पतंजलि का संकल्पित आंदोलन
डॉ. रुपेश शर्मा, योग संदेश विभाग
भारत में हर तरफ भौतिक विकास तो हो रहा है परन्तु व्यक्ति के उत्कृष्ट चिंतन, संकल्प व स्वास्थ्य आदि आंतरिक सभी प्रणालियों में गिरावट आयी है। मृत्यु दर घटी है, औसतन आयुष्य बढ़ा है परन्तु बीमारी उससे सैकड़ो गुणा बढ़ी है। 60 से 80 वर्ष की उम्र तक पहले कोई-कोई व्यक्ति बीमार नहीं होता था एवं दवाई का प्रयोग भी बहुत कम करना पड़ता था। परन्तु अब स्थिति यह है कि स्वस्थ व्यक्ति तो कोई-कोई है, दवाओं का प्रयोग सैकड़ों गुना बढ़ गया। ऐसा होना देश के विकास में बाधक है और यह सही इशारा नहीं है। यह विडम्बना है कि आज जिन के पास धन एवं अन्य साधन-सामग्री की कोई कमी नहीं है, वे प्राय: अस्वस्थ होने के कारण उनका भोग नहीं कर सकते एवं जीवन का अधिकांश समय चिंता और फ्रिक में ही गुजरता है अत: ऐसे अरोग्य के औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं। यह पीड़ा देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व के हर चितंनशील को दशको से सता रही थी, पर इसे व्यक्त करने का कोई उचित प्लेटफॉर्म नहीं था समय के साथ पतंजलि के संकल्पित आंदोलन ने विश्व के सामने योग-आयुर्वेद, शिक्षा-चिकित्सा के पूर्ण आरोग्यता आंदोलन को रखा।
पहला आंदोलन जन-जन तक योग
पूज्य स्वामी रामदेव जी ने वेदों का पाठ किया, इन्हीं वेदों से योग निकला, जिसे पूज्य स्वामी जी ने अपने जीवन में सिद्ध किया और योगऋषि बनें। उसके बाद शुरु होता है जन-जन तक योग और आरोग्य को पहुँचाने का आंदोलन स्वामी जी ने देश में जगह-जगह योग शिविर लगाने का अभियान शुरु किया। यात्रा करने से लाखों-करोड़ों व्यक्ति का परिचय हुआ। अपरिचित व्यक्ति भी अब योग, साधना से न केवल परिचित हुये, अपितु स्वयं योगाभ्यास भी करने लगे। यह आंदोलन का पहला चरण था जिससे हर क्षण किसी न किसी रोग से ग्रस्त रहने वाला व्यक्ति अब स्वस्थ होने की दिशा में अग्रसर हो रहा था। योग, साधना से अनेक व्यक्तियों की मानसिकता भी स्वस्थ हुई। एक उनकी उग्र सोच में सुधार आया। इस आंदोलन का ही परिणाम है वर्तमान में योग व उसकी क्रियाओं से पूरा विश्व परिचित है। देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी स्वयं यौगिक क्रियायें करते हैं। स्वास्थ्य आंदोलन से भारत का बहुयान हुआ है। आज योग का पूरक है पूज्य स्वामी रामदेव जी।
दूसरा आंदोलन आयुर्वेद के लिए
जी हां! यह सत्य है हजारों वर्ष पहले ऋषि-मुनियों द्वारा विकसित निरापद व प्राकृतिक इलाज की विधि है आयुर्वेद। जिसे भारत के लोग भूलते जा रहे थे। इसी वजह से विदेशी अप्राकृतिक इलाज ऐलापैथी भारत में द्र्रुतगति से फैलने में सफल रही। इससे किसी भी प्रकार की आरोग्यता तो बढ़ी नहीं अपितु नये-नये रोगों ने जन्म ले लिया।

दवाईयों को टेक्नोलॉजी व अन्य-अन्य मदों से देश का लाखों-करोड़ों रुपया विदेशियों द्वारा लूटा जाने लगा था और यह क्रम आज भी लगातार जारी है। बड़ी-बड़ी दवाईयों की कम्पनी इस देश की जनता के साथ-साथ इस देश को भी बराबर लूट रही है। लूट की इस बर्बरता को पूज्य स्वामी रामदेव जी ने संज्ञान में लिया और एलोपैथी दवाईयों के खिलाफ आन्दोलन की शुरूआत की और अपनी प्राचीन परम्परा से निर्मित आयुर्वेद उपचार व आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियो को देश के आगे रखा।
