, बेटी जब तेरी शादी हो जाए तब कर लेना जो तेरा मन करे तेरा पति चाहे तो, जो करना है जल्दी कर लो फिर तेरी शादी भी तो करनी है नहीं तो बाद में कोई नहीं करेगा तेरे से शादी उम्र निकल गई तो, लोग क्या सोचेंगे अगर हमने बेटी की शादी समय पर न की तो, संभल कर आगे बढ़ो, लोगों की नजरें अच्छी नहीं हैं, कल को बच्चे भी तो होंगे ज्यादा कमाने में कुछ नहीं रखा बच्चे बिगड़ जाते हैं आजकल के बच्चे। और न जाने क्या-क्या? इतने सारे भावनात्मक प्रहार का सामना करना पड़ता है एक बेटी को, जब वह अपना कॉलेज पास करके ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट पूरी करती है। ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि सारे परिवारों का अपनी बेटी के प्रति ऐसा दृष्टिकोण होता है। लेकिन ऐसा जरूर है, देश के लगभग 80 प्रतिशत से अधिक परिवारों व पुरुषों का।
बेटी का सपना जब अपना सपना बने
आज भी वर्तमान युग में ऐसा ही दृष्टिकोण होता है। जो हमारा ग्रामीण भारत है, जिसमें देश की अधिकतर आबादी वास करती है और शहरों में भी अधिकतर परिवारों में एक बेटी का कोई बड़ा सपना देखना माता-पिता के लिए खुशी के स्थान पर सवाल बन जाता है। और यदि यह सपना बेटी का संकल्प बन जाए तो वो हो जाता है जो कर्णम मल्लेश्वरी ने किया। कर्णम मल्लेश्वरी भारत को साल 2000 में कास्य पदक दिलाया था। मेडल के साथ उन्होंने इतिहास अपने नाम किया। वो भारत की पहली महिला ओलंपिक मेडलिस्ट बनीं। इसमें एक और उदाहरण मैरीकॉम का है। मैर कॉम भारतीय खेल जगत का बड़ा नाम है। विश्व चैंपियनशिप से लेकर ओलंपिक मेडल तक विजेता बनने तक शायद ही ऐसी कोई उपलब्धि होगी, जिसे मैरी कॉम ने हासिल न किया हो। यही वजह है कि मैरीकॉम देश की तमाम महिलाओं को खेल जगत के लिए प्रेरित करती आई हैं। जीवन में कई मुश्किलों को पार करते हुए आखिरकार महिला बॉक्सिंग ओलंपिक में मैरीकॉम ने कांस्य पदक जीता। ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप के अलावा एशियाई खेलों में भी मैरी कॉम का प्रदर्शन बेहतरीन रहा है। जहाँ उन्होंने 5 स्वर्ण 1 रजत पदक अपने नाम किए। ऐसे ही साइना नेहवाल ओलंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, जिन्होंने 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था। भारत की स्टार बैडमिंटन प्लेयर पीवी सिंधु ने तो इतिहास ही रच दिया है। वे ओलंपिक में लगातार 2 मेडल जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बन गईं। वह वल्र्ड चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय शटलर हैं। ऐसे ही साक्षी मलिक भारतीय महिला पहलवान हैं। इन्होंने ब्राजील 2016 के ओलम्पिक में कांस्य पदक जीता है। भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली वे पहली महिला पहलवान हैं। उडऩ परी पी.टी. उषा, अंजू बॉबी जॉर्ज, अवनि लेखरा, गीता फोगाट, बबीता फोगाट, साइखोम मीराबाई चानू, हिमा दास, तानिया सचदेव, हरमनप्रीत कौर ऐसी अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने वाली महिलाओं के लिए प्रेरणा खिलाडिय़ों की लिस्ट काफी लम्बी है। विभिन्न चुनौतियों से निकलते हुए सामान्य ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर विश्व स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाने वाली इन प्रत्येक महिला खिलाड़ी के संघर्ष की कहानी महान सफलता के परम शिकार पर खत्म होती है।
बेटियों की जिद दुनिया जीतने की