पूज्य स्वामी जी महाराज ने राष्ट्रधर्म व राष्ट्रहित को सर्वोपरि लक्ष्य बनाकर आयुर्वेद के लिए आंदोलन की शुरूआत की जिसका परिणाम पतंजलि अनुसंधान संस्थान आज सबके सामने है जहाँ पूरी दुनिया में आयुर्वेद पर क्लिनिकल कंट्रोल ट्रायल तथा ड्रग डिसकवरी का काम सर्वप्रथम पतंजलि के माध्यम से किया जा रहा है। आयुर्वेद जिसे अभी तक मात्र फूड सप्लिमेंट का दर्जा था उसे पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मापदंडो के अनुसार मेडिसिन का दर्जा दिलाने का कार्य किया है। आज ब्लड प्रेशर के लिए मुक्तावटी, मधुमेह के लिए मधुनाशिनी, हृद्य रोगों के लिए हृदयामृत वटी, डेंगू के लिए डेंगूनिल वटी। कोरोना काल में ड्रग माफियाओं ने लाख विवाद और लाख षडय़ंत्र खड़े किये परन्तु लाखों-करोड़ो लोगों को जीवन देने का काम कोरोनिल ने ही किया है। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि दुनिया में कोरोना रोगियों का सबसे ज्यादा रिकवरी रेट और सबसे कम डेथ रेट भारत में ही है और इसमें सबसे बड़ा योगदान पतंजलि योगपीठ का है। उन्होनें कहा कि पतंजलि ने योग और आयुर्वेद का समावेश लोगों की जीवनशैली में कराया। उन्होंने कहा कि आज एक छोटी सी महामारी के सामने अमेरिका जैसे विकसित देश ने भी घुटने टेक दिये परंतु हमारी ऋषियेां की प्राचीनत्म विरासत योग व आयुर्वेद से हम घुटने टेकने से बच गये। यह आयुर्वेद की प्रमाणिकता का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। लेकिन फिर भी हम योग व आयुर्वेद को लेकर कही न कही लापरवाह है। जिस योग और आयुर्वेद ने पूरी दुनिया को दिशा देने का काम किया है उसके लिए हम सबकों चेतन व जाग्रत होना ही होगा। योग व आयुर्वेद की विद्या के आत्मसात् करने के लिए आंदोलित होना ही होगा। पूज्य स्वामी जी ने आयुर्वेद को लेकर जो आंदोलन छेड़ा है जिससे एलोपैथ का बाजार व ड्रग माफियाओं की कमर टूट गयी हैं।
भारत में इस समय 562 मेडिकल कॉलेज हैजिनमें एम.बी.बी.एस. की 85 हजार सीट है इनमें 286 सरकारी और 276 प्राइवेट मेडिकल है अगर बात आयुर्वेद मेडिकल संस्थानों की करे तो देश में इस समय लगभग 250 आयुर्वेद संस्थान है जिनमें लगभग 10 हजार ग्रेजुएट और 12 हजार पोस्ट ग्रेजुएट सीट है। इसी से आप एलोपैथी एवं आयुर्वेदिक के बीच के अंतर को समझ सकते है इसके अलावा एलोपैथी का बाजार भी बहुत बड़ा है इस समय पूरी दुनिया में ड्रग माफियाओं का सलाना टर्न ओवर 1.3 ट्रिलियन डॉलर यानि 97 लाख करोड़ रुपयें का है औैर अगर भारत की बात करें तो भारत में अंग्रेजी दवाईयां का सलाना टर्नओवर 41 बिलियन डॉलर यानि 3 लाख करोड़ रुपयें का है। पूज्य स्वामी जी महाराज के आयुर्वेद आंदोलन के बाद आयुर्वेद अधिकांश रुप से हमारे देश में ज्यादा लोकप्रिय हुआ है इसे भी आप कुछ आंकड़ो से समझ सकते है देश में आयुर्वेदिक दवाइयों का सलाना कारोबार 10 हजार करोड़ रुपये का है जबकि एक हजार करोड़ रूपये की आयुर्वेदिक दवाईयां निर्यात की जाती है और यदि सभी आयुर्वेदिक उत्पादों की बात करें तो 2018 में इसका सलाना कारोबार 30 हजार रुपये था जो 2024 तक 71 हजार करोड़ का हो सकता है पिछले एक साल में इसमें काफी तेजी आई है जब से कोरोना वायरस आया है तब से सभी आमजन मानस ने कोरोना वायरस से बचने के लिए आयुर्वेदिक काढे की शरण ली है इस काढे को पीकर लाखो लोगों ने अपनी जान बचायी है उसी प्रकार हल्दी वाला दूध आज भी अदरूनी चोट के लिए लाभदायक है। गिलोय का सेवन या अदरक का अधिक सेवन यह सब आयुर्वेद पद्धति के इलाज का हिस्सा है। आयुर्वेद में इन्ही जड़ी-बूटियों से लोगों को सही किया जाता है। इतना ज्ञान भी जो आम जन-मानस को हुआ है वह सब पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के आंदोलन के कारण हुआ हैं। उन्होंने आयुर्वेद को हर घर तक पहुँचाने के लिए चलाया था, जिसकी झलक संम्पूर्ण राष्ट्र में दिखने लगी है। लोग प्राकृतिक चिकित्सा व आयुर्वेद से अपना इलाज करवाकर स्वस्थ हो रहे है क्योंकि आयुर्वेद दवाईयां किसी प्रकार कोई नुकसान स्वास्थ्य में नहीं करती। इसके विपरीत एलोपैथी दवाईयां न तो रोगी के रोग को जड़ से खत्म करती है, साथ ही जिन दवाईयों का सेवन रोगी करता है वह अन्य कई बीमारियों को खुद से आमंत्रित करता है, जबकि आयुर्वेद संम्पूर्ण बीमारी का जड़ से खत्म करने की पद्धति है।
स्वदेशी व आत्मनिर्भर भारत के लिए आंदोलन
पूज्य स्वामी जी ने देशभर में भ्रमणकर यह अनुभव किया कि विदेशी कम्पनियां अपने अति मुनाफे हेतु खानपान व स्वाद के लिए कुछ ऐसी चीजे उत्पाद में मिलाते है जिसमें व्यक्ति को रोगी करने वाले तत्व ज्यादा होते हैं। विज्ञापनों की आड़ की वजह से वह ऐसे उत्पादों को भरपूर मात्रा में बेचते है। परिणामत: ऐसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मुनाफा बढ़ रहा है एवं देश में अस्वस्थता भी बढ़ रही है। पूज्य स्वामी जी ने इस घोर पाप को गहराई से समझा। कैसे विदेशी कम्पनियां भारत को लूटकर अपने देश को सम्पन्न करने में लगी हुई हैं। एक समय ऐसा भी था जब हमारे पूर्वज लम्बी आयु जीने वाले होते थे और स्वस्थ रहने वाला हमारा भारत देश आज के परिवेश में भयंकर स्थिति में फसता जा रहा है। भारत में एक समय ऐसा भी था जब किसी एक घर में रोगी होता था, उसे भी प्राचीन ज्ञान के माध्यम से रोगमुक्त कर दिया जाता था, लेकिन आज हर घर में प्रत्येक सदस्य किसी न किसी रोग से पीडि़त है। यह सब गलत खानपान के कारण है। आज हमारे खाद्य पदार्थ दूषित पैदा हो रहे हैं और उनसे बनने वाले उत्पादों का दूषित होना भी स्वाभाविक है। इसके अलावा विदेशी कम्पनियां बाजार में ऐसे नये-नये उत्पाद बेच रही हैं जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान कम और स्वाद पर ध्यान ज्यादा होता है। अत: वह धडल्ले से बिक भी रहे है और उनका मुनाफा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। बस इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर पूज्य स्वामी रामदेव जी ने विदेशी उत्पादों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। पूज्य स्वामी जी ने इसी क्रम में सन् 2006 में पतंजलि आयुर्वेद की स्थापना की जहाँ पर विदेशी कम्पनियों को टक्कर देने के लिए औषधियों का निर्माण किया जाने लगा। पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड़ कम्पनी पूरी तरह से स्वदेशी भारतीय कंपनी बनाई। जहाँ स्वदेशी वस्तुओं का निर्माण स्वदेशी विचारधारा को ध्यान में रखकर किया जाता हैं।
पतंजलि ही एकमात्र ऐसा ब्रांड है जो रोजमर्रा की जिदंगी में उपयोग होने वाली चीजों के मामले में विदेशी ब्रांड को टक्कर दे रहा है। साथ ही धीरे-धीरे विश्व बाजार में अपनी धाक जमाने की कोशिश कर रहा है। इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य लोगों को सस्ता और शुद्धता की गारंटी के साथ उत्पाद उपलब्ध करवाना है और दूसरी तरफ पतंजलि लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाकर युवाओं को राष्ट्र निर्माण की दिशा में कार्य करने का मौका भी दे रहा है। वहीं दूसरी तरफ जो बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियां किसान भाईयों की फसलों को ओने-पौने दामों में खरीदती थी। उन सभी किसान भाईयां को अपनी फसल का उचित मूल्य दिलवाने का कार्य पूज्य स्वामी जी के आशीर्वाद के कारण संभव हो पा रहा हैं।