आज खेल ही नहीं आत्मबल, मनोबल व शिक्षा के बल पर भारतीय बालिकाएँ हर क्षेत्र में गौरव का प्रतीक हैं। व्यापार, विज्ञान, अनुसंधान, कला, एन्टरप्रेन्योर, एक्टिविस्ट, राजनीति, डॉक्टर, वकील, इंजिनियर, मैनेजर आदि-आदि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएँ पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर और उनसे आगे बढक़र भी गौरवपूर्ण नेतृत्व कर रही हैं। आज हम जहाँ भी देखते हैं। महिलाओं ने रूढि़वादी धाराओं के विपरीत पुरुषार्थ कर अद्भुत सफलताएं अर्जित की हैं, निश्चित इसमें परिवार के सदस्यों, पुरुषों का सहयोग रहा होगा परन्तु इसमें उन महिलाओं की जि़द आगे बढऩे की उसका महत्व प्रथम रहा है। कहते हैं न जिद करो और दुनिया जीतो, ऐसा ही कुछ हुआ है। नहीं तो उन्हें रोकने वाली सोच और आँखे बहुत थीं और आज भी हैं। महिलाओं ने अपनी तेज तर्रार तर्क की शक्ति से समाज के फर्क को मिटाया है।
राष्ट्र की प्रगति में घातक रूढि़वादी सोच
तर्क उन सबसे जिन्होंने उन्हें आगे बढऩे से रोका, उसमें पुरानी सोच की महिलाएँ व पुरुष दोनों समाहित हैं और ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्र में यह फर्क आज भी जीवित है। यह सोच राष्ट्र की प्रगति के लिए घोर घातक है, राष्ट्र की लगभग 50% आबादी को यह बोल दिया जाए की वह केवल घर-परिवार को संभालने के लिए है, बच्चों के लालन-पालन के लिए है तो यह विश्व में भारत को आगे नहीं बढऩे देगा। तभी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला क्षेत्र होते हुए भी भारत ने धीरे-धीरे प्रगति की और कुछ राष्ट्र कम आबादी वाले राष्ट्र होते हुए भी बहुत आगे निकल गए। इसके अन्य कारण भी हैं परन्तु यह भी इसमें एक कारण रहा है। पिछले लगभग दो दशकों से जब हम देखते हैं, भारत के महिला व पुरुष कंधे से कंधा मिला के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं तो भारत भी हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है। लेकिन अभी भी बहुत विकृतियाँ-कृतियाँ हैं जो पुरुष समाज को समझनी होंगी। ईश्वर के प्रति तो सबकी गहरी आस्था है। उस अदृश्य शक्ति ने सृष्टि का अद्भुत सृजन किया है, उस ईश्वर ने कुछ तो श्रेष्ठ दिया होगा पुरुष की अपेक्षा महिला को जो नए जन्म के लिए उसमें महिला का ही केवल मात्र चयन किया पुरुष का नहीं। पुरुष का जन्म भी तो मातृशक्ति ‘माँ’महिला से हुआ है, जिसके दिव्य गर्भ में ईश्वर की अद्भुत श्रेष्ठ रचना बाल रूप में ‘मानव’की होती है, पुरुष को उसका सम्मान तो रखना ही चाहिए, वासना रूपी दृष्टिकोण नहीं। जब धरती माँ को हम इतना महत्व देते हैं तो स्त्री महिला को क्यों नहीं? चाहे फिर वह किसी भी उम्र या रूप में हमारे समक्ष क्यों न हो? इसका तो पुरुष समाज को चिंतन करना ही होगा। तो फिर महिलाओं को जीवन में प्रगति करने के लिए जो समाज के झूठे पाखंडों की अगर-मगर से गुजरकर सफलता की डगर प्राप्त होती है उनकी वो राह इससे आसान हो जाएगी। आपस के भेद-प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर पुरुष व महिला परस्पर सम्मान का दृष्टिकोण रखते हुए जब जियेंगे तब यह धरती ही स्वर्ग सी प्रतीत होगी, क्लेशों का अखाड़ा नहीं बनेगी। महिलाओं के मन की यह टीस कि समाज में उन्हें समानता का दर्जा नहीं है, उन्हें कमजोर-असहाय लाचार क्यों समझा जाता है, यह टीस ही उन्हें वर्ष दर वर्ष प्रगति के नए आयाम प्रदान करेगी। महिलाओं ने सैकड़ों वर्षों में जो उन्नति की राह प्राप्त की है आने वाले समय में सफलता की यह गति एक दशक से भी कम समय में पूरी हो जाएगी। अर्थात् पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं जिस गति से प्रगति की राह पर हैं, वह दिन दूर नहीं जब महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों से कहीं ज्यादा सफल होंगी और भारत का गौरव पूरे विश्व में बढ़ाएँगीं। मातृ शक्ति को प्रणाम ...