भारत में पतंजलि फूड हर्बल पार्क की कई इकाईयां स्थापित करने के लिए अग्रसर हैं। महाराष्ट्र सरकार ने पतंजलि फूड पार्क स्थापित करन के लिए 200 एकड़ जमीन आवंटित करने की सहमति दी है। ताकि महाराष्ट्र में भी स्वदेशी हर्बल फूड पार्क बनकर तैयार हो सके। भारत में एफ.एम.सी.जी. उद्योग देश का चौथा सबसे बड़ा उद्योग है। वर्ष 2001-02 पर नजर डाले तो इसका 48,000 करोड़ का व्यापार हुआ था जो आज बढक़र 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपये से भी कही अधिक हैं। और वर्ष 2020 में इसका 7 लाख 24 हजार करोड़ लगभग रही है। यह बाजार औसतन 11 प्रतिशत की वार्षिक दर के साथ बढ़ रहा है जिसमें मुख्य रूप से विदेशी कम्पनियों का हस्तपेक्ष हैं। आज हिन्दुस्तान यूनिलीवर भारत में लगभग 38,224 करोड़ रुपये का वार्षिक व्यापार करती है जिसमें उसको 6080 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ मिलता है इसके अलावा आई.टी.सी., नेस्ले, ग्लैक्सो स्मिथ क्लीन फार्मा व कोलगेट क्रमागत् अन्य विदेशी कम्पनियां है, जो देश मे क्रमानुसार 48268, 11292, 3230-43 व 4500 करोड़ रुपये का व्यापार करती है व 12464, 1606, 445-39 व 775 करोड़ रुपये की लूट हमारे भारत से कर रही है। यह तो मात्र 5 विदेशी एफ.एम.सी.जी. कम्पनियों के आंकड़े है। इन आंकड़ो के माध्यम से पता चलता है कि इतनी बड़ी मात्रा में हमारे देश का धन हम लोग ही जाने-अनजाने विदेशी कम्पनियों को दे देते हैं। और यह सारा धन यह विदेशी कम्पनियां अपने देश ले जाती है जिससे उस देश का विकास हमारे देश से अधिक गति से हो रहा हैं। और हमारा देश लगातार गरीब होता जा रहा है। पूज्य स्वामी जी ने इन विदेशी कम्पनियों के खिलाफ आंदोलन छेड़कर देशवासियों से अपील की है कि वह स्वेदशी पतंजलि कम्पनियों को अपने घरों में जगह दें। पतंजलि एक सशक्त विकल्प बाजार में उपलब्ध करा रहा है। और देश का पैसा बचाकर देश के कल्याणार्थ प्रयोग करना है।
पूज्य स्वामी रामदेव जी कहते है जिस तरह भारत देश के महान क्रान्तिवीरों लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चन्द्रपाल, महात्मा गांधी, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, पडि़त रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस आदि ने इसी बहिष्कार आंदोलन को हथियार बनाकर ईस्ट इण्डिय़ा कम्पनी को भारत से उखाड़ फेंक दिया था। आज फिर इस बहिष्कार के आंदोलन की आवश्यकता है हम सभी भारतवासी को उन हजारों विदेशी कम्पनियों को भारत से भगा देने की कसम खानी चाहिए, जो भारत को लूट रही है जिससे देश का धन देश के बाहर भेज कर देश को को शक्तिहीन बना रहे हैं। अत: जो विदेशी कम्पनियां व्यापार करके देश का धन लूट रही है तथा भ्रष्ट लोग भ्रष्टाचार करके देश को लूट रहे है, उनका हम बहिष्कार करें एवं स्वदेशी को अपनाकर तथा विदेशी व्यापार व भ्रष्टाचार को मिटाकर देश को बचायें। अधिकांश लोग अनजाने में ही विदेशी वस्तुओं का प्रयोग करके राष्ट्रीय पाप के भागीदार बन रहे है और इससे बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान देश को हो रहा है। आज हमें सभी भारतवासियों को मिलकर संकल्प लेना चाहिए कि अपने जीवन से विदेशी कम्पनियों के समानों का 100 प्रतिशत बहिष्कार करेंगे व स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देगें इस कृतज्ञ से नये राष्ट्र का निर्माण होगा।


